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Thursday, April 9, 2015

अलवर के किसानों की जमीन पर जापानी इन्वेस्टमेंट जोन स्थापित करने की सामन्ती घोषणा का विरोध!

प्रेषक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन 
राष्ट्रीय कार्यालय : 7, तंवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
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पत्रांक : /राजस्थान/पत्र/2               दिनांक : 09.04.2015
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प्रेषिति :
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषय : अलवर के किसानों की जमीन पर जापानी इन्वेस्टमेंट जोन स्थापित करने की सामन्ती घोषणा का विरोध!

स्थानीय समाचार-पत्रों के माध्यम से इस संगठन को प्राप्त जानकारी के अनुसार-

1. राजस्थान की मुख्यमंत्री की हैसियत से आप ने निर्वाचित जन प्रतिनिधियों और जमीन के मालिकों से अग्रिम सहमति प्राप्त किये बिना जापान में इकतरफा घोषणा की है कि अलवर में जापानी कम्पनी को आप 500 एकड़ जमीन देंगी। इस खबर से राज्य के और विशेषकर आदिवासी बहुल अलवर जिले के सभी किसान बुरी तरह से भयाक्रान्त हो गये हैं।

2. राज्य के समस्त किसानों की ओर से आपसे यह संगठन जानना चाहता है कि आखिर लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ऐसा सामन्ती निर्णय क्यों? इससे ऐसा क्या राष्ट्रहित होने वाला है कि किसानों की जमीन पर जापानी इन्वेस्टमेंट जोन स्थापित होगा! खबर के अनुसार इसमें सैरेमिक्स, इलेक्ट्रोनिक सिस्टम और मैन्यूफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर फोकस होगा। इससे किसानों की आने वाली पीढियों को क्या स्थायी परिलाभ होगा?

3. सर्वविदित है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती हैं। इसलिये सरकार को जनता को यह बतलाना चाहिए कि-क्या आपके द्वारा उक्त निर्णय लिये जाने और जापान में घोषणा करने से पूर्व क्या इस तथ्य का आकलन किया गया है-कि जापानी कम्पनी को 500 एकड़ जमीन सौंपने के कारण अलवर के कितने किसान परिवार रोड पर आ जायेंगे और उनके सदस्य हमेशा को बेरोजगार हो जायेंगे?

4. यदि आपकी सरकार द्वारा ऐसा आकलन नहीं किया गया तो जनता को जानने का हक है कि क्यों नहीं किया गया? बिना आकलन घोषण क्यों की गयी? जिन किसानों की बेसकीमती उपजाऊ जमीन जापानी कम्पनी/कार्पोरेट को दी जा जाना प्रस्तावित है, उन किसान परिवारों के स्थाई पुनर्वास की क्या कोई वास्तविक और अनुभवसिद्ध योजना सरकार द्वारा बनाकर विधानसभा में अनुमोदित करवायी गयी है? यदि हॉं तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

5. केंद्रीय सरकार द्वारा अलोकतान्त्रिक तरीके से लाये गए अध्यादेश के जरिये लाये गये भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी कानून (काले कानून) की आड़ में इस प्रकार से यदि किसानों की जमीनों को कम्पनियों/कॉर्पोरेट्स को बांटना शुरू किया गया तो आपकी सरकार द्वारा अगले सालों में न जाने कितने किसानों को आत्महत्या करने को मजबूर कर दिया जाएगा?

अत: उपरोक्तानुसार जनहित में आप को अवगत करवाकर आग्रह है कि राज्य में लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा की जाये और राज्य की जमीन को विदेशियों को नहीं बेचा जाये। अन्यथा राज्य में बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, बीमारी, अशिक्षा और अनेक प्रकार के अपराधों को बढावा मिलेगा। जिससे समाज आगे बढने के बजाय पीछे ही जायेगा। यदि किसी बड़े राष्ट्रहित में किसानों की जमीन अधिगृहित की जानी अत्यावश्यक है तो कम से कम अगले सौ वर्ष की कृषि-उपज के बराबर राशि ऐसे जमीन मालिकों को दी जाये और प्रत्येक एक एकड़ जमीन पर प्रभावित जमीन मालिक परिवार के एक-एक व्यक्ति को न्यूनतम तृतीय श्रेणी में सरकारी नौकरी प्रदान की जाये। अन्यथा इस सामन्ती निर्णय के कारण राज्य के किसानों और आम जनता में पनपने वाले असन्तोष के परिणामों के लिये राज्य सरकारी खुद जिम्मेदार होगी। 

भवदीय 

(डॉ. पुरुषोत्तम मीणा)
   राष्ट्रीय प्रमुख

Monday, March 2, 2015

सरकारी उपक्रमों में जाति प्रमाण-पत्र अंग्रेजी प्रारूप में बनवाने की अनिवार्यता क्यों?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा

प्रेस-नोट
सरकारी उपक्रमों में जाति प्रमाण-पत्र अंग्रेजी प्रारूप
में बनवाने की अनिवार्यता क्यों?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
            
जयपुर। हक रक्षक दल सामाजिक संगठन के राष्ट्रीय प्रमुख डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कानूनी सवाल उठाया है कि बिना किसी कानूनी प्रावधान के भारत सरकार के उपक्रमों में आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों से अंग्रेजी प्रारूप में जाति प्रमाण-पत्र बनवाने की मनमानी व्यवस्था क्यों लागू की जा रही है?
डॉ. मीणा ने अपने पत्र में लिखा है कि भारत सरकार के नियन्त्राणाधीन संचालित संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे भर्ती बोर्ड तथा अन्य केन्द्र सरकार के सरकारी व अर्द्ध-सरकारी उपक्रमों द्वारा नौकरी प्राप्ति के इच्छुक आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को हर बार अंग्रेजी की भिन्न-भिन्न भाषा/शब्दावलि में जाति प्रमाण का अंग्रेजी प्रारूप और केवल अंग्रेजी में बनवाने के निर्देश जारी किये जा रहे हैं। जिसके कारण अभ्यर्थियों को एक ही वर्ष में अनेक बार जाति-प्रमाण-पत्र बनवाने पड़ते हैं। जिसमें बेरोजगार अभ्यर्थियों का गैर-जरूरी खर्चा तो होता ही साथ ही साथ, विशेषकर हिन्दी भाषी या गैर-हिन्दी व गैर अंग्रेजी भाषी राज्यों में सरकारी कार्यालयों में कार्यरत लोक सेवकों द्वारा अंग्रेजी में बनाये जाने वाले जाति प्रमाण-पत्रों में अंग्रेजी भाषा में प्रवीणता नहीं होने के कारण, अनेक प्रकार की त्रुटियॉं भी छोड़ दी जाती हैं। जिनका खामियाजा अन्तत: जाति प्रमाण-पत्र धारी अभ्यर्थियों को ही भुगतना पड़ता है।

उपरोक्त के अलावा डॉ. मीणा ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि भारत सरकार के अधीन कार्यरत सरकारी एवं अर्द्ध-सरकारी उपक्रमों में नौकरी प्राप्त करने एवं शिक्षण संस्थानों में प्रवेश प्राप्ति हेतु आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर प्रस्तुत करने हेतु अंगे्रजी भाषा में मनमाने प्रारूप बनाकर जारी किये जा रहे हैं, जो राजभाषा अधिनियम, 1976 का खुला उल्लंघन और अपमान है। क्योंकि ऐसा करने से राजभाषा अधिनियम के अनुसार भारत के ‘क’ एवं ‘ख’ क्षेत्रों में हिन्दी भाषा में कार्य करने के संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने में खुद सरकारी उपक्रमों द्वारा ही रुकावट पैदा की जा रही है।

पत्र के अन्त में डॉ. मीणा ने लिखा है कि उक्त मनमानी एवं असंवैधानिक प्रक्रिया पर तत्काल पाबन्दी लगायी जावे और आरक्षित वर्गों के संरक्षण हेतु भारत सरकार द्वारा निम्न कार्यवाही की जावे-

  • 1. भारत सरकार की ओर से हिन्दी और स्थानीय भाषाओं में जाति प्रमाण-पत्रों के प्रारूप जारी किये जावें।
  • 2. अभ्यर्थियों को उनकी सुविधानुसार किसी भी भाषा के भारत सरकार के निर्धारित प्रारूप में जाति प्रमाण-पत्र बनवाने की संवैधानिक आजादी है, जिसकी सुरक्षा के लिये प्रशासन को सख्त निर्देश जारी किये जावें।
  • 3. अंग्रेजी में या मनमाने तरीके से निर्धारित किये जाने वाले प्रारूपों में हर बार नये-नये प्रारूपों में केवल अंग्रेजी में ही जाति प्रमाण-पत्र बनवाने के निर्देश जारी करने पर पाबन्दी लगायी जावे।
  • 4. उक्त निर्देशों की पालना नहीं करने वाले प्राधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही की जावे।

सधन्यवाद।
भवदीय
(डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’)
राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल

Monday, October 13, 2014

समाज सेवकों के वेश में भावी मनुवादी जन प्रतिनिधि तैयार हो रहे हैं?


डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

राजस्थान सरकार की पूर्ववर्ती कांग्रेसी और वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार के प्राश्रय से राजस्थान में 'मीणा' जनजाति को आरक्षित वर्ग में से बाहर निकालने के दुराशय से एक सुनियोजित षड़यंत्र चल रहा है। जिसके तहत 'मीणा' जनजाति के बारे में भ्रम फैलाया जा रहा है की 'मीणा' और 'मीना' दो भिन्न जातियां हैं। 'मीना' को जनजाति और 'मीणा' को सामान्य जाति बताया जा रहा है। जिसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि शुरू में जारी अधिसूचना में एक सरकारी बाबू ने 'मीणा' जाती को अंग्रेजी में Mina लिख दिया। जिसे बाद में हिन्दी अनुवादक ने ‘मीना’ लिख दिया। इसके बाद से सरकारी बाबू सरकारी रिकार्ड में मीणा जनजाति को समानार्थी और पर्याय के रूप में (Meena/Mina) (मीणा/मीना) लिखते आये हैं। राज्य सरकार के सक्षम प्राधिकारियों द्वारा 'मीणा' और 'मीना' दोनों नामों से जनजाति के जाति प्रमाण पत्र भी 'मीणा' जाति के लोगों को शुरू से जारी किये जाते रहे हैं। अनेक ऐसे भी उदाहरण देखने को मिल रहे हैं, जहॉं पर एक ही परिवार में बेटा का 'मीणा' और बाप का 'मीना' नाम से जनजाति प्रमाण पात्र जारी किये हुआ है।


इसके उपरांत भी मनुवादियों, पूंजीपतियों और काले अंग्रेजों द्वारा आरक्षित वर्गों के विरुद्ध संचालित 'समानता मंच' के कागजी विरोध को आधार बनाकर और समानता मंच द्वारा किये जा रहे न्यायिक दुरूपयोग के चलते मनुवादी राजस्थान सरकार ने आदेश जारी कर दिये हैं कि यद्यपि अभी तक 'मीणा' और 'मीना' दोनों नामों से 'मीणा' जाति को जनजाति प्रमाण-पत्र जारी किये जाते रहे हैं, लेकिन भविष्य में सक्षम प्राधिकारी  ‘मीणा’ जाति को जनजाति के प्रमाण पत्र जारी नहीं करें और जिनको पूर्व में 'मीणा' जन जाति के प्रमाण-पत्र जारी किये गये हैं, उनके भी 'मीना' नाम से जनजाति प्रमाण-पत्र जारी नहीं किये जावें। आदेशें में यह भी कहा गया है कि इन आदेशों को उल्लंघन करने पर अनुशासनिक कार्यवाही की जायेगी।

यहॉं स्वाभाविक रूप से यह सवाल भी उठता है कि यदि ‘मीना’ जाति ही जनजाति है तो 'मीना' जाति के लोगों को 'मीणा जनजाति' के प्रमाण-पत्र जारी करने वाले प्राधिकारियों के विरुद्ध राज्य सरकार द्वारा कोई अनुशासनिक कार्यवाही किये बिना इस प्रकार के आदेश कैसे जारी किये जा सकते हैं? विशेषकर तब जबकि 'मीणा' जनजाति के नाम से सरकार की ओर से जारी किये गये जन के जाति प्रमाण-पत्रों के आधार पर हजारों की संख्या में 'मीणा' जनजाति के कर्मचारी और अधिकारी सेवारत हैं। यही नहीं जब पहली बार मीणा जनजाति को जनजातियों की सूची में शामिल किया गया था तो काका कालेकर कमेटी ने अपनी अनुशंसा में हिन्दी में साफ़ तौर पर 'मीणा' लिखा था।

उपरोक्त सरासर किये जा रहे अन्याय और मनमानी के खिलाफ जयपुर में मीणा जाति की और से 12 अक्टूबर, 2014 को सांकेतिक धरने का आयोजन किया गया। जहॉं पर एक बात देखने को मिली कि मीणा समाज के लोग अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ तो खुलकर बोले, लेकिन राजनैतिक बातें करने से कतराते दिखे।

इस बारे में मेरा यह मानना और कहना है कि यह सर्व विदित है की आज के समय में कहने को तो देश संविधान द्वारा संचालित हो रहा है, मगर सच तो ये है कि सब कुछ, बल्कि सारी की सारी व्यवस्था ही राजनीति और ब्यूरोक्रेसी के शिकंजे में है, राजनेता तथा ब्यूरोक्रेट्स राजनैतिक पार्टियों के कब्जे में हैं। राजनैतिक पार्टियों पर मनुवादियों, पूंजिपतियों और काले अंग्रेजों का सम्पूर्ण कब्जा है। मतलब साफ़ है कि सारे देश पर संविधान का नहीं मनुवादियों, पूंजिपतियों और काले अंग्रेजों का कब्जा है। जब तक देश मनुवादियों, पूंजिपतियों और काले अंग्रेजों के कब्जे से मुक्त नहीं होगा, देश का हर व्यक्ति मनुवादियों, पूंजिपतियों और काले अंग्रेजों द्वारा संचालित मनमानी व्यवस्था का गुलाम ही बना रहेगा। 

इस सबके उपरान्त भी 'मीणा' जाति ही नहीं, अकसर सभी समाजों के मंचों पर चिल्ला-चिल्ला कर घोषणा करवाई जाती हैं कि यहां राजनीति के बारे में कोई चर्चा नहीं की जाएगी। केवल इस डर से कि राजनीति की चर्चा करने से ऐसा नहीं हो कि 'मीणा' समाज के राजनेताओं का समर्थन मिलने में किसी प्रकार की दिक्कत पैदा नहीं हो जाये। इसके विपरीत इस बात को भी सभी जानते हैं कि राजनेता अपनी-अपनी पार्टी की जी हुजूरी पहले करते हैं। इसके बाद देश, समाज या अपनी जाति के बारे में सोचते हैं। फिर भी राजनीति के बारे में चर्चा क्यों नहीं होनी ही चाहिए? इस बात का कोई जवाब नहीं दिया जाता है।

ऐसी सोच रखने वालों से मेरा सीधा सवाल है कि राजनीति कोई आपराधिक या घृणित या असंवैधानिक या प्रतिबंधित शब्द तो है नहीं? राजनीति हमारे यहॉं संवैधानिक अवधारणा है। जिससे संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र संचालित हो रहा है। ऐसे में राजनेताओं और राजनीति दोनों की अच्छाइयों और बुराइयों पर खुलकर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए? यदि चर्चा पर ही पाबंदी रहेगी तो फिर समाज को राजनीतिक दलों और राजनेताओं की असलियत का ज्ञान कैसे होगा? राजनैतिक अज्ञानता के कारण मनुवादियों की धोती धोने वाले और मनुवादियों की जूतियां उठाने वाले लोगों को आरक्षित क्षेत्रों से उम्मीदवार बनाया जाता है! जो समाज की नहीं अपनी पार्टियों की चिंता करते हैं। येन केन प्रकारेण जुटाये जाने वाले अपने वोटों की चिंता करते हैं। ऐसे में विचारणीय विषय यह होना चाहिए कि यदि आम जनता को राजनीति की हकीकत का ज्ञान ही नहीं करवाया जायेगा तो फिर वंचित, शोषित और पिछड़े तबकों के हकों की रक्षा करने वाले सच्चे राजनेताओं का उद्भव (जन्म) कैसे होगा?

12 अक्टूबर, 2014 को जयपुर में आयोजित उक्त मीणा-मीना मुद्दे के विरोध में आयोजित धरने कार्यक्रम का मैं साक्षी रहा। जिसमें मीणा-मीना मुद्दे पर खूब सार्थक और निरर्थक भाषण बाजी भी हुई। दबी जुबान में राजनैतिक बातें भी कही गयी। कभी दबी तो कभी ऊंची आवाज में सरकार को भी ललकारा गया। मनुवादियों द्वारा संचालित आरक्षण विरोधी 'समानता मंच' की बात भी इक्का दुक्का वक्ताओं ने उठायी। जिसे मंच तथा धराना आयोजकों की और से कोई खास तबज्जो नहीं दी। अर्थात 'समानता मंच' के विरोध को समर्थन नहीं मिला। यही नहीं बल्कि सबसे दुखद विषय तो ये रहा कि आरक्षित वर्गों का जो असली दुश्मन है, अर्थात मनुवाद, उसके बारे में एक शब्द भी किसी भी वक्ता ने नहीं बोला। 

अभी तक देखा जाता था कि राजनेता मनुवाद के खिलाफ बोलने से कतराते थे या इस मुद्दे पर चुप रहते थे तो आम लोग कहते थे कि राजनेता वोटों के चक्कर में मनुवाद के खिलाफ नहीं बोलते। मगर मीणा समाज के हकों की बात करने वाले मीणा समाज के कथित समाज सेवक भी इस बारे में केवल चुप ही नहीं दिखे, बल्कि इस मुद्दे से जानबूझकर बचते भी दिखे। मैंने मंच पर अनेकों से इस बारे में निजी तौर पर चर्चा भी की, तो सबने माना कि मनुवाद ही आरक्षण का असली दुश्मन है, मगर बिना कोई ठोस कारण या वजह के सब के सब मनुवाद के खिलाफ बोलने से बचते और डरे-सहमे नजर आये। ऐसे में मेरे मन में दो सवाल उठते हैं-

क्या मीणा समाज के समाज सेवकों को मनुवादियों से डर लगता है?

या

समाज सेवकों के वेश में भावी मनुवादी जन प्रतिनिधि तैयार हो रहे हैं?

Saturday, September 20, 2014

आर्य-वैदिक साहित्य में आदिवासियों के पूर्वजों का राक्षस, असुर, दानव, दैत्य आदि के रूप में उल्लेख

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

रामायण में असुर की उत्पत्ति का उल्लेख :-

सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्याभिविश्रुता:।
अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्‍चासुरा: स्मृता:॥

उक्त श्‍लोक के अनुसार सुरा का अर्थ ‘मादक द्रव्य-शराब’ है। चूंकि आर्य लोग मादक तत्व सुरा का प्रारम्भ से पान (सेवन) करते थे। इस कारण आर्यों के कथित देव (देवता) सुर कहलाये और सुरा का पान नहीं करने वाले मूल-भारतवासी असुर (जिन्हें आर्यों द्वारा अदेव कहा गया) कहलाये। जबकि इसके उलट यदि आर्यों द्वारा रचित वेदों में उल्लिखित सन्दर्भों पर दृष्टि डालें तो ज्ञात होता है कि आर्यों के आगमन से पूर्व तक यहॉं के मूल निवासियों द्वारा ‘असुर’ शब्द को विशिष्ठ सम्मान सूचक अर्थ में विशेषण के रूप में उपयोग किया जाता था। क्योंकि संस्कृत में असुर को संधि विच्छेद करके ‘असु+र’ दो हिस्सों में विभाजित किया है और ‘असु’ का अर्थ ‘प्राण’ तथा ‘र’ का अर्थ ‘वाला’-‘प्राणवाला’ दर्शाया गया है।

एक अन्य स्थान पर असुनीति का अर्थ प्राणनीति बताया गया है। ॠग्वेद (10.59.56) में भी इसकी पुष्टि की गयी है। इस प्रकार प्रारम्भिक काल में ‘असुर’ का भावार्थ ‘प्राणवान’ और ‘शक्तिशाली’ के रूप में दर्शाया गया है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि अनार्यों में असुर विशेषण से सम्मानित व्यक्ति को इतना अधिक सम्मान व महत्व प्राप्त था कि उससे प्रभावित होकर शुरू-शुरू में आर्यों द्वारा रचित वेदों में (ॠगवेद में) आर्य-वरुण तथा आर्यों के अन्य कथित देवों के लिये भी ‘असुर’ शब्द का विशेषण के रूप में उपयोग किये जाने का उल्लेख मिलता है। ॠग्वेद के अनुसार असुर विशेषण से सम्मानित व्यक्ति के बारे में यह माना जाता जात था कि वह रहस्यमयी गुणों से युक्त व्यक्ति है।

महाभारत सहित अन्य प्रचलित कथाओं में भी असुरों के विशिष्ट गुणों पर प्रकाश डालते हुए उन्हें मानवों में श्रेृष्ठ कोटि के विद्याधरों में शामिल किया गया है।

मगर कालान्तर में आर्यों और अनार्यों के मध्य चले संघर्ष में आर्यों की लगातार हार होती गयी और अनार्य जीतते गये। आर्य लगातार अनार्यों के समक्ष अपमानित और पराजित होते गये। इस कुण्ठा के चलते आर्य-सुरों अर्थात सुरा का पान करने वाले आर्यों के दुश्मन के रूप में सुरों के दुश्मनों को ‘असुर’ कहकर सम्बोधित किया गया। आर्यों के कथित देवताओं को ‘सुर’ लिखा गया है और उनकी हॉं में हॉं नहीं मिलाने वाले या उनके दुश्मनों को ‘असुर’ कहा गया। इस प्रकार यहॉं पर आर्यों ने असुर का दूसरा अर्थ यह दिया कि जो सुर (देवता) नहीं है, या जो सुरा (शराब) का सेवन नहीं करता है-वो असुर है।

लेकिन इसके बाद में ब्राह्मणों द्वारा रचित कथित संस्कृत धर्म ग्रंथों में असुर, दैत्य एवं दानव को समानार्थी के रूप में उपयोग किया गया है। जबकि ऐसा उल्लेख मिलता है कि प्रारम्भ में ‘दैत्य’ और ‘दानव’ असुर जाति के दो विभाग थे। क्योंकि असुर जाति के दिति के पुत्र ‘दैत्य’ और दनु के पुत्र ‘दानव’ कहलाये। जो आगे चलकर दैत्य, दैतेय, दनुज, इन्द्रारि, दानव, शुक्रशिष्य, दितिसुत, दूर्वदेव, सुरद्विट्, देवरिपु, देवारि आदि नामों से जाने गये।

जहॉं तक राक्षस शब्द की उत्पत्ति का सवाल है तो आचार्य चुतरसेन द्वारा लिखित महानतम ऐतिहासिक औपन्यासिक कृति ‘वयं रक्षाम:’ और उसके खण्ड दो में प्रस्तुत किये गये साक्ष्यों पर गौर करें तो आर्यों के आक्रमणों से अपने कबीलों की सुरक्षा के लिये भारत के मूल निवासियों द्वारा हर एक कबीले में बलिष्ठ यौद्धाओं को वहॉं के निवासियों को ‘रक्षकों’ के रूप में नियुक्ति किया गया। ‘रक्षक समूह’ को ‘रक्षक दल’ कहा गया और रक्षकों पर निर्भर अनार्यों की संस्कृति को ‘रक्ष संस्कृति’ का नाम दिया गया। यही रक्ष संस्कृति कालान्तर में आर्यों द्वारा ‘रक्ष संस्कृति’ से ‘राक्षस प्रजाति’ बना दी गयी।

निष्कर्ष : इस प्रकार स्पष्ट है कि आर्यों के आगमन से पूर्व यहॉं के मूल निवासी अनार्यों का भारत के जनपदों (राज्यों) (नीचे टिप्पणी भी पढें) पर सम्पूर्ण स्वामित्व और अधिपत्य था। जिन्होंने व्यापारी बनकर आये और यहीं पर बस गये आर्यों को अनेकों बार युद्धभूमि में धूल चटायी। जिन्हें अपने दुश्मन मानने वाले आर्यों ने बाद में घृणासूचक रूप में दैत्य, दानव, असुर, राक्षस आदि नामों से अपने कथित धर्म ग्रंथों उल्लेखित किया है। जबकि असुर भारत के मूल निवासी थे और वर्तमान में उन्हीं मूलनिवासियों के वंशजों को आदिवासी कहा जाता है।

टिप्पणी : अनार्य जनपदों में मछली के भौगोलिक आकार का एक मतस्य नामक जनपद भी था, जिसके ध्वज में मतस्य अर्थात् मछली अंकित होती थी-मीणा उसी जनपद के वंशज हैं। चालाक आर्यों द्वारा मीणाओं को विष्णू के मतस्य अवतार का वंशज घोषित करके आर्यों में शामिल करने का षड़यंत्र रचा गया और पिछले चार दशकों में जगह-जगह मीन भगवान के मन्दिरों की स्थापना करवा दी। जिससे कि मीणाओं का आदिवासी दर्जा समाप्त करवाया जा सके।
स्रोत : ‘हिन्दू धर्मकोश’, वयं रक्षाम: और अन्य सन्दर्भ।
लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ प्रमुख-हक रक्षक दल
(‘हक रक्षक दल’-अनार्यों के हक की आवाज)