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Wednesday, March 9, 2016

रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया : मूलवासी-आदिवासी
समस्त प्रजातियों को एकजुट होने की जरूरत है!!
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
भारत के मूलमालिक, मूलवासी, आदिनिवासी, जिन्हें आम बोलचाल में आदिवासी कहा जाता है, जबकि संविधानसभा में शामिल मूलवासी प्रतिनिधि जयपाल सिंह मुंडा के तीखे विरोध के बावजूद मूलवासी-आदिवासियों को संविधान में अनुसूचित जन जाति लिखा गया है, जो वर्तमान भारत में सर्वाधिक कष्टमय जीवन जीने को विवश है। जिसका मूल कारण भारत के मूलवासी के साथ संविधान निर्माताओं द्वारा किया गया अन्याय है। मूलवासी प्रजाति का मौलिक अस्तित्व मिटाने के लिए, उसे अजजा नाम दे दिया गया। केवल इतना ही नहीं, बल्कि आदिनिवासी जो हकीकत में रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया हैं, उनकी अनेक प्रजातियों को षड्यंत्र पूर्वक संविधान निर्माताओं, केंद्र सरकार और विधायिका ने अजजा, अजा और ओबीसी में विभाजित कर दिया। इस कारण वर्तमान में भारत के मूलमालिक-मूलवासी की खोज करना, मूलवासियों की पहली और अनिवार्य जरूरत है। जिसमें बकवास वर्ग से प्रभावित और भ्रमित कुछ मूलवासी जो खुद को शूद्र मानते हैं, विदेशी मूल की नस्लों के लिए उपयोग में लाये जाने वाले मूलनिवासी शब्द को गढ़कर और मूलवासियों पर थोपकर बलात् व्यवधान पैदा कर रहे हैं। जिनमें बामसेफी वामन मेश्राम प्रमुख व्यक्ति हैं, जो बामणों द्वारा दी गयी शूद्र नामक गाली को सार्वजनिक रूप से अंगीकार कर के, खुद को शूद्रवंशी मान रहे हैं। जबकि बाबा साहब के अनुसार शूद्र सूर्यवंशी आर्य क्षत्रियों के वंशज थे, जिनका उपनयन संस्कार बन्द कर के बामणों ने उनको शूद्र बना दिया। दूसरी और संसार के सबसे बड़े, क्रूर और दुर्दांत हत्यारे आर्य-ब्राह्मण परशुराम ने समस्त क्षत्रियों की 21 बार अभियान चलाकर निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी थी। वहीं बाबा साहब का कहना है कि वर्तमान अजा, दलित और अछूत जातियां ही शूद्र हैं, इस बात का कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है। बाबा साहब के उक्त निष्कर्ष का आज तक किसी ने खण्डन नहीं किया है। इससे यह तथ्य स्वत: प्रमाणित होता है कि वर्तमान अजा एवं ओबीसी वर्गों में भी अनेक जातियां शूद्रवंशी या विदेशी मूलनिवासी नहीं, बल्कि अदिनिवासी मूलवासी हैं। जो रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया हैं। आज विभिन्न वर्गों में शामिल समस्त रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया-मूलवासी-आदिवासी जातियों को एकजुट होने की जरूरत है। क्योंकि रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया अर्थात अजा, अजजा और ओबीसी में शामिल हम सभी भारत के मूलवासियों की प्रजातियों को एकजुट होकर अनेक मोर्चों पर लड़ना होगा। मूलवासियों को अनेक विदेशी विचारधाराओं से सतत संघर्ष करना होगा। जिनमें गांधीवादी लोग जो मूलवासी को गिरिवासी कहते हैं। याद रहे गांधी ने भारत का वारिसाना हक प्राप्त करने के लिए कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे निरस्त करके कोर्ट ने निर्णय दिया था कि भारत गांधी या  कांग्रेस का नहीं, बल्कि मूलवासी-आदिवासी का देश है, जिसका वारिसाना हक गांधी और उनकी कांग्रेस को नहीं दिया जा सकता। आर्यवंशी विदेशी लोगों द्वारा प्रतिपादित अमानवीय मनुवादी व्यवस्था के पोषक संघी जो भारत के मूलमालिक आदिवासी को वनवासी कहते हैं। इनसे मुक्ति मूलवासियों की सबसे बड़ी चुनौती है। हमारे की मूलवासियों में शामिल प्रजातियों के कुछ लोग जो बामसेफी प्रभाव में हैं, जबकि बामसेफी जो मूलवासी को मूलनिवासी-विदेशी शूद्रों की औलाद सिद्ध करने में जुटे हुए हैं, ये लोग आज मूलवासी-आदिवासी के विरुद्ध सर्वाधिक मूर्खतापूर्ण और आत्मघाती कार्य कर रहे हैं। केंद्र सरकार और अनेक राज्य सरकारें जो देश के मूलवासियों के प्राकृतिक हकों को बलपूर्वक छीन रही हैं और प्रतिरोध करने पर मूलवासी को नक्सलवादी घोषित कर रही हैं। अंत में अफसरशाही जो हमेशा व्यवस्था के नाम पर सत्ता की चाटुकारिता करती है, वो भी मूलवासियों के हकों के विरुद्ध जारी षडयन्त्रों में सहायक सिद्ध हो रही है। अत: रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया : मूलवासी-आदिवासी की अजा, अजजा और ओबीसी में शामिल समस्त प्रजातियों को सबसे पहले शीघ्रता से एकजुट होने की जरूरत है!!
जय भारत। जय संविधान।
नर-नारी सब एक समान।।
लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/09-03-2016/07.37 AM
@—लेखक का संक्षिप्त परिचय : मूलवासी-आदिवासी रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया। होम्योपैथ चिकित्सक और दाम्पत्य विवाद सलाहकार। राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोसिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक) और पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ।

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Saturday, February 27, 2016

केवल आदिवासी ही भारत के मूलवासी हैं।

केवल आदिवासी ही भारत के मूलवासी हैं।
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
हमारे कुछ मित्र दिन-रात "जय मूलनिवासी" और "मूलनिवासी जिंदाबाद" की रट लगाते नहीं थकते। बिना यह जाने और समझे कि मूलनिवासी का मतलब क्या होता है? साथ ही भारत के 85 फीसदी लोगों को भारत के मूलनिवासी घोषित करके, शेष आबादी ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय को विदेशी बतलाते हैं। आश्चर्य कि इनमें से बहुत से खुद को तर्क के समर्थक महामानव बुद्ध के अनुयायी भी बतलाते हैं, लेकिन इनको व्यवहार में बुद्ध के तर्क के सिद्धांत से परहेज है। तर्क करने वाला इनको मूर्ख, गद्दार और मनुवादियों का एजेंट नजर आता है। मूलनिवासी का नारा देने वाले शीर्ष लोग एक विशेष तबके या विशेष मानसिकता के लोग हैं, जो खुद को बुद्धिजीवियों का शिरोमणि मानते हैं। सबसे बड़ा दुःख तो यह है कि इनका बाबा आंबेडकर या कांशीराम या अन्य किसी के मिशन या सामाजिक न्याय या संविधान के प्रावधानों से कोई सरोकार नहीं है। इनको वंचित वर्ग शूद्रों की समस्याओं से भी कोई मतलब नहीं है। इनका लक्ष्य येनकेन प्रकारेण सत्ता पर कब्जा करना है, जिसके लिये इनको नरेंद्र मोदी का प्रचार करने वाली और बामणों को आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करने वाली मायावती साक्षात देवी नजर आती हैं। आएं भी क्यों नहीं, आखिर मायावती के सहारे पहले की भाँति सत्ता की मलाई मिलने की उम्मीद जो जगी रहती है। इनको बाबा साहब और कांशीराम की संदिग्ध मौत की जांच की मांग करना तो दूर इस बारे में बात करना तक गवारा नहीं है। ऐसे लोग भारत की सत्ता पर कब्जा करने के सपने देखते हैं, जिनको बोलने, लिखने और संवाद करने की तहजीब तक नहीं? हकीकत में ऐसे लोग अभिव्यक्ति की आजादी को कुचल देना चाहते हैं। मूलाधिकारों में इनकी कोई आस्था नहीं। वंचित वर्गों की संख्यात्मक दृष्टि से छोटी-छोटी जातियों के प्रति इनके मन में कोई मान-सम्मान या जगह नहीं। सच में इनका व्यवहार ब्राह्मणों से कई गुना अधिक दुराग्रही और तानाशाही है। इनके लिए वंचित वर्गों के महान लोग, जैसे ज्योतिराव फ़ूले, बिरसा मुंडा, पेरियार, बाबा साहब, कांशीराम आदि के विचार, काम और नाम केवल सत्ता पाने की सीढ़ी मात्र हैं। इनको इतनी सी बात समझ में नहीं आती कि आज भारत का प्रत्येक वह व्यक्ति भारत का मूलनिवासी है, जिसके पास मूलनिवास प्रमाण-पत्र है! ये लोग प्रायोजित और तथाकथित डीएनए को आधार बनाकर तर्क करते हैं, लेकिन हजारों सालों से बामणों और आर्य शासकों के यौनाचार के साथ-साथ विवाहेत्तर यौन सम्बंधों के कार्ब उटप्पन्न वर्णशंकर संतति के कड़वे सच पर विचार, चर्चा और तर्क नहीं करना चाहते। इनका मकसद केवल सत्ता है, सत्ता भी वंचित वर्ग के उद्धार के लिए नहीं, बामणों के साथ समझौता करके माल कमाने और नरेंद्र मोदी का प्रचार करने के लिए चाहिए। सत्ता चाहिये जिससे बामणों के हित में अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम को निलम्बित किया जा सके। संघ के लिए राम मन्दिर और धारा 370 का जो महत्व है, वही इनके लिए मूलनिवासी का अर्थ है। अर्थात लोगों को गुमराह करके वोट बैंक तैयार करना। इसलिए ये लोग सत्ता की खातिर वंचित वर्गों को मूलनिवासी के बहाने लगातार गुमराह कर रहे हैं। मूलनिवासी शब्द के बहाने ये लोग केवल खुद को अर्थात एक विशेष तबके को भारत के मूलवासी घोषित करना चाहते हैं। इनसे मेरा सीधा सवाल है कि यदि वास्तव में इनके पूर्वज भारत के मूलवासी थे तो मूलनिवासी जैसे हल्के शब्द को गढ़ने की क्या जरूरत है? अपने आप को भारत के मूलवासी अर्थात आदिवासी क्यों नहीं मानते? सारा संसार जानता है कि भारत के मूलवासी तो आदिवासी हैं। मूलनिवासी तो प्रत्येक देश के सभी नागरिक होते हैं। ईसाई, पारसी, यहूदी, आर्य-क्षत्रिय-शूद्र, अछूत, दलित, ओबीसी, घुमन्तु, विमुक्त, आदिवासी, हूँण, कुषाण, शक, मंगोल, मुगल, आर्य-ब्राह्मण और वैश्यों सहित सभी के वंशज जो भारत के नागरिक हैं, आज कानूनी तौर पर भारत के मूलनिवासी हैं, लेकिन भारत के मूलवासी नहीं हैं। भारत के मूलवासी केवल भारत के आदिवासी हैं। हाँ यदि इतिहास या अन्य किन्हीं साक्ष्य के मार्फत किन्हीं अन्य जाति, समुदायों के भारत के मूलवासी और आदिवासी होने के प्रमाण प्रकट होते हैं, तो सभी को अपने आप को भारत का आदिवासी मानना चाहिये और आदिवासी एकता को मजबूत करना चाहिए। अन्यथा लोगों को गुमराह करने और बुद्ध के नाम की माला जपने और तर्क से भागने का नाटक बन्द करना चाहिए।

जय आदिवासी। जय मूलवासी।
जय भीम। नमो बुद्धाय।
जय भारत। जय संविधान।
नर-नारी सब एक सामान।।
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', 9875066111/27.02.2016.

Sunday, April 19, 2015

मनुवाद से मुक्ति, शुरूआत कैसे?

मनुवाद से मुक्ति,  शुरूआत कैसे?
मनुवादी-धार्मिक-अंधविश्वासों के चलते हर दिन सैकड़ों लोग बेमौत मारे जा रहे हैं!
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सोशल मीडिया के मार्फ़त देशभर में मनुवाद के खिलाफ एक बौद्धिक मुहिम शुरू हो चुकी है। जिसका कुछ-कुछ असर जमीनी स्तर पर भी नजर आने लगा है! लेकिन हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विचारणीय सवाल यह है कि यदि हमें मनुवाद के खिलाफ इस मुहिम को स्थायी रूप से सफल बनाना है तो हमें वास्तव में इस देश के बहुसंख्यक लोगों को और विशेषकर आम लोगों को साथ लेना होगा, जिनको बामसेफ और बसपा वाले बहुजन कहते और लिखते हैं, लेकिन हकीकत में मनुवाद बामसेफ और बसपा के नेतृत्व द्वारा परिभाषित देश के बहुसंख्यक अर्थात बहुजनों के कंधे पर पर ही ज़िंदा है। इसलिए हमें ऐसा सरल और व्यावहारिक रास्ता निकालना होगा, जिससे कि दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक अर्थात सभी अनार्य भारतीय केवल कागजों पर ही नहीं, बल्कि दैनिक व्यवहार में भी मनुवाद के विरुद्ध स्वेच्छा से एकजुट हो सकें, जिसके लिए मनुवाद के विरुद्ध केवल अतिवादी सोच या अतिवादी लेखनी मात्र से कुछ नहीं होगा। बल्कि ऎसी अतिवादी सोच या लेखनी हमें हमारे आम लोगों से दूर भी ले जा सकती है। यह मुहिम दोधारी तलवार जैसी है। मेरा मानना है कि हमें हमारे अनार्य लोगों के साथ सीधा संवाद कायम करना होगा। वातानुकूलित कक्षों से बाहर निकलकर हमें लोगों के बीच जाना होगा, क्योंकि चालाक आर्यों ने मनुवाद को हजारों सालों से धर्म की चासनी में लपेट रखा है। समस्त अनार्य, आर्यों के मनुवादी षड्यंत्र के शिकार होते आये हैं। आज भी मानसिक रूप से हमारे लोग मनुवादियों के गुलाम हैं और सबसे दुखद तो यह है कि उनको इस गुलामी का अहसास ही नहीं है, बल्कि इस मानसिक गुलामी को अनार्य लोग धार्मिक स्वाभिमान और आस्था का प्रतीक मान चुके हैं। उनके अवचेतन मन पर मनुवाद ही धर्म के रूप में स्थापित हो चुका है। हमारे ही लोगों को मनुवाद का विरोध, पहली नजर में धर्म का विरोध नजर आता है, ऐसे में हमें यह विचार करना होगा कि हम किस प्रकार से अपने लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत किये बिना, उनको किस प्रकार से मनुवाद से मुक्ति दिला सकते हैं? क्योंकि यदि हम बिना विचारे मनुवाद और मनुवादी धार्मिक प्रतीकों का सीधा विरोध करते रहे तो ऐसे में सबसे बड़ा खतरा यह है कि आर्य-मनुवादियों तथा अनार्य मनुवादी अंधभक्तों द्वारा हमारी मुहिम को कमजोर करने के लिए हमारे मनुवाद विरोधी सही, सच्चे और तार्किक विचारों को भी हिन्दू धर्म विरोधी करार दिए जाने के लिए पूरे प्रयास किये जायेंगे। बल्कि किये भी जा रहे हैं। जातीय खाप पंचायतों को हमारे खिलाफ खडा किया जा सकता है। जिनमें न तर्क सुने जाते हैं और न ही वहां पर, उनसे न्याय की अपेक्षा की जा सकती है! यही नहीं धर्म के नाम पर हमारे ही लोग हमारे खिलाफ खड़े हो सकते हैं! जिससे हमारी मुहिम पहले दिन से कमजोर हो जाती है। अत: हमको आत्मचिन्तन करना होगा कि मनुवाद के दुश्चक्र को कैसे परास्त किया जाए? इसके लिए हर उस व्यक्ति को जो मनुवाद से आहत है, उसको गहन चिन्तन और मनन करना होगा! यद्यपि मेरा निजी अनुभव है कि मनुवाद से सर्वाधिक आहत मेहतर जाति के लोग तक मनुवाद का खुलकर विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं! लेकिन यह भी सच है कि मनुवाद से मुक्ति के बिना भारत के अनार्यों, मूल निवासियों और वंचित वर्गों के लिए संविधान के अनुसार सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना असम्भव है! इसलिए हमें हर हाल में, लेकिन बौद्धिक तरीके से मनुवाद मुक्त समाज की स्थापना के लिए अनेक स्तरों पर लगातार प्रयास करने होंगे! सबसे पहले हम धर्म के नाम पर संचालित अवैज्ञानिक-अंधविश्वासों और स्वास्थ्य के साथ किये जाने वाले खिलवाड़ के प्रति आम लोगों में जागरण लाना होगा! जैसे उदाहरण के लिए हमें हमारे लोगों को समझाना होगा कि-रात दिन मंदिर, मस्जिद या चर्च में रहने वाला पुजारी, मौलवी या पादरी जब बीमार होता है तो वह अपना उपचार करवाने के लिए सीधा डॉक्टर के पास जाता है, जबकि अनार्य अनपढ़ और भोले लोग बीमार होने पर पुजारी, मौलवी या पादरी के पास जाते हैं! जहां इनको-झाड, फूंक, व्रत, भजन, कीर्तन, पाठ, सवामणी, कथा, गंदा, ताबीज आदि उपचार बतलाये जाते हैं और इस प्रकार मनुवादी धार्मिक अन्धविश्वास के चक्कर में हमारे लोग अपनी बीमारी को असाध्य बना लेते हैं! दुष्परिणामस्वरूप बीमारी इतनी असाध्य हो जाती है, जिसका डॉक्टर भी उपचार करने से इनकार कर देते हैं! बीमार की अकाल मौत हो जाती है! लेकिन मनुवादी इसे भी ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करने और बीमार की अकाल मृत्यु पर भी पुण्य-दान करने की सलाह देते हैं! एक कडवी सच्चाई यह भी है कि ऐसे मनुवादी-धार्मिक-अंधविश्वासों के चलते हर दिन सैकड़ों लोग बेमौत मारे जा रहे हैं! ऎसी मौतों के बाद भी मनुवादियों द्वारा हमें बतलाया जाता है कि दान-पुण्य करने से मृतक को मोक्ष मिलेगा और मृत-आत्मा को पाप नीच योनी से मुक्ति मिलेगी! यदि और कुछ नहीं कर सकते तो हम ऎसी पोंगापंथी धूर्त मनुवादी कहानियों से तो हम अपने अनार्य बन्धुओं को बचा ही सकते हैं! शुरूआत में ऐसे प्रयोग मनुवादी शिकंजे से मुक्ति के पुख्ता आधार बन सकते हैं!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 19.04.2015

Thursday, April 9, 2015

अलवर के किसानों की जमीन पर जापानी इन्वेस्टमेंट जोन स्थापित करने की सामन्ती घोषणा का विरोध!

प्रेषक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन 
राष्ट्रीय कार्यालय : 7, तंवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
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पत्रांक : /राजस्थान/पत्र/2               दिनांक : 09.04.2015
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प्रेषिति :
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषय : अलवर के किसानों की जमीन पर जापानी इन्वेस्टमेंट जोन स्थापित करने की सामन्ती घोषणा का विरोध!

स्थानीय समाचार-पत्रों के माध्यम से इस संगठन को प्राप्त जानकारी के अनुसार-

1. राजस्थान की मुख्यमंत्री की हैसियत से आप ने निर्वाचित जन प्रतिनिधियों और जमीन के मालिकों से अग्रिम सहमति प्राप्त किये बिना जापान में इकतरफा घोषणा की है कि अलवर में जापानी कम्पनी को आप 500 एकड़ जमीन देंगी। इस खबर से राज्य के और विशेषकर आदिवासी बहुल अलवर जिले के सभी किसान बुरी तरह से भयाक्रान्त हो गये हैं।

2. राज्य के समस्त किसानों की ओर से आपसे यह संगठन जानना चाहता है कि आखिर लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ऐसा सामन्ती निर्णय क्यों? इससे ऐसा क्या राष्ट्रहित होने वाला है कि किसानों की जमीन पर जापानी इन्वेस्टमेंट जोन स्थापित होगा! खबर के अनुसार इसमें सैरेमिक्स, इलेक्ट्रोनिक सिस्टम और मैन्यूफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर फोकस होगा। इससे किसानों की आने वाली पीढियों को क्या स्थायी परिलाभ होगा?

3. सर्वविदित है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती हैं। इसलिये सरकार को जनता को यह बतलाना चाहिए कि-क्या आपके द्वारा उक्त निर्णय लिये जाने और जापान में घोषणा करने से पूर्व क्या इस तथ्य का आकलन किया गया है-कि जापानी कम्पनी को 500 एकड़ जमीन सौंपने के कारण अलवर के कितने किसान परिवार रोड पर आ जायेंगे और उनके सदस्य हमेशा को बेरोजगार हो जायेंगे?

4. यदि आपकी सरकार द्वारा ऐसा आकलन नहीं किया गया तो जनता को जानने का हक है कि क्यों नहीं किया गया? बिना आकलन घोषण क्यों की गयी? जिन किसानों की बेसकीमती उपजाऊ जमीन जापानी कम्पनी/कार्पोरेट को दी जा जाना प्रस्तावित है, उन किसान परिवारों के स्थाई पुनर्वास की क्या कोई वास्तविक और अनुभवसिद्ध योजना सरकार द्वारा बनाकर विधानसभा में अनुमोदित करवायी गयी है? यदि हॉं तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

5. केंद्रीय सरकार द्वारा अलोकतान्त्रिक तरीके से लाये गए अध्यादेश के जरिये लाये गये भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी कानून (काले कानून) की आड़ में इस प्रकार से यदि किसानों की जमीनों को कम्पनियों/कॉर्पोरेट्स को बांटना शुरू किया गया तो आपकी सरकार द्वारा अगले सालों में न जाने कितने किसानों को आत्महत्या करने को मजबूर कर दिया जाएगा?

अत: उपरोक्तानुसार जनहित में आप को अवगत करवाकर आग्रह है कि राज्य में लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा की जाये और राज्य की जमीन को विदेशियों को नहीं बेचा जाये। अन्यथा राज्य में बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, बीमारी, अशिक्षा और अनेक प्रकार के अपराधों को बढावा मिलेगा। जिससे समाज आगे बढने के बजाय पीछे ही जायेगा। यदि किसी बड़े राष्ट्रहित में किसानों की जमीन अधिगृहित की जानी अत्यावश्यक है तो कम से कम अगले सौ वर्ष की कृषि-उपज के बराबर राशि ऐसे जमीन मालिकों को दी जाये और प्रत्येक एक एकड़ जमीन पर प्रभावित जमीन मालिक परिवार के एक-एक व्यक्ति को न्यूनतम तृतीय श्रेणी में सरकारी नौकरी प्रदान की जाये। अन्यथा इस सामन्ती निर्णय के कारण राज्य के किसानों और आम जनता में पनपने वाले असन्तोष के परिणामों के लिये राज्य सरकारी खुद जिम्मेदार होगी। 

भवदीय 

(डॉ. पुरुषोत्तम मीणा)
   राष्ट्रीय प्रमुख

Monday, February 9, 2015

यदि भाजपा मांझी को समर्थन देती है तो मांझी का अत्यंत बुरा अंत तय है।

यदि भाजपा #मांझी को समर्थन देती है तो मांझी का अत्यंत बुरा अंत तय है।

बिहार के सबसे विवादास्पद मुख्यमंत्री बना दिए गए #जीतनराम मांझी जनता दल में शामिल होने से पहले कांग्रेसी हुआ करते थे। वह डॉ. जगन्नाथ मिश्र की राज्य सरकार में राज्यमंत्री भी रहे। जनतादल में बिखराव के बाद में जीतनराम मांझी लालू प्रसाद के साथ गए और राष्ट्रीय जनता दल की सरकार मे मंत्री रहे। फिर वह लालू को छोड़ कर नीतीश के साथ हो गये और उनकी सरकार में मंत्री बने। मुख्य मंत्री बनने से पूर्व तक मध्य बिहार में जीतनराम मांझी की छवि एक सीधे-सादे गैर-विवादास्पद राजनेता की रही है। 

जीतनराम मांझी के बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में लगभग आठ महिने के कार्यकाल को देखें तो अपने दामाद को मुख्यमंत्री कार्यालय में पदस्थापित कराने के अलावा उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसे गरिमाहीन या अनैतिक कहा जा सके। दामाद के मामले में भी उन्होंने फ़ौरन कार्रवाई की और उन्हें पदमुक्त कर दिया। 

मनुवादी मीडिया ने मांझी के हर एक सच्चे बयान को विवादित बतलाने और बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। #जनता दल (यू) के नेताओं-विधायकों की मांझी के बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया को भी मीडिया द्वारा ऐसे पेश किया गया, जैसे कि मांझी नीतीश के खिलाफ या सवर्णों और आर्यों के बारे में सच्ची बात बोलकर अपराध कर रहा हैं। 

इस प्रष्ठभूमि में देखा जाए तो बिहार के मुख्‍यमंत्री जीतनराम मांझी का कद केवल बिहार के #महादलितों में ही नहीं, बल्कि बहुत कम समय में देशभर के #दलितों, #पिछड़ों और #आदिवासियों में भी तेजी बढ़ा। जिसे नीतीश और जनता दल (यू) ने बगावत करार दिया। 

जीतनराम मांझी के बगावती तेवर और नीतीश के मुख्‍यमंत्री बनने की जल्‍दबाजी ने 'जनता परिवार' के एकीकरण का सारा खेल बिगाड़ दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आपात स्थिति में नीतीश कुमार ने जिस मांझी को सरकार रूपी नैया की पतवार सौंपी थी, वही आज बगावती सुर अलापकर नैया मझधार में डुबोने पर क्‍यों अमादा हैं?

सारा देश जनता है कि लोकसभा चुनाव में जनता दल (यू) के अत्यधिक घटिया प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 19 मई, 2014 को अपनी कार से जीतन राम मांझी के साथ राजभवन पहुंचे थे। सरकार की कमान संभालने के लायक उन्होंने जीतन राम मांझी को ही समझा था। वही मांझी आज उनके लिए खतरा दिखाई दे रहा है। लेकिन इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करना भी जरूरी है। 

मांझी ने 20 मई, 2014 को 17 अन्य मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। नीतीश ने कहा था कि मांझी सरकार चलाएंगे और वह (नीतीश) संगठन का काम देखेंगे। सवाल यह है कि इन आठ महीनों में ऐसा क्या हो गया? क्‍यों बागी हुए जीतनराम मांझी, जानिये ये रहे असली कारण :-

-नीतीश मांझी को रिमोट से चलाना चाहते थे जो मांझी को कतई भी मंजूर नहीं था। 

-बिहार के भाजपा के कद्दावर नेता सुशील कुमार मोदी सारे विकल्प खुले रहने के बयान देकर भाजपा के समर्थन के स्पष्ट संकेत दिए। दूसरी और उमा भारती ने अपने पटना दौरे के दौरान मांझी से मुलाकात की थी और उन्हें सार्वजनिक रूप से 'गरीबों का मसीहा' बताया था। जिससे मांझी भाजपा के संपर्क में माने जाने लगे।

-राजनीति के जानकार कहते हैं कि इतने दिनों में मांझी की तेजी से महत्वकांक्षा बढ़ती  गई है। प्रारंभ से ही मांझी महादलित नेता के तौर पर खुद को स्थापित करने में लगे थे। मांझी बहुत कम दिनों में अपने समाज के नेता बन गए। कई लोग मांझी के पीछे खड़े नजर आते हैं। इसमें कई मंत्री और विधायक भी शामिल हैं। ऐसे में मांझी का हौसला बुलंद हुआ।

-मांझी के सही और कडवे बयानों से जद (यू) नेतृत्व परेशान हो चुका था। ऐसे में पार्टी नेतृत्व ने मांझी से जब इस्तीफा मांगा तो मांझी बागी से दिखने लगे।

-मांझी की नाराजगी लगातार उनके कामों में हस्तक्षेप को लेकर भी है। पिछले दिनों उनके काम को लेकर पार्टी के प्रवक्ताओं द्वारा की गई बयानबाजी से मांझी खासा नाराज हुए थे। इसके बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के स्थानांतरण को भी दो मंत्रियों ने नियम विरुद्ध बताते हुए मुख्य सचिव से शिकायत की थी।

-कुछ सूत्रों का यह दावा है कि कुछ दिनों पूर्व राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने भी मांझी को खरी-खोटी सुनाई थी। इस कारण मांझी को लेकर जनता दल (यू) में नाराजगी काफी दिनों से थी, परंतु पार्टी अध्यक्ष शरद यादव द्वारा उनसे बिना पूछे पार्टी विधानमंडल दल की बैठक बुलाना आग में घी का काम कर गया और जदयू की नाव हिचकोले खाने लगी। 

अब देखना यह है कि मांझी और जनता दल (यू) की यह नाव किस किनारे लगती है। यदि भाजपा मांझी को समर्थन देती है तो वो मांझी का अत्यंत बुरा अंत तय है। क्योंकि भाजपा रामबिलास पासवान जैसो की भांति मांझी को भी अपनी छत्र छाया में लाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ने वाली। आखिर भाजपा का मकसद दलित और आदिवासियों को नेतृत्व विहीन करना जो है!-डॉ. #पुरुषोत्तम मीणा '#निरंकुश', 

Saturday, September 20, 2014

आर्य-वैदिक साहित्य में आदिवासियों के पूर्वजों का राक्षस, असुर, दानव, दैत्य आदि के रूप में उल्लेख

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

रामायण में असुर की उत्पत्ति का उल्लेख :-

सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्याभिविश्रुता:।
अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्‍चासुरा: स्मृता:॥

उक्त श्‍लोक के अनुसार सुरा का अर्थ ‘मादक द्रव्य-शराब’ है। चूंकि आर्य लोग मादक तत्व सुरा का प्रारम्भ से पान (सेवन) करते थे। इस कारण आर्यों के कथित देव (देवता) सुर कहलाये और सुरा का पान नहीं करने वाले मूल-भारतवासी असुर (जिन्हें आर्यों द्वारा अदेव कहा गया) कहलाये। जबकि इसके उलट यदि आर्यों द्वारा रचित वेदों में उल्लिखित सन्दर्भों पर दृष्टि डालें तो ज्ञात होता है कि आर्यों के आगमन से पूर्व तक यहॉं के मूल निवासियों द्वारा ‘असुर’ शब्द को विशिष्ठ सम्मान सूचक अर्थ में विशेषण के रूप में उपयोग किया जाता था। क्योंकि संस्कृत में असुर को संधि विच्छेद करके ‘असु+र’ दो हिस्सों में विभाजित किया है और ‘असु’ का अर्थ ‘प्राण’ तथा ‘र’ का अर्थ ‘वाला’-‘प्राणवाला’ दर्शाया गया है।

एक अन्य स्थान पर असुनीति का अर्थ प्राणनीति बताया गया है। ॠग्वेद (10.59.56) में भी इसकी पुष्टि की गयी है। इस प्रकार प्रारम्भिक काल में ‘असुर’ का भावार्थ ‘प्राणवान’ और ‘शक्तिशाली’ के रूप में दर्शाया गया है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि अनार्यों में असुर विशेषण से सम्मानित व्यक्ति को इतना अधिक सम्मान व महत्व प्राप्त था कि उससे प्रभावित होकर शुरू-शुरू में आर्यों द्वारा रचित वेदों में (ॠगवेद में) आर्य-वरुण तथा आर्यों के अन्य कथित देवों के लिये भी ‘असुर’ शब्द का विशेषण के रूप में उपयोग किये जाने का उल्लेख मिलता है। ॠग्वेद के अनुसार असुर विशेषण से सम्मानित व्यक्ति के बारे में यह माना जाता जात था कि वह रहस्यमयी गुणों से युक्त व्यक्ति है।

महाभारत सहित अन्य प्रचलित कथाओं में भी असुरों के विशिष्ट गुणों पर प्रकाश डालते हुए उन्हें मानवों में श्रेृष्ठ कोटि के विद्याधरों में शामिल किया गया है।

मगर कालान्तर में आर्यों और अनार्यों के मध्य चले संघर्ष में आर्यों की लगातार हार होती गयी और अनार्य जीतते गये। आर्य लगातार अनार्यों के समक्ष अपमानित और पराजित होते गये। इस कुण्ठा के चलते आर्य-सुरों अर्थात सुरा का पान करने वाले आर्यों के दुश्मन के रूप में सुरों के दुश्मनों को ‘असुर’ कहकर सम्बोधित किया गया। आर्यों के कथित देवताओं को ‘सुर’ लिखा गया है और उनकी हॉं में हॉं नहीं मिलाने वाले या उनके दुश्मनों को ‘असुर’ कहा गया। इस प्रकार यहॉं पर आर्यों ने असुर का दूसरा अर्थ यह दिया कि जो सुर (देवता) नहीं है, या जो सुरा (शराब) का सेवन नहीं करता है-वो असुर है।

लेकिन इसके बाद में ब्राह्मणों द्वारा रचित कथित संस्कृत धर्म ग्रंथों में असुर, दैत्य एवं दानव को समानार्थी के रूप में उपयोग किया गया है। जबकि ऐसा उल्लेख मिलता है कि प्रारम्भ में ‘दैत्य’ और ‘दानव’ असुर जाति के दो विभाग थे। क्योंकि असुर जाति के दिति के पुत्र ‘दैत्य’ और दनु के पुत्र ‘दानव’ कहलाये। जो आगे चलकर दैत्य, दैतेय, दनुज, इन्द्रारि, दानव, शुक्रशिष्य, दितिसुत, दूर्वदेव, सुरद्विट्, देवरिपु, देवारि आदि नामों से जाने गये।

जहॉं तक राक्षस शब्द की उत्पत्ति का सवाल है तो आचार्य चुतरसेन द्वारा लिखित महानतम ऐतिहासिक औपन्यासिक कृति ‘वयं रक्षाम:’ और उसके खण्ड दो में प्रस्तुत किये गये साक्ष्यों पर गौर करें तो आर्यों के आक्रमणों से अपने कबीलों की सुरक्षा के लिये भारत के मूल निवासियों द्वारा हर एक कबीले में बलिष्ठ यौद्धाओं को वहॉं के निवासियों को ‘रक्षकों’ के रूप में नियुक्ति किया गया। ‘रक्षक समूह’ को ‘रक्षक दल’ कहा गया और रक्षकों पर निर्भर अनार्यों की संस्कृति को ‘रक्ष संस्कृति’ का नाम दिया गया। यही रक्ष संस्कृति कालान्तर में आर्यों द्वारा ‘रक्ष संस्कृति’ से ‘राक्षस प्रजाति’ बना दी गयी।

निष्कर्ष : इस प्रकार स्पष्ट है कि आर्यों के आगमन से पूर्व यहॉं के मूल निवासी अनार्यों का भारत के जनपदों (राज्यों) (नीचे टिप्पणी भी पढें) पर सम्पूर्ण स्वामित्व और अधिपत्य था। जिन्होंने व्यापारी बनकर आये और यहीं पर बस गये आर्यों को अनेकों बार युद्धभूमि में धूल चटायी। जिन्हें अपने दुश्मन मानने वाले आर्यों ने बाद में घृणासूचक रूप में दैत्य, दानव, असुर, राक्षस आदि नामों से अपने कथित धर्म ग्रंथों उल्लेखित किया है। जबकि असुर भारत के मूल निवासी थे और वर्तमान में उन्हीं मूलनिवासियों के वंशजों को आदिवासी कहा जाता है।

टिप्पणी : अनार्य जनपदों में मछली के भौगोलिक आकार का एक मतस्य नामक जनपद भी था, जिसके ध्वज में मतस्य अर्थात् मछली अंकित होती थी-मीणा उसी जनपद के वंशज हैं। चालाक आर्यों द्वारा मीणाओं को विष्णू के मतस्य अवतार का वंशज घोषित करके आर्यों में शामिल करने का षड़यंत्र रचा गया और पिछले चार दशकों में जगह-जगह मीन भगवान के मन्दिरों की स्थापना करवा दी। जिससे कि मीणाओं का आदिवासी दर्जा समाप्त करवाया जा सके।
स्रोत : ‘हिन्दू धर्मकोश’, वयं रक्षाम: और अन्य सन्दर्भ।
लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ प्रमुख-हक रक्षक दल
(‘हक रक्षक दल’-अनार्यों के हक की आवाज)

Tuesday, August 13, 2013

कब मिलेगी आदिवासियों को असली सत्ता?

झारखंड देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जो कानूनी तौर पर तो नहीं लेकिन सैद्धान्तिक रूप से आदिवासियों के नाम पर बना है और इसी वजह से सत्ता के केन्द्र में अब तक आदिवासी ही रहे हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हकीकत में सत्ता उनके हाथ में है? बावजूद इसके सत्ता के केन्द्र से आदिवासियों को बेदखल कर मुख्यमंत्री की कुर्सी गैर-आदिवासियों को सौंपने का प्रयास पिछले कुछ वर्षों से चल रही है। बहुसंख्यक गैर-आदिवासी यह स्वीकार करने को ही तैयार नहीं हैं कि राज्य का शीर्ष नेतृत्व आदिवासियों के हाथ में हो और वे राज्य का भविष्य गढ़े। इसलिये अब आदिवासी नेतृत्व को ही कमजोर, नालायक, दिशाहीन, भ्रष्ट और असफल बताया जा रहा है। छत्तीसगढ़ को उदाहरण मानते हुये तर्क दिया जाता है कि झारखंड का विकास करना है तो गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री चाहिए।

लेकिन क्या किसी के पास इस सवाल का जवाब है कि सरकार का जो विभाग गैर-आदिवासी मंत्रियों के जिम्मे में था उनकी स्थिति बदहाल क्यों है? इस सवाल का भी जवाब चाहिए कि बिहार, मध्यप्रदेश या पश्चिम बंगाल जैसे राज्य क्यों पिछड़े हैं जबकि वहाँ की सत्ता गैर-आदिवासियों के हाथों में ही रही है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भ्रष्ट, दिशाहीन और असफल भारतीय लोकतंत्र का नेतृत्व कभी आदिवासियों ने किया है? यहाँ झाड़ी पीटने के बजाये गंभीर चर्चा का विषय यह होना चाहिए कि क्या पिछले 13 वर्षो से झारखंड की सत्ता सही मायने में आदिवासियों के हाथों में हैं? यह इसलिये जरूरी है क्योंकि अगर सही मायने में झारखंड का आदिवासी नेतृत्व फेल हुआ तो पूरे देश में आदिवासी असफल होंगे। यहाँ आदिवासी संघर्ष का गौरवशाली इतिहास है इसलिये देश के अन्य हिस्सों के आदिवासियों को झारखंड से बहुत उम्मीद है और इसी राज्य से देश के आदिवासियों का भविष्य तय होगा।

जब 15 नवंबर, 2000 को राज्य का गठन हुआ था तब ऐसा लग रहा था कि अब अबुआ दिशुम, अबुआ राज का सपना पूरा होगा। आदिवासी नेता बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनायी और तीन वर्षों के बाद उन्हें सत्ता से बेदखल कर अर्जुन मुंडा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। सत्ता की ड्राइविंग सीट पर बैठने वाले ये दोनों ही आदिवासी चेहरे थे लेकिन अबुआ राज का सपना पूरा नहीं हुआ क्योंकि उन्हें निर्णय लेने की स्वतंत्रता ही नहीं थी इसलिये वे प्रत्येक बड़े निर्णय के लिये दिल्ली और नागपुर के आदेश का इंतजार करते थे। इसी तरह जब मधुकोड़ा के नेतृत्व में यूपीए ने सत्ता संभाली तो शासन का बागडोर फिर दिल्ली और पटना में केन्द्रित हो गयी। इसी बीच दिसोम गुरू शिबू सोरेनभी कुछ दिनों के लिये कुर्सी पर काबिज हुये लेकिन फिर सत्ता की लगाम दिल्ली में ही थी।

अब वर्तमान झारखंड सरकार को भी देख लीजिए किस तरह से केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश सत्ता की चाभी अपने हाथ में लेकर घूम रहे हैं। वहीं आदिवासी नेतागण, मंत्री बनने के लिये कभी सोनिया गांधी, तो कभी राहुल गांधी और कभी लालप्रसाद यादव के दरबार में गिड़गिड़ाते नजर आते हैं। सही मायने में झारखंड की असली सत्ता समय-समय पर अटलबिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, सोनिया गांधी, लालू प्रसाद यादव और नीतिश कुमार के हाथों में रही है। अब तक राज्य के मुख्यमंत्री, मंत्री और नीति निर्धारण दिल्ली, नागपुर और पटना से होता रहा है तो फिर असफलता का ठीकरा आदिवासियों के सिर पर क्यों फोड़ा जाना चाहिए? क्या अगर राज्य सही पटरी पर होता तो उसका श्रेय उन्हें दिया जाता? क्या आप उस ड्राईवर से सही ड्राइविंग की उम्मीद कर सकते हैं, जिसे स्टीयरिंग, गियर और ब्रेक लगाने ही आजादी ही न हो? ऐसी स्थिति में क्या दुर्घटना की जिम्मेवारी उसके सर पर मढ़ना उसके साथ अन्याय नहीं होगा? और आदिवासी नेतृत्व के साथ यही हो रहा है।

देखा जाये तो आदिवासी सलाहकार परिषद् एक संवैधानिक संस्थान है, जहां आदिवासियों के विकास एवं कल्याण हेतु निर्णय लिया जाना है। यह संस्थान संवैधानिक रूप से विधानसभा से भी ज्यादा शक्तिशाली हैं जहाँ अनुसूचित क्षेत्र के विकास एवं कल्याण हेतु सिर्फ आदिवासी जनप्रतिनिधि निर्णय लेने के लिये बैठते हैं। लेकिन क्या कारण है कि पिछले 13 वर्षों में इस संस्थान ने आदिवासी विकास और कल्याण को लेकर कोई एक ठोस निर्णय नहीं ले सका है? क्यों ट्राईबल सब-प्लान के पैसे का बंदरबाँट हो रहा है और कोई प्रश्न नहीं उठता? क्या सचमुच आदिवासी नेता अपने समाज के हित की चिन्ता नहीं करते या उन्हें ऐसा करने से रोका जाता है? क्यों हेमंत सोरेन जैसा युवा आदिवासी नेता मुख्यमंत्री बनते ही स्थानीयता की बात करता है और उसे दूसरे दिन ही चुप करा दिया जाता है? कौन लोग हैं जो आदिवासी नेताओं के मुंह में ताला लगा रहे हैं?


देश के स्तर पर देखने से पता चलता हैं कि वर्तमान में 47 आदिवासी सांसद हैं लेकिन आदिवासियों के गंभीर मुद्दे कभी भी राष्ट्रीय मुद्दा क्यों नहीं बनता? झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओड़िसा में हो रहे निर्दोष आदिवासियों की निर्मम हत्या, आदिवासी बच्चियों के साथ बलात्कार और उनकी गैर-कानूनी जमीन लूट संसद में क्यों नही गूँजती है? आज क्यों एक भी राष्ट्रीय स्तर का आदिवासी नेता नहीं है? क्यों आदिवासी नेता कोई मुद्दा उठाने की बात पर पार्टी लाईन का रोना रोते हैं? क्या आदिवासी नेताओं को गुलाम बना लिया गया है? इन सवालों का जवाब आदिवासी नेताओं को भी देना चाहिए। 

हकीकत यह है कि आदिवासी नेतृत्व के खिलाफ षडयंत्र चलाया जा रहा है और वे उसमें फँसते जा रहे हैं। इतिहास गवाह है कि बाबा तिलका मांझी, सिदो-कन्हो, फूलो-झानो, सिंगराय-बिन्दराय, माकी-देवमणी, बुद्धो भगत, निलंबर-पीतंबर, बिरसा मुंडा, जतरा टाना भगत जैसे सैंकड़ो क्रांतिकारी आदिवासी नेताओं ने आजादी की लड़ाई लड़ी लेकिन इतिहास में उन्हें नाकार दिया गया। इसी तरह जब जयपाल सिंह मुंडा, विश्व पटल पर चमके और उनके जादुई नेतृत्व में झारखंड पार्टी ने 1952 के विधानसभा चुनाव में बिहार विधानसभा में 32 सीट हासिल कर विपक्षी पार्टी की ताकत हासिल कर ली तो कांग्रेस पार्टी के अंदर खलबली मच गई और उसे ट्रैप कर लिया गया। दिसोम गुरू शिबु सोरेन के साथ भी वही हुआ। कांग्रेस के नेताओं ने उनके बैंक खाते में एक करोड़ रूपये डालकर उसे बेईमान घोषित कर दिया। अगर वे सचमुच बेईमान होते तो क्यों वे उस पैसे को अपने बैंक खाते में डलवाते?

झारखंड बनने के बाद तो आदिवासी नेताओं को बेईमान साबित कर भ्रष्टाचार का सिंबल बना दिया गया। अब मधुकोड़ा को ही ले लीजिये। आज वे भ्रष्टाचार के सिंबंल बन गये हैं लेकिन उनके साथ जुड़ने वाले नामों में कितने लोग आदिवासी हैं? क्या लूटे गये खजाना का पैसा उनके खाते में गया या किसी और के खजाने में? हालांकि मधुकोड़ा को आदिवासी कहकर बरी तो नहीं ही किया जा सकता है क्योंकि लूट तो उन्हीं के शासनकाल में हुई है। लेकिन अगर सही में वे भ्रष्ट हैं भी तो एक मधुकोड़ा की वजह से पूरे आदिवासी समुदाय के नेतृत्व को कैसे नाकारा जा सकता है? साथ ही साथ यह भी देखना होगा कि झारखण्ड गठन के बाद भ्रष्टाचार की नीव पड़ी उसमें कितने आदिवासी नेता शामिल थे? राज्य में किसने भ्रष्टाचार की नीव डाली? किसने सबसे पहले झारखंड का सौदा दिया? झारखंड के संसाधनों को लूटकर किसका घर भरा जा रहा है?

यह कौन नहीं जानता है कि अपने मेहनत के बलबूते पर उभरती नेत्री रमा खलखो को ट्रैप कर लिया गया और लोकतंत्र के नाम पर पैसे के पूरे खेल को अंजाम देने वाली बड़ी मछली को किसी ने हाथ लगाने की हिम्मत तक नहीं की? और अंत में आदिवासी नेत्री रमा खलखो को बेईमानों की सूची में डालकर जेल भेज दिया गया। क्या वजह है कि चमरा लिंडा जैसा लड़ाकू युवा सत्ता पर बैठते ही चुपी साध लेता है? स्थानीयता, जमीन बचाने का संघर्ष और आदिवासी मुद्दों पर गोलबंद के लिये विख्यात नेता बंधु तिर्की और चमरा लिंडा कांग्रेस पाटी में शामिल होने के लिये मजबूर क्यों हैं? कालांतर में जिस तरह से आदिवासी तिरंदाज एकलब्य का अंगूठा कटवाकर उसके प्रतिभा की हत्या की गई, ठीक उसी तरह से देश में आदिवासी नेतृत्व को एक के बाद एक खत्म करने की साजिश चल रही है, जिसपर आदिवासी नेताओं को भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।

झारखंड का असली नारा ‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ में अबतक आदिवासियों को सिर्फ अबुआ दिशुम मिला है और सही मायने में अबुआ राज लेना अभी बाकी है। अबुआ राज याने सत्ता में बैठकर निर्णय लेने का अधिकार, क्योंकि झारखंड की सत्ता को अबतक दिल्ली (अटलबिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और सोनिया गांधी), नागपुर (नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और आर.एस.एस. नेतृत्व) पटना (लालू प्रसाद यादव और नीतिश कुमार), पूंजीपति, नौकरशाह और ठेकेदार ही चलाते रहे हैं, जिन्होंने आदिवासियों को सिर्फ एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया है। फलस्वरूप यहाँ पूँजीपतियों, नेताओं, नौकरशाहों, ठेकेदारों और व्यापारियों का खजाना भरा और आदिवासी लोग गरीब होते चले गये?

ऐसी स्थिति में जबतक झारखंडी लोग स्वयं झारखंड को नहीं चलायेंगे तब तक यह राज्य कभी भी आगे नहीं बढ़ेगा, क्योंकि राज्य की परिकल्पना ही उनका है। झारखंड का इतिहास गौरवशाली रहा है, जिससे आदिवासी नेताओं ने भी मिट्टी में मिलाने का काम किया है। इसलिये आदिवासी नेताओं को ही सबसे ज्यादा सोचना पड़ेगा। अब समय आ गया है कि नया नेतृत्व, नयी सोच और नयी उर्जा के साथ झारखंड में पार्टी लाईन, दिल्ली, नागपुर और पटना से छुटकारा लेकर राज्य में विकास और सुशासन कायम करते हुये विरोधियों को करारा जवाब दे तभी झारखंड और आदिवासियों का भला होगा।

- ग्लैडसन डुंगडुग मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक व चिंतक हैं।

स्त्रोत : हस्तक्षेप में दिनांक : ०९-०८-१३ को प्रकाशित!

Friday, May 10, 2013

दलित-आदिवासी और स्त्रियों का धर्म आधारित उत्पीड़न हमारी चिन्ता क्यों नहीं?

तत्काल समाधान हेतु इस देश में यदि आज सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वो है, देश के पच्चीस फीसदी दलितों और आदिवासियों और अड़तालीस फीसदी महिला आबादी को वास्तव में सम्मान, संवैधानिक समानता, सुरक्षा और हर क्षेत्र में पारदर्शी न्याय प्रदान करना और यदि सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वो है-दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को धर्म के नाम पर हर दिन अपमानित, शोषित और उत्पीड़ित किया जाना। यही नहीं इस देश में आज की तारीख में यदि सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न कर रहे हैं और जिन्हें धर्म और संस्द्भति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सहयोग प्रदान करते रहते हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पिछले कुछ समय से मीडिया की मेहरबानी से कुछ चतुर, चालाक, भ्रष्ट और कट्टरपंथी ताकतों ने देश की राजधानी नयी दिल्ली को अपनी प्रायोजित ताकत दिखाने और संवैधानिक सरकारों को बदनाम करने का नया तरीका ईजाद कर लिया है। जिसकी बड़ी और सार्वजनिक शुरुआत अन्ना हजारे आन्दोलन के समय हुई। इस आन्दोलन को कथित रूप से विदेशी ताकतों और देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों का खुला समर्थन था। कुछ ही समय में इस कथित जन आन्दोलन की और इसके कर्ताधर्ताओं की चारित्रिक सच्चाई देश के सामने आ गयी।

इसी प्रायोजित नाटक का सहारा प्रारम्भ से ही तथाकथित योग गुरू बाबा रामदेव भी लेते रहे हैं, लेकिन उसका शोषक व्यापारी का घिनौना चेहरा भी देश के समक्ष आ चुका है। यही नहीं देश यह भी जान चुका है कि इन तथाकथित योग गुरू का असली मकसद देश में साम्प्रदायिक और फासीवादी ताकतों को मजबूत करना तथा देश के धर्म-निरपेक्ष ढांचे का ध्वस्त करना है। यही नहीं वह जनता से प्राप्त अनुदान और योग-शुल्क के मार्फत एकत्रित राशि में से चुनावों के समय भारतीय जनता पार्टी को आर्थिक सहयोग करते रहे हैं।

इसी क्रम में अन्ना हजारे से अलग होकर अरविन्द केजरीवाल ने अपनी नयी दुकान ‘‘आम आदमी’’ के नाम पर खोल ली है और वो न मात्र भारत के लोगों को देश की संवैधानिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ सरेआम भड़का और उकसा रहे हैं, बल्कि इसके साथ-साथ ‘‘आम आदमी पार्टी’’ बनाकर, आम आदमी के नाम का भी दुरूपयोग कर रहे हैं। जबकि इस पार्टी के नीति नियंताओं में कोई भी आम आदमी नहीं है!

ये और कि इन जैसे सभी लोगों के कथित जनान्दोलनों का भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अर्थात् आरएसएस और आरएसएस के अनुसांगिक सभी संगठन, जिनमें बजरंग दल, विश्‍व हिन्दू परिषद, दुर्गा वाहिनी आदि प्रमुख हैं, खुलकर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सक्रिय सहयोग करते रहे हैं और ये सब मिलकर हर छोटे बड़े मुद्दे को सुनियोजित तरीके से मीडिया के मार्फत राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का हरसंभव अनैतिक प्रयास करते रहे हैं।

लेकिन आश्‍चर्यजनक तथ्य ये है कि भारतीय जनता पार्टी, आरएसएस और आरएसएस के अनुसांगिक संगठनों सहित ऐसी ताकतें, जो अपने आप को राष्ट्रवादी, देशभक्त और हिन्दुत्ववादी संस्कृति की संरक्षक बतलाती हैं, आश्‍चर्यजनक रूप से उस समय लम्बा मौन साध लेती हैं, जबकि दलितों, आदिवासियों और गरीब एवं पिछड़े वर्गों की स्त्रियों का सरेआम शोषण और उत्पीड़न होता है। बल्कि कड़वी सच्चाई तो ये है कि इन्हीं तथाकथित राष्ट्रवादी, देशभक्त और हिन्दुत्ववादी ताकतों के इशारों या इनके सक्रिय सहयोग और इन्हीं के उकसावे पर हर दिन देशभर में दलितों, आदिवासियों और गरीब एवं पिछड़े वर्गों की स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता रहता है। देश में हर दिन कहीं न कहीं दलितों और आदिवासियों की लड़कियों के साथ गैंग-रेप किये जा रहे हैं। दलितों और आदिवासियों का सार्वजनिक रूप से उत्पीड़न किया जाता है। उनको अमानवीय त्रासदियॉं दी जाती हैं।

कभी मंदिरों से धक्के देकर बाहर भगा दिया जाता है तो कभी बलात्कार करने में असफल होने पर दलितों और आदिवासियों की पीड़ित औरतों को विरोध करने के कारण जिन्दा जला दिया जाता है। कभी होटलों में खाना खाने की हिमाकत करने पर दलितों और आदिवासियों को अपमानित करके सरेआम सड़कों पर घसीटा जाता है। नाईयों को बाल नहीं काटने दिये जाते हैं। सार्वजनिक नल-कूपों से पानी नहीं भरने दिया जाता है। इन सब असंवैधानिक और मनमानियों को क्रियान्वित करने की आज्ञा जिन झूठे और ढोंगी ग्रंथों में दी गयी है, उन कथित धर्म ग्रंथों का सरकार और प्रशासन की नाक के नीचे, बल्कि सरकार और प्रशासन के सहयोग से हर दिन कहीं न कहीं और टीवी पर पूरे उत्साह के साथ और सार्वजनिक रूप से पठन-पाठन किया जाता है। इसी प्रकार से दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और स्त्रियों के साथ इतिहास में किये गये अन्याय के मुख्य खलनायकों का भी सार्वजनिक रूप से महिमामंडन किया जाता है।

इस प्रकार तत्काल समाधान हेतु इस देश में यदि आज सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वो है, देश के पच्चीस फीसदी दलितों और आदिवासियों और अड़तालीस फीसदी महिला आबादी को वास्तव में सम्मान, संवैधानिक समानता, सुरक्षा और हर क्षेत्र में पारदर्शी न्याय प्रदान करना और यदि सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वो है-दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को हर दिन धर्म के नाम पर अपमानित, शोषित और उत्पीड़ित किया जाना। यही नहीं इस देश में आज की तारीख में यदि सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न कर रहे हैं और जिन्हें धर्म और संस्कृति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सहयोग प्रदान करते रहते हैं।

अत: हमारे देश में भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर उपरोक्त प्रकार के अन्यायों से देश के शोषित लोगों का ध्यान भटकाया जाता है। असल में आज सबसे बड़ी जरूरत है कि हम इस बात को समझें कि इस देश की तकरीबन नब्बे फीसदी से अधिक आबादी लगातार अभावों में जीने को विवश है। अत: हमें देश के कर्णधारों से इस बात के लिये सवाल करना होगा कि उन्हें देश की बहुसंख्यक आबादी की चिन्ता क्यों नहीं है। यदि जन-आन्दोलनों या बाबा रामदेव जैसों द्वारा योग के नाम पर भटकाया जावे तो इस देश के दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को सबसे पहले उनसे भी उपरोक्त सवाल पूछने चाहिये।

-लेखक : होम्योपैथ चिकित्सक, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिसट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) और संगठित षड़यंत्र के चलते जिला जज ने उम्र कैद की सजा सुनाई, चार वर्ष से अधिक समय चार-जेलों में व्यतीत किया। हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने दोषमुक्त/निर्दोष ठहराया। मोबाइल : 085619-55619, 098285-02666

Wednesday, March 27, 2013

आदिवासी को गुस्सा क्यों आता है​?

आदिवासी को गुस्सा क्यों आता है​? (1)

पलाश विश्वास

मित्रों, यह आलेख कोई सामान्य आलेख न समझें, कृपया। कृपया इस आलेख के साथ दिये गये लिंक पर क्लिक करके आदिवासी आवाज को सुनें। हमने जिन्हें मुख्यधारा से काटकर अलग कर दिया है, कट जाने के बाद उनके जख्मी दिलो दिमाग से रिसते खून की अनंत धारा को तनिक स्पर्श करें और अपने से पूछें कि क्या हम लोकतंत्र के काबिल हैं!

Friday, January 11, 2013

एसपी राजेश मीणा तो एक बहाना है! असली मकसद तो मीणा आदिवासियों को मिटाना है!!

मनुवादी किसी भी सूरत में आदिवासियों को ताकतवर होते हुए नहीं देख सकते हैं| उनके लिये यह असहनीय हो रहा है कि राजस्थान का पुलिस महा निदेशक एक आदिवासी अर्थात् मीणा है| जिसे बदनाम करने के लिये पुलिस को भ्रष्ट दिखाना और वो भी उसी की जाति के राजेश मीणा को भ्रष्टाचार और घूसखोर सिद्ध करना, क्या किसी की समझ में नहीं आ रहा है? केवल इतना ही नहीं राजस्थान की राज्यपाल पुलिस महानिदेशक को बुलाकर कहती हैं कि राज्य में स्त्रियों पर अत्याचार और पुलिस में भ्रष्टाचार बढ रहा है| ये बात गृह मंत्री की ओर से भी कही जा सकती थी, लेकिन जानबूझकर पुलिस महानिदेशक को दबाव में लाने और इस खबर को मीडिया के जरिये जनता के समक्ष लाने की सरकार की नीति को मीणा जनजाति के लोगों को समझना होगा और साथ ही इस बात को भी समझना होगा कि केवल बड़े बाबू बनने या एक पार्टी छोड़कर सत्ताधारी पार्टी का दामन थामकर लाल बत्ती प्राप्त कर लेने मात्र से आदिवासियों का उत्थान नहीं हो सकता! आदिवासी समाज की सेवा करनी है तो लालबत्ती नहीं, आदिवासियों की हरियाली की वफादारी की भावना को जिन्दा रखना होगा|

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पिछले दिनों राजस्थान के अजमेर जिले के पुलिस अधीक्षक पद पर तैनात राजेश मीणा को कथित रूप से अपने ही थानेदारों से वसूली करते हुए राजस्थान के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने दलाल के साथ रंगे हाथ पकड़ा गया | यह कोई पहली घटना नहीं है, जिसमें किसी लोक सेवक को रिश्‍वत लेते हुए पकड़ा गया हो! हर दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी लोक सेवक को रिश्‍वत लेते पकड़ा ही जाता रहता है| ऐसे में किसी को रिश्‍वत लेते पकड़े जाने पर, किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये| सरकार और प्रशासन अपने-अपने काम करते ही रहते हैं| इसी दिशा में हर एक राज्य का भ्रष्टाचार निरोधक विभाग भी अपना काम करता रहता है| इसी क्रम में राज्य की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो भी अपना काम कर ही रही है|

सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि जिस दिन से राजेश मीणा को कथित रूप से घूस लेते हुए पकड़ा है, उसी दिन से स्थानीय समाचार-पत्रों में इस खबर को इस प्रकार से प्रसारित और प्रचारित किया जा रहा है, मानो केवल मीणा जनजाति के सम्पूर्ण अधिकारी और कर्मचारी ही चोर हैं, बाकी सारे के सारे दूध के धुले हुए हैं| राजस्थान की मीणा जनजाति सहित सारे देश के सम्पूर्ण जनजाति समाज में इस बात को लेकर भयंकर रोष व्याप्त है| रोष व्याप्त होने का प्रमुख कारण ये है कि राजेश मीणा की मीडिया ट्रायल की जा रही है, जबकि दक्षिणी राजस्थान में अपनी मजदूरी मांगने जाने वाले एक आदिवासी मीणा के उच्च जाति के एक ठेकेदार द्वारा सरेआम हाथ काट दिये जाने की सही और क्रूरतम घटना को सही तरह से प्रकाशित और प्रसारित करने में इसी मीडिया को अपना धर्म याद नहीं रहा|

इसके अलावा पिछले दिनों दलित परिवार के दो नवविवाहिता जोड़ों को मन्दिर से धक्के मारकर भगा देने की घटना को इसी मीडिया द्वारा जानबूझकर दबा दिया गया| भ्रूण हत्या के आरोपों में पकड़े जाने वाले उच्च जातीय डॉक्टरों के रंगे हाथ पकड़े जाने के उपरान्त भी खबर को अन्दर के पन्नों पर दबा दिया जाता है| जब पिछड़े वर्ग से आने वाले राजनेता महीपाल मदेरणा का प्रकरण सामने आया तो उसकी भी जमकर मीडिया ट्रायल की गयी| जबकि दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों के विरुद्ध होने वाले अपराधों में पकड़े जाने वाले मनुवादी अपराधियों के क्रूर और घृणित अपराधों को जानबूझकर मीडिया द्वारा और प्रशासन द्वारा दबा दिया जाता है|

इन सब बातों का साफ और सीधा मतलब है कि चाहे कानून और संविधान कुछ भी कहता हो जो भी जाति या व्यक्ति मनुवादी व्यवस्था से टकराने का प्रयास करेगा उसे निपटाने मे मनुवादी मीडिया और प्रशासन एवं सत्ता पर काबिज मनुवादी कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे| महीपाल मदेरणा और राजेश मीणा दोनों ही मामलों में मनुवादियों की ओर से पिछड़ों और आदिवासियों को यही संकेत दिया गया है| 

राजस्थान में मीणा जाति के बच्चे कड़ा परिश्रम करते हैं| उनके माता-पिता कर्ज लेकर, अपने बच्चों को जैसे-तैसे पढा-लिखाकर योग्य बनाते हैं| जब वे अफसर या कर्मचारी नियुक्त होते हैं तो उस वर्ग की आँखों में खटकने लगते हैं, जो सदियों से मलाई खाता आ रहा है और आज भी सत्ता की असली ताकत उसी के पास है| जबकि जानबूझकर के मीणा जनजाति को बदनाम किया जा रहा है और अफवाह फैलायी जाती है कि मीणा सभी विभागों में और सभी क्षेत्रों में भरे पड़े हैं| जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है|

राजस्थान में आजादी से आज तक एक भी दलित या आदिवासी वकील को, वकीलों के लिये निर्धारित 67 फीसदी वकील कोटे से हाई कोर्ट का एक भी जज नियुक्त नहीं किया गया| इसका अर्थ क्या ये लगाया जाये कि दलित-आदिवासी वकील हाई कोर्ट के जज की कुर्सी पर बैठने लायक नहीं हैं या हाई कोर्ट के जज की कुर्सी दलित-आदिवासियों के बैठने से अपवित्र होने का खतरा है या दलित-आदिवासियों को जज नियुक्त करने पर मनुवादियों को खतरा है कि उनकी मनमानी रुक सकती हैं| कारण जो भी हो, लेकिन राजस्थान हाई कोर्ट में अपवादस्वरूप पदोन्नति कोटे से एक मात्र यादराम मीणा के नाम को छोड़ दिया जाये तो आजादी के बाद से एक भी व्यक्ति सरकार को या जज नियुक्त करने वाले लोगों को ऐसा नजर नहीं आया, जिसे जज के पद पर नियुक्त किया जा सकता!

मीणा क्यों बहुतायत में दिखते हैं? इस बात को भी समझ लेना जरूरी है| चूँकि आदिवासी वर्ग के लोग सरल व भोली प्रवृत्ति के होते हैं, इस कारण वे मनुवादियों की जैसी चालाकियों से वाकिफ नहीं होते हैं और इसी का नुकसान राजस्थान की आदिवासी मीणा जनजाति के लोगों को उठाना पड़ रहा है| सबके सब अपने नाम के आगे ‘मीणा’ सरनैम लिखते हैं| जिसके चलते सभी लोगों को हर एक क्षेत्र में मीणा ही मीणा नजर आते हैं| यदि मीणा अपने गोत्र लिखने लगें, जैसे कि-मरमट, सेहरा, मेहर, धणावत, घुणावत, सपावत, सत्तावत, जोरवाल, बारवाड़, बमणावत आदि तो क्या किसी को लगेगा कि मीणा जाति के लोगों की प्रशासन में बहुतायत है, लेकिन अभी भी मीणा जनजाति के लोगों को इतनी सी बात समझ में नहीं आ पायी है|

यह तो एक बड़ा और दूरगामी सवाल है, जिस पर फिर कभी चर्चा की जायेगी| लेकिन फिलहाल राजस्थान की मजबूत और ताकतवर कही जाने वाली मीणा जनजाति की नौकरशाही को इस बात को समझना होगा कि वे इस मुगालते में नहीं रहें कि वे बड़े बाबू बन गये तो उन्होंने कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मार लिया है| क्योंकि सारा देश जानता है कि राजस्थान की ही नहीं, बल्कि सारे देश की पुलिस व्यवस्था अंग्रेजों की बनायी पटरी पर चल रही है| जिसके तहत प्रत्येक पुलिस थाने की बोली लगती है| थानेदार उगाही करके एसपी को देता है और एसपी ऊपर पहुँचाता है, जिसको अंतत: सत्ताधारी पार्टी को पहुँचाया जाता है| हर विभाग में इस तरह की उगाही होती है| पिछले दिनों एक एक्सईएन बतला रहे थे कि राजस्थान का प्रत्येक एक्सईन अपने चीफ इंजीनियर को हर माह पचास हजार रुपये पहुँचाता है, जिसमें से सीएमडी के पास से होते हुए हर माह मोटी राशी सरकार के पास पहुँचायी जाती है|

कहने का तात्पर्य यह है कि सरकारें स्वयं अफसरों से उगाही करवाती हैं और जब कभी कोई अफसर या अफसरों का कोई धड़ा नियम कानून या संविधान के अनुसार काम करने लगता है तो वही सरकार एक पल में ऐसे अफसरों को उनकी औकात दिखा देती है| कौन नहीं जानता कि किस-किस राजनेता का चरित्र कैसा है, लेकिन महीपाल मदेरणा को ठिकाने लगाना था तो लगा दिया| इसी प्रकार से जाट जाति के बाद राजस्थान में दूसरी ताकतवर समझी जाने वाली मीणा जनजाति के अफसरों को ठिकाने लगाने की राजेश मीणा से शुरूआत करके मीणा जाति के सभी अफसरों और कथित मीणा मुखियाओं को सन्देश दिया गया है कि यदि किसी ने अपनी आँख दिखाने का साहस किया तो उसका हाल राजेश मीणा जैसा होगा|

जहॉं तक इस प्रकार के मामले को मीडिया द्वारा उछाले जाने की बात है तो कोई भी नागरिक सूचना के अधिकार के तहत सरकार से पूछ सकता है कि उसकी ओर से किस-किस समाचार-पत्र को कितने-कितने करोड़ के विज्ञापन दिये गये हैं| जिन अखबारों को हर माह करोड़ों रुपये के विज्ञापन सरकार की ओर से भेंटस्वरूप दिये जाते हैं, उन समाचार-पत्रों की ओर से सरकार का हुकम बजाना तो उनका जरूरी धर्म है|

आजकल मीडिया व्यवसाय हो गया है| जिस पर भारत में केवल और केवल मनुवादियों का कब्जा है| मनुवादी किसी भी सूरत में आदिवासियों को ताकतवर होते हुए नहीं देख सकते हैं| उनके लिये यह असहनीय हो रहा है कि राजस्थान का पुलिस महानिदेशक एक आदिवासी अर्थात् मीणा है| जिसे बदनाम करने के लिये पुलिस को भ्रष्ट दिखाना और वो भी उसी की जाति के राजेश मीणा को भ्रष्टाचार और घूसखोर सिद्ध करना, क्या किसी की समझ में नहीं आ रहा है? केवल इतना ही नहीं राजस्थान की राज्यपाल पुलिस महानिदेशक को बुलाकर कहती हैं कि राज्य में स्त्रियों पर अत्याचार और पुलिस में भ्रष्टाचार बढ रहा है| ये बात गृह मंत्री की ओर से भी कही जा सकती थी, लेकिन जानबूझकर पुलिस महानिदेशक को दबाव में लाने और इस खबर को मीडिया के जरिये जनता के समक्ष लाने की सरकार की नीति को मीणा जनजाति के लोगों को समझना होगा और साथ ही इस बात को भी समझना होगा कि केवल बड़े बाबू बनने या एक पार्टी छोड़कर सत्ताधारी पार्टी का दामन थामकर लाल बत्ती प्राप्त कर लेने मात्र से आदिवासियों का उत्थान नहीं हो सकता! आदिवासी समाज की सेवा करनी है तो लालबत्ती नहीं, आदिवासियों की हरियाली की वफादारी की भावना को जिन्दा रखना होगा| एसपी राजेश मीणा तो एक बहाना है! असली मकसद तो मीणा आदिवासियों को मिटाना है|

Friday, December 21, 2012

बलात्कार से निजात कैसे?


एक पुलिस का जवान कानून व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिये पुलिस में भर्ती होता है, लेकिन पुलिस अधीक्षक उसे अपने घर पर अपनी और अपने परिवार की चाकरी में तैनात कर देता है। (जो अपने आप में आपराधिक न्यासभंग  का अपराध है और इसकी सजा उम्र कैद है) जहॉं उसे केवल घरेलु कार्य करने होते हैं-ऐसा नहीं है, बल्कि उसे अफसर की बीवी-बच्चियों के गन्दे कपड़े भी साफ करने होते हैं। क्या यह उस पुलिस कॉंस्टेबल के सम्मान का बलात्कार नहीं है?

Friday, September 21, 2012

नेहरू की आदिवासी पत्नी की त्रासदी

नेहरू की आदिवासी पत्नी की त्रासदी
अनन्त//
पंडित नेहरू की आदिवासी पत्नी जिंदा है। वह धनबाद के पंचेत में गुमनामी की जिंदगीं गुजर-बसर कर रही है। दो बेटे और एक बेटी की मां बन चुकी बुधनी जीवन के पुराने पन्नों को पलटना नहीं चाहती। वह यह भी नहीं बताना चाहती कि नेहरू की समाजवादी और गांधीवादी आदर्श ने कैसे उसके जीवन को अभिशप्त बना दिया? वह यह भी नहीं बताना चाहती कि नेहरू के शतरंजी समाजवादी चाल की शिकार होने के बाद समाज ने उसके साथ कैसा बर्ताव किया? सच तो यह है कि दर-दर भटकने वाली बुधनी को अहसास हो गया है कि दुखों का कोई बाजार नहीं होता। दरअसल बुधनी नेहरू के पोलिटकल प्रयोगशाला की रसायण है। जो सामाजिक-राजनैतिक प्रतिक्रिया के दौर से गुजरते हुये अपना रूप बदल चुकी है। वह अब अपने दुःखों के विज्ञापन से भी डरती है। क्योंकि बुधनी का उपयोग कर नेहरू ने स्वयं को गांधी के सपनों को सच करने वाला मसीहा साबित किया। वहीं बुधनी को ईनाम के रूप में मिला त्रासदीपूर्ण जीवन।

उसकी पथरायी आँखें ही उसकी पीड़ा की दास्तान कहती है। पश्चिम बंगाल के पुरूलिया से लगभग 75 और झारखंड के धनबाद से 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पंचेत में अपने बेटे के साथ रह रही है। सबसे बड़ी बेटी की शादी कर माँ का फर्ज अदा कर चुकी है। कैमरे की चकाचौंध से वह दूर रहना चाहती है। वह किसी अजनबी से बात भी नहीं करना चाहती है। 67 बसंत देख चुकी बुधनी का जीवन पतझर क्यों बना रहा? इसे समझने के लिये फ्लैशबैक में जाना होगा।

दरअसल आजादी के बाद नेहरू भारत के नवनिर्माण का सपना लिये औद्योगिकरण का विस्तार करने में जुटे थे। उनका यह कथन कि ‘औद्योगिकरण विकास के नये मंदिर हैं’ आजादी के बाद नवनिर्मित सभी औद्योगिक शहरों में ग्लोबलाइजेशन के इस क्रूर दौर में भी सरकारी होर्डिंगों पर ‘समाजवादी विकास’ की घोषणा करता हुआ मिल जाएगा। नेहरू और पटेल जैसे कद्दावर नेताओं के इस नीति का विरोध करते हुये झारखंड आन्दोलन के अगुआ रहे जयपाल सिंह मुण्डा ने 1947 में ही कहा था, ‘आप जिस विकास की बात कर रहे हैं, वह एक दिन आदिवासियों की कब्रगाह बनकर रह जाएगा।’ ठेठ आदिवासी बुधनी का जीवन सच में कब्रगाह का गवाह बन चुका है।’

बताते चले कि नेहरू देश में औद्योगिकरण का विस्तार करते हुये समाजवादी बने रहना चाहते थे। डी0वी0सी0 योजना के तहत बन रहे पंचेत डैम का उदघाटन करने 6 दिसंबर 1959 को झारखंड आये थे। समाजवादी आंदोलन का पर्याय बनने के मकसद से उन्होंने डैम का उद्घाटन उसके हाथों से करवाने का फैसला किया, जिसने निर्माण में मजदूर की भूमिका निभायी है। डैम के अधिकारियों ने पंडित नेहरू की उपस्थिति में बटन दबाने के लिये बुधनी का चयन किया। बुधनी एक संथाल युवती थी, उस वक्त उसकी उम्र महज 15 साल की थी और वह मैथन डैम में दिहाड़ी मजदूर का काम करती थी। नेहरू ने उस 15 वर्षीय नाबालिग आदिवासी युवती से पंचेत डैम का उद्घाटन करा जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की थी कि वे ‘राष्ट्र निर्माण’ के लिए तैयार रहें। विकास की परियोजनाओं से आदिवासी समाज को देश में सम्मान मिलेगा। उनके बीच खुशहाली आएगी, और समाजिक न्याय के साथ देश का विकास होगा।

बटन दबाते ही जहां बुधनी सुर्खियों में आई वहीं से शुरू हुई उसके त्रासदीपूर्ण जीवन की शुरुआत। दरअसल दिसंबर 1959 के समारोह में बुधनी ने नेहरु को माला पहनायी थी। बुधनी द्वारा नेहरू को माला पहनाने की घटना को उसके समाज ने माना कि बुधनी ने गैर आदिवासी नेहरु को अपने पति के रूप में वरण किया है। संथाल समाज ने एक ‘दिकु (बाहरी) को पति बनाने का आरोप लगाकर सामाजिक निर्वासन का दंड दिया। इस प्रकार उसे अपना गांव ‘खोरबोना’ के साथ घर-परिवार गांव-समाज तत्काल छोड़ देना पड़ा। फिलवक्त में ‘खोरबोना’ गांव अपना अस्तित्व खो चुका है। डैम बनने के बाद यह गांव डुब गया था। गांव का अस्तित्व समाप्त होते ही वहां के ग्रामीण सालतोड़ जा बसे।

परिवार-समाज से बहिष्कृत होने के बाद वह (बुधनी) दर-ब-दर भटकने लगी। फिर उसकी मुलाकात एक बंगाली सज्जन सुधीर दत्ता से हुई जिसने उसे पनाह दी। पर बुधनी की मुश्किलें कम नहीं हुईं और वह अब भी गांव-समाज से निर्वासित थी। बताते चले कि नेहरु युगीन औद्योगीकरण की शुरुआत के ऐतिहासिक कार्य विशेष के एवज में बुधनी को कुछ वर्षों के लिए डीवीसी में नौकरी दी गई थी। नौकरी ही उसके जीवन का सहारा था। लेकिन कुछ ही वर्षों बाद उसे नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद बेसहारा बुधनी वर्षों तक बेसहारा भटकती रही। जीवन की जंग से हार चुकी बुधनी 1985 में तत्कालीन प्रधान मंत्री और नेहरु के नवासे राजीव गांधी से मिलने दिल्ली गई। उसके दिल्ली प्रवास के बाद फिर से उसे डीवीसी में काम पर रख लिया गया। कयास लगाया जाता है कि राजीव गांधी की पहल पर ही पुनः उसे अस्थायी तौर पर बहाल किया गया।

‘डेक्कन क्रोनिकल’ (30 मार्च 2001) और ‘द हिंदू’ (2 जून 2012) के उन पत्रकारों को जिन्होंने बुधनी पर महत्वपूर्ण रपट लिखी है। 2001 में जब ‘डेक्कन क्रोनिकल’ का पत्रकार बुधनी से पंचेत में मिला था। द हिंदू के जर्नलिस्ट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि बहुत कोशिशों के बाद भी वह बुधनी को ढूंढने में नाकाम रही और उसे अपने एक दोस्त के दोस्त से जो कि रांची में रहता है से सूचना मिली की एक वर्ष पहले बुधनी की मृत्यु हो चुकी है। लेकिन बुधनी आज भी जिंदा है। उसके चेहरे पर औद्योगिकरण की चमक के बदले विस्थापन की पीड़ा को साफ-साफ देखी जा सकती है। पंचेत के डीवीसी कॉलोनी से सटे उसके घर में बिजली तक नहीं है। जिंदा बुधनी के साथ कई सुलगते सवाल जिंदा हैं और विकास की पूरी परिभाषा को कटघरे में खड़ा किये हुए हैं। झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखाड़ा की महासचिव वंदना टेटे के अनुसार 'संपूर्ण झारखंड में कई बुधनियां हैं। विकास के बाहरी और भीतरी दोनों दबावों से हर दिन एक नयी बुधनी जनम रही है और दरबदर भटकने के लिए अभिशप्त है। आज पूरा झारखंड बुधनी है।'

सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता महेन्द्र सुमन बुधनी की कहानी सुनने के बाद कहते हैं कि बुधनी के त्रासदपूर्ण जीवन के सामने ईमानदारी से खड़ा होना होगा और सभ्य समाज को इसका जवाब देना होगा। उसके परिवार का खेत-गांव डूबा। हजारों आदिवासी आजीविका और आश्रय से बेदखल हुए। जिस बुधनी ने बटन दबाकर राष्ट्रहित में सबकुछ गंवाया। कारखानों को उर्जा दी और अंधेरे में डूबे घरों को रौशन किया। आज वह खुद क्यों बिजली के लिए तरस रही है।-स्त्रोत : तेवर ओनलाइन (Posted on August 25, 2012 by एडिटर)

Sunday, February 19, 2012

छत्तीसगढ़ में महिला शिक्षक सोनी सोड़ी के खिलाफ पुलिस अत्याचार के खिलाफ आपके कारगर हस्तक्षेप की अपेक्षा!

निम्न याचिका पर समर्थन देने के लिए यहाँ क्लिक करें!
Why This is Important ?

प्रति- मुख्य न्यायाधीश 
सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली 

विषय- छत्तीसगढ़ में महिला शिक्षक सोनी सोड़ी के खिलाफ पुलिस अत्याचार के खिलाफ आपके कारगर हस्तक्षेप की अपेक्षा!

Wednesday, January 18, 2012

आदिवासी इलाकों के शहरी




शहरी व्यक्ति के पास कोई आर्थिक संसाधन नहीं हैं. उसे तो आदिवासियों के संसाधनों से जो उद्योग चलेगा या जो व्यापार होगा, उससे ही आमदनी होगी. इसलिए शहरी व्यक्ति आदिवासियों के संसाधनों की लूट को समर्थन देता है... 

हिमांशु कुमार

कुछ दिन पहले दिल्ली में कुछ अफगानी विद्यार्थियों के एक दल से मुलाक़ात हुई. खूबसूरत मुस्कान वाले चौदह से अठारह साल के गोरे और लाल गालों वाले सुन्दर बच्चे. अमन और मुहब्बत की बातें कर रहे थे. मैंने कुछ सवाल किये तो उन्होंने कहा कि अमेरिका जो उनके देश में कर रहा है उसे वहाँ के कबायली अर्थात आदिवासी नापसंद करते हैं, लेकिन शहरी मिडिल क्लास के लोग अमेरिका के हमले को पसंद करते हैं.

मैं उनकी इस बात की समानता दंतेवाडा से करने लगा. दंतेवाडा में जो हथियारबंद फौज़ें वहाँ के खनिजों को लूटने के लिए भेजी गयी हैं, उन्हें भी वहाँ के आदिवासी नापसंद करते हैं, लेकिन शहरों में रहने वाले लोग इस सैन्यीकरण का समर्थन करते हैं, ऐसा क्यों होता है और क्या सब जगह ऐसा ही होता है ?

मैंने देश के जितने भी आदिवासी इलाके देखे हैं उनमें आदिवासियों पर होने वाले दमन के विरुद्ध कभी भी कोई स्थानीय शहरी आवाज़ नहीं उठाता. बल्कि आदिवासियों के लिए आवाज़ उठाने वाले को वहाँ के शहरी पत्रकार, नेता, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी देशद्रोही खलनायक के रूप में चित्रित करते हैं. इसलिए आपको बिनायक या दायमनी के लिए देश में या सारे संसार में समर्थक मिल जायेंगे, लेकिन उनके अपने शहर रायपुर या रांची में नहीं.

इसका पहला कारण तो आर्थिक है. आदिवासियों के पास जंगल में जीवन के अपने संसाधन हैं, इसलिए उन्हें अपने संसाधनों को बचाने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है. इसीलिये वो संसाधन लूटने वाली फौजों और उन फौजों को भेजने वाली सरकार के खिलाफ लड़ता है, लेकिन शहरी व्यक्ति के पास कोई आर्थिक संसाधन नहीं हैं. उसे तो आदिवासियों के संसाधनों से जो उद्योग चलेगा या जो व्यापार होगा, उससे ही आमदनी होगी. इसलिए शहरी व्यक्ति आदिवासियों के संसाधनों की लूट को समर्थन देता है, लुटेरी फौजों को समर्थन देता है, संसाधन लूटने वाली राजनीति का समर्थन करता है.

ऐसे में स्थानीय पत्रकार लुटेरी व्यवस्था के प्रवक्ता बन जाते हैं और फिर इनका सामना होता है किसी ऐसे व्यक्ति से, जो होता तो इनके बीच में है लेकिन इस लूट के खिलाफ आवाज़ बुलंद करता है, वो पूरी लूट की राजनीति को नंगा कर देता है. पूरे शहरी षड्यंत्र का पर्दाफाश करता है. एक अकेला मानवाधिकार कार्यकर्त्ता पूरे सत्ता के किले की नीव को हिलाकर रख देता है.

ऐसे में ये उम्मीद बेमानी होगी कि ये लुटेरी ताकतें उनका पर्दाफाश करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्त्ता को बख्श देंगी. वो ऐसा कर ही नहीं सकतीं, क्योंकि मानवाधिकार कार्यकर्ता लूट होने नहीं देगा और लूट बंद हुई तो शहरी खायेंगे क्या? उनके पास अपना तो कोई उत्पादन है नहीं. सबकुछ तो लूटकर ही लाया गया है, लूट पर तो शहर जिंदा हैं, इसलिए बिनायक को उम्रकैद की सजा देनी जरूरी है, कोपा को जेल में डालना ज़रूरी है. दायमनी बरला को डराना ज़रूरी है.

ग्रामीण आदिवासियों के संसाधनों की इस लूट के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले हज़ारों कार्यकर्ता आज जेलों में बंद हैं. इस लूट के खिलाफ लड़ने वाली ताकतें देश की प्रधानमंत्री द्वारा सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताई जा रही है. देश की ज़्यादातर फौजों को सीमा से हटाकर इन आदिवासी लूट क्षेत्रों में भेजा जा रहा है.

हम सबको जानना चाहिए कि जैसे ही कोई कम्पनी और सरकार खनिजों से भरी ज़मीन का एमओयू पर हस्ताक्षर करते हैं, वैसे ही वह कम्पनी अंतर्राष्ट्रीय शेयर बाज़ार में अपने शेयर बेच देती है. सवाल उठता है कि जिस आदिवासी ज़मीन के लिए दुनिया के ताकतवर लोगों ने अरबों रुपये दाँव पर लगाये हैं वो क्या अपने रुपये डूबने देंगे? ये पैसा लगाने वाले ताकतवर लोग दुनिया के बैंकों के मालिक हैं, ये वालस्ट्रीट के मालिक हैं, अमेरिकी सरकार से लेकर दुनिया की छोटे से छोटे देशों की सरकार को चलाते हैं, देश की हर राजनीतिक पार्टी इनके पैसे से चुनाव लड़ती है, यही आर्थिक दैत्य दुनिया के हर युद्ध की जगह और समय तय करते हैं, हर युद्ध इनके फायदे के लिए लड़ा जाता है और हर देश का बजट इनके कहने से बनाया जाता है.

यही ताकतें टीवी और अखबार की मालिक हैं, आप वही जानते और मानते हैं, जो ये ताकतें चाहती हैं. आपके धर्मगुरु भी इन्हीं आर्थिक आकाओं के गुलाम हैं. जनता इन धनिकों के खिलाफ न हों जाए, इसलिए धर्मगुरु आमजन को आसपास की वास्तविकता से काटकर स्वर्ग-नर्क की कल्पनाओं में उलझा कर रखते हैं. यही आर्थिक ताकतें आपके बच्चों के शिक्षण संस्थान चलाते हैं, इसलिए आपका बच्चा वही पढता है जो इन आर्थिक ताकतों का व्यापार चलाने के लिए आवश्यक है.

ध्यान से देखने पर पता चलता है कि आज ग्रामीण आदिवासी की लूट को समर्थन देने वाली ताकतें धार्मिक हैं, राष्ट्रवादी हैं, सेना और पुलिसभक्त हैं, सरकार को ही लोकतंत्र और राष्ट्र मानने वाली हैं और शहरी हैं. ये लड़ाई अभी और क्रूर और व्यापक होगी और इन शक्तियों का प्रतिरोध भी उतना ही व्यापक और तीव्र होगा.
Souce : Janjwar, TUESDAY, 17 JANUARY 2012 22:45

Saturday, October 1, 2011

आदिवासी : ग्यारह अवरोधक

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
आजादी के तत्काल बाद संविधान में सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक रूप से सर्वाधिक कमजोर जिन दो वर्गों या समूहों को चिह्नत किया गया था, उनमें एक आदिवासी वर्ग है, जिसे संविधान में ‘अनुसूचित जनजाति’ कहा गया था, संविधान में उसे दलित के समकक्ष खड़ा कर दिया था| इसके चलते वर्तमान में आदिवासी वर्ग देश का सर्वाधिक शोषित, वंचित और फिसड्डी वर्ग/समूह बना दिया गया है|

Saturday, August 13, 2011

आदिवासियों की व्यथा!

9 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित विश्व आदिवासी दिवस मनाने के लिए छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक वृहद् सम्मेलन का आयोजन किया गया।
अतिथि के रूप में देश भर के आदिवासी नेता जुटे, सम्मेलन में हजारों की संख्या में शामिल हुए