Showing posts with label देशद्रोही. Show all posts
Showing posts with label देशद्रोही. Show all posts

Thursday, November 1, 2012

मुनवादी लोगों ने दलित जोड़ों को मन्दिर से अपमानित कर भगाया!

यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि देश में अमन-चैन बना रहे और समाज के सभी दबे-कुचले लोग तरक्की करें और सम्मान के साथ जीवन यापन करें तो हमें मनुवाद को तत्काल प्रतिबन्धित करने और मुनवादी कुकृत्यों को अंजाम देने वालों को देशद्रोही के समान दण्डनीय अपराध घोषित करने की सख्त जरूरत है| जिसके लिये संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 13 (1) एवं 13 (3) में सरकार को सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं| यदि सरकार में राजनैतिक इच्छा-शक्ति हो तो इस प्रावधान के तहत मनुवादी दैत्य को नेस्तनाबूद किया जा सकता है| लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है, जिसके पीछे हर पार्टी में मनुवादियों का वर्चस्व होना बड़ा कारण है|
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

राजस्थान के अजमेर सम्भाग मुख्यालय से प्रकाशित प्रमुख समाचार-पत्र ‘‘दैनिक नवज्योति’’ 29 अक्टूबर, 2012 के अंक के मुखपृष्ठ पर-‘‘दलित जोड़ों को धक्के मारकर मन्दिर से निकाला’’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित हुआ है| जिसमें कहा गया है कि 26 अक्टूबर को अनुसूचित जाति के दो नवविवाहित जोड़े मन्दिर में भगवान के समक्ष नतमस्तक होकर (जिसे स्थानीय आंचलिक बोली में ‘धोक देना’ कहा जाता है) आशीर्वाद लेने गये, लेकिन मन्दिर के पुजारी सहित कुछ मनुवादी लोगों ने और कुछ महिलाओं ने मिलकर न मात्र उन्हें मन्दिर से धक्के देकर बाहर कर दिया, बल्कि उनके साथ जाति सूचक शब्दों का अभद्रतापूर्ण तरीके से उपयोग करते हुए गाली-गलोंच भी की गयी और उन्हें मन्दिर से निकाल दिया गया| इस मामले में खेतड़ीनगर पुलिस ने आठ लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया है| 

Manwadi System
इस मामले में जानकारी करने पर सूत्रों का कहना है कि अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल ‘मेघवाल’ जाति के लोगों को स्थानीय सवर्ण जाति के लोग मन्दिरों में प्रवेश नहीं करने देते हैं और जब भी इन लोगों को में से किसी को मन्दिर में स्थापित भगवान का आशीर्वाद लेना होता है तो मन्दिर के सामने रास्ते या जमीन पर खड़े होकर ही भगवान का आशीर्वाद लिया जा सकता है| इस बार दो नव विवाहित जोड़ों ने मन्दिर के अन्दर जाकर न मात्र भगवान का दर्शन करके आशीर्वाद लेने की हिमाकत की, बल्कि मन्दिर में स्थापित भगवान की पूजा-अर्चना करने का भी अपराध भी कर डाला| जो मन्दिर के पुजारी को नागवार गुजरा| जिस पर मन्दिर के पुजारी घीसाराम स्वामी ने कुछ स्थानीय स्त्री-पुरुषों के साथ मिलकर नवविवाहित जोड़ों को मन्दिर से खदेड़ दिया|

सूत्रों का कहना है कि उक्त पुजारी कट्टर हिन्दू है और मनु द्वारा स्थापित ब्राह्मणवादी व्यवस्था को लागू करना अपना पवित्र धार्मिक कर्त्तव्य मानता है| जिसमें स्थानीय उच्च कुलीन हिन्दू साथ देते हैं| सूत्रों का यह भी कहना है कि पकड़े गये लोगों का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी से निकट सम्बन्ध हैं|

यहॉं विचारणीय गम्भीर प्रश्‍न यह है कि हो सकता है कि कानून के अनुसार आरोपियों के विरुद्ध मुकदमा चले और कुछ वर्षों के विचारण के बाद कुछ लोगों को सजा भी हो जाये, जिसकी कम ही सम्भावना है, लेकिन असल सवाल ये है कि आखिर मनुवाद द्वारा स्थापित यह कुव्यवस्था कब समाप्त होगी और चरित्र निर्माण की बात करने वाला संघ कब तक मनुवादी लोगों का पोषण तथा संरक्षण करता रहेगा?

जब तक मनुवाद और मनुवाद के पोषक संघ तथा संघ की घृणित और समाज तोड़क दोगली सोच को ध्वस्त नहीं कर दिया जाता है, तब तक अकेला कानून कुछ भी नहीं कर सकता है| क्योंकि राजस्थान और अन्य अनेक राज्यों में आये दिन मनुवादियों द्वारा इस प्रकार की अमानवीय और आदिकालीन सोच की परिचायक घटनाओं को लागातार और बेखोफ अंजाम दिया जाता रहा है| जिसे संघ एवं भाजपा से जुड़े लोगों का खुला राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है| जिसका दु:खद परिणाम ये होता है कि आये दिन दलित उत्पीड़न होता रहता है| उत्पीड़न के कुछ मामलों में मुकदमे भी दर्ज होते हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में गवाहों को डराया और धमकाया जाता है| डराने और धमकाने से नहीं मानने पर उनके साथ मारपीट की जाती है, उनकी औरतों और लडकियों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया जाता है और अन्तत: शोषित तथा भयभीत दलित दर जाते हैं! परिणामस्वरूप अधिकतर मुकदमे निरस्त हो जाते हैं, जिन्हें यह कहकर प्रचारित किया जाता है कि दलित लोगों द्वारा बनावटी मुकदमे दर्ज करवाये जाते हैं| 

यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि देश में अमन-चैन बना रहे और समाज के सभी दबे-कुचले लोग तरक्की करें और सम्मान के साथ जीवन यापन करें तो हमें मनुवाद को तत्काल प्रतिबन्धित करने और मुनवादी कुकृत्यों को अंजाम देने वालों को देशद्रोही के समान दण्डनीय अपराध घोषित करने की सख्त जरूरत है| जिसके लिये संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 13 (1) एवं 13 (3) में सरकार को सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं| यदि सरकार में राजनैतिक इच्छा-शक्ति हो तो इस प्रावधान के तहत मनुवादी दैत्य को नेस्तनाबूद किया जा सकता है| लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है, जिसके पीछे हर पार्टी में मनुवादियों का वर्चस्व होना बड़ा कारण है|

Wednesday, January 18, 2012

आदिवासी इलाकों के शहरी




शहरी व्यक्ति के पास कोई आर्थिक संसाधन नहीं हैं. उसे तो आदिवासियों के संसाधनों से जो उद्योग चलेगा या जो व्यापार होगा, उससे ही आमदनी होगी. इसलिए शहरी व्यक्ति आदिवासियों के संसाधनों की लूट को समर्थन देता है... 

हिमांशु कुमार

कुछ दिन पहले दिल्ली में कुछ अफगानी विद्यार्थियों के एक दल से मुलाक़ात हुई. खूबसूरत मुस्कान वाले चौदह से अठारह साल के गोरे और लाल गालों वाले सुन्दर बच्चे. अमन और मुहब्बत की बातें कर रहे थे. मैंने कुछ सवाल किये तो उन्होंने कहा कि अमेरिका जो उनके देश में कर रहा है उसे वहाँ के कबायली अर्थात आदिवासी नापसंद करते हैं, लेकिन शहरी मिडिल क्लास के लोग अमेरिका के हमले को पसंद करते हैं.

मैं उनकी इस बात की समानता दंतेवाडा से करने लगा. दंतेवाडा में जो हथियारबंद फौज़ें वहाँ के खनिजों को लूटने के लिए भेजी गयी हैं, उन्हें भी वहाँ के आदिवासी नापसंद करते हैं, लेकिन शहरों में रहने वाले लोग इस सैन्यीकरण का समर्थन करते हैं, ऐसा क्यों होता है और क्या सब जगह ऐसा ही होता है ?

मैंने देश के जितने भी आदिवासी इलाके देखे हैं उनमें आदिवासियों पर होने वाले दमन के विरुद्ध कभी भी कोई स्थानीय शहरी आवाज़ नहीं उठाता. बल्कि आदिवासियों के लिए आवाज़ उठाने वाले को वहाँ के शहरी पत्रकार, नेता, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी देशद्रोही खलनायक के रूप में चित्रित करते हैं. इसलिए आपको बिनायक या दायमनी के लिए देश में या सारे संसार में समर्थक मिल जायेंगे, लेकिन उनके अपने शहर रायपुर या रांची में नहीं.

इसका पहला कारण तो आर्थिक है. आदिवासियों के पास जंगल में जीवन के अपने संसाधन हैं, इसलिए उन्हें अपने संसाधनों को बचाने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है. इसीलिये वो संसाधन लूटने वाली फौजों और उन फौजों को भेजने वाली सरकार के खिलाफ लड़ता है, लेकिन शहरी व्यक्ति के पास कोई आर्थिक संसाधन नहीं हैं. उसे तो आदिवासियों के संसाधनों से जो उद्योग चलेगा या जो व्यापार होगा, उससे ही आमदनी होगी. इसलिए शहरी व्यक्ति आदिवासियों के संसाधनों की लूट को समर्थन देता है, लुटेरी फौजों को समर्थन देता है, संसाधन लूटने वाली राजनीति का समर्थन करता है.

ऐसे में स्थानीय पत्रकार लुटेरी व्यवस्था के प्रवक्ता बन जाते हैं और फिर इनका सामना होता है किसी ऐसे व्यक्ति से, जो होता तो इनके बीच में है लेकिन इस लूट के खिलाफ आवाज़ बुलंद करता है, वो पूरी लूट की राजनीति को नंगा कर देता है. पूरे शहरी षड्यंत्र का पर्दाफाश करता है. एक अकेला मानवाधिकार कार्यकर्त्ता पूरे सत्ता के किले की नीव को हिलाकर रख देता है.

ऐसे में ये उम्मीद बेमानी होगी कि ये लुटेरी ताकतें उनका पर्दाफाश करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्त्ता को बख्श देंगी. वो ऐसा कर ही नहीं सकतीं, क्योंकि मानवाधिकार कार्यकर्ता लूट होने नहीं देगा और लूट बंद हुई तो शहरी खायेंगे क्या? उनके पास अपना तो कोई उत्पादन है नहीं. सबकुछ तो लूटकर ही लाया गया है, लूट पर तो शहर जिंदा हैं, इसलिए बिनायक को उम्रकैद की सजा देनी जरूरी है, कोपा को जेल में डालना ज़रूरी है. दायमनी बरला को डराना ज़रूरी है.

ग्रामीण आदिवासियों के संसाधनों की इस लूट के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले हज़ारों कार्यकर्ता आज जेलों में बंद हैं. इस लूट के खिलाफ लड़ने वाली ताकतें देश की प्रधानमंत्री द्वारा सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताई जा रही है. देश की ज़्यादातर फौजों को सीमा से हटाकर इन आदिवासी लूट क्षेत्रों में भेजा जा रहा है.

हम सबको जानना चाहिए कि जैसे ही कोई कम्पनी और सरकार खनिजों से भरी ज़मीन का एमओयू पर हस्ताक्षर करते हैं, वैसे ही वह कम्पनी अंतर्राष्ट्रीय शेयर बाज़ार में अपने शेयर बेच देती है. सवाल उठता है कि जिस आदिवासी ज़मीन के लिए दुनिया के ताकतवर लोगों ने अरबों रुपये दाँव पर लगाये हैं वो क्या अपने रुपये डूबने देंगे? ये पैसा लगाने वाले ताकतवर लोग दुनिया के बैंकों के मालिक हैं, ये वालस्ट्रीट के मालिक हैं, अमेरिकी सरकार से लेकर दुनिया की छोटे से छोटे देशों की सरकार को चलाते हैं, देश की हर राजनीतिक पार्टी इनके पैसे से चुनाव लड़ती है, यही आर्थिक दैत्य दुनिया के हर युद्ध की जगह और समय तय करते हैं, हर युद्ध इनके फायदे के लिए लड़ा जाता है और हर देश का बजट इनके कहने से बनाया जाता है.

यही ताकतें टीवी और अखबार की मालिक हैं, आप वही जानते और मानते हैं, जो ये ताकतें चाहती हैं. आपके धर्मगुरु भी इन्हीं आर्थिक आकाओं के गुलाम हैं. जनता इन धनिकों के खिलाफ न हों जाए, इसलिए धर्मगुरु आमजन को आसपास की वास्तविकता से काटकर स्वर्ग-नर्क की कल्पनाओं में उलझा कर रखते हैं. यही आर्थिक ताकतें आपके बच्चों के शिक्षण संस्थान चलाते हैं, इसलिए आपका बच्चा वही पढता है जो इन आर्थिक ताकतों का व्यापार चलाने के लिए आवश्यक है.

ध्यान से देखने पर पता चलता है कि आज ग्रामीण आदिवासी की लूट को समर्थन देने वाली ताकतें धार्मिक हैं, राष्ट्रवादी हैं, सेना और पुलिसभक्त हैं, सरकार को ही लोकतंत्र और राष्ट्र मानने वाली हैं और शहरी हैं. ये लड़ाई अभी और क्रूर और व्यापक होगी और इन शक्तियों का प्रतिरोध भी उतना ही व्यापक और तीव्र होगा.
Souce : Janjwar, TUESDAY, 17 JANUARY 2012 22:45