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Wednesday, January 27, 2016

आरक्षण व्यवस्था के साथ जारी बर्बरतापूर्ण बलात्कार कैसे रुके?

आरक्षण व्यवस्था के साथ जारी
बर्बरतापूर्ण बलात्कार कैसे रुके?

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
भारत में हजारों सालों से संचालित अमानवीय मनुवादी व्यवस्था के कारण सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से वंचित वर्गों की दशा संविधान लागू होने के 66 साल बाद भी अत्यधिक दयनीय है। संविधान निर्माताओं को इन वर्गों की विशेष चिन्ता थी। इसी कारण से इन वंचित वर्गों को अजा, अजजा एवं ओबीसी वर्गों में वर्गीकृत करके, संविधान में कुछ विशेष प्रावधान किये गये थे। जिनमें विधायिका में प्रतिनिधित्व के साथ—साथ शिक्षण संस्थानों में प्रवेश तथा सरकारी नौकरियों में चयन एवं पदोन्नति के समय पात्रता में छूट, प्रमुख प्रावधान हैं। ओबीसी की दशा इस मामले में कमतर है। उनको न तो विधायिका में और न ही पदोन्नति में आरक्षण प्राप्त है। यही नहीं ओबीसी को उनकी जनंसख्या के अनुपात से आधे से भी ​कम आरक्षण प्राप्त है। जानबूझकर ओबीसी में असमान पृष्ठभूमि की जातियों को शामिल करके आरक्षण को आपसी संघर्ष का आखाड़ा बना दिया गया है।

संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था के परिणामस्वरूप या इसके दुष्परिणामस्वरूप वंचित वर्गों में विशेष रूप से अजा एवं अजजा के अनेक लोग उच्च पदों तक पहुंचे हैं। अनेक वर्तमान में भी पदस्थ हैं। इस सब के बाद भी मैं अत्यधिक दुःख के साथ, यह लिखने को विवश हूं कि उच्च प्रशासनिक और निर्णायक पदों पर पदस्थ रहते हुए, आरक्षित वर्ग के अनेक अधिकारी अपने वर्ग के आहत, पीड़ित और वंचित लोगों का प्रतिनिधित्व करने की तनिक भी परवाह नहीं करते हैं। इसके विपरीत अपने वर्ग के वंचित लोगों से दूरी बनाते देखे जा सकते हैं और बकवास (BAKVaS= B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Va-वैश्य+Sसंघी) वर्ग के मनुवादियों की खुशामद करते देखे जा सकते हैं। जिसे सीधे शब्दों में चाटुकारिता और चमचागिरी की संज्ञा दी जा सकती है।

जबकि सरकारी सेवाओं में चयन हेतु पात्रता में छूट प्रदान करने का मूल मकसद वंचित वर्गों के नये सामन्त पैदा करना कदापि नहीं था, बल्कि देश में सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु कार्यपालिका में वंचित वर्गों का पर्याप्त और सशक्त प्रतिनिधित्व स्थापित करना था। जिससे कि बकवास (BAKVaS= B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Va-वैश्य+Sसंघी) वर्ग से वंचित वर्गों के हितों की रक्षा की जा सके। वंचित वर्गों के उत्थान और संरक्षण के लिये नीतियों और कानूनों का निर्माण किया जा सके। पिछले 66 वर्ष के अनुभव को देखा जाये तो संविधान की मंशा के अनुरूप वंचित वर्गों का सच्चा और सशक्त प्रतिनिधित्व स्थापित नहीं हो सका है। इस मामले में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था असफल रही है और आरक्षण का मूल मकसद समाप्त और बेमानी हो चुका है।

आरक्षण का लाभ प्राप्त करके उच्च पदों पर पदस्थ अनेक प्रशासनिक अधिकारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों में अपने ही वंचित वर्ग के प्रति संवैधानिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का प्राय: अभाव दिखाई दे रहा है। इसके साथ—साथ यह भी देखने और सुनने में आता रहा है कि उच्च प्रशासनिक पदों पर बिराजमान आरक्षित वर्ग के अफसरों के परिजनों और सम्बन्धियों का ही प्रशासनिक पदों पर प्रमुखता से चयन हो रहा है? मुझे यह भी जानकारी मिली है कि लिखित और मुख्य परीक्षा में तुलनात्मक रूप से अधिक अंक प्राप्त करने वाले आम आरक्षित लोगों की संतानों की तुलना में, उच्च प्रशासनिक पदों पर बिराजमान आरक्षित वर्ग के अफसरों के कम अंक लाने परिजनों और सम्बन्धियों का अन्तिम रूप से चयन हो जाता है। यदि यह सत्य नहीं भी है तो क्या इसे सिर्फ संयोग ही माना जावे कि उच्च प्रशासनिक पदों पर बिराजमान लोगों के परिवार या रिश्तेदारी में ही अतिविलक्षण प्रतिभाशाली बच्चे पैदा हो रहे हैं, जिसके चलते भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में उनका चयन अवश्य हो रहा है। यदि यह सच है तो यह आरक्षण के आधार पर प्राप्त उच्च पदस्थिति का निजी हित में भयंकर दुरूपयोग और सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु लागू आरक्षण व्यवस्था के साथ सरेआम, क्रूरतापूर्ण और बर्बर बलात्कार नहीं तो और क्या है?

अब यह तथ्य किसी से छिपा नहीं रह गया है कि आरक्षण का लाभ लेकर उच्च पदों पर पदस्थ अनेक अधिकारी ऐश-ओ-आराम की जिंदगी जीते हैं और अवैध तरीकों से अकूत धन-सम्पदा अर्जित करते हैं। जिसे अपनी भावी पीढ़ियों के लिए अक्षुण्य बनाये रखने के लिए सरकारी सेवा में रहते हुए राजनैतिक दलों से नजदीकीयां बना लेते हैं और सेवानिवृति के बाद मनुवादी राजनैतिक दलों के टिकिट पर आरखित निर्वाचन क्षेत्रों से जीतकर MP या MLA बन जाते हैं। ऐसे लोगों का अपने वर्ग के आम लोगों के दुःख-दर्द या मुसीबतों या उनके हितों या अधिकारों के संरक्षण से दूर का भी वास्ता नहीं होता है। ऐसे लोग पहले प्रशासन में रहकर और बाद में विधायिका में पहुंचकर अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति करने के साथ—साथ अपने राजनैतिक दल के आकाओं के आदेशों की पालना करने के अलावा कुछ नहीं करते हैं। इसी कारण वंचित समाज के अन्दर गहरी खाई बन चुकी है और आरक्षित वर्ग के आम लोगों में गहरा असन्तोष और गुस्सा व्याप्त है। 

इन हालातों में और संविधान को लागू हुए सात दशक पूर्ण होने जा रहे हैं, तब भी क्या आरक्षित वर्ग के आम लोगों के लिये यह विशेष चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिये कि सामाजिक न्याय की वास्तविक स्थापना कैसे हो? वंचितों के प्रेरणा स्रोत ज्योतिबा फूले, विश्वस्तरीय विधिवेत्ता और बहुमुखी प्रतिभा के धनि बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेड़कर, आदिवासी हितों के लिये समर्पित प्रतिनिधि जयपालसिंह मुण्डा और आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय के मसीहा कांशीराम की सामाजिक न्याय की लड़ाई का क्या यही लक्ष्य था? मुझे नहीं लगता कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था से इन महामानवों के सपने कभी पूर्ण हो सकेंगे।

मुझे ज्ञात है कि काले धन की ताकत पर आरक्षित वर्गों के दिखावटी मसीहा बने हुए कुछ स्वार्थी पूर्व या वर्तमान प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से मेरा और मेरे विचारों का कड़ा विरोध हो सकता है, जो अनपेक्षित और अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन उनके स्वार्थपूर्ण विचारों की परवाह किये बिना समग्र वंचित समाज के संवैधानिक हित में हमें सत्य को स्वीकार कर के, इस समस्या का अविलम्ब स्थायी और संवैधानिक समाधान खोजना ही होगा।

कुछ कथित उथले विद्वान आरक्षित वर्गों में क्रीमी लेयर लागू करके इस समस्या का समाधान करने की बात करते हैं, जिसका मैं कभी समर्थन नहीं कर सकता। क्योंकि क्रीमी लेयर संवैधानिक प्रतिनिधित्व की मूल अवधारणा को ही नेस्तनाबूद कर देती है। यद्यपि मैं स्वीकरता हूं और उक्त विवेचन से प्रमाणित भी होता है कि वर्तमान व्यवस्था में वंचित वर्गों का उचित संवैधानिक प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा है। इसके बावजूद भी हम हमारे समस्त प्रतिनिधियों को शतप्रतिशित नहीं नकार सकते, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था की बदौलत ही अनेक संवेदनशील, सेवाभावी एवं जिम्मेदार अफसर और जनप्रतिनिधि, पूर्ण ईमानदारी और निष्ठा के साथ अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए वंचित वर्गों का निर्भीकतापूर्वक प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

इसके उपरान्त भी वंचित वर्ग के लिये अहितकर बन चुकी वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का स्थायी और संवैधानिक समाधान खोजना ही होगा। बल्कि अविलम्ब खोजना होगा। इसलिये सामाजिक न्याय के लिये कार्यरत और संविधान के जानकार विद्वानों को इस बारे में गम्भीरतापूर्वक चिन्तन और मंथन करने की करने की जरूरत है। मेरे मनोमस्तिष्क में भी कुछ समाधान हैं, लेकिन उन्हें प्रस्तुत करूं उससे पहले बेहतर होगा कि इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिये। जिससे मेरे विचारों से प्रभावित हुए बिना, अधिक अच्छे समाधान सामने आ सकें। अब देखना होगा कि कितने लोग वंचित समाज के प्रति चिन्तनशील हैं और कितने लोग तार्किक, संवैधानिक और समाधानकारी सुझाव प्रस्तुत करने का साहस जुटा पाते हैं?

जय भारत। जय संविधान।
नर—नारी सब एक समान।।
@—लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोशिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक), पूर्व रा महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ, दाम्पत्य विवाद सलाहकार तथा लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में एकाधिक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित। वाट्स एप एवं मो. नं. 9875066111, 27.01.2016 (11.59 AM)
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अति—महत्वूपर्ण नोट : बकवासवर्गीय मीडिया हमारे विचारों को दबाता है। ऐसे में वंचित वर्गों के पास शोसल मीडिया ही विचार सम्प्रेषण का एक मात्र माध्यम है। अत: यदि हम वंचित वर्गों से जुड़े महत्वूपर्ण विषयों से सम्बन्धित जानकारी को अपने मित्रों और परिचितों को अग्रेषित कर सकें तो हम वंचित वर्गों के जनजागरण में महत्वूपर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं।
—निवेदक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Sunday, April 28, 2013

भारत का बलात्कार करने वाले लड़ रहे हैं बलात्कार की लड़ाई!

सच तो ये है कि भारत का मतलब है भारत के असली मालिक, जो आज हर क्षेत्र में सबसे निचले पायदान पर वंचित वर्गों में शामिल हैं और इन्हीं वंचित वर्गों के हकों और स्वाभिमान का, हर क्षेत्र में दिनरात बेरोकटोक बलात्कार होता रहता है, जो वास्तव में भारत के साथ बलात्कार है। लेकिन भारत के साथ हजारों सालों से बलात्कार करने वाले इन 15 फीसदी वर्ग के लोगों में शामिल कुछ चालाक और षड़यंत्रकारी आज खुद आम आदमी की टोपी पहनकर और भगवा वस्त्र धारण करके बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करने का नाटक खेल रहे हैं। इस  षड़यंत्र में कॉंग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी बुरी तरह से फंस चुकी है, क्योंकि कॉंग्रेस पार्टी में भी, कॉंग्रेसी चोला धारण किये हुए, इन फासिस्ट और देशद्रोहियों के ऐजेंट नीति-नियन्ता पदों पर पदस्थ हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान मेरे हाथ में है, जो मुझे आम आदमी पार्टी की अजमेर (राजस्थान) की महिला कार्यकर्ता (या पदाधिकारी) मैडम कीर्ति पाठक जी ने मेल के जरिये ये दिखाने के लिये भेजा है, कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ सच में ‘‘आम आदमी’’ की पार्टी है। मैडम कीर्ति जी ने मेरे किसी लेख को पढकर पहले तो बड़े ही संयमित तथा शिष्ट तरीके से मुझसे मोबाइल पर बात की और फिर कहा कि अन्याय के खिलाफ संघर्षरत हम सभी लोगों को एक-दूसरे की कमियों को दिखाने के बजाय ‘‘आम आदमी’’ की परेशानियों के लिये मिलकर आम आदमी की लड़ाई में शामिल होना चाहिये। मैडम कीर्ति जी का कहना था कि इसके लिये ‘‘आम आदमी पार्टी’’ अरविन्द केजरीवाल जी के नेतृत्व में देशभर में अन्याय के खिलाफ संघर्षरत लोगों को एकजुट करके और साथ लेकर आम आदमी की समस्याओं के लिये संघर्ष कर रही है।

मुझे मैडम कीर्ति जी से मोबाइल पर बात करके अच्छा लगा और जब उनकी ओर से मेल के जरिये ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान और ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संकल्प पत्र (विजन डॉक्यूमेंट) मिला तो इस बात की प्रसन्नता हुई कि मैडम कीर्ति जी ने जो वायदा किया उसे पूरा किया। स्वाभावत: मैंने दोनों ही दस्तावेजों को अद्योपान्त बढा। जिस पर विस्तृत प्रतिक्रिया तो फिर कभी, लेकिन फिलवक्त तो देश की राजधानी नयी दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ लोगों के गुस्से के संदर्भ में लिखना असल मकसद है।

नयी दिल्ली में बलात्कार की घटनाओं के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों के दौरान भीड़ में अधिकतर लोगों में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की टोपी पहनने वाले और भाजपा या भाजपा से सम्बद्ध संगठनों का झंडा हाथ में लिये लोगों का टीवी पर दिखना आम बात है। जिससे लगता है कि बलात्कार की सर्वाधिक चिन्ता इन्हीं दो राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं को है। इसके अलावा टेलीवीजन पर खबरों को बेचने वालों को तो बलात्कार की सर्वाधिक चिन्ता सता ही रही है।

आम आदमी पार्टी की टोपी पहने लोग, जिस पर लिखा होता है-‘‘मैं हूँ आम आदमी’’ नयी दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करते नजर आते हैं। जो अपने इस संघर्ष को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिये देशभर के लोगों का गुस्सा दिखलाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते हैं। जिससे टीवी देखने वाला आम आदमी इस भ्रम में पड़ जाता है कि भारत की राजधानी महिलाओं के लिये सुरक्षित नहीं है और महिलाओं की सुरक्षा की सर्वाधिक चिन्ता यदि किसी को है तो ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को है। पहले इस मामले में भाजपा प्रथम स्थान पर हुआ करती थी। अब ‘‘आम आदमी पार्टी’’ ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। यही नहीं ‘‘आम आदमी पार्टी’’ हर उस मामले में आम आदमी के साथ दिखना चाहती है, जिससे वो ये दिखा सके कि वास्तव में आम आदमी की चिन्ता केवल और केवल ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को ही है।

संयोग से ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के सभी बड़े कर्ताधर्ता नयी दिल्ली में या आसपास में रहते हैं और छनछन कर प्राप्त होने वाली खबरों के मुताबिक इस समय देश को अस्थिर करने वाली ताकतें भारत के मीडिया को खरीद चुकी हैं। इसलिये मीडिया फासिस्टवादी और कमजोर लोगों के खिलाफ षड़यन्त्र करने वाली ताकतों का जमकर गुणगान कर रहा है। इन्हीं ताकतों में, ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को शामिल करना मेरी बाध्यता है, क्योंकि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के मुखिया दिल्लीवासियों से बिजली का बिल जमा नहीं करने का आह्वान करते हैं और स्वयं अपने बिजली के बिल सही समय पर जमा करवाते हैं। इस प्रकार आम लोगों को सरकार से लड़ाने का काम करते हैं। यह आम आदमी के साथ ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का खुला षड़यंत्र है।

द्वितीय ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान में इस बात को स्वीकार किया गया है कि-‘‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ वर्गों में शामिल लोग सामाजिक रूप से वंचित समूह हैं। इन वर्गों की आबादी देश की कुल आबादी का पिच्यासी फीसदी बतायी जाती है। अर्थात् इन वंचित समूहों के लोग ही इस देश में असली वंचित और आम आदमी हैं।

अत: देश की पहली प्राथमिकता इन वंचित वर्गों का उत्थान करना होनी चाहिये। ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नजर में भी स्वाभाविक रूप से इन्हीं वंचित समूहों के लोगों को इस देश का ‘‘आम आदमी’’ होना चाहिये और ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के ‘‘नीति-नियन्ता अर्थात् असली कर्ताधर्ता’’ पदों पर भी इन्हीं वंचित समूहों और वर्गों के लोगों का संवैधानिक अधिकार होना चाहिये। अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान में ऐसी सुस्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिये, जिससे कि देश की पिच्यासी फीसदी आबादी के वंचित समूहों, जो हकीकत में देश के ‘‘आम आदमी’’ हैं के हाथों में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की कमान होनी हो। 

लेकिन इस देश के आम आदमी का दुर्भाग्य यहॉं भी उसका साथ नहीं छोड़ता है और आम आदमी के नाम पर बनायी गयी ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान कहता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कुल तीस सदस्य होंगे और इन तीस पदों पर पदस्थ राष्ट्रीय कार्यकारिणी द्वारा ही देशभर में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नीतियों का निर्धारण, नीतियों का संचालन एवं क्रियान्वयन किया जायेगा, लेकिन ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान दूसरी बात यह कहता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नीतियों का निर्धारण करने में इस देश के वंचित समूहों में शामिल ‘‘आम आदमी’’ की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होगी। अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान के अनुसार देश के पिच्यासी फीसदी वंचित समूहों अर्थात् ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ के अधिकतम केवल पांच लोग ही ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा हो सकेंगे।

अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कुल तीस पदों में से पच्चीस पद उन ताकतवर वर्गों के लोगों के पास होंगे, जिनके अन्याय के और शोषण के कारण ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ वर्गों के लोग सामाजिक रूप से वंचित बनाये जा चुके हैं। अर्थात् जो 15 फीसदी शोषक वर्ग पिच्यासी फीसदी लोगों के पिछड़ेपन का कारण हैं, उसी वर्ग के शोषक और अन्यायी लोग आम आदमी के नाम पर ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संचालन करेंगे। केवल यही नहीं, बल्कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान वंचित वर्गों के विरुद्ध यहॉं तक नकारात्मक प्रावधान भी करता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सामाजिक रूप से वंचित उक्त समूहों अर्थात् के देश के 85 फीसदी लोगों का अधिकतम प्रतिनिधित्व 16 फीसदी से अधिक नहीं हो सकेगा और देश की 85 फीसदी आबादी को सामाजिक रूप से वंचित बनाये रखने, उनका शोषण एवं अन्याय करने वाले 15 फीसदी लोगों को ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 84 फीसदी से भी अधिक पदों पर पदस्थ होने का संवैधानिक अधिकार होगा।

इन तथ्यों से इस बात को प्रमाणित करने की जरूरत नहीं रह जाती है कि इस देश की 85 फीसदी आबादी को असमानता, भेदभाव, शोषण और अन्याय का शिकार बनाने के लिये, शेष 15 फीसदी लोग ही जिम्मेदार हैं। जिसमें स्वयं अपने वर्गों की महिलाओं के साथ किये जाने वाले बलात्कारी भी शामिल हैं। 

इससे भी बड़ी सच्चाई तो यह भी है कि देश की 84 फीसदी आबादी के मान-सम्मान, संवैधानिक, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और जीने के अधिकार का हजारों सालों से बलात्कार करने वाले 15 फीसदी लोगों की जैसी मानसिकता वाले लोगों द्वारा इस देश में आम आदमी के नाम पर ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का गठन किया गया है, जो महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कारों के विरुद्ध दिल्ली में घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। जिन्हें न तो आम आदमी के दु:ख दर्दों से कोई सारोकार है और न हीं आम आदमी के दु:ख दर्दों की कोई पीड़ा है।

सच तो ये है कि भारत का मतलब है भारत के असली मालिक, जो आज हर क्षेत्र में सबसे निचले पायदान पर वंचित वर्गों में शामिल हैं और इन्हीं वंचित वर्गों के हकों और स्वाभिमान का, हर क्षेत्र में दिनरात बेरोकटोक बलात्कार होता रहता है, जो वास्तव में भारत के साथ बलात्कार है। लेकिन भारत के साथ हजारों सालों से बलात्कार करने वाले इन 15 फीसदी वर्ग के लोगों में शामिल कुछ चालाक और षड़यंत्रकारी आज खुद आम आदमी की टोपी पहनकर और भगवा वस्त्र धारण करके बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करने का नाटक खेल रहे हैं। इस  षड़यंत्र में कॉंग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी बुरी तरह से फंस चुकी है, क्योंकि कॉंग्रेस पार्टी में भी, कॉंग्रेसी चोला धारण किये हुए, इन फासिस्ट और देशद्रोहियों के ऐजेंट नीति-नियन्ता पदों पर पदस्थ हैं।

-लेखक : होम्योपैथ चिकित्सक, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिसट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन और राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास), मोबाइल : 085619-55619, 098285-02666 

Friday, April 26, 2013

सवाल चौदह साल की लड़की का....?

वह अपनी उम्र के लड़कों के साथ सेक्स करने की तमन्ना रखती है, न कि अपने पिता से बड़ी उम्र के मर्दों के साथ, लेकिन उसे अपनी उम्र के लड़के बच्ची समझते हैं। लड़कों की नजर में बड़ी दिखने के लिये वह दो-दो ब्रा पहनती है, लेकिन फिर भी कुछ मतलब नहीं निकलता....!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

आज 26 अप्रेल, 2013 को मैं अपने परिचत के यहॉं पर बैठा था। कुछ पल के लिये मैं वहॉं पर अकेला हुआ तो एक लड़की मेरे पास आयी। मुझ से नमस्ते किया। पूछा ‘‘सर क्या आप डॉक्टर हैं?’’ मैंने कहा ‘‘हॉं’’, वह बोली ‘‘सर मेरी बीमारी का इलाज करें। मैं बहुत परेशान हूँ।’’

चित्र सांकेतिक है
इतने में वे महाशय जिनके यहॉं पर मैं गया था, प्रकट हो गये। मैंने उनसे पूछा कि ‘‘ये बच्ची किसकी है? ये बच्ची अपनी किसी बीमारी के बारे में बात कर रही है। इसे क्या तकलीफ है?’’ इस पर उन्होंने बताया कि ‘‘पड़ौस के मकान में रहने वाले किरायेदार की बेटी है, लेकिन मुझे नहीं पता इसे क्या तकलीफ है......।’’

इतना कहने के बाद वे उस लड़की की ओर मुखातिब होकर बोले, ‘‘क्यों बेटी तुम्हें क्या तकलीफ है, तुम्हारे पापा को बुला लाओ डॉक्टर साहब को दिखा देंगे।’’ इस पर लड़की ने कहा, ‘‘नहीं अंकल नहीं, कोई बात नहीं....!’’ लड़की के चेहरे के हावभाव देखकर मुझे कुछ संशय हुआ तो मैंने अपने मित्र से इशारे में अन्दर जाने को कहा। 

उनके जाते ही लड़की बोली, ‘‘डॉक्टर साहब आपने तो मरवाया होता, अंकल से बोलने की क्या जरूरत थी। मेरी ऐसी व्यक्तिगत समस्या है, जिसके बारे में, मैं मेरे पापा और इन अंकल के सामने आपको कुछ नहीं बता सकती। यदि आप मेरा इलाज कर सकते हैं और मेरी तकलीफ के बारे में किसी को कुछ नहीं बतलायें तो मैं आपका बतलाऊं, नहीं तो रहने दो...।’’

लड़की की बात सुनकर मुझे चिन्ता हुई कि लड़की कहीं कोई मुसीबत में तो नहीं है, सो मैंने उसे विश्‍वास दिलाया और अपनी समस्या बताने को कहा, लेकिन जो कुछ उसने बताया, वह एक सदमें से कम नहीं था। विशेषकर इसलिये कि लड़की की शक्ल-ओ-सूरत देखकर कोई सोच भी नहीं सकता कि वह लड़की किसी से ऐसी बात कह सकती है।

लड़की का वजन मुश्किल से 30-35 किलो, लम्बाई करीब पौने पांच फिट, रंग एकदम गौरा, बदन बहुत पतला, नाक-नक्श औसत से अच्छे और दिखने में बेहद कमजोर और कक्षा आठ की छात्रा है। लड़की ने अपनी समस्या के बारे में जो कुछ बतलाया, उसका सार संक्षेप इस प्रकार है-

सर मैं हैल्दी होना चाहती हूँ। मैं 14 साल की हो गयी, लेकिन अभी भी मैं बच्ची जैसी दिखती हूँ, जबकि मेरे साथ पढने वाली दूसरी लड़कियॉं अच्छी-खासी दिखती हैं। आगे से मुझसे कोई बात ही नहीं करता। जब मैं किसी लड़के से बात करती हूँ तो वो मुझे बच्ची समझकर इगनोर-अनदेखा कर देता है और उम्र में मुझसे छोटी और काले रंग की दूसरी हैल्दी लड़कियों में इंट्रेस्ट लेने लगता है।

सर मैं चाहती हूँ कि मेरे स्तन इतने बड़े-बड़े हों जायें कि कोई भी लड़का देखते ही मेरी ओर झट से आकर्षित हो जाये। मैंने उसे कहा कि वह सच में ही अभी बच्ची ही तो है और 14 वर्ष की उम्र में तुम खुद को इतनी बड़ी क्यों समझती हो?
इस पर उसने बताया कि उसके स्कूल की 12 साल से 14 साल तक की तकरीबन सभी लड़कियॉं अपनी-अपनी कक्षा में पढने वाले छात्रों या अपने पड़ौस के किसी न किसी लड़के से सेक्स करती हैं। सबके अनेक बॉय फ्रेंड हैं। कुछ तो अपने टीचर या किसी रिश्तेदार के साथ ही सेक्स करती हैं। उसने बताया कि उसके भी दो-तीन बॉय फ्रेंड हैं, लेकिन वे उसके बजाय दूसरी लड़कियों में अधिक रुचि लेने लगे हैं। इसलिये वो अच्छी तन्दुरुस्त और ताजा दिखना चाहती है। जिससे कोई भी लड़का देखते ही उसकी ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रहे। विशेषकर वह चाहती है कि उसके स्तनों का आकार इनता बड़ा हो जाये कि कोई भी लड़का उसे देखते ही लट्टू हो जाये।
मैंने उससे फिर से पूछा कि ऐसा वह क्यों चाहती है। उसने उल्टा मुझसे ही सवाल किया कि जब सारी लड़कियॉं मजे लेती हैं तो मैं ऐसा क्यों नहीं करूँ? उसने बताया कि दो वर्ष पहले उसके साथ सबसे पहले उसके चाचा ने सेक्स किया, जो अब नौकरी पर दूसरे शहर में रहते हैं। ऐसे में उसकी सेक्स करने की तेज इच्छा होती है। पड़ौस के लड़के और साथ पढने वाले लड़के उसे घास नहीं डालते। ऐसे में वह एक 50-55 साल के अपने पास के मकान में रहने वाले किरायेदार के साथ सेक्स करके अपना काम चलाती है।

उसने बताया कि वह अपनी उम्र के लड़कों के साथ सेक्स करने की तमन्ना रखती है, न कि अपने पिता से बड़ी उम्र के मर्दों के साथ, लेकिन उसे अपनी उम्र के लड़के बच्ची समझते हैं। लड़कों की नजर में बड़ी दिखने के लिये वह दो-दो ब्रा पहनती है, लेकिन फिर भी कुछ मतलब नहीं निकलता....!

सारी बात जानकर मैं स्तब्ध रह गया। एक ओर तो देश सेक्स जनित मामलों के विकृततम रूप बलात्कार की विभीषिका से जूझ रहा है, दूसरी ओर हमारे देश की कमशिन-किशारियों की ये मनोदशा है! क्या यह स्थिति हम सबके लिये अत्यधिक चिन्ताजनक नहीं है? इस विषय पर अपने विचार अधिक प्रकट करने के बजाय मैं समाज के इस कड़वे सच को प्रबुद्ध लोगों के सामने रखना अधिक उचित समझता हूँ। जिससे कि हम समाज के इस रूप को भी ध्यान में रखें और इस बारे में समुचित निर्णय ले सकें।

लेखक : होम्योपैथ डॉक्टर, संपादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन और राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)

Monday, January 7, 2013

पांच लड़कियों के साथ दुष्कर्म पर नपुंसक बनाया गया!

एक तरफ जहां बलात्कार की घटना को लेकर भारत में किस तरह का कानून हो इस पर विचार-विमर्श चल रहा है, विभिन्न राजनीतिक दलों, राज्य सरकारों से इस विषय पर राय ली जा रही है वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे देश हैं जो बलात्कार जैसे घिनौने अपराध पर कठोर दंड देकर भारत के सामने एक उदाहरण पेश कर रहे हैं. साउथ कोरिया में इस दिशा में कड़ा कदम उठाते हुए वहां के कोर्ट ने पांच लड़कियों का रेप करने वाले आरोपी को रसायनों से नपुंसक करने का आदेश दिया है.

न्यूज एजेंसी के मुताबिक आरोपी का नाम पायो है. पायो लड़कियों से स्मार्ट फोन चैट सर्विस के दौरान मिला था. आरोपी ने लड़कियों की अश्लील वीडियो बना रखी थी और वह उन्हें इन वीडियो को सार्वजनिक करने की धमकी देता था. इतना ही नहीं आरोपी हथियारों के बल पर भी उन्हें धमकाकर पीड़ित लड़कियों का बलात्कार करता था. पायो को यौन उत्पीड़न का दोषी पाए जाने पर अदालत ने उसे 15 साल के जेल की सजा सुनाई. इस दौरान जेल में उसे ऐसी दवाएं दी जाएंगी जिससे उसके भीतर की यौन इच्छा समाप्त हो सके.

एशियाई देशों में साउथ कोरिया ऐसा पहला देश है, जिसने बलात्कार के आरोपी को रसायन से नपुंसक करने का आदेश दिया है. इससे पहले जर्मनी, डेनमार्क, स्वीडन, पोलैंड और अमेरिका के कैलिफोर्निया में ही इस तरह की सजा का प्रवाधान है. भारत में भी बलात्कारियों को रसायन के जरिए नपुंसक बनाए जाने पर विचार चल रहा है. यहां भी बलात्कार के दोषियों को रासायनिक प्रक्रिया से नपुंसक बनाना कांग्रेस के उन प्रस्तावों में शामिल हैं जिन्हें वो जस्टिस जेएस वर्मा के नेतृत्व वाली समिति को सौंपेंगे. हाल ही में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि रेप के मामलों में शामिल लोगों को मौत और रसायन का इस्तेमाल कर नपुंसक बनाने की सजा देने के लिए कानूनों में संशोधन किया जाए.

भारत में एक तरफ बलात्कारियों को नपुंसक बनाए जाने के लिए आवाज उठाए जा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ कुछ राज्य ऐसे हैं जिनकी रेप जैसे जघन्य अपराध के लिए फांसी की सजा पर भी सहमति नहीं है. शुक्रवार को दिल्ली में हुई पुलिस महानिदेशकों की बैठक में लगभग सभी ने बलात्कारियों को उम्रकैद की सजा को ज्यादा कारगर बताया. लेकिन शायद ये राज्य भूल गए हैं कि हमारे यहां उम्रकैद की सजा का प्रावधान है और भारत में उम्रकैद का मतलब है आरोपी का कुछ ही सालों में जेल से बाहर आ जाना.

आइए जानते हैं किन-किन देशों में बलात्कार जैसी घटनाओं पर कैसे प्रावधान हैं :-

भारत: आइपीसी की धारा 376 में आरोपी को दंडित करने का प्रावधान है जिसके तरह आरोपी को दो साल से लेकर 14 साल तक या उम्रकैद की सजा हो सकती है. यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्‍‌नी के साथ रेप करता है तो उसको दो साल की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. वहीं अगर यदि कोई पुलिस अधिकारी या सिविल सेवक किसी महिला से रेप करता है या कोई व्यक्ति 12 साल से कम उम्र या गर्भवती स्त्री के साथ रेप करता है या गैंगरेप की स्थिति में 10 साल का सश्रम कारावास या आजीवन कारावास, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है.

पाकिस्तान: दहशतगर्दी के रूप में पहचाने जाने वाले पाकिस्तान में भी भारत से कड़े कानून हैं. यहां गैंगरेप के मामले में दोषियों को न्यूनतम उम्रकैद से लेकर फांसी तक की सजा हो सकती है. किसी महिला के साथ रेप करने पर सामान्यतया 10 से 25 साल की सजा का प्रावधान है. अप्राकृतिक रूप से लैंगिक उत्पीड़न के लिए दो साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है.

चीन: चीन दुनियाभर में अपने कड़े नियमों के लिए जाना जाता है. यहां रेप जैसे विशेष मामलों में आरोपी को मौत की सजा देने का प्रावधान है. सामान्यत: रेप के मामले में यहां तीन से 10 साल तक की सजा का प्रावधान है. यदि पीड़िता की आयु 14 वर्ष से कम हो तो कड़ी सजा हो सकती है. गैंगरेप, पीड़िता की मौत या उसके गंभीर रूप से घायल होने जैसे विशेष मामलों में दोषी को फांसी की सजा हो सकती है.

अमेरिका: विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका में भी कड़े कानून हैं. यहां हर राज्य में रेप के लिए सजा के अलग-अलग प्रावधान हैं. टेक्सास में जबरदस्ती, अप्राकृतिक सेक्स, गैंगरेप के बाद यदि जान से मारने की धमकी दी जाती है या पीड़िता की मौत हो जाती है तो दोषी को पांच से लेकर अधिकतम 99 साल तक की सजा हो सकती है. लैंगिक उत्पीड़न पर दो से 20 साल तक की सजा की व्यवस्था है. वाशिंगटन में रेपिस्ट को सामान्यतया पांच से लेकर 15 साल तक की सजा हो सकती है.

ब्रिटेन: लगभग 200 सालों तक भारत पर राज्य करने वाले ब्रिटेन में भी रेप, लैंगिक उत्पीड़न के लिए अधिकतम आजीवन कारावास की सजा है जिसकी अवधि 15 से 40 साल तक की है. लैंगिक रूप से किसी से संपर्क भी लैंगिक उत्पीड़न की श्रेणी में आता है. इस वजह से छह महीने से 10 साल तक की सजा हो सकती है. किसी के साथ लैंगिक गतिविधियों के लिए जबरदस्ती करने से छह माह से लेकर आजीवन कारावास की सजा तक हो सकती है.

रूस: रूस में हिंसा का सहारा या जबरदस्ती लैंगिक संबंध बनाना, पीड़ित की असहाय दशा का लाभ लेकर उत्पीड़न करना रेप की श्रेणी में शामिल है. इस तरह के मामले में तीन से छह साल की सजा का प्रावधान है. गैंगरेप के मामले में चार से 10 साल तक की सजा हो सकती है. 14 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन अपराध करने पर आठ से 15 साल की तक सजा हो सकती है. इस तरह के मामलों में कुल मिलाकर कठोरतम 15 साल की सजा का यहां के कानून में प्रावधान है.

सऊदी अरब: महिला उत्पीड़न और अन्य दूसरे सामाजिक कानूनों की बात की जाए तो सऊदी अरब का उदाहरण हर कोई देता है. यहां शरीयत कानून का पालन किया जाता है. इसके तहत रेप, हत्या, सशस्त्र डकैती जैसे अपराधों के लिए कानून में मौत की सजा का प्रावधान है. ऐसे मामले में दोषियों का सिर कलम कर दिया जाता है.
स्त्रोत : पोस्टेड ओन: 6 Jan, 2013 न्यूज़ बर्थ में, जागरण जंक्शन 

Sunday, January 6, 2013

बलात्कार का मनोविज्ञान!

स्त्री की गहन चाह कि कोई पुरुष उसका पागल हो जाए, कि वह इतनी सुंदर है कि किसी को भी पागल कर दे, कि वह इतनी बड़ी जरूरत है कि कोई उसके लिए जान की बाजी लगा दे, बलात्कार के मूल होती है।
लेखक : बनवारी

क्या आपको पता है कि दुनियाभर के मनोवैज्ञानिकों का यह विश्लेषण रहा है कि बलात्कार के मामलों में अधिकांशतः स्त्रियां स्वयं इस तरह की चाह से भरी होती हैं? कहा तो यह तक जाता है कि स्त्री के स्वभाव में होता है कि कोई उसके साथ जोर-जबरदस्ती करे...कोई उसके लिए इतना पागल हो जाए कि बस सब कुछ करने को तैयार हो जाए?

हाल ही में प्रकाशित मनोविज्ञान के एक अध्ययन के अनुसार पिछले तीस सालों में की लगभग 20 शोधों से यह पता चला है कि पचास से अधिक प्रतिशत में स्त्रियां बलात्कार की वासना रखती हैं, चाह रखती हैं। कुछ मनोवैज्ञानिक तो यह तक कहते हैं कि कई बार स्त्री स्वयं ऐसी परिस्थितियां पैदा करती हैं कि उसका बलात्कार हो जाए।

स्त्री की गहन चाह कि कोई पुरुष उसका पागल हो जाए, कि वह इतनी सुंदर है कि किसी को भी पागल कर दे, कि वह इतनी बड़ी जरूरत है कि कोई उसके लिए जान की बाजी लगा दे, बलात्कार के मूल होती है।

यह तो एक मनोवैज्ञानिक सोच है बलात्कार के पीछे।

भारत में बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के पीछे एक तो बहुत बड़ा कारण है स्त्रियां लगातार कम हो रही है और पुरुषों की संख्या बढ़ती जा रही है।

महावीर और बुद्ध की शिक्षाओं के बाद भारत में ब्रह्मश्चर्य की शिक्षा ने ऐसा घर कर लिया कि सेक्स बुरी तरह से अपमानित कर दिया गया और सदियों तक हमने भयंकर दमन किया। आज के इस संचार माध्यमों के सहज युग में हर कोई किसी ने किसी बहाने उत्तेजित हो रहा है। सदियों का दमन का ढक्कन तहस-नहस हो रहा है, काम के दमन से काम की अती पर स्वाभाविक ही पैंडुलम डोल रहा है।

जब तक स्त्री को प्रेम नहीं किया जाता, उसे सम्मान नहीं दिया जाता, उसके प्रति संवेदनशील नहीं हुआ जाता, उसे भी एक मानव समझ कर अपनी बराबरी का नहीं माना जाता, बलात्कार जैसी घटनाएं होती रहेगी। यदि स्त्री भोग की ही चीज है तो सहमती या असहमती भोग ही लो बुरा क्या है?

बलात्कार को सख्त कानून से नहीं रोका जा सकता। काम का वेग इतना होता है कि जब यह उद्दाम वेग किसी के सिर पर चढ़ता है तो उस समय उसे कोई कानून नहीं दिखाई देता। एक बार एक वृद्ध वकील साहब जो देश में अंग्रेजों के जमाने से वकालात कर रहे थे, मुझे बता रहे थे कि जितना कानून सख्त होता जाता है उतना ही बीमारी और जटिल हो जाती है। उन्होंने मुझे बताया कि बलात्कार पर सख्त से सख्त कानून के आते-आते, बलात्कार के बाद स्त्रियों की हत्याएं अधिक होने लगी। सबूत मिटाने के लिए हत्या कर दी जाती है।

बलात्कार के लिए एक बेहद स्वस्थ समाज की जरूरत होती है, जहां स्त्री-पुरुष समान हो, उनका मिलना-जुलना सहज हो, सरल हो, उनके बीच रिश्ते बहुत ही पवित्रता के साथ बन सकते हों, सेक्स का दमन जरा भी न हो, इसे एक प्राकृतिक भेंट समझकर उसे स्वीकारा जाए, उसकी निंदा जरा भी न हो।

किसी तल पर जो आदिवासी हैं, पिछड़े हैं, जंगलों में रहते हैं, वे बेहद सहज, सरल व प्राकृतिक जीवन जीते हैं, वहां कभी बलात्कार नहीं होते। बलात्कार आधुनिक सभ्यता, शिक्षा व दमित समाज की देन है।

और हां, यह भी सच है कि अनेक मामलों में स्त्री अपनी मर्जी से संबंध बनाती हैं और दुर्घटनावश पकड़ में आ जाए तो स्वयं को बचाने के लिए बलात्कार का आरोप लगाती है।

बलात्कार एक बहुत ही जटिल मामला है। हमारे न्यूज चैनल्स व राजनैतिक पार्टियां अपने राजनैतिक हितों के लिए जिस तरह से बयान देकर अपनी रोटी सेंक रहे हैं, उससे इस समस्या का कोई निदान नहीं होगा।

बलात्कार : अनेक लेखकों के आलेख और विचार!

नीचे दिए गए जिस भी किसी भी लेख पढना चाहें उस पर क्लिक करें!

  1. बलात्कार कांड :दोषी तो और भी हैं-निर्मल गुप्त 
  2. बलात्कार और कानून-विकास कुमार तिवारी 
  3. स्वर्ण लड़की का बलात्कार vs दलित लड़की का बलात्कार-केशव
  4. बलात्कार क्यो?-भारत 
  5. बलात्कार रोकने का अचूक उपाय!-डॉ. सुधीर कुमार शुक्ल " तेजस्वी" 
  6. बलात्कार का मनोविज्ञान-बनवारी
  7. रेपः कानून व्यवस्था ही नहीं समाज को भी बदलने की ज़रूरत है!-इकबाल हिंदुस्तानी, प्रवक्ता
  8. बलात्कार का भी व्यापार तो नहीं कर रहा कोई ?-नवीन जोशी, हिमालय गौरव उत्तराखंड
  9. महिला हिंसा के बारे में न्यायाधीशों की राय-मोहल्ला लाइव
  10. बलात्कारियों को फांसी पर लटकाने से सोनी सोरी, मनोरमा और शोपिया जैसे पीड़िताओं को न्याय दिला पायेंगे-सुनील हस्तक्षेप
  11. सिर्फ कमजोर कानून की कसौटी पर जस्टिफाई नहीं कर सकते बलात्कार को-अनुराग मिश्र, हस्तक्षेप!
  12. संघ की पुरूषवादी, दकियानूसी मानसिकता-एल. एस. हरदेनिया, भड़ास4मीडिया






11 साल के बच्चे से 40 साल की महिला ने किया दुष्कर्म

पीटीआई | Jan 5, 2013, 07.02PM IST

कोच्चि।। जब देश महिलाओं के साथ बढ़ते दुष्कर्म से गुस्से में है वैसे में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। केरल में 40 साल की एक महिला 11 साल के स्कूली लड़के का यौन शोषण करती थी। लड़का शर्म से किसी को बता नहीं पा रहा था। यौन शोषण करने वाली महिला लड़के की पड़ोसी है। यह घटना एर्नाकुलम जिले के पारूर इलाके की है। इस घटना से लोग हैरान हैं। पुलिस ने बताया कि आरोपी महिला को अरेस्ट कर लिया गया है।

लड़के के साथ महिला ने 11 दिसंबर को दुराचार किया था। उसने पूरा वाकया अपने क्लासमेट को बताया। इसके बाद पीड़ित लड़के के घर वालों को पता चला। घरवालों ने पुलिस स्टेशन जाकर एफआईआर दर्ज कराई। इसके फौरन बाद महिला को अरेस्ट कर लिया गया।

नाबालिग लड़के का बयान पुलिस ने ले लिया है। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों को बचाने संबंधी कानून के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

स्त्रोत : नव भारत टाइम्स, 05.01.13
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उक्त खबर पर कुछ सार्थक टिप्पणियां :-
1-हमारा समाज दोहरी मानसिकता मे जीती है . सच का सामना करना बड़ा मुस्किल होता है , कोई हिम्मत करके कोई सच बोल दे , तो पूरी मीडिया उसी के पिच्छे लग जाती है, पूरी बत को राजनिनितिक रंग दे दिया जाता है. सेक्स को हौआ बना दिया गया है , कोई स्वेच्छा से सेक्स करे/ करवाये तो पुलिस छ्हपआ मरती है , क्योंकि उसे दलाली नही मिलती , आज जरोरत है की एक सेक्स पॉलिसी बने , सेक्स भी उतना ही जरूरी है जितना खाना पीना. कुकर्मी लोग मानसिक बीमारी से ग्रस्त . , उनका इलाज करने की जरूरत है.
 2-भारत मे महिलाए समानता का अधिकार चाहती है ,शायद बलात्कार करने भी, और इस तरह इस औरत ने महिलाओ को पुरुषो के बराबर खड़ा कर दिया है. RIGHT TO EQUALITY AND RIGHT TO EQUAL OPPORTUNITY. इस महिला की यही सजा होनी चाहिये!
 3-मुझे लगता हे सरकार की चाल हे !
 4-कोई भी सजा किसी व्यक्ति के लिंग निर्धारण के बाद तय नही की जाती. जुर्म तो जुर्म होता है चाहे वह महिला करे या पुरुष. दोनो एकसमान सजा के हकदार हैं.
 5-महिलाए तो पहले ही कहती है की हम पुरुषो से किसी भी मामले मे कम नही है, इस बात को इस महिला ने पूरा करके दिखाया है, अब क्या महिलाए इस औरत को फांसी दिलाने के लिये क्या आन्दोलन करेंगी, अब इस चीज को देखना है.
6-यह खबर केवल खबर ही नही बल्कि औरतो के दोहरे चरित्र को भी उजागर कर देगी यदि महिला संगठन इस मामले पर चुप्प लगा जाती है,

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Sunday, December 30, 2012

बलात्कार : स्थितियां कैसे बदलेंगी?


सच यह है कि हमारे देश में कानून बनाने, कानून को लागू करने और कोर्ट से निर्णय या आदेश या न्याय या सजा मिलने के बाद उनका क्रियान्वयन करवाने की जिम्मेदारी जिन लोक सेवकों या जिन जनप्रतिनिधियों के कंधों पर डाली गयी है, उनमें से किसी से भी भारत का कानून इस बात की अपेक्षा नहीं करता कि उन्हें-संविधान, न्यायशास्त्र, प्राकृतिक न्याय, मानवाधिकार, मानव व्यवहार, दण्ड विधान, साक्ष्य विधि, धर्मविधि, समाज शास्त्र, अपराध शास्त्र, मानव मनोविज्ञान आदि विषयों का ज्ञान होना ही चाहिये। ऐसे में देश के लोगों को न्याय या इंसाफ कैसे हासिल हो सकता है? विशेषकर तब, जबकि शैशव काल से ही हमारा समाजीकरण एक भेदभावमूलक और अमानवीय सिद्धान्तों की पोषक सामाजिक (कु) व्यवस्था में होता रहा है??? अत: यदि हम सच में चाहते हैं कि हम में से किसी की भी बहन-बेटी, माता और हर एक स्त्री की इज्जत सुरक्षित रहे तो हमें जहॉं एक और विरासत में मिली कुसंस्कृति के संस्कारों से हमेशा को मुक्ति पाने के लिये कड़े कदम उठाने होंगे, वहीं दूसरी ओर देश का संचालन योग्य, पात्र और संवेदनशील लोगों के हाथों में देने की कड़ी और जनोन्मुखी संवैधानिक व्यवस्था बनवाने और अपनाने के लिये काम करना होगा। जिसके लिये अनेक मोर्चों पर सतत और लम्बे संघर्ष की जरूरत है। हाँ तब तक के लिए हमेशा की भांति हम कुछ अंतरिम सुधार करके जरूर खुश हो सकते हैं!

Sunday, December 23, 2012

बलात्कारी खुद को निर्दोष सिद्ध करे, ऐसा कानून बनाने की मांग पागलपन है!

प्रत्येक क्षेत्र में प्रक्रियात्मक सुधार के लिये हर स्तर पर आमूलचूल परिवर्तन के लिये मन से तैयार होना होगा और देश में कानून बनाने से लेकर कानूनों को लागू करने, दोषी को सजा देने तथा सजा भुगताने तक की सम्पूर्ण प्रक्रिया को न केवल पूरी तरह से पारदर्शी ही बनाना होगा, बल्कि हर एक स्तर पर पुख्ता, सच्ची और समर्पित लोगों की भागीदारी से निगरानी की संवेदनशील व्यवस्था भी करनी होगी। जिससे किसी निर्दोष को किसी भी सूरत में सजा नहीं होने पाए और किसी भी सूरत में किसी भी दोषी को बक्शा नहीं जा सके! इसके साथ-साथ 21वीं सदी में तेजी बदलते समय के आचार-विचारों, पश्चिम के प्रभावों को और देश पर अंगरेजी थोपे जाने के कुपरिणामों को ध्यान में रखते हुए, पुरातनपंथी कही जाने वाली और अव्यावहारिक हो चुकी हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परम्पराओं, प्रथाओं और रीतियों से समाज को क्रमश: मुक्त करने की दिशा में केवल कुछ दिन नहीं, बल्कि दशकों तक लगातार कार्य करना होगा। तब ही केवल बलात्कार ही नहीं, बल्कि हर प्रकार के अन्याय और अपराध से पीड़ितों को संरक्षण प्रदान किया जा सकेगा।


Friday, December 21, 2012

बलात्कार से निजात कैसे?


एक पुलिस का जवान कानून व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिये पुलिस में भर्ती होता है, लेकिन पुलिस अधीक्षक उसे अपने घर पर अपनी और अपने परिवार की चाकरी में तैनात कर देता है। (जो अपने आप में आपराधिक न्यासभंग  का अपराध है और इसकी सजा उम्र कैद है) जहॉं उसे केवल घरेलु कार्य करने होते हैं-ऐसा नहीं है, बल्कि उसे अफसर की बीवी-बच्चियों के गन्दे कपड़े भी साफ करने होते हैं। क्या यह उस पुलिस कॉंस्टेबल के सम्मान का बलात्कार नहीं है?

Tuesday, August 14, 2012

पाकिस्तान में हिन्दू स्त्रियों का बलात्कार और भारत की चुप्पी के मायने?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

1-भारत सरकार का ये नैतिक, मानवीय, धार्मिक, राष्ट्रीय, संवैधानिक और वैश्‍विक फर्ज है कि वह अपने स्तर पर कूटनीतिक प्रयासों के जरिये पाकिस्तान की सरकार को कड़ा सन्देश दे कि मानवता का मजाक उड़ाने वाले और हिन्दू बहन-बेटियों के साथ कुकर्म करने वाले नापाक वहशी दरिन्दों को कड़ी सजा दी जाये और पाकिस्तान के सभी हिन्दुओं को सम्पूर्ण सुरक्षा मुहैया करवायी जाये, अन्यथा इससे जहॉं एक ओर दोनों देशों के रिश्तों में खटाश तो आयेगी ही, साथ ही साथ भारत इस प्रकार के मामलों को चुपचाप नहीं देखेगा।
2-मीडिया के मार्फ़त जो खबरें आ रही हैं, उनसे पता चलता है कि इतनी भयानक स्थितियॉं पैदा हो चुकी हैं कि पाकिस्तान के हिन्दू परिवार भारत में शरण प्राप्त करने को विवश हो गये हैं। जिस पर भारत के इस्लामिक धर्मगुरुओं की ओर से रमजान के पवित्र महिने में चुप्पी साध लेना किस बात का संकेत देती है?
अमेरिका जो संसार के किसी भी देश के किसी भी कौने में अपनी दादागिरी करने पहुँच जाता है, उसे ये घटनाएँ क्यों नहीं दिख रही हैं? यह भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है और भारत को विश्‍व मंचों पर इस बात को अमेरिका के खिलाफ उपयोग में लाना चाहिये।
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भारत और पाकिस्तान अपनी आजादी का जश्‍न मानने में मशगूल हैं और पाकिस्तान में आये दिन हिन्दू लड़कियों और औरतों के साथ हिन्दू होने के कारण ‘‘बलात्कार’’ किये जाने की खबरें, मीडिया के माध्यम से लगातार आती रहती हैं। जिस पर भारत सरकार की ओर से ऐसा कोई ठोस कूटनीतिक कदम सार्वजनिक रूप से नहीं उठाया गया है, जिससे देश के आम इंसाफ पसन्द लोगों को और विशेषकर हिन्दुओं को इस बात का अहसास हो सके कि भारत सरकार को विदेशों में बसने वाले हिन्दुओं की भी चिन्ता है! यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण और दु:खद है, जिसकी तीखे शब्दों कड़ी निन्दा और भर्त्सना की जानी चाहिये।

हम सभी भारतीय और पाकिस्तानी लोग इस बात को ठीक से जानते हैं कि विभाजन के समय दोनों राष्ट्रों के तत्कालीन कर्ताधर्ताओं की ओर से सार्वजनिक रूप से गारण्टी दी गयी थी कि विभाजन के बाद अपने-अपने नागरिकों के बीच सरकारों द्वारा धर्म के आधार पर या अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जायेगा और सभी को अपने-अपने दीन-ईमान-धर्म का अनुसरण और पालन करने की सम्पूर्ण आजादी होगी। सभी को बिना किसी भेदभाव के पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होगी। इसके बावजूद दोनों ही देशों में अनेकों बार इस घोषणा का उल्लंघन किया गया है।

वर्तमान में पाकिस्तान में हिन्दू धर्मानुयाईयों की बहन बेटियों की इज्जत के साथ केवल इस कारण कि वे हिन्दू हैं, सरेआम खिलवाड़ किया जाना ‘इस्लाम’ और ‘हिन्दू’ दोनों ही धर्मों के मूल सिद्धान्तों के विपरीत है। यही नहीं ये कुकृत्य संसार के सभी राष्ट्रों द्वारा स्वीकृत और सभी पर लागू मानव अधिकारों की संधियों के भी विपरीत है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि इस प्रकार की घटनाएँ समाज में वैमनस्यता और दुराग्रहों को जन्म देती हैं। जिससे आहत धर्म के अन्य लोगों में भी स्वाभाविक तौर पर गुस्सा भड़कता है, जिसमें हिंसा और आगजनी जैसी घटनाएँ हो सकती हैं। कुछ घटिया किस्म के लोग ऐसे माहौल का लाभ उठाकर लोगों के बीच दूरियॉं पैदा करने के प्रयास करते हैं। ऐसे में अनेक निरीह प्राणी असमय काल के गाल में समा जाते हैं। जिसके चलते समाज में साम्प्रदायिक माहौल खराब होता है। लोगों के बीच धार्मिक दीवारें खड़ी हो जाती हैं!

मीडिया के मार्फ़त जो खबरें आ रही हैं, उनसे पता चलता है कि इतनी भयानक स्थितियॉं पैदा हो चुकी हैं कि पाकिस्तान के हिन्दू परिवार भारत में शरण प्राप्त करने को विवश हो गये हैं। जिस पर भारत के इस्लामिक धर्मगुरुओं की ओर से रमजान के पवित्र महिने में चुप्पी साध लेना किस बात का संकेत देती है? मॉं-बहन किसी की भी हों, उनकी रक्षा करना केवल दीन, धर्म या मजहब को मानने वालों के लिये ही नहीं, बल्कि इंसानियत में आस्था रखने वाले हर एक इंसान का फर्ज है! जिस पर किसी की भी चुप्पी का अर्थ है, इंसानियत को नंगा होते हुए देखकर भी चुप्पी साध लेना या उनके इंसानी जेहन का मर जाना। मानवीय संवेदनशीलता का समाप्त हो जाना और नापाक एवं वहशी ताकतों के समाने घुटने टेकना और उनको खुला समर्थन देना।

फिर से इस बात को दौहराना जरूरी है कि भारत सरकार का ये नैतिक, मानवीय, धार्मिक, राष्ट्रीय, संवैधानिक और वैश्‍विक फर्ज है कि वह अपने स्तर पर कूटनीतिक प्रयासों के जरिये पाकिस्तान की सरकार को कड़ा सन्देश दे कि मानवता का मजाक उड़ाने वाले और हिन्दू बहन-बेटियों के साथ कुकर्म करने वाले नापाक वहशी दरिन्दों को कड़ी सजा दी जाये और पाकिस्तान के सभी हिन्दुओं को सम्पूर्ण सुरक्षा मुहैया करवायी जाये, अन्यथा इससे जहॉं एक ओर दोनों देशों के रिश्तों में खटाश तो आयेगी ही, साथ ही साथ भारत इस प्रकार के मामलों को चुपचाप नहीं देखेगा।

अमेरिका जो संसार के किसी भी देश के किसी भी कौने में अपनी दादागिरी करने पहुँच जाता है, उसे ये घटनाएँ क्यों नहीं दिख रही हैं? यह भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है और भारत को विश्‍व मंचों पर इस बात को अमेरिका के खिलाफ उपयोग में लाना चाहिये। इस सबके साथ-साथ भारत के आम लोगों को भी जहॉं एक ओर तो संयम और सौहार्द को बनाये रखना होगा, वहीं दूसरी ओर भारत सरकार को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने के लिये मजबूर करना होगा! प्रतिपक्षी दलों को भी एकजुट होकर इस मामले को संसद में पूरी ताकत के साथ उठाना चाहिये। भारत की महिला संगठनों और मानव अधिकारों के लिये काम करने वाले संगठनों तथा लोगों को भी इस मामले में संज्ञान लेकर इसे उचित मंचों पर उठाना चाहिये। लेकिन इस बात की सावधानी बरती जाने की भी अत्यधिक जरूरत है कि इस मामले को भारत के कुछ दुष्ट प्रकृति के साम्प्रदायिक लोग वोट बैंक बनाने के लिये इस्तेमाल नहीं करने पायें।

Sunday, April 8, 2012

मध्यप्रदेश में महिलाओं और किशोरियों के खिलाफ लगातार बढ़ते हिंसा को लेकर युवा संवाद और नागरिक अधिकार मंच द्वारा जारी किया गया श्वेत पत्र

प्रेस विज्ञप्ति                                                                                                 दिनांक-5/04/.2012

मध्यप्रदेश में महिलाओं और किशोरियों के खिलाफ लगातार बढ़ते हिंसा को लेकर युवा संवाद और नागरिक अधिकार मंच द्वारा जारी किया गया श्वेत पत्र

Tuesday, February 7, 2012

माता-पिता करवाते हैं-जीवन भर का बलात्कार


जीवन भर का बलात्कार
बलात्कार का सबसे घिनौना रूप
मै आप सब को शारीरिक शोषण के बारे में बताना चाहता हूँ | वैसे तो शारीरिक शोषण से सब लोग परिचित है | शारीरिक शोषण के बारे में आप सब ने अच्छी तरह से सुने और देखें है | हमारा समाज भारतीय रीति-रिवाजों पर टिका हुआ है | भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वश्रेष्ठ एवं महानतम संस्कृति है , परन्तु फिर भी इसमे बहुत सारी अमानवीय , कठोर और निर्मम बुराइयाँ है | इन बुराइयों को पहचानने की सख्त जरूरत है , नहीं तो दिन-प्रतिदिन मानवता और इंसानियत की हत्या होती रहेगी | शारीरिक शोषण के कई रूप हो सकते है परन्तु सबसे घिनौना रूप है बलात्कार | आप सब जानते है की बलात्कार की प्रक्रिया में दो पक्ष होते है |
१. बलात्कार करने वाला ( प्रायः पुरुष वर्ग )
२. जिसका बलात्कार होता है ( प्रायः स्त्री वर्ग )
सामान्य बलात्कार से आप सब बहुत अच्छी तरह से वाकिफ है | इस तरह के बलात्कार में बलात्कारी सिर्फ और सिर्फ केवल एक बार ही बलात्कार करता है | इसके बाद क्या होता है आप सब अच्छी तरह से जानते है जैसे की पंचायत , पोलिस , मेडिकल और कोर्ट के चक्कर | इसमे बलात्कारी को बिना जमानत के सख्त से सख्त सजा होती है , और कभी-कभी फांसी भी हो जाती है | ये सबसे परिचित और सामान्य बलात्कार है , परन्तु इसी बलात्कार का एक और घिनौना , कठोर और सबसे निर्मम रूप है जिसमे शारीरिक और मानसिक बलात्कार होता है , भावनावों का बलात्कार होता है | यही बलात्कार का सबसे घिनौना , कुरूप , निर्दयी और निर्मम रूप है | इस तरह के बलात्कार में तीन पक्ष होते है...
१. बलात्कार करने वाला ( प्रायः पुरुष वर्ग )
२. जिसका बलात्कार होता है ( प्रायः स्त्री वर्ग )
३. बलात्कार करवाने वाले ( प्रायः माता-पिता और आप यानि कि ये समाज )
बलात्कार के इस रूप को जानने से पहले आप को बलात्कार को जानना होगा |
बलात्कार क्या होता है ?
जब कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ उसकी सहमति के बगैर जबरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध बनाता है , तो ये बलात्कार कहलाता है |
इस परिभाषा में " सहमति के बगैर " शब्द का ही सबसे ज्यादा महत्त्व है |
बलात्कार कब होता है ?
जब शारीरिक सम्बन्ध सहमति के बगैर बनाया जाए |
बलात्कार कब नहीं होता है ?
जब स्त्री-पुरुष एक-दुसरे कि सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाते है , तो यह बलात्कार नहीं होता है |
जिस बलात्कार को आप सब जानते है , उसमे सिर्फ एक ही अपराधी होता है तथा एक निर्दोष होता है | लेकिन मै आप को एक ऐसे बलात्कार के बारे में बातें जा रहा हूँ जिसमे दो अपराधी है तथा एक निर्दोष | 
अपराधी कौन-कौन है ?
बलात्कारी और बलात्कार करवाने वाले यानि कि माता-पिता और ये समाज |
निर्दोष कौन हैं ?
जिसका बलात्कार होता है |
मै जहाँ तक समझता हूँ आप सब बलात्कार कि परिभाषा को अच्छी तरह से समझ गए होगें | बलात्कार कि परिभाषा को ध्यान में रखते हुए आप सब अब
आसानी से समझ सकते है कि ....जब माता-पिता बेटी कि शादी , बेटी कि इच्छा को जाने बगैर , अपने मन मर्जी से करते है | मतलब कि ये शादी बेटी कि इच्छा के खिलाफ है , तो इस स्थिति में माता-पिता खुद अपनी बेटी का बलात्कार करवाते है | इस बलात्कार में बलात्कारी को कोई सजा ना होकर , हमारा समाज उसकी इज्जत करता है | ये कहाँ का न्याय है कि एक बलात्कारी को सजा तो दूसरे की आव भगत कि जाती है | यही है बलात्कार का सबसे घिनौना और सबसे निर्मम रूप जहाँ पर झूठे इज्जत के लिए माता-पिता अपने बेटी का हर पल , हर दिन यानि कि पूरी उम्र बेटी का बलात्कार करवाते है और इस बलात्कार में बेटी कि सहायता के लिए कोई भी सामने नहीं आता है | यहाँ पर बिटिया रानी पूरी तरह से असहाय रहती है | यही है बलात्कार का सबसे घिनौना और निर्मम रूप | 
ये सदा - सदा मानवता के खिलाफ है | अपने मन मर्जी से बेटी कि शादी करके आप सब अपना बोझ हल्का करते है | इस तरह की शादी में आप सब बेटी कि सौदेबाजी करते है | आप ये नहीं सोचते है कि जिंदगी तो बेटी की है , जीना बेटी को है , तो हम बेटी के अधिकारों का अतिक्रमण क्यों करे | लेकिन फिर भी आप सब करते है | यह नहीं सोचते है कि सही क्या है , गलत क्या है | इस तरह के माता-पिता अपनी बेटी का बलात्कार करवाते है |
ऐसे माता-पिता और लोग समाज के लिए कलंक है |
रामायण , महाभारत और गीता पढ़ने से कुछ नहीं होता है | ये सब अमल करने के लिए है ना की दिखावा करने के लिए | जैसा की आप सब जानते है कि रावण ने माता सीता का सिर्फ हरण किया था | रावण ने माता सीता को छुआ तक नहीं था | भगवान् राम ने उस रावण को मृत्यु-दंड दिया था | आप तो खुद अपनी बेटी का बलात्कार करवाते है तो अब आप किस सजा के भागीदार है , आप खुद सोच सकते है | ऐसे माता-पिता और समाज के लोग जो अपनी बेटी का खुद दिन-प्रतिदिन बलात्कार करवाते है , वह तो रावण से भी गए गुजरे है | ऐसे लोगों को दिवाली जैसा पवित्र त्यौहार मनाने और रावण का पुतला जलने का कोई अधिकार नहीं है | यदि आप स्वाभिमानी पुरुष है , तो खुद को जला डालो या फिर अच्छे माता-पिता बनो | अपनी बेटी का खुद बलात्कार मत करवों | बेटी को उसका अधिकार दो | यही सच्ची दिवाली है , यही भगवान् राम की सच्ची पूजा है |
भगवान श्री कृष्ण ने रुकमणि का हरण करके रुकमणि के अधिकारों की रक्षा की थी, तो वही महाभारत में भगवान् श्री कृष्ण ने ही खुद अपनी बहन सुभद्रा का अपनी बुआ कुंती के पुत्र अर्जुन द्वारा हरण करवा कर सुभद्रा के अधिकारों को रक्षा की थी | 
इस तरह से भगवान् ने आप सब को मानवता का रास्ता दिखाया है | आप सब भगवत गीता और भगवान् श्री कृष्ण की पूजा करते है , परन्तु उनके कर्म प्रधान जीवन से कुछ नहीं सीखते है | मेरी समझ में ये नहीं आता है कि आप सब भगवान् की कैसी पूजा करते है , क्यों भगवान् की पूजा करते है | 
अतः आप सब भगवान के कर्मप्रधान जीवन पर अमल करो , अपने जीवन में उतारो | बेटी के अधिकारों का हनन मत करो | यही सब भगवान कि सच्ची पूजा है | लेकिन आप सब तो जन्मजात अंधे है| आप कब सुधरेगें ये तो सिर्फ भगवान् ही जानते है | आपके इस निर्मम अपराध कि क्या सजा होगी आप जानते होगें | ईश्वर आपको कभी माफ़ नहीं करेगा | आप अपनी बेटी के सबसे बड़े शत्रु है | ऐसे माता-पिता और समाज के लोग सबसे बड़े कुकर्मी और अपराधी है , जो मानवता को दरकिनार करते है | 
मेरी आप सब से प्रार्थना है कि अपनी बेटी की जिंदगी बचा लो , यही धरती का और इस मानव जन्म का सबसे बड़ा पुण्य है |
बलात्कार करवाने वाले माता-पिता मत बनो | इस लिए आप अपने बेटी कि शादी वही करो जहाँ बेटी कि इच्छा हो ताकि वह खुश रह सके और आप को  गर्व से माता-पिता कह सके | बेटी को बेटी का अधिकार देकर आप खुश हो सकते है कि आपने अपनी बेटी को सच्चा सुख, न्यारा प्यार और खुशियों का संसार दिया है | 
यही मानव धर्म है | यही ईश्वर की सच्ची पूजा है | यही मोक्ष है | यही पुण्य है क्योकि आपकी बेटी माँ का रूप है और माँ सबसे सम्मानीय और सर्व शक्तिमान है |
बेटी को बेटी का अधिकार देना ही नारी जाति, बेटी , बहन और माँ की सच्ची पूजा और बंदना है | ऐसे करने मात्र से आप का मानव जीवन सफल हो जायेगा और आप महाविष्णु को प्राप्त करगें |
मै रजनी कान्त आप सब से यही आशा करता हूँ कि अब आप सब बलात्कार करवाने वाले माता-पिता नहीं बनेगें |-इंजीनियर रजनीकांत!