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Tuesday, April 23, 2013

आसन्न लोकसभा चुनाव और लपलपाती जीभें!

आज की परिस्थितियों में भाजपा में एक मात्र लाल कृष्ण आडवाणी ही श्रेष्ठतम, योग्यतम एवं सम्मानित व्यक्ति हैं, जबकि दूसरी ओर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल और संभावित प्रत्याशी हैं जो योग्यतम तो हो भी सकते हैं, परन्तु श्रेष्ठतम नहीं। सर्वमान्य तो कदापि भी नहीं, क्योंकि भारत देश का प्रधानमंत्री पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होना चाहिये न कि कथित रूप से मुसलमानों का खून बहाकर शासन करने वाला क्रूरतम आरोपी?

राजेन्द्र चतुर्वेदी

सत्ताधारी यूपीए एवं सत्ताविहीन एनडीए दोनों गठबंधन निकट भविष्य में लोकसभा चुनाव होने की सम्भावनाएं देखते हैं, जो कि वर्ष 2014 में सम्भावित हैं। सत्ताधारी यूपीए की चिंता केवल यह है कि कैसे पुन: सत्ता में चुनाव जीतकर आवें और तीसरा कार्यकाल शुरू करें, जबकि एनडीए की करो या मरो की स्थिति बनी हुई है, क्योंकि यदि इस बार एनडीए सत्ता में नहीं आया तो वह कभी भी सत्ता में नही आ सकता है।

एनडीए का एक कार्यकाल जो अटल बिहारी वाजपेयी के सम्मोहक व्यक्तित्व एवं सर्वमान्य नेता के कारण सम्भव हुआ था। आज एनडीए के पास ऐसे सम्मोहक व्यक्तित्व का पूरी तरह से अभाव है, जो पुन: उन्हें सत्ता सुख दिला सके।

बीजेपी का यह दुर्भाग्य है कि वहॉं प्रधानमंत्री के पद के लिये घमासान हो रहा है, क्योंकि एक वर्ग श्री लालकृष्ण आडवाणी का समर्थक है जो कि आज की परिस्थितियों में भाजपा में श्रेष्ठतम, योग्यतम, सम्मानित व्यक्ति हैं, जबकि दूसरी ओर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के संभावित प्रत्याशी हैं जो योग्यतम तो हो भी सकते हैं, परन्तु श्रेष्ठतम नहीं। सर्वमान्य तो कदापि भी नहीं, क्योंकि देश का प्रधानमंत्री धर्मनिरपेक्ष होना चाहिये न कि कथित रूप से मुसलमानों का खून बहाकर शासन करने वाला क्रूरतम आरोपी?

इसके अलावा भी भाजपा में सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, मुरली मनोहर जोशी सहित अनेक ऐसे नेता हैं, जो हर पल प्रधानमंत्री बनने का सपना देखते रहते हैं। 

कॉंग्रेस का यह दुर्भाग्य है कि उसके पास तजुर्बे का लम्बा कैनवास तो है, परन्तु उस पर रंग भरने वाला चित्रकार नहीं। यद्यपि राहुल गॉंधी एकमात्र सर्वमान्य कांग्रेस का मुखौटा तो हैं, परन्तु उनकी आनाकानी कॉंग्रेस को भारी पड़ेगी।

कांग्रेस द्वारा यदि चुनाव पूर्व राहुल गांधी को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया जाता है तो निश्‍चित रूप से बीजेपी इसे राहुल वर्सेज मोदी के रूप में प्रचारित करके बढ़त लेने का प्रयास करेगी, क्योंकि इस प्रयास में बीजेपी को लगभग 30 प्रतिशत वोट का फायदा होगा तो कांग्रेस को 40 प्रतिशत वोट का नुकसान।
यदि कांग्रेस चुनाव पूर्व प्रियंका गांधी बढेरा को प्रधानमंत्री घोषित करे तो निश्‍चित रूप से मोदी के खिलाफ 70 प्रतिशत वोट दिलाकर कांग्रेस को विजयश्री दिला सकती हैं और यह भी संभावना है कि अकेली कांग्रेस अपने बल पर ही सिंगल पार्टी मेजोरिटी दिला सके।

रही बात मुलायम सिंह, नीतीश कुमार, मायावती, शरद पंवार जैसे अन्य नेताओं की जो कि मन ही मन प्रधानमंत्री बनने का खयाली पुलाव पका रहे हैं। उन्हें यह पद इस योनि में तो संभव नहीं लगाता है, क्योंकि प्रधानमंत्री पद के हिसाब से मुलायम सिंह विदेशी ताकतों के सामने अंग्रेजी न जानने के कारण अनपढ़ सिद्ध होंगे। जबकि विदेशों में ख्याति प्राप्त मायावती प्रधानमंत्री पद के लिये सर्वथा अयोग्य हैं, क्योंकि वे केवल मान्यवर कांशीराम जी एवं एससी, एसटी के अलावा कुछ भी सर्वहारा समाज के लिये सोचने में अपरिपक्व व अदूरदर्शी नेत्री हैं। साथ ही मायावती अंग्रेजी तो दूर हिन्दी में लिखित भाषण तक को अटक-अटक कर पढती हैं। मायावती ने जब से ब्राह्मणों से समझोता किया है, स्वयं दलितों को उन पर विश्‍वास नहीं है। मायावती ने आदिवासियों के लिये आज तक कुछ नहीं किया है। ओबीसी वर्ग के लोगों का नाम लेने के अलावा उन्होंने ओबीसी वर्ग के उत्थान के लिये कोई काम नहीं किया है। शरद पवार राजनीति के साथ-साथ कूटनीति में माहिर तो जरूर हैं, लेकिन वे कभी भी इतना बड़ा संख्या बल उपलब्ध नहीं करा सकते, जिसके बल पर कि वे प्रधानमंत्री पद को सुशोभित कर सकें।

नीतीश कुमार स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहते जरूर हैं, लेकिन पिछले 17 साल से साम्प्रदायिकता की झंडाबरदार भाजपा के साथ सत्तासुख भोग रहे हैं। केवल मोदी को साम्प्रदायिक बताने मात्र से उनके दाग नहीं धुल जायेंगे। इसके अलावा उनके शासन काल में बिहार में प्रेस की आजादी पर नकेल कसने के हरसम्भव प्रयास किये गये हैं, जो उनको अनुदार नेता कहने के लिये पर्याप्त है। 

लोकसभा चुनाव में भाजपा/एनडीए मंहगाई का राग अलापेगी तो क्या वे अपने कलेजे पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि पूर्व में कभी उनके शासनकाल में देश में मंहगाई नहीं बढ़ी या उन्होंने डीजल पेट्रोल के दाम नहीं बढाये या उनके सत्ता में आने पर मंहगाई नहीं बढेगी या डीजल पेट्रोल के दाम नहीं बढेंगे?

यद्यपि गत वर्षो में भारत में भ्रष्टाचार जरूर बढ़ा है, परन्तु इसके लिये केवल कांग्रेस ही जिम्मेदार नहीं है, क्योंकि जो भी पार्टी सत्ता में रहती है, वह आँख मूंदकर येन-केन प्रकारेण काला धन पैदा करती रहती है। 

क्या कोई इस बात को बता सकता है कि एक स्कूल की साधारण सी मास्टरणी मायावती आज करोड़ों की मालकिन क्यों है, क्या यह अटूट धन भ्रष्टाचार पोषित नहीं है। हॉं जयललिता इस मामले मैं उससे कुछ कम हैं, क्योंकि आज जो धन का साम्राज्य उसके पास है, उसमें लगभग आधा उन्होनें फिल्मों में नाच गाकर कमाया है। 

यद्यपि राजनीति में एक दूसरे पर कीचड़ उछालना हर व्यक्ति एवं हर पार्टी का अधिकार है, परन्तु भारतीय राजनीति के हमाम में सभी नंगे खडे़ हुए हैं। आज के हालातों को देखकर लोकसभा चुनाव जब भी हों 2013 या 2014 में लेकिन किसी भी पार्टी को सम्पूर्ण बहुमत मिलना दूर की कौड़ी नजर आ रहा है। इसके उपरान्त भी प्रधानमंत्री बनने के लिये एक दर्जन से अधिक नेताओं की जीभ लपलपा रही है, जिससे देश-विदेश में भारतीय लोकतंत्र के प्रधानमंत्री पद की गरिमा भी गिर रही है। ऐसे हालात में यही कहा जा सकता है कि बेशक प्रधानमंत्री चाहे किसी भी पार्टी या गठबंधन का हो, सर्वमान्य व्यक्ति होना चाहिये, जिसे देश का सर्मथन हासिल हो और जिसका विदेशों में सम्मान हो।

Sunday, April 7, 2013

मीडिया मैनेजमेंट की उपज है नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय कद !

मीडिया मैनेजमेंट की उपज है नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय कद!
मोदी को भाजपा का आइकन बनाने में मीडिया की कितनी बड़ी भूमिका है, इसका अंदाजा आप इसी बात ये लगा सकते हैं कि हाल ही में एक टीवी चैनल पर लाइव बहस के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार ने मोदी को अपरिहार्य आंधी कह कर इतनी सुंदर और अलंकारयुक्त व्याख्या की, जितनी कि पैनल डिस्कशन में मौजूद भाजपा नेता भी नहीं कर पाए। आखिर एंकर को कहना पड़ा कि आपने तो भाजपाइयों को ही पीछ़े छोड़ दिया। इतना शानदार प्रोजेक्शन तो भाजपाई भी नहीं कर पाए। हो सकता है उस पत्रकार अपनी निजी सोच वैसी ही हो जैसा वह बोल रहा था लेकिन एक हकीकत यह भी है कि मोदी ने मीडिया मैनजमेन्ट पर जितना ध्यान दिया है उतना और किसी दूसरे काम पर नहीं। पिछले छह सालों में मोदी की ओर से टेलीवीजन और न्यू मीडिया को साधने की जमकर कोशिश की गई है। उसी का परिणाम है कि मोदी के जितने मित्र और समर्थक उनकी अपनी पार्टी भाजपा में नहीं हैं उससे ज्यादा मीडिया में हैं। मोदी और उनकी टीम द्वारा मीडिया में जनसंपर्क का जो सघन अभियान चलाया गया उसका सुखद परिणाम आज मोदी के सामने है।
तेजवानी गिरीधर

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्तमान में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में सबसे आगे आ चुके हैं, इसमें अब कोई दो राय नहीं हो सकती। मगर जितना सच यह है उतना ही सच यह भी है कि यह सब मीडिया का किया धरा है और जो कुछ है वह सब मोदी के मीडिया मैनेजमेंट का कमाल है। आज भले ही निचले स्तर पर भाजपा के कार्यकर्ताओं को मोदी में ही पार्टी के तारणहार के दर्शन हो रहे हों, मगर सच ये है कि उन्हें भाजपा नेतृत्व ने जितना प्रोजेक्ट नहीं किया, उससे कई गुना अधिक मीडिया ने शोर मचाया है। जैसा कि हमारे देश में भेड़चाल का चलन है, इसी प्रोपेगंडा से प्रभावित होकर भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेता, छुटभैये और कार्यकर्ता उनके नाम की रट लगाए हुए हैं।

उनके विकास का मॉडल भी धरातल पर उतना वास्तविक नहीं है, जितना की मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने खड़ा किया है। इसका बाद में खुलासा भी हुआ। पता लगा कि ट्विटर पर उनकी जितनी फेन्स फॉलोइंग है, उसमें तकरीबन आधे फाल्स हैं। फेसबुक पर ही देख लीजिए। मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने वाली पोस्ट बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से डाली जाती रही हैं। गौर से देखें तो साफ नजर आता है कि इसके लिए कोई प्रोफेशनल्स बैठाए गए हैं, जिनका कि काम पूरे दिन केवल मोदी को ही प्रोजेक्ट करना है। बाकी कसर भेड़चाल ने पूरी कर दी। हां, इतना जरूर है कि चूंकि भाजपा के पास कोई दमदार चेहरा नहीं है, इस कारण मोदी की थोड़ी सी भी चमक भाजपा कार्यकर्ताओं को कुछ ज्यादा की चमकदार नजर आने लगती है। शाइनिंग इंडिया व लोह पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी का बूम फेल हो जाने के बाद यूं भी भाजपाइयों को किसी नए आइकन की जरूरत थी, जिसे कि मोदी के जरिए पूरा करने की कोशिश की जा रही है।

आपको जानकारी होगी कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने की शुरुआत उनके तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने से पहले की शुरू हो गई थी। मुख्यमंत्री पद पर फिर काबिज होने के लिए मोदी ने मीडिया के जरिए ऐसा मायाजाल फैलाया कि विशेष रूप से गुजरात में उनके पक्ष में एक लहर सी चलने लगी। और जीतने के बाद तो मानो भूचाल ही आ गया। सच तो ये है कि प्रधानमंत्री पद के दावेदारों तक ने कभी अपनी ओर से यह नहीं कहा कि मोदी भी दावेदार हैं। वे कहने भी क्यों लगे। मीडिया ने ही उनके मुंह में जबरन मोदी का नाम ठूंसा। मीडिया ही सवाल खड़े करता था कि क्या मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं तो भाजपा नेताओं को मजबूरी में यह कहना ही पड़ता था कि हां, वे प्रधानमंत्री पद के योग्य हैं। इक्का-दुक्का को छोड़ कर अधिसंख्य भाजपा नेताओं ने कभी ये नहीं कहा कि मोदी ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं। वे यही कहते रहे कि भाजपा में मोदी सहित एकाधिक योग्य दावेदार हो सकते हैं। और इसी को मीडिया ने यह कह कर प्रचारित किया कि मोदी प्रबल दावेदार हैं। सीधी सी बात है कि भला कौन यह कहता कि नहीं, वे इस पद के योग्य नहीं हैं अथवा दावेदार नहीं हो सकते। और आज हालत ये है कि चारों ओर मोदी की ही आंधी चल पड़ी है।

मोदी को भाजपा का आइकन बनाने में मीडिया की कितनी बड़ी भूमिका है, इसका अंदाजा आप इसी बात ये लगा सकते हैं कि हाल ही में एक टीवी चैनल पर लाइव बहस के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार ने मोदी को अपरिहार्य आंधी कह कर इतनी सुंदर और अलंकारयुक्त व्याख्या की, जितनी कि पैनल डिस्कशन में मौजूद भाजपा नेता भी नहीं कर पाए। आखिर एंकर को कहना पड़ा कि आपने तो भाजपाइयों को ही पीछ़े छोड़ दिया। इतना शानदार प्रोजेक्शन तो भाजपाई भी नहीं कर पाए। हो सकता है उस पत्रकार अपनी निजी सोच वैसी ही हो जैसा वह बोल रहा था लेकिन एक हकीकत यह भी है कि मोदी ने मीडिया मैनजमेन्ट पर जितना ध्यान दिया है उतना और किसी दूसरे काम पर नहीं। पिछले छह सालों में मोदी की ओर से टेलीवीजन और न्यू मीडिया को साधने की जमकर कोशिश की गई है। उसी का परिणाम है कि मोदी के जितने मित्र और समर्थक उनकी अपनी पार्टी भाजपा में नहीं हैं उससे ज्यादा मीडिया में हैं। मोदी और उनकी टीम द्वारा मीडिया में जनसंपर्क का जो सघन अभियान चलाया गया उसका सुखद परिणाम आज मोदी के सामने है।

यह मीडिया की ही देन है कि हाल ही अमरीकी प्रतिनिधिमंडल की मोदी से मुलाकात को इस रूप में स्थापित करने की कोशिश की कि अब अमरीका का रुख मोदी के प्रति सकारात्मक हो गया है। उन्हें अमरीका अपने यहां बुलाने को आतुर है। बाद में पता लगा कि वह प्रतिनिधिमंडल अधिकृत नहीं था और एक टूर प्रोग्राम के तहत उस प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से राशि वसूली गई थी। खैर, जहां तक उनके लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का सवाल है तो वे पहले व्यक्ति नहीं है। और भी उदाहरण हैं। और लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना यानि प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो जाना भी गले उतरने वाली बात नहीं है। इसी प्रकार इस बार जब मोदी को भाजपा संसदीय दल में शामिल किया गया तो मीडिया ने उसे इतना उछाला है, मानो कोई अजूबा हो गया है। संसदीय बोर्ड में तो वे पहले भी रहे हैं।

भाजपा के थिंक टैंक रहे गोविंदाचार्य ने इसको कुछ इस तरीके से कहा है-मोदी 6 साल पहले भी संसदीय बोर्ड में थे और अगर फिर उनको शामिल कर दिया गया है तो इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई है। गोविंदाचार्य ने आगे कहा कि मोदी को देश के बारे में कोई ठोस समझ नहीं है, मीडिया प्रबंधन की वजह से कई बार व्यक्ति पद तो पा जाता है, लेकिन काम नहीं कर पाता। अभी मोदी को बहुत कुछ सीखने और समझने की जरूरत है। जरूरी नहीं की जो अच्छा पत्रकार हो वो अच्छा सम्पादक ही हो जाए या अच्छा अध्यापक बहुत अच्छा प्रधानाध्यापक बन जाए, उसी तरह जरूरी नहीं की एक अच्छा मुख्यमंत्री, अच्छा प्रधानमंत्री ही बन जाए।

कुल मिला कर आज हालत ये हो गई है कि मोदी भाजपा नेतृत्व और संघ के लिए अपरिहार्य हो गए हैं। व्यक्ति गौण व विचारधारा अहम के सिद्धांत वाली पार्टी तक में एक व्यक्ति इतना हावी हो गया है, उसके अलावा कोई और दावेदार नजर ही नहीं आता। संघ के दबाव में फिर से हार्ड कोर हिंदूवाद की ओर लौटती भाजपा को भी उनमें अपना भविष्य नजर आने लगा है। यह दीगर बात है कि उनके प्रति आम सहमति बन पाती है या नहीं, उसकी घोषणा करना मीडिया की जिम्मेदारी नहीं, फिर भी वह करने से बाज नहीं आ रहा। सहयोगी दलों की स्वीकार्यता तो अभी दूर की कौड़ी है।
स्त्रोत : राजनामा,