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Tuesday, February 26, 2013

हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र

मनीषा पांडेय
इंडिया टुडे की फीचर एडिटर
मनीषा पांडेय






एक काम क्‍यों नहीं करते, इस मुल्‍क को आप हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र घोषित कर दीजिए!

मनीषा पांडेय

"मैं पिछले दस सालों से घर से दूर अकेले रह रही हूं। लेकिन मेरी मां को आज भी लगता है कि मैं घर वापस आ जाऊं। लड़की के अकेले रहने, अकेले घर से बाहर निकलने के ख्‍याल से उन्‍हें बार-बार इलाहाबाद की उस महिला डॉक्‍टर का ख्‍याल आता है, जिसे कुछ लोगों ने रेप करके मार डाला था। दिल्‍ली गैंग रेप के बाद उनका डर और गहरा हो गया है। वो जानती हैं, रहना तो पड़ेगा लेकिन उनके दिल को सुकून नहीं है। उन्‍हें कतई भरोसा नहीं है कि कभी कुछ बुरा नहीं हो सकता। इस मुल्‍क में उन्‍हें अपनी बच्‍ची की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं लगती। वो डर में जीती हैं।"
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"मेरा एक मुसलमान दोस्‍त मुंबई में रहता है। शहर में जब-जब बम फटता है, उससे बहुत दूर बिजनौर में बैठी उसकी मां डर जाती है। वो नास्तिक है। खुदा से उसका कभी याराना नहीं रहा। वो न नमाज पढ़ता है, न रोजे रखता है। लेकिन उसे याद है कि हर नौकरी में लोगों ने उसके नाम के कारण उसे तिरछी निगाहों से देखा है। जब-जब बम फटे, उससे उसकी देशभक्ति का सबूत मांगा है। वो जिस मुल्‍क में पैदा हुआ, उसके दादा, परदादा, दादा के दादा, जिस मुल्‍क में जन्‍मे और जिसकी मिट्टी में दफन हो गए, वो मुल्‍क उससे रोज उसकी देशभक्ति का सबूत मांगता है। दूर देश बैठी उसकी मां रोज डर में जीती है। मां को भरोसा नहीं इस मुल्‍क पर कि वो उसके बच्‍चे की हिफाजत करेगा। इस मुल्‍क ने मां को वो भरोसा कभी नहीं ही दिया।
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मेरा एक और दोस्‍त है। बहुत गरीब दलित परिवार से आता है। उसकी विधवा मां ने लोगों के घरों में झाडू-बर्तन करके उसे पढ़ाया। आज वो पीसीएस ऑफीसर है। लेकिन अब भी वो कभी-कभी उदास होता है क्‍योंकि उसकी सारी पढ़ाई, मेहनत, पोजीशन और पावर के बावजूद लोग उसे आज भी पीठ पीछे चमार का लड़का कहकर बुलाते हैं। उसकी सारी उपलब्धियों का ठीकरा रिजर्वेशन के सिर फोड़ देते हैं। मां अपनी धुंधलाई आंखों से बेटे को देखती है और सोचती है कि इतना पढ़-लिखकर भी आखिर बदला क्‍या। उसकी मां को भी इस मुल्‍क पर भरोसा नहीं। क्‍या चाहिए था जिंदगी में। इज्‍जत और स्‍वाभिमान की दो रोटी। रोटी तो मिली लेकिन इज्‍जत और स्‍वाभिमान नहीं।
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ये सारी माएं तुम्‍हारे महान लोकतांत्रिक मुल्‍क में आज भी डर में जीती हैं। वो मुल्‍क पर भरोसा कर न सकीं, मुल्‍क उन्‍हें भरोसा करा न सका। क्‍योंकि ये मुल्‍क औरतों के, दलितों के, मुसलमानों के स्‍वाभिमान का घर है ही नहीं। एक काम क्‍यों नहीं करते। अपने मुल्‍क को आप हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र घोषित कर दीजिए।
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मेरे मुसलमान दोस्‍त से ये मुल्‍क बार-बार देशभक्ति का सबूत मांगता है। एक औरत से उसका पति उसके शरीर की पवित्रता का सबूत मांगता है। बलात्‍कार की शिकार महिला से पुलिस, कानून, न्‍यायालय तक अच्‍छे चरित्र का सबूत मांगते हैं। एक दलित से उसकी खून की श्रेष्‍ठता का सबूत मांगते हैं। नौकरी और प्रमोशन में योग्‍यता का सबूत मांगते हैं। तुम्‍हारे मुल्‍क में हम सब हर क्षण संदेह के घेरे में हैं। तुम्‍हारे हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र में हमारे लिए न इज्‍जत है, न स्‍वाभिमान।

स्त्रोत/साभार : भड़ास४मीडिया (इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय Manisha Pandey के फेसबुक वॉल से.)

Sunday, January 6, 2013

11 साल के बच्चे से 40 साल की महिला ने किया दुष्कर्म

पीटीआई | Jan 5, 2013, 07.02PM IST

कोच्चि।। जब देश महिलाओं के साथ बढ़ते दुष्कर्म से गुस्से में है वैसे में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। केरल में 40 साल की एक महिला 11 साल के स्कूली लड़के का यौन शोषण करती थी। लड़का शर्म से किसी को बता नहीं पा रहा था। यौन शोषण करने वाली महिला लड़के की पड़ोसी है। यह घटना एर्नाकुलम जिले के पारूर इलाके की है। इस घटना से लोग हैरान हैं। पुलिस ने बताया कि आरोपी महिला को अरेस्ट कर लिया गया है।

लड़के के साथ महिला ने 11 दिसंबर को दुराचार किया था। उसने पूरा वाकया अपने क्लासमेट को बताया। इसके बाद पीड़ित लड़के के घर वालों को पता चला। घरवालों ने पुलिस स्टेशन जाकर एफआईआर दर्ज कराई। इसके फौरन बाद महिला को अरेस्ट कर लिया गया।

नाबालिग लड़के का बयान पुलिस ने ले लिया है। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों को बचाने संबंधी कानून के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

स्त्रोत : नव भारत टाइम्स, 05.01.13
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उक्त खबर पर कुछ सार्थक टिप्पणियां :-
1-हमारा समाज दोहरी मानसिकता मे जीती है . सच का सामना करना बड़ा मुस्किल होता है , कोई हिम्मत करके कोई सच बोल दे , तो पूरी मीडिया उसी के पिच्छे लग जाती है, पूरी बत को राजनिनितिक रंग दे दिया जाता है. सेक्स को हौआ बना दिया गया है , कोई स्वेच्छा से सेक्स करे/ करवाये तो पुलिस छ्हपआ मरती है , क्योंकि उसे दलाली नही मिलती , आज जरोरत है की एक सेक्स पॉलिसी बने , सेक्स भी उतना ही जरूरी है जितना खाना पीना. कुकर्मी लोग मानसिक बीमारी से ग्रस्त . , उनका इलाज करने की जरूरत है.
 2-भारत मे महिलाए समानता का अधिकार चाहती है ,शायद बलात्कार करने भी, और इस तरह इस औरत ने महिलाओ को पुरुषो के बराबर खड़ा कर दिया है. RIGHT TO EQUALITY AND RIGHT TO EQUAL OPPORTUNITY. इस महिला की यही सजा होनी चाहिये!
 3-मुझे लगता हे सरकार की चाल हे !
 4-कोई भी सजा किसी व्यक्ति के लिंग निर्धारण के बाद तय नही की जाती. जुर्म तो जुर्म होता है चाहे वह महिला करे या पुरुष. दोनो एकसमान सजा के हकदार हैं.
 5-महिलाए तो पहले ही कहती है की हम पुरुषो से किसी भी मामले मे कम नही है, इस बात को इस महिला ने पूरा करके दिखाया है, अब क्या महिलाए इस औरत को फांसी दिलाने के लिये क्या आन्दोलन करेंगी, अब इस चीज को देखना है.
6-यह खबर केवल खबर ही नही बल्कि औरतो के दोहरे चरित्र को भी उजागर कर देगी यदि महिला संगठन इस मामले पर चुप्प लगा जाती है,

समस्त टिप्पणी पढ़ना चाहें तो यहाँ क्लिक करें! 

Friday, January 4, 2013

विडंबनाओं के देश में स्त्री-सुरक्षा..!

दुनिया के किसी भी देश में रहने वाले इतनी विडंबनाओं के साथ नहीं जीते, जितनी विडंबनाओं के साथ हमें भारत में जीना पड़ता है। धर्म, सम्प्रदाय और राजनीति से परे हम भारतीयों में यदि कोई एकरूपता है, तो वह है, भारतीयों की सोच और कथनी, कथनी और करनी में मौजूद पाखंड। भारतीय समाज का वयस्क हिस्सा, चाहे वह पुरुष हो या महिला, अपने दैनंदिनी जीवन के प्रत्येक पल को इसी दिखावे, बनावटीपन और ओढ़े हुए झूठ के साथ जीते हैं। वह चाहे गरीबों के नाम पर आंसू बहाना हो, भ्रष्टाचार के नाम पर रोष जाहिर करना हो या फिर स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित होना हो, हम अपने पाखंड को सरलता के साथ ओढ़े रहते हैं| हमारी सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि चरित्र और नैतिकता के स्तर पर मूल्यों में दोहरापन हमें कभी कचौटता भी नहीं है।

किसी मनुष्य को जीवन में जिन तीन चीजों की कामना सबसे अधिक होती है, वे तीनों ही भारतीय सन्दर्भों में स्त्री रूप हैं| लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा| धन, बुद्धि और शक्ति। सामान्य तौर पर किसी घर में घर में कन्या का जन्म होने पर कहा जाता है कि लक्ष्मी घर में आई है| पर, उसी लक्ष्मी को कोख में ही मार देने की घटनाएं सर्वाधिक भारत में होती हैं। वही लक्ष्मी दैहिक व्यापार में धकेली जाती है और धन कमाने का साधन मानी जाती है। विडम्बना यह है कि लक्ष्मी को दैहिक व्यापार में ढकेलने के काम में भी सहायक लक्ष्मी ही बनती है।

सरस्वती ज्ञान की देवी है। उन्हीं सरस्वतियों को पढ़ लिखकर क्या करेंगी, कहकर, ज्ञान प्राप्ति से वंचित रखा जाता है। दुर्गा की उपासना करके शक्ति प्राप्त की जाती है| दुर्गा के उन्हीं अवतारों को घरों में समाज में लतियाया जाता है। यह सब करते हुए सोच के स्तर पर समाज में श्रेणी या स्तर का कोई भेदभाव नहीं है। उच्च वर्ग हो, मध्य वर्ग हो या निचला तबका, आर्थिक आधार पर हो या जाती, धर्म और सम्प्रदाय, सोच के स्तर पर सभी समान हैं| स्त्रियाँ पैर की जूती से भी कम हैं। यह सोच के स्तर पर है। स्त्रियाँ पूजनीय हैं, उनका सम्मान होना चाहिये। यह कथनी के स्तर पर है। उन्हें दबाकर रखना चाहिये और अवसर मिलते ही उनका उपभोग किया जा सकता है, यह करनी के स्तर पर है।

दिल्ली सहित पूरे देश में पिछले एक पखवाड़े से चल रहे प्रदर्शनों में यह विडम्बना आंदोलन, राजनीति और प्रशासन तीनों स्तर पर खुलकर सामने आई है। यह क्या कम विडंबनापूर्ण है कि जब इंडिया गेट पर युवाओं का रोषपूर्ण प्रदर्शन अपने चरम पर था, इलेक्ट्रानिक मीडिया के तथाकथित बुद्धिमान और विवेकपूर्ण रिपोर्टर और एंकर गला फाड़ फाड़ कर दिल्ली पोलिस ही नहीं, पूरे देश की पोलिस व्यवस्था को कोस रहे थे, देश की सरकार ही नहीं, सारे दलों के सारे राजनीतिज्ञ घडियाली आंसू बहाकर संवेदनशील दिखने की कोशिश कर रहे थे, दुनिया की सबसे बदनाम पत्रिका और बदनाम क्लबों का समूह प्लेब्वॉय भारत में उसके खुलने वाले क्लबों में शराब परोसने के लिए रखी जाने वाली “बनीज” याने लड़कियों के लिए पहनने वाली पोशाक का प्रदर्शन कर रहा था, पर, न तो इंडिया गेट पर "व्ही डिमांड जस्टिस" के नारे लगाने वालों ने, न ही चैनलों पर बलात्कार के खिलाफ प्रवचन झाड़ने वाले महिलाओं के महिला और पुरुष पक्षधरों ने, न ही गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया के रिपोर्टरों और एंकरों ने, न ही प्रिंट मीडिया के अखबारों ने और न ही घडियाली आंसू बहाने वाले राजनीतिज्ञों ने किंचित मात्र भी चिंता जताई कि कामुकता परोसने वाले इन क्लबों के खुलने का भारतीय समाज पर क्या असर पड़ेगा?

पिछले तीन दशकों ने भारत में कामुकता एक उद्योग के रूप में स्थापित हो चुकी है और महिलाएं इसमें माल के रूप में व्यापार के लिए इस्तेमाल हो रही हैं। कामुकता जब उद्योग की शक्ल ग्रहण कर लेती है, तब इसका उपभोक्ता केवल समाज का अभिजात्य अग्रणी नहीं होता, उपभोक्ताओं का विस्तार मध्यवर्ग और निचले वर्ग तक हो जाता है। ठीक उसी तरह, जैसे देश में पहले जब गुटखे का उत्पादन शुरू हुआ तो वो बड़े पेक (डिब्बे) में मिलता था और उसके ग्राहक समाज के संपन्न तबके से थे। एक दशक के बाद ही वह छोटे पेक याने पाउच में भी मिलाने लगा और उपभोक्ता समाज का प्रत्येक तबका है| यही बात कामुकता के उद्योग पर भी लागू होती है| गुटखा उद्योग समाज को गुटखे का आदी बनाता है। कामुकता का उद्योग समाज को कामुक बनाता है। आज यही होते हम देख रहे हैं। इस उद्योग में माल स्त्री है और वो इसी का दुष्परिणाम भुगत रही है।

इस कामुक समाज का प्रत्येक अंग, व्यक्ति से लेकर संस्था तक, राजनीति से लेकर धर्म तक, स्त्री से लेकर पुरुष तक, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार तक की घटनाओं पर, दहेज से लेकर डायन/टोनही कहकर महिलाओं को मार देने तक की घटनाओं पर, प्रेम निवेदन अस्वीकार कर देने से सम्मान के लिए स्त्रियों को मार देने तक की घटनाओं पर, उसी कामुक नजरिये से सोचता है। यही सोच पोलिस को लापरवाह बनाती है। यही सोच 100 में से 70 बलात्कार के अपराधियों को न्यायालय से छुड़ाती है। यही सोच बलात्कारियों को लोकसभा और विधान सभाओं में पहुंचाती है।

इस विडम्बना के बावजूद कि यही समाज तब उद्वेलित नहीं हुआ था, जब मणिपुर की मनोरमा, छत्तीसगढ़ की सोनी शोरेन, आसिया, नीलोफर या भंवरी देवी के ऊपर अत्याचार हुए थे, इस बात का स्वागत किया जाना चाहिये कि कुछ हलचल तो समाज में हुई है। पर, दुखद तो यह है कि इतना बड़ा अवसर मिलने के बावजूद भी, समाज की चिंताएं, फांसी की सजा, नपुंसक बनाने और पोलिस तथा न्यायायिक सुधार पर ही टिकी हैं। उन प्रदर्शनों में न तो व्यवस्था जन्य दोषों पर कोई बल है, न ही समाज को सेक्स के चक्कर में डालकर मूल सामाजिक समस्याओं की तरफ से भटकाने के प्रति कोई चिंता है| प्रधानमंत्री का कहना है कि उस 23 वर्षीय लड़की की कुरबानी बेकार नहीं जायेगी। उस लड़की के माता-पिता का कहना है कि उनकी बेटी की मौत से दिल्ली और देश की महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ेगी। देश की बेटियों को हक और सम्मान मिलेगा। पर, मिलेगा क्या?

देश का एक युवा क्रिकेटर लड़कियों को पटाने के दो तरीके बता रहा है। एक परफ्यूम के विज्ञापन में लड़के की फियान्सी कामुकता से प्रोत होकर लड़के के पिता के कपड़े उतार रही है। योनी को गोरा बनाने से लेकर, योनी को कसा बनाने की क्रीम तक के विज्ञापन बाजार में छाये हैं। नहीं किसी के मुँह में जहर डाल के आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वो व्यक्ति उस जहर को अमृत में बदल लेगा। इसी तरह समाज के दिमाग में कामुकता भरकर आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह उसे सदवृति में बदल लेगा।

बुनियादी बात यह है कि समाज की संस्कृति, नैतिकता का वाहक समाज का अग्रणी हिस्सा होता है। आज वही भ्रष्ट है। वही कामुकता में खो गया है। आप अपने मालिक को प्लेब्वॉय क्लब तक ले जाने वाले ड्राईवर से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह उसकी पहुँच में आ जाने वाली महिला को माल नहीं समझेगा।

विडम्बना यह है कि उस सोच के बारे में कहीं नहीं सोचा गया जो कामुकता को समाज में रोप रही है, बलात्कार, स्त्रियों को माल समझना, जिसके सहउत्पाद (BY PRODUCT) हैं। न इंडिया गेट पर, न लोकसभा में और न हमारे दिमागों में। बिना उस पर विचार किये, विडंबनाओं से भरे इस समाज में स्त्री सुरक्षा पर रोना कितना फलीभूत होगा, यह तो भविष्य ही बताएगा।

Thursday, May 3, 2012

मिस्त्र में मुर्दा महिला के साथ सेक्स


मिस्त्र में मुर्दा महिला के साथ सेक्स

मिस्त्र में मुर्दा महिला के साथ सेक्स करने का नया कानून के बनाए जाने के विरोध में मुसलिम महिला आंदोलन की कार्यकर्ताओं ने विधान सभा के पास प्रदर्शन किया।

इसका नेतृत्व महिला आंदोलन की अध्यक्ष नाईस हसन ने करते हुए भारत सरकार के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग करते हुए इजिप्ट दूतावास को ज्ञापन भेजा।

Sunday, April 8, 2012

मध्यप्रदेश में महिलाओं और किशोरियों के खिलाफ लगातार बढ़ते हिंसा को लेकर युवा संवाद और नागरिक अधिकार मंच द्वारा जारी किया गया श्वेत पत्र

प्रेस विज्ञप्ति                                                                                                 दिनांक-5/04/.2012

मध्यप्रदेश में महिलाओं और किशोरियों के खिलाफ लगातार बढ़ते हिंसा को लेकर युवा संवाद और नागरिक अधिकार मंच द्वारा जारी किया गया श्वेत पत्र