भारत में उच्च स्तरीय न्यायाधीशों के लिए स्वयं न्यायपालिका ही नियुक्ति का कार्य देखती है और उस पर किसी बाहरी नियंत्रण का नितांत अभाव है|फलत: जनता को अक्सर शिकायत रहती है कि उसे न्याय नहीं मिला और उतरोतर अपीलों का लंबा सफर करने बावजूद आम नागरिक वास्तविक न्याय से वंचित ही रह जाता है| दूसरी ओर सरकारें कहती हैं कि न्यायपालिका स्वतंत्र है अतः वह उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती है| स्वतंत्र होने का अर्थ स्वच्छंद होना नहीं है और लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी गयी सरकारें न्यायपालिका सहित अपने प्रत्येक अंग के स्वस्थ संचालन के लिए जिम्मेदार हैं | आखिर न्यायाधीश भी लोक सेवक हैं और वे भी अपने कृत्यों के लिए जवाबदेय हैं|
आप सबका हार्दिक स्वागत है! यहाँ पर "प्रेसपालिका" (राष्ट्रीय हिन्दी पाक्षिक) और "ऑल इण्डिया प्रेसपालिका-प्रेस-क्लब" की मौलिक ख़बरों, आलेखों तथा अन्य स्रोतों से प्राप्त संकलित विभिन्न विषयों के अन्य शोधपूर्ण तथा तथ्यपरक आलेखों और विचारों के साथ-साथ देश के प्रमुख प्रान्तों की राजधानियों/प्रमुख शहरों की तथा राजस्थान के सभी जिलों की अन्य पापुलर स्रोतों, समाचार-पत्रों से प्राप्त ताजा खबर, समाचार और हलचल भी प्रस्तुत हैं! सुधि पाठक भी इसमें अपना स्रजनात्मक योगदान कर सकते हैं!
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Saturday, April 28, 2012
Thursday, March 29, 2012
विरासत में मिला लोकतंत्र
विरासत में मिला लोकतंत्र
-सचिन कुमार जैन , मध्यप्रदेश
ब्रिटिश राज द्वारा ऐसी कर और राजस्व व्यवस्था बनायी गयी, जिनसे और आसानी से यहाँ के संसाधनों को लूटा जा सके। ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनायी गयी जिससे बंधुआ समाज की स्थापना की जा सके, लोग विचार हीन हो जाएँ और उनकी सवाल करने की क्षमता खत्म कर दी जाए। भय का ऐसा माहौल बने कि भुखमरी होने पर भी लोग विद्रोह करने के बारे में ना सोचें. ऐसी थीं उनकी मंशाएं, तो स्वाभाविक है कि उनके लिए कानून और व्यवस्था के कुछ दूसरे ही मायने स्थापित हो जाते हैं। न्याय उनकी व्यवस्था का चरित्र हो ही नहीं
Monday, February 27, 2012
पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु, कानून द्वारा शासित सभ्य समाज में एक कलंक है
दाण्डिक अपील संख्या ८५७/ १९९६ शकीला अब्दुल गफार खान बनाम वसंत रघुनाथ ढोबले में निर्णय सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकार सर्वशक्तिमान और सर्वत्र व्याप्त अध्यापक की तरह लोगों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करती है, यदि सरकार ही कानून तोडने वाली हो जाये तो यह कानून के अपमान को जन्म देती
Tuesday, February 21, 2012
आवंटन अधिसूचना जारी होने से २ वर्ष पूर्व ही कर दिया गया था|
सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय उपभोक्ता कांग्रेस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (मनु/सुको /०३४५/२०११) के निर्णय में कहा है कि राज्य या इसकी एजेंसियां राजनैतिक संस्थानों/या राज्याधिकारियों की इच्छानुसार किसी भी व्यक्ति को खैरात या लाभ नहीं दे सकती| ऐसा लाभ सशक्त, पारदर्शी , दृष्टव्य और निश्चित नीतिगत सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए |वर्तमान प्रकरण में भूमि के आरक्षण हेतु एक्स द्वारा मेमोरिअल ट्रस्ट के संयोजक
Thursday, December 15, 2011
कारण ही निर्णय की जान
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय जीवन बीमा निगम बनाम भा.जी.बी. के सेवानिवृत अधिकारी संगठन के निर्णय दिनांक 12.02.08 में कहा है कि एक कानून में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द उसके उद्देश्य एवं अभिप्राय से असर लेना चाहिए। इसलिए व्याख्या को उद्देश्य एवं अभिप्राय से असर लेना चाहिए। इसलिए व्याख्या में उद्देश्यपरकता का सिद्धान्त प्रयुक्त किया जाना चाहिए। एक प्रत्यायोजिती संविधि के उल्लंघन में कार्य नहीं कर सकता। संविधिक प्रावधानों द्वारा उसे न प्रत्यायोजित शक्तियों का उप प्रत्यायोजित अधिकारी प्रयोग नहीं कर सकता। यह मात्र विनियमों और अधिनियमों से ही मेल नहीं खाने चाहिए अपितु संसद के अन्य अधिनियमों से भी मेल खाने चाहिए।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने सेव द चिल्डेªन फण्ड यू.के. बनाम डॉ0 सुरेष चन्द्र शर्मा (आर.एल.डब्ल्यू. 2006(2) राज. 1433) में कहा है कि नियुक्ति पत्र जयपुर से जारी हुआ था। जयपुर में ही नियुक्ति हुई थी। अतएव प्रत्यर्थी याची को कार्य हेतुक का भाग जयपुर में उपलब्ध हुआ था।
दुनीचन्द एण्ड कं0 बनाम नारायण दास एण्ड कं0 (1947 17 ब्वउच ब्ंेमे 195 थ्ठ) के निर्णय में कहा गया है कि आनुशंगिक का अर्थ आकस्मिक व अकस्मात् सम्बन्ध से नहीं है। शक्तियों के संदर्भ में लागू करने के कानूनी अर्थ में इसका अर्थ जो कुछ अभिव्यक्त है के सहायक से है और उसके सम्बन्ध में निमित प्रकृति से है जो कि अभिव्यक्त रूप में दी गई मुख्य शक्ति के उचित प्रयोग करने, और आवश्यक दोनों अर्थों में है।
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब राज्य बनाम मुस्तमा केसर जहां बेगम (एआईआर 1963 सु.को. 1604) में कहा है कि राजा हरिश्चन्द्र के प्रकरण के निर्णय का औचित्य यह लगता है कि प्रभावित पक्षकार को पंचाट का ज्ञान होना चाहिए। वास्तव में या रचनात्मक रूप में और छः माह की समयावधि उस ज्ञान की तिथि से प्रारम्भ होगी। अब ज्ञान का अर्थ मात्र इस तथ्य के ज्ञान से नहीं है कि पंचाट हो गया है। ज्ञान पंचाट की आवश्यक विषय वस्तु के सम्बन्ध में होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने रणजीत बनाम महाराष्ट्र राज्य (1965 एआईआर 881) में कहा है कि उप धारा (अश्ली ल पुस्तक )बेचना और बेचने के लिए कब्जे में रखना अपराध के लिए आवश्यक तत्व बनाती है। चूंकि बिक्री सम्पन्न हो गई है और अपीलार्थी विक्रेता है इसलिए इस मामले में यह आवश्यक अभिप्राय निकलता है। न्यायालय यह समझेगा कि यदि पुस्तक उसकी ओर से बेची गई तो वह दोशी है और बाद में यह पाया जावे कि यह अश्लील थी यदि वह यह स्थापित नहीं करता कि पुस्तक उसकी जानकारी या सहमति के बिना बेची गयी थी।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने न्यू इण्डिया एश्योरेन्स कम्पनी बनाम भारत संघ के निर्णय दिनांक 02.07.09 में स्पष्ट किया है कि जहां कार्य का भाग भी सम्पन्न हुआ हो वह वादी जो कि वाद का प्रमुख आधार है अपनी सुविधानुसार मंच का चयन कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने डॉ0 विजय लक्ष्मी साधो बनाम जगदीश के निर्णय दिनांक 05.01.01 में स्पष्ट किया है कि विद्वान एकल न्यायाधीश ने यह अनदेखा किया है कि संविधान के अनुच्छेद 225 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय द्वारा बनाये गये नियम मात्र प्रक्रिया के नियम है तथा वे सारभूत नियम नहीं बन जाते और वे नियम संविधान के अनुच्छेद 348 (2) के प्रावधानों के आशय को प्रभावित नहीं कर सकते। उच्च न्यायालय के नियम 2 (ख) की अनुपालना नहीं करने पर अधिनियम की धारा 86 (1) चुनाव याचिका को प्रभावित करेगा यह सही नहीं है। यह निर्धारित है यदि समान क्षेत्राधिकार वाली बैंच दूसरी बैंच भिन्न तर्क या अन्यथा के आधार पर असहमत है जो कि विधिप्रश्न है कि स्थिति में उपयुक्त यह है कि मामले को बड़ी बेंच को मुद्दे के समाधान हेतु रेफर किया जाय बजाय कि दो विरोधाभासी निर्णयों को संशय के लिए मुक्त छोड़ दिया जाय। कानून की निश्चितता का बलिदान देना ठीक नहीं है। न्यायिक अनुषासन न्यायिक प्रक्रिया का आधार कानूनी औचित्य से कम नहीं बनाता और इसका हर कीमत पर सम्मान होना चाहिए।
मद्रास उच्च न्यायालय ने बोमिडी बायन नायडू बनाम बोमिडी सूर्यनारायण (1912 23 एमएल जे 543) में कहा है कि मैं इस विचारण के पैरा 5 और 6 में दिये गये कारणों से निचले न्यायालयों द्वारा दिये गये निर्णयों को उलटता हूं तथा मामले को निचले अपीलीय न्यायालय द्वारा अपील के नये सिरे से निस्तारण के लिए रिमाण्ड करता हूं जिला मुंसिफ ने मुद्दों सं0 4 ता 5 में अन्तवर्लित प्रश्नों का निर्धारण नहीं किया है और निचले अपील न्यायालय ने भी सभी मुद्दों का विचारण नहीं किया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रेमप्रकाश विरमानी बनाम राज्य सरकार (ए.आई.आर. 1971 इला 82) में स्पष्ट किया है कि चूंकि मेरे विचार से धारा 7एफ भू आंवटन से सम्बन्धित में अर्द्ध न्यायिक रूप में कार्य करने की आवश्यकता है ऐसे कारण जिनका उतर मैंने रिट में दिया है, राज्य सरकार अपने आदेश में कारण देने को बाध्य है।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने सेव द चिल्डेªन फण्ड यू.के. बनाम डॉ0 सुरेष चन्द्र शर्मा (आर.एल.डब्ल्यू. 2006(2) राज. 1433) में कहा है कि नियुक्ति पत्र जयपुर से जारी हुआ था। जयपुर में ही नियुक्ति हुई थी। अतएव प्रत्यर्थी याची को कार्य हेतुक का भाग जयपुर में उपलब्ध हुआ था।
दुनीचन्द एण्ड कं0 बनाम नारायण दास एण्ड कं0 (1947 17 ब्वउच ब्ंेमे 195 थ्ठ) के निर्णय में कहा गया है कि आनुशंगिक का अर्थ आकस्मिक व अकस्मात् सम्बन्ध से नहीं है। शक्तियों के संदर्भ में लागू करने के कानूनी अर्थ में इसका अर्थ जो कुछ अभिव्यक्त है के सहायक से है और उसके सम्बन्ध में निमित प्रकृति से है जो कि अभिव्यक्त रूप में दी गई मुख्य शक्ति के उचित प्रयोग करने, और आवश्यक दोनों अर्थों में है।
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब राज्य बनाम मुस्तमा केसर जहां बेगम (एआईआर 1963 सु.को. 1604) में कहा है कि राजा हरिश्चन्द्र के प्रकरण के निर्णय का औचित्य यह लगता है कि प्रभावित पक्षकार को पंचाट का ज्ञान होना चाहिए। वास्तव में या रचनात्मक रूप में और छः माह की समयावधि उस ज्ञान की तिथि से प्रारम्भ होगी। अब ज्ञान का अर्थ मात्र इस तथ्य के ज्ञान से नहीं है कि पंचाट हो गया है। ज्ञान पंचाट की आवश्यक विषय वस्तु के सम्बन्ध में होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने रणजीत बनाम महाराष्ट्र राज्य (1965 एआईआर 881) में कहा है कि उप धारा (अश्ली ल पुस्तक )बेचना और बेचने के लिए कब्जे में रखना अपराध के लिए आवश्यक तत्व बनाती है। चूंकि बिक्री सम्पन्न हो गई है और अपीलार्थी विक्रेता है इसलिए इस मामले में यह आवश्यक अभिप्राय निकलता है। न्यायालय यह समझेगा कि यदि पुस्तक उसकी ओर से बेची गई तो वह दोशी है और बाद में यह पाया जावे कि यह अश्लील थी यदि वह यह स्थापित नहीं करता कि पुस्तक उसकी जानकारी या सहमति के बिना बेची गयी थी।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने न्यू इण्डिया एश्योरेन्स कम्पनी बनाम भारत संघ के निर्णय दिनांक 02.07.09 में स्पष्ट किया है कि जहां कार्य का भाग भी सम्पन्न हुआ हो वह वादी जो कि वाद का प्रमुख आधार है अपनी सुविधानुसार मंच का चयन कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने डॉ0 विजय लक्ष्मी साधो बनाम जगदीश के निर्णय दिनांक 05.01.01 में स्पष्ट किया है कि विद्वान एकल न्यायाधीश ने यह अनदेखा किया है कि संविधान के अनुच्छेद 225 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय द्वारा बनाये गये नियम मात्र प्रक्रिया के नियम है तथा वे सारभूत नियम नहीं बन जाते और वे नियम संविधान के अनुच्छेद 348 (2) के प्रावधानों के आशय को प्रभावित नहीं कर सकते। उच्च न्यायालय के नियम 2 (ख) की अनुपालना नहीं करने पर अधिनियम की धारा 86 (1) चुनाव याचिका को प्रभावित करेगा यह सही नहीं है। यह निर्धारित है यदि समान क्षेत्राधिकार वाली बैंच दूसरी बैंच भिन्न तर्क या अन्यथा के आधार पर असहमत है जो कि विधिप्रश्न है कि स्थिति में उपयुक्त यह है कि मामले को बड़ी बेंच को मुद्दे के समाधान हेतु रेफर किया जाय बजाय कि दो विरोधाभासी निर्णयों को संशय के लिए मुक्त छोड़ दिया जाय। कानून की निश्चितता का बलिदान देना ठीक नहीं है। न्यायिक अनुषासन न्यायिक प्रक्रिया का आधार कानूनी औचित्य से कम नहीं बनाता और इसका हर कीमत पर सम्मान होना चाहिए।
मद्रास उच्च न्यायालय ने बोमिडी बायन नायडू बनाम बोमिडी सूर्यनारायण (1912 23 एमएल जे 543) में कहा है कि मैं इस विचारण के पैरा 5 और 6 में दिये गये कारणों से निचले न्यायालयों द्वारा दिये गये निर्णयों को उलटता हूं तथा मामले को निचले अपीलीय न्यायालय द्वारा अपील के नये सिरे से निस्तारण के लिए रिमाण्ड करता हूं जिला मुंसिफ ने मुद्दों सं0 4 ता 5 में अन्तवर्लित प्रश्नों का निर्धारण नहीं किया है और निचले अपील न्यायालय ने भी सभी मुद्दों का विचारण नहीं किया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रेमप्रकाश विरमानी बनाम राज्य सरकार (ए.आई.आर. 1971 इला 82) में स्पष्ट किया है कि चूंकि मेरे विचार से धारा 7एफ भू आंवटन से सम्बन्धित में अर्द्ध न्यायिक रूप में कार्य करने की आवश्यकता है ऐसे कारण जिनका उतर मैंने रिट में दिया है, राज्य सरकार अपने आदेश में कारण देने को बाध्य है।
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