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Friday, January 1, 2016

उमराव सालोदिया का उमराव खान हो जाना


उमराव सालोदिया का उमराव खान हो जाना
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राजस्थान के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी उमराव सालोदिया ने मुख्य सचिव नहीं बनाये जाने से नाराज हो कर स्वेच्छिक सेवा निवृति लेने तथा हिन्दुधर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने की घोषणा कर सनसनी पैदा कर दी है ।
राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार से अब न उगलते बन रहा है और न ही निगलते। यह सही बात है कि वरीयता क्रम में वे मुख्य सचिव बनने के लिए बिलकुल पात्र थे और यह भी सम्भव था कि वे राज्य के पहले दलित मुख्य सचिव बन जाते मगर भाजपा सरकार ने वर्तमान मुख्य सचिव सी एस राजन को तीन माह का सेवा विस्तार दे कर सालोदिया को वंचित कर दिया ।
सेवा एवम् धर्म छोड़ने की घोषणा करते हुए सालोदिया ने यह भी कहा कि उन्हें सेवाकाल के दौरान सामान्य वर्ग के एक व्यक्ति ने बहुत परेशान किया ,जिसकी प्राथमिकी दर्ज कराये जाने के बावजूद उस व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी।सालोदिया ने यह भी कहा कि वे समानता की चाह में इस्लाम कबूल कर रहे है । हालाँकि उन्होंने यह भी बताया कि उनकी इस्लाम में रूचि लंबे समय से है और उन्होंने इस्लाम को भली भांति पढ़ समझ कर ही धर्मान्तरण का फैसला किया है।
उमराव सालोदिया अब उमराव खान बन चुके है। उनके धर्म परिवर्तन करने पर मिश्रीत प्रतिक्रियाएं आई है ।राज्य के गृह मंत्री गुलाब चन्द कटारिया ने इसे व्यक्तिगत निर्णय बताते हुए कहा कि अगर उनके साथ अन्याय हुआ है और उन्हें लगता है कि उन्हें वंचित किया गया है तो उसका विरोध उचित फोरम पर किया जा सकता था। चिकित्सा एवम् स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ ने इसे सेवा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन करार देते हुए कहा कि वे पद पर रहते हुए इस तरह प्रेस वार्ता कैसे कर सकते है । उन्हें दूसरे मान्य तरीके अपनाने चाहिए ।
यह तो निर्विवाद तथ्य है कि उन्हें मुख्य सचिव बनाया जाना चाहिये। यह उनका हक़ है जिसे सरकार ने जानबूझ कर छीना है मगर उनके इस तरीके और इस्लाम कबूल करने को लेकर दलित बहुजन आंदोलन ने भी कई सवाल खड़े करके उन्हें इस लड़ाई में अकेला छोड़ दिया है।
दरअसल विगत कुछ दिनों से दलित समुदाय के युवा सोशल मीडिया के ज़रिये उमराव सालोदिया को मुख्य सचिव बनाने की पुरजोर मांग कर रहे थे।इन उत्साही अम्बेडकर अनुयायियों को उमराव सालोदिया के इस आकस्मिक और एकाकी निर्णय ने निराश कर दिया है।अब तक उनके पक्ष में खड़े लोग ही अब पूंछ रहे है कि उमराव सालोदिया उमराव गौतम क्यों नहीं हुए ? जिस अम्बेडकर की वजह से वे इतने बड़े पद तक पंहुचे उनका मार्ग क्यों नहीं लिया खान साहब ने ?
दलित बहुजन आंदोलन को इस्लाम से ना तो परहेज़ है और ना ही कोई दिक्कत ,परेशानी उमराव सालोदिया के तरीके और निर्णय से है। बिना संघर्ष किये ही उनके नौकरी छोड़ने के निर्णय को पलायन माना जा रहा है तथा बुद्ध धर्म नहीं अपनाने की कड़ी आलोचना हो रही है।
दलित युवा सोशल मीडिया पर बहस छेड़े हुए है कि अब वे दलितों की समानता के मिशन के लिए काम करेंगे अथवा दीन की तब्लीग के लिए जमाती बन जाएंगे। यह भी प्रश्न उठाया जा रहा है कि अगर उनके साथ नौकरशाही में रहते हुए लंबे अरसे से अन्याय व भेदभाव हो रहा था तो वे इतने समय तक खामोश क्या सिर्फ मुख्य सचिव बनने की झूठी आशा में थे ? यहाँ तक पूंछा जा रहा है कि क्या अगर उन्हें चीफ सेकेट्री बना दिया जाता तो उनकी नज़र में हिन्दू धर्म समानता का धर्म हो जाता ? अब लोग यह भी जानना चाह रहे है कि क्या उन्होंने बौद्ध धर्म को पढ़ा है ?
जो उमराव सालोदिया को जानते है उनके मुताबिक वे कभी भी आंबेडकर की मुहिम में शामिल नहीं रहे है और ना ही उन्हें मुक्तिकामी कबीर, फुले, अम्बेडकर की विचारशरणी से कोई मतलब रहा है।यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें समाज हित में एक सामूहिक फैसला ले कर नज़ीर स्थापित करनी चाहिए थी ।उन्हें अपने साथ हुए भेदभाव और वंचना के प्रश्न को समाज जागृति का हथियार बनाना चाहिए था मगर वे इससे चूक गए और इसे केवल निजी हित का सवाल बना डाला है।संभवतः उमराव सालोदिया से यह चूक इसलिए हुयी है क्योंकि उनका जुड़ाव समुदाय से लगभग नहीं के बराबर रहा है । वे पूरे सेवाकाल में इन्हीं लोगों के होने में लगे रहे जैसे अधिकांश बड़े दलित अधिकारी करते है।
यह बात कुछ हद तक सही भी है कि जो अधिकारी और राजनेता समाज से कट कर जीते है फिर उन्हें अपनी लड़ाई अक्सर अकेले ही लड़नी होती है और फिर वे ऐसे ही अदूरदर्शी निर्णय ले कर अपनी तथा अपने वर्ग की किरकिरी करा बैठते है।
बेहतर होता कि उमराव सालोदिया इस लड़ाई को थोडा पहले शुरू करते और अंत तक लड़ते ,मगर उन्होंने योद्धा बनने के बजाय भगौड़ा बनना स्वीकार किया है ,जिसका दलित बहुजन आंदोलन ने स्वागत करने से साफ इंकार कर दिया है।अब दलित किसी धर्म में मुक्ति नहीं देखते,क्योंकि उन्हें मुक्ति संघर्ष में दिखाई देती है पलायन में नहीं ।
- भंवर मेघवंशी
( लेखक स्वतन्त्र पत्रकार है ,उनसे Bhanwar meghwanshi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है )





Monday, August 12, 2013

दुर्गा शक्ति के बहाने ताकतवर होती आईएएस लॉबी

"हमें हजारों सालों से एक ही बात सिखायी गयी है कि उच्च वर्ग और शासक वर्ग कभी गलत नहीं होता, उसे कभी बड़ी सजा नहीं दी जा सकती और छोटे लोग या निम्न वर्ग सेवा करने, सजा पाने और देश के कानून को तथा सत्ताधारियों व सत्ता के दलालों के हर आदेश को मानने के लिये पैदा हुए हैं।" "ये मनोभाव आज भी इस देश के लोगों के अवचेतन में विद्यमान है और यही रुग्ण मानसिकता, अनेक प्रकार के शोषण एवं विभेद के लिये जिम्मेदार है। जब तक इस मानसिकता को पैदा करने वाले कारकों को शक्ति से नहीं बदला जायेगा दुर्गा शक्ति नागपाल जैसियों के बहाने आईएएस अधिक ताकतवर होते रहेंगे और कमजोर वर्ग शोषण का शिकार होता रहेगा।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा युवा आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित कर दिये जाने के मुद्दे को कॉर्पोरेट तथा धनाढ्य वर्ग के चंगुल में कैद मीडिया द्वारा जमकर उछाला गया है। इस मुद्दे के बहाने मीडिया व हितबद्ध लोगों द्वारा तरह-तरह की चर्चाएँ और परिचर्चाएँ आयोजित और सम्पन्न करवायी गयी। प्रिंट और सोसल मीडिया पर कई सौ आलेख इस विषय पर लिखे जा चुके हैं। इस मुद्दे को प्रचारित करने का आधार ये बताया जा रहा है कि दुर्गा शक्ति नागपाल नाम की ये निलम्बित आईएएस ईमानदार बतायी जाती हैं और इन्होंने कथित रूप से माफिया से टक्कर लेने की कौशिश की। जबकि उत्तर प्रदेश की सरकार का पक्ष है कि रमजान के पवित्र महिने में इस्लाम के अनुयाईयों की ओर से किये जा रहे मस्जिद की निर्माण में व्यवधान डालने का प्रयास करके दुर्गा शक्ति नागपाल ने कथित रूप से सामाजिक सौहार्द और शान्ति को भंग करने का प्रयास किया।

इस मुद्दे को जहॉं एक ओर तो देश की आईएएस लॉबी ने अपनी आन-बान और शान से जोड़ दिया है, वहीं दूसरी और इस देश की संस्कृति, ईमानदारी, चाल, चरित्र और सभी सामाजिक मूल्यों की ठेकेदारी करने वाली सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक ताकतों ने इसे इस प्रकार से उछालने का प्रयास किया है, मानो दुर्गा शक्ति नागपाल के निलम्बन से आसमान टूट पड़ा हो और मानो इससे देश का सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और ईमानदारी का ढांचा ही बिखर जायेगा। इन ताकतों का मानना है कि इस देश के प्रबुद्ध वर्ग का नेतृत्व आईएएस करता है और वही देश को सही दिशा दे सकता है। इसलिये हर हाल में आईएएस का सम्मान होना चाहिये और आईएएस चाहे कुछ भी करे, उसे स्थानान्तरित किये जाने से बड़ी कोई सजा दी ही नहीं जानी चाहिये।

अन्यथा क्या कारण है कि गुजरात के आईपीएस संजीव भट्ट के साथ कोई क्यों खड़ा नहीं हुआ और प्रतिदिन कई सौ छोटे कर्मचारी कठोर श्रम करने के बाद भी अपनी ईमानदारी और संविधान के प्रति निष्ठा के चलते हुए भी आईएएस और पीएसएसी अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किये जा रहे हैं, लेकिन उनके साथ कोई खड़ा नहीं होता है। उनके साथ होने वाला अन्याय कोई अन्याय नहीं और दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित किया जाना देशभर में इस प्रकार से चर्चा का विषय बना दिया गया है, मानो दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ कोई भयंकर अमानवीय दुर्व्यवहार या दुर्घटना हो गयी है।

स्वयं सुप्रीम कोर्ट अनेक बार कहा चुका है कि "निलम्बन कोई सजा नहीं है। अत: निलम्बन को चुनौती नहीं दी जा सकती।" हॉं ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट के ऐसे निर्णय उन छोटे कर्मचारियों को राहत नहीं देते हुए सुनाये जाते रहे हैं, जिनमें राज्य लोक सेवा आयोग और संघ लोक सेवा आयोग के उत्पाद महामानव, महान विभूतियों द्वारा मनमाने तरीके से छोटे कर्मचारियों का निलम्बन किया जाता रहा है, ऐसे में दुर्गा शक्ति नागपाल के मामले में आने वाले समय में स्वयं सुप्रीम कोर्ट भी मीडिया की भॉंति अपना नया "विपरीत रुख" अपना ले तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट हड़ताल करने को असंवैधानिक घोषित करने के बाद भी ओबीसी वर्ग को संविधान में वर्णित सामाजिक न्याय की अवधारणा के अनुसार उच्च शिक्षण संस्थानों में, ओबीसी की जनसंख्या से बहुत कम फीसदी आरक्षण दिये जाने के सरकारी आदेश के विरुद्ध, उच्च वर्ग के डॉक्टरों द्वारा विरोध स्वरूप, गैर कानूनी तरीके से की गयी हड़ताल को, सुप्रीम कोर्ट अपने पिछले आदेश की अनदेखी करते हुए न मात्र संवैधानिक ठहरा चुका है, बल्कि केन्द्र सरकार को निर्देश भी दे चुका है कि हड़ताली डॉक्टरों को हड़ताल की अवधि का वेतन दिया जावे।

ऐसे में "आईएएस अधिकारी का निलम्बन भी सुप्रीम कोर्ट को सजा नजर आ जाये तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये!" जिसका सबसे बड़ा कारण यही है कि "हमें हजारों सालों से एक ही बात सिखायी गयी है कि उच्च वर्ग और शासक वर्ग कभी गलत नहीं होता, उसे कभी बड़ी सजा नहीं दी जा सकती और छोटे लोग या निम्न वर्ग सेवा करने, सजा पाने और देश के कानून को तथा सत्ताधारियों व सत्ता के दलालों के हर आदेश को मानने के लिये पैदा हुए हैं।" "ये मनोभाव आज भी इस देश के लोगों के अवचेतन में विद्यमान है और यही रुग्ण मानसिकता, अनेक प्रकार के शोषण एवं विभेद के लिये जिम्मेदार है। जब तक इस मानसिकता को पैदा करने वाले कारकों को शक्ति से नहीं बदला जायेगा दुर्गा शक्ति नागपाल जैसियों के बहाने आईएएस अधिक ताकतवर होते रहेंगे और कमजोर वर्ग शोषण का शिकार होता रहेगा।