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Friday, January 1, 2016

उमराव सालोदिया का उमराव खान हो जाना


उमराव सालोदिया का उमराव खान हो जाना
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राजस्थान के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी उमराव सालोदिया ने मुख्य सचिव नहीं बनाये जाने से नाराज हो कर स्वेच्छिक सेवा निवृति लेने तथा हिन्दुधर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने की घोषणा कर सनसनी पैदा कर दी है ।
राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार से अब न उगलते बन रहा है और न ही निगलते। यह सही बात है कि वरीयता क्रम में वे मुख्य सचिव बनने के लिए बिलकुल पात्र थे और यह भी सम्भव था कि वे राज्य के पहले दलित मुख्य सचिव बन जाते मगर भाजपा सरकार ने वर्तमान मुख्य सचिव सी एस राजन को तीन माह का सेवा विस्तार दे कर सालोदिया को वंचित कर दिया ।
सेवा एवम् धर्म छोड़ने की घोषणा करते हुए सालोदिया ने यह भी कहा कि उन्हें सेवाकाल के दौरान सामान्य वर्ग के एक व्यक्ति ने बहुत परेशान किया ,जिसकी प्राथमिकी दर्ज कराये जाने के बावजूद उस व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी।सालोदिया ने यह भी कहा कि वे समानता की चाह में इस्लाम कबूल कर रहे है । हालाँकि उन्होंने यह भी बताया कि उनकी इस्लाम में रूचि लंबे समय से है और उन्होंने इस्लाम को भली भांति पढ़ समझ कर ही धर्मान्तरण का फैसला किया है।
उमराव सालोदिया अब उमराव खान बन चुके है। उनके धर्म परिवर्तन करने पर मिश्रीत प्रतिक्रियाएं आई है ।राज्य के गृह मंत्री गुलाब चन्द कटारिया ने इसे व्यक्तिगत निर्णय बताते हुए कहा कि अगर उनके साथ अन्याय हुआ है और उन्हें लगता है कि उन्हें वंचित किया गया है तो उसका विरोध उचित फोरम पर किया जा सकता था। चिकित्सा एवम् स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ ने इसे सेवा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन करार देते हुए कहा कि वे पद पर रहते हुए इस तरह प्रेस वार्ता कैसे कर सकते है । उन्हें दूसरे मान्य तरीके अपनाने चाहिए ।
यह तो निर्विवाद तथ्य है कि उन्हें मुख्य सचिव बनाया जाना चाहिये। यह उनका हक़ है जिसे सरकार ने जानबूझ कर छीना है मगर उनके इस तरीके और इस्लाम कबूल करने को लेकर दलित बहुजन आंदोलन ने भी कई सवाल खड़े करके उन्हें इस लड़ाई में अकेला छोड़ दिया है।
दरअसल विगत कुछ दिनों से दलित समुदाय के युवा सोशल मीडिया के ज़रिये उमराव सालोदिया को मुख्य सचिव बनाने की पुरजोर मांग कर रहे थे।इन उत्साही अम्बेडकर अनुयायियों को उमराव सालोदिया के इस आकस्मिक और एकाकी निर्णय ने निराश कर दिया है।अब तक उनके पक्ष में खड़े लोग ही अब पूंछ रहे है कि उमराव सालोदिया उमराव गौतम क्यों नहीं हुए ? जिस अम्बेडकर की वजह से वे इतने बड़े पद तक पंहुचे उनका मार्ग क्यों नहीं लिया खान साहब ने ?
दलित बहुजन आंदोलन को इस्लाम से ना तो परहेज़ है और ना ही कोई दिक्कत ,परेशानी उमराव सालोदिया के तरीके और निर्णय से है। बिना संघर्ष किये ही उनके नौकरी छोड़ने के निर्णय को पलायन माना जा रहा है तथा बुद्ध धर्म नहीं अपनाने की कड़ी आलोचना हो रही है।
दलित युवा सोशल मीडिया पर बहस छेड़े हुए है कि अब वे दलितों की समानता के मिशन के लिए काम करेंगे अथवा दीन की तब्लीग के लिए जमाती बन जाएंगे। यह भी प्रश्न उठाया जा रहा है कि अगर उनके साथ नौकरशाही में रहते हुए लंबे अरसे से अन्याय व भेदभाव हो रहा था तो वे इतने समय तक खामोश क्या सिर्फ मुख्य सचिव बनने की झूठी आशा में थे ? यहाँ तक पूंछा जा रहा है कि क्या अगर उन्हें चीफ सेकेट्री बना दिया जाता तो उनकी नज़र में हिन्दू धर्म समानता का धर्म हो जाता ? अब लोग यह भी जानना चाह रहे है कि क्या उन्होंने बौद्ध धर्म को पढ़ा है ?
जो उमराव सालोदिया को जानते है उनके मुताबिक वे कभी भी आंबेडकर की मुहिम में शामिल नहीं रहे है और ना ही उन्हें मुक्तिकामी कबीर, फुले, अम्बेडकर की विचारशरणी से कोई मतलब रहा है।यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें समाज हित में एक सामूहिक फैसला ले कर नज़ीर स्थापित करनी चाहिए थी ।उन्हें अपने साथ हुए भेदभाव और वंचना के प्रश्न को समाज जागृति का हथियार बनाना चाहिए था मगर वे इससे चूक गए और इसे केवल निजी हित का सवाल बना डाला है।संभवतः उमराव सालोदिया से यह चूक इसलिए हुयी है क्योंकि उनका जुड़ाव समुदाय से लगभग नहीं के बराबर रहा है । वे पूरे सेवाकाल में इन्हीं लोगों के होने में लगे रहे जैसे अधिकांश बड़े दलित अधिकारी करते है।
यह बात कुछ हद तक सही भी है कि जो अधिकारी और राजनेता समाज से कट कर जीते है फिर उन्हें अपनी लड़ाई अक्सर अकेले ही लड़नी होती है और फिर वे ऐसे ही अदूरदर्शी निर्णय ले कर अपनी तथा अपने वर्ग की किरकिरी करा बैठते है।
बेहतर होता कि उमराव सालोदिया इस लड़ाई को थोडा पहले शुरू करते और अंत तक लड़ते ,मगर उन्होंने योद्धा बनने के बजाय भगौड़ा बनना स्वीकार किया है ,जिसका दलित बहुजन आंदोलन ने स्वागत करने से साफ इंकार कर दिया है।अब दलित किसी धर्म में मुक्ति नहीं देखते,क्योंकि उन्हें मुक्ति संघर्ष में दिखाई देती है पलायन में नहीं ।
- भंवर मेघवंशी
( लेखक स्वतन्त्र पत्रकार है ,उनसे Bhanwar meghwanshi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है )





Wednesday, October 16, 2013

मानव-निर्मित धर्म की क्रूरता से खुद को बचायें

मानव-निर्मित धर्म की क्रूरता से खुद को बचायें

संसार में जितने भी युद्ध हुए हैं, उनमें से अधिकतर के पीछे धार्मिक कारण रहे हैं। धर्म या धार्मिक लोगों या कथित धार्मिक महापुरुषों ने कितने लोगों को जीवनदान दिया, इसका तो कोई पुख्ता और तथ्यात्मक सबूत नहीं है, लेकिन हम देख रहे हैं कि धर्म हर रोज ही लोगों को लीलता जा रहता है। ऐसे में क्या मानव निर्मित धर्म के औचित्य के बारे में हमें गम्भीरता से सोचने की जरूरत नहीं है?
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ 

मध्य प्रदेश के दतिया जिले से लगभग 60 किलोमीटर दूर रतनगढ़ स्थित देवी के मंदिर में नवरात्रि के अंतिम दिन देवी के दर्शन के लिए दूर-दूर से आये हजारों श्रृद्धालुओं में पुलिस लाठीचार्ज के कारण मची भगदड़ में अकाल मृत्यु के शिकार लोगों की संख्या 100 से पार पहुँच गयी। मरने वालों में ज्यादातर निर्दोष बच्चे और महिलाएं थे।

सूचना माध्यमों को लोगों की मौत का जो आंकड़ा मध्य प्रदेश प्रशासन द्वारा बताया गया, असल में वह सही नहीं था। क्योंकि स्थानीय लोगों का कहना है कि अनेक ग्रामीण बिना पोस्टमार्टम कराये ही अपने सगे-संबंधियों के शव लेकर अपने-अपने गांव चले गए। ऐसे में, इस हादसे में मरने वालों की संख्या प्रशासन द्वारा बतायी जा रही संख्या से कहीं अधिक होने की पूरी सम्भावना है।

यहाँ पर यह सवाल उठाना भी प्रासंगिक लगता है कि हादसों में मरने वाले निर्दोष लोगों को मुआवजा देने की शर्त के साथ मृतकों का पोस्टमार्टम कराये जाने की कानूनी शर्त क्यों प्रभाव में है? जबकि ऐसे मामलों में पोस्टमार्टम करवाने से मृतक परिवार अधिक आहत होते हैं। जिसके चलते इस हादसे में मरे लोगों के परिजन मुआवजे की चिन्ता किये बिना अपने सगे-सम्बन्धियों के शवों को पोस्टमार्टम से बचाने के लिये सीधे अपने-अपने गांव ले गये। जिन्हें मुआवजा इसी कारण नहीं मिलने वाला है। दूसरी ओर इस कारण से हादसे में मरने वालों की संख्या का वास्तविक आंकड़ा भी देश के सामने कभी नहीं आ सकेगा। इसलिये इस प्रकार के बेहूदा कानून को तत्काल बदले जाने की जरूरत है।

हिन्दू धर्म में जोरशोर से मनाये जाने वाले नवरात्री त्यौहार के अंतिम दिन रविवार 13 अक्टूबर को बड़ी संख्या में श्रद्धालु रतनगढ़-माता के मंदिर में दर्शन करने पहुंचे थे। मंदिर से पहले सिंध नदी पुल पर भारी भीड़ थी। पुल के संकरा होने और उस पर बड़ी संख्या में टैक्टरों के पहुंचने से जाम की स्थिति बन गई। जाम के कारण भीड़ बेकाबू हो गई। जिसे काबू करने के लिये पुलिस ने वहां बल प्रयोग कर दिया, जिससे भगदड़ मच गई। एक तरफ श्रृद्धालु जहां एक-दूसरे को कुचलते हुए भागने की कोशिश में लगे थे, वहीं दूसरी ओर कई लोग जान बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी।

उक्त दर्दनाक घटना पर प्रदेश और देश के राजनैतिक प्रतिनिधियों ने संवेदनाएं व्यक्त की और मृतकों तथा घायलों के परिवारजनों को फौरी राहत पहुंचाने के लिये मुआवजे की घोषणाएं की गयी। सरकार ने जांच के आदेश दे दिये हैं, जिससे कि विधानसभा चुनावों से ठीक पूर्व सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ जनता में उपजे आक्रोश को कुछ सीमा तक नियन्त्रित किया जा सके। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि हम इस प्रकार के हादसों से कब तक सबक नहीं सीखेंगें?

सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि हजारों-लाखों जानें धार्मिक यात्राओं, धर्मस्थलों या धर्म के नाम पर चलने वाले युद्धों के कारण जाती रही हैं। हमारे देश में ही नहीं, बल्कि संसार में जितने भी युद्ध हुए हैं, उनमें से अधिकतर के पीछे धार्मिक कारण रहे हैं। धर्म या धार्मिक लोगों या कथित धार्मिक महापुरुषों ने कितने लोगों को जीवनदान दिया, इसका तो कोई पुख्ता और तथ्यात्मक सबूत नहीं है, लेकिन हम देख रहे हैं कि धर्म हर रोज ही लोगों को लीलता जा रहता है। ऐसे में क्या मानव निर्मित धर्म के औचित्य के बारे में हमें गम्भीरता से सोचने की जरूरत नहीं है? 

जो धर्म एक ओर तो वर्ग विशेष को आजीवन, आजीविका प्रदान करने का पुख्ता साधन बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर भोले-भाले लोगों के शोषण का कारण भी बना हुआ है। जिसमें महाकुम्भ में रेल पुल का हादसा हो जाता है। केदारनाथ दर्शन को जाने वाले लोग बेमौत मारे जाते हैं। अनेकों स्थानों पर देवी और बालाजी के दर्शन करने के बजाय मौत को गले लगा लेते हैं। इसी धर्म की आड़ में नित्यानन्द और आशाराम जैसे लोग पैदा होते हैं। यही धर्म की बीमारी लोगों को धर्म में बांटकर देश के विकास के मुद्दों से विमुख कर देती है।

इसी धर्म की ओट में स्वयं को हिन्दूवादी वोटरों का सबसे बड़ा पेरोकार दिखाने की होड़ में 2014 में होने जा रहे लोक सभा चुनावों से पूर्व ही भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी स्वयं को राष्ट्रभक्त या राष्ट्रवादी कहने के बजाय हिन्दू राष्ट्रवादी कहकर हिन्दूओं की भावनाओं को भड़काने और गैर-हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने से पीछे नहीं रहते हैं।

टीवी पर न जाने कितने कथित संत और संतानी धर्म के नाम पर अपनी दुकान चला रहे हैं और सरेआम देश के लोगों को ठग रहे हैं। जिनमें सबसे बड़े ठग हैं-रामदेव। आज से पांच वर्ष पूर्व जिनका कहना था कि योग से सारी बीमारियों का यहां तक कि एड्स एवं कैंसर तक का इलाज सम्भव है। इसके साथ-साथ रामदेव अपने योग शिविरों में सारे डॉक्टरों और अस्पतालों के बन्द और बेरोजगार हो जाने का दावा किया करते थे। वही रामदेव आज अपने योग शिविरों में योग से रोग भगाने की बात को प्राथमिकता देने के बजाय, खुद के द्वारा निर्मित की गयी हर रोग की दवा, आटा और साबुन बेच रहे हैं। रामदेव देश के लोगों का इलाज करने के लिये शिविरों में भारतीय जनता पार्टी नामक दवा भी बेच रहे हैं। जिसके लिये हिन्दुत्व को हथियार बना रखा है।

ऐसे में आज देश के लोगों को ये समझने की सख्त जरूरत है कि वास्तव में धर्म क्या है और धर्म की मानव को किसलिये और कितनी जरूरत है? क्या मानव निर्मित धर्म मानव का सच में उत्थान करने वाला है या मानव को पुलों से नदियों और रेल की पटरियों पर धकेल कर उनकी जिन्दगी छीनने वाला है? या केदारनाथ, देवियों, बालाजियों या महाकुम्भों के दर्शन करने या धार्मिक आयोजनों में आस्था एवं श्रृद्धा लिये जाने वाले लोगों के बच्चों को अनाथ, पत्नियों को विधवा, पतियों को विधुर और माता-पिताओं को बेसहारा बनाने वाला है?

हमारी रुग्ण और विकृत मनोस्थिति के लिये हमारे धर्म और संस्कृति की उपज हमारा पारिवारिक व सामाजिक परिवेश और निराशावादी माहौल जिम्मेदार है, जो प्रारम्भ से ही हमारे नजरिये और हमारी सोच को नकारात्मक, संकीर्ण, रुग्ण और विध्वंसात्मक बना देता है। जिसके चलते अनेक लोग निराशा, अवसाद, दुख, तकलीफ और तनावों में डूबकर अस्वास्थ्यकर रास्तों को अपनाने लगते हैं। इस प्रकार लोग एक परेशानी या दुख से मुक्ति पाने की आशा में अनेकों प्रकार की की न मिटने वाली मानसिक और शारीरिक पीड़ाओं तथा अनेक प्रकार की मुसीबतों में हर दिन घिरते ही चले जाते हैं। इस मानव निर्मित धार्मिक दुष्चक्र में फंसकर सम्पूर्ण मानवता बुरी तरह से तड़प रही है।

इसी मानवनिर्मित धर्म की कथित धार्मिक लोगों द्वारा निर्मित शास्त्रीय राह पर चलने और चलाने वाले आशाराम और नित्यानन्द जैसे कथित संतों के कारण लोगों को अपने ही स्वजनों से चाहे अनचाहे अनेक ऐसे दुखद विचार संस्कारों में मिलते रहते हैं, जो पीड़ा के सिवाय और कुछ नहीं देते हैं। धर्म का चोला ओड़कर स्वयं को धार्मिक दिखाने वाले ये कथित धार्मिक संत नकारात्मक, निराशावादी या जीवन से पलायन करने वाली बातें कहने वाले, आम और भोले भाले लोगों को जाने-अनजाने हर दिन मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार बना रहें हैं, उनके अन्तर्मन में डर और निराशा का बीज बो रहे हैं। जिसके चलते लोगों के शारीरिक स्वास्थ्य एवं आर्थिक हालातों और पारिवारिक, सामाजिक, कार्यालयीन तथा व्यावसायिक रिश्तों और दाम्पत्य सम्बन्धों पर निश्चित रूप से कुप्रभाव पड़ रहा होगा।

इसके बावजूद भी धर्म के चंगुल में फंसे लोग कुछ नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वे इस माहौल को और इसके प्रभाव को बदलने की स्थिति में नहीं है। अर्थात् इतनी सारी नकारात्मक और निराशा से भरी एवं भय पैदा करने वाली बातों से बचाव का सही एवं सफल रास्ता उनको ज्ञात ही नहीं हैं। ऐसे में मानवनिर्मित धर्म की शरण में जाना उनकी जन्मजात सामाजिक मजबूरी बना हुआ है। यदि हम अपने आपको स्वस्थ बनाये रखना चाहते हैं और हम सुखी तथा सफल होना चाहते हैं तो हमको इस स्थिति पर तत्काल काबू पाना होगा, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि सम्पूर्ण समाज ही धर्म जनित नकारात्मकता एवं निराशा में डूबा हुआ है, ऐसे में धार्मिक चंगुल में फंसे लोगों को कैसे रोका या बदला जा सकता है? बदलना सम्भव भी है या नहीं? लगता है कि मुश्किल है। बिलकुल सही, क्योंकि दूसरों को बदलना असम्व है, लेकिन हमारे पास एक रास्ता तो है-दूसरों को न सही हम खुद अपने आपको तो बदल ही सकते हैं।

Thursday, July 18, 2013

धर्म आधारित भेदभाव समाप्त हो

पाकिस्तान के आम लोग भारत से शांतिपूर्ण संबंध चाहते हैं 

पाकिस्तान की मेरी हालिया (1828 फरवरी 2013) 11दिवसीय यात्रा के दौरान मैंने यह महसूस किया कि जहां तक भारत के प्रति रूख का प्रश्न है, वहां का समाज दो स्पष्ट तबकों में बंटा हुआ है। एक तबका उन लोगों का है जो भारत व पाकिस्तान के बीच दोस्ती चाहते हैं और दूसरी तरफ वे लोग हैं जो वहां भारत के विरूद्ध घृणा फैलाकर अपना दबदबा कायम रखना चाहते हैं। ये लोग भारत के प्रति दुर्भावना तो रखते ही हैं, वे अपने कारनामों से अपने देश को भी कमजोर कर रहे हैं। पहले तबके में हैं वहां के बुद्धिजीवी, कालेज और विश्वविद्यालयों के शिक्षक, एन.जी.ओ. के कार्यकर्ता, शायर, कहानीकार व अन्य रचनाधर्मी। यह वह वर्ग है जो पाकिस्तान में व्याप्त अशांति से परेशान है, जो चाहता है कि धर्म आधारित भेदभाव समाप्त हो। 

मैं पाकिस्तान, उस सम्मान को ग्रहण करने गया था, जो अमरीका की एक संस्था ने मुझे प्रदान किया था। यह संस्था दक्षिण एशिया में शांति और सद्भाव कायम करने के लिये प्रयासरत है। अन्यों के अतिरिक्त यह सम्मान, पाकिस्तान की एक महिला को भी दिया गया था। इस महिला का नाम है शीमा पाकिस्तान की एक प्रसिद्ध नृत्यांगना हैं। वे भारतीय शास्त्रीय नृत्यकला में पारंगत हैं। वे स्वयं तो नृत्य करती ही हैं पाकिस्तान की बेटियों को भी नृत्य का प्रशिक्षण देती हैं। पाकिस्तान के तानाशाह जियाउल-हक ने उन्हें नृत्यकला सिखाने से मना किया था परन्तु वे तानाशाह के सामने नहीं झुकीं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के बड़े लोग तो मुजरा सुनते हैं और उन्हें नृत्य करने से मना करते हैं। तब से लेकर आज तक नृत्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता में किसी प्रकार की कमी नहीं आयी है। 

सम्मान प्रदान करने के लिये 19 फरवरी को करांची में एक समारोह आयोजित किया गया था। समारोह में करांची के अनेक जानेमाने लोगों ने भाग लिया। समारोह में सभी वक्ताओं ने भारतपाक मित्रता और दोनों देशों के बीच शांति की आवश्यकता पर जोर दिया। समारोह में करांची के अनेक साहित्यकारों, शायरों और बुद्धिजीवियों ने अपने विचार प्रगट किये। सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि यदि दोनों देशों के आम लोग आपस में घुलतेमिलते रहेंगे तो यह शांति की सबसे बड़ी गारंटी होगी। 

अमरीकी संस्था ॔एसोसिएशन फार कम्यूनल हार्मोनी॔ की ओर से प्रीतम रोहिला ने सम्मान प्रदान किया। रोहिला ने बताया कि बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद, अमरीका में निवासरत भारतपाक मूल के अनेक व्यक्तियों ने इस संस्था की स्थापना की। यह संस्था दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत एवं पाकिस्तान के ऐसे लोगों को सम्मानित करती है जो अपनेअपने देशों में सौहार्द और दोस्ती के लिये काम करते हैं और जो यह मानते हैं कि पाकिस्तान व भारत के मधुर संबंध, दक्षिण एशिया में शांति की पहली शर्त है। रोहिला ने कहा कि उनकी व उनके साथियों की यह मान्यता है कि सरकारें चाहे कोशिश करें या न करें, आम जनता को शांति के लिये प्रयासरत रहना चाहिये। करांची के जानेमाने चिंतक करामत अली ने कहा कि दक्षिण एशिया के सभी देशों को एक संधि पर हस्ताक्षर करना चाहिये, जिसके अंतर्गत वे आपस में युद्ध न करने का वचन दें। उन्होंने कहा कि इन देशों को अपनी सेनाओं और रक्षा बजट में कटौती करनी चाहिये। वीजा जारी करने में उदारता बरती जाये। 

कार्यक्रम में बोलते हुये सुप्रसिद्ध शायरा फहमीदा रियाज ने कहा कि भारत व पाकिस्तान के बीच बेहतर संबंधों से अतिवादी हिंसक गतिविधियां समाप्त हो सकती हैं। कार्यक्रम को पाकिस्तान के एक और चिंतक एवं सामाजिक सुधारक डॉ. बी.एम. कुट्टी ने भी संबोधित किया। डॉ. कुट्टी उन लोगों में से हैं जो पिछले 40 वर्षों से पाकिस्तान के मजदूरों के कल्याण के लिए प्रयासरत हैं और इस उद्धेश्य से एक संस्था भी चला रहे हैं।
 
मैंने कार्यक्रम में कहा कि धर्मनिरपेक्षता ही दक्षिण एशिया के देशों की समस्याओं का प्रभावी हल है। मैंने कहा कि पाकिस्तान के निर्माता कायदे आजम जिन्ना भी पाकिस्तान को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाना चाहते थे। आज पाकिस्तान की बहुसंख्यक जनता भी यही चाहती है। मैंने कहा कि इतिहास, पाकिस्तान के उन शासकों को कभी माफ नहीं करेगा जिन्होंने जिन्ना के इस सपने को चूरचूर कर दिया। मैंने कहा कि धर्मनिरपेक्षता के बारे में जानबूझकर दुष्प्रचार किया जाता है। भारत में भी ऐसे लोग और संगठन हैं जो धर्मनिरपेक्षता को बदनाम करते हैं। शीमा किरमानी ने इस अवसर पर अंग्रेजी की कविता भी पॄकर सुनाई जिसका भावार्थ था 

"मैं तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों पर नहीं नाचूंगी, 
मैं घृणा की धुन पर नहीं नाचूंगी। 
मैं तुम्हारे लिए किसी को नहीं मारुंगी। 
मैं तुम्हारे लिए अपनी जान नहीं दूंगी। 
मैं तुम्हारे बमों की आवाज पर नहीं नाचूंगी। 
परन्तु मैं नाचूंगी, 
हां मैं नाचूंगी, विरोध करने के लिये, 
मैं नाचूंगी, 
अस्तित्व में बने रहने के लिए 
हां मैं नाचूंगी, शांति के लिये 
जब तक वह स्थापित नहीं हो जाती।’’ 

करांची प्रवास के दौरान हमें वहां के विश्वविद्यालय जाने का अवसर मिला। विश्वविद्यालय में हमने अन्तर्राष्ट्रीय संबंध विषय के एम.ए. के विद्यार्थियों को संबोधित किया। एम.ए. क्लास में कम से कम 100 विद्यार्थी थे। विद्यार्थियों में छात्राओं का बहुमत था। कम ही छात्रायें बुर्का पहिने थीं। यद्यपि उनमें से कुछ अपना सिर के थीं। मैंने कक्षा में काफी अनुशासन पाया। हाजिरी लगने के बाद एक छात्रा ने क्लासरूम में प्रवेश करना चाहा। परन्तु क्लास के प्रोफेसर ने उससे कहा तुम लेट हो, भीतर नहीं आ सकती। इसी तरह क्लास के दौरान एक युवक आया और उसने प्रोफेसर से अनुरोध किया कि वे क्लास छोड़ दें ताकि छात्र-छात्रायें क्रिकेट मैच देख सकें। इस पर प्रोफेसर ने उससे पूछा कि तुम क्लास के भीतर कैसे आये। क्लास जारी रहेगी।

मेरे संक्षिप्त भाषण के बाद छात्रछात्राओं ने अनेक प्रश्न पूछे। उनमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि भारत ने अभी तक पाकिस्तान के अस्तित्व को क्यों नहीं स्वीकारा है? मैंने उन्हें बताया कि यह आरोप सरासर बेबुनियाद है। मैंने कहा कि वैसे यह बात सच है कि हमारे देश के सबसे बड़े नेता, जिन्हें हम राष्ट्रपिता कहते हैं, देश के विभाजन के विरोधी थे। वे कहते थे कि भारत का विभाजन केवल उनकी मृत देह पर होगा। परन्तु जब पाकिस्तान बन ही गया तो गांधीजी ने भी पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया था। विभाजन के बाद भारत को केन्द्रीय बैंक के रिजर्व कोष में पाकिस्तान के हिस्से के बतौर उसे 55 करोड़ रूपये देना बाकी रह गया था। गांधी जी भारत सरकार को बार बार कहते थे कि पाकिस्तान की उधारी शीघ्र चुकाओ। परन्तु उधारी चुकाने में देरी हो रही थी। इस पर भारत सरकार पर दबाव बनाने के लिये महात्मा गांधी ने अनशन प्रारंभ कर दिया। इसके बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये दे दिये। गांधी जी का रवैया देश के कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगा। ऐसे लोगों में नाथूराम गोडसे भी शामिल था। पाकिस्तान को उसका वाजिब हक दिलवाने का गांधीजी का यह प्रयास कुछ लोगों को मुसलमानों और पाकिस्तान का तुष्टिकरण लगा। यही वे लोग थे जिन्होंने बाद में गांधी जी की हत्या की। इस तरह, हमारे देश के सबसे बड़े नेता ने पाकिस्तान के हित की खातिर अपनी जान दे दी। पाकिस्तान को मान्यता देने का इससे बड़ा सुबूत और क्या हो सकता है।
 
अपने भाषण के अंत में मैंने कहा कि मेरा एक सपना है जो मैं उनसे बांटना चाहता हूँ। मैंने उन्हें याद दिलाया कि अमरीका के एक बड़े नेता थे डॉ. मार्टिन लूथर किंग "जूनियर"। वे वहां के काले लोगों के अधिकारों के लिये संघर्ष करते थे। उन्होंने एक दिन एक जोशीला भाषण दिया। अपने भाषण के बीच में वे बारबार दुहराते थे कि ’आई हेव ए ड्रीम॔ (मेरा यह सपना है)। 

मैंने कहा कि मेरा भी एक सपना है। और वह यह कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश मिलकर एक महासंघ बना लें। ठीक वैसे ही जैसे यूरोप के देशों ने मिलकर यूरोपीय संघ बनाया है। यूरोप के देशों ने आपस में अनेक युद्ध लड़े। इनमें दो महायुद्ध शामिल हैं। इन युद्धों में करोड़ों लोगों की जान गयी और अरबों की संपत्ति स्वाहा हो गई। इतनी बड़ी जनधन की हानि के बाद अब यूरोपीय देशों ने यह निर्णय किया है कि वे आपस में युद्ध नहीं लड़ेंगे। क्या हम भी युद्ध लड़तेलड़ते थक नहीं गये हैं? पिछले 66 वर्षों में हमने स्वयं का कितना नुकसान किया है। इन वर्षों में हमने अपनी सीमाओं की रक्षा पर जितना खर्च किया है, यदि वह खर्च नहीं हुआ होता तो शायद हम तीनों देशों का एक भी व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे रही रह जाता। हम महासंघ बनायें, युद्ध न करने की कसम खायें, आपस में व्यापार करें, बिना वीजा के तीनों देशों में कहीं भी आजा सकें। मैंने कहा कि स्वार्थी तत्व ही हमें आपस में लड़ाते हैं। इन स्वार्थी तत्वों में पश्चिम के वे देश शामिल हैं जो पहिले ऐसी परिस्थिति पैदा करते हैं जिससे हम आपस में लड़ें और लड़ाई के लिये वे अपने उत्पादित किये गये हथियार हमें बेचते हैं। हमें इन चालाकियों को समझना चाहिये और आपस में न लड़ने की कसम खाना चाहिये। 

इतना कहने के बाद मैंने विद्यार्थियों से पूछा कि क्या वे मेरे इस सपने को पूरा करने में सहायक होंगे। क्या वे अपने देश में ऐसे प्रयास करेंगे जिससे युद्ध समर्थक लोगों की आवाज दबे? इस पर सभी छात्रछात्राओं ने जोरदार तालियां बजाकर मेरे सपने को पूरा करने का आश्वासन दिया। उनके इस समर्थन से यह स्वयंसिद्ध कि पाकिस्तान के आम नागरिक शांति चाहते हैं।

-एल. एस. हरदेनिया, बृहस्पतिवार, 28 मार्च 2013
स्त्रोत : लो क सं घ र्ष !

Saturday, June 29, 2013

मनुवाद द्वारा प्रायोजित महात्रासदी

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

भारत में जहॉं हर कि प्रकार के प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं, वहीं हम भारतीय हर प्रकार की प्राकृतिक और मनुष्यजन्य विपदाओं का सामना करते रहने के भी आदि होते जा रहे हैं। उत्तराखण्ड में आयी बाढ और भू-स्खलन के कारण जो हालात पैदा हुए हैं, उनके लिये हमारे देश में बुद्धिजीवी वास्तवकि कारणों को ढूँढने में लगे हुए हैं, वहीं नरेन्द्र मोदी जैसे राजनेताओं ने इस विपदा को भी अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का अखाड़ा बनाने की शुरूआत करके इसमें भी गंदी और वीभत्स राजनीति को प्रवेश करवा दिया।

सारा संसार जानता है कि भारत में बहुरंगी प्रकृति के सभी रंग और हर एक अनुपन सौगाद मौजूद है, लेकिन दुर्भाग्य ये है कि हर प्रकृति की सुन्दर लीला को भारत में ब्राह्मणशाही और मनुवादी व्यवस्था ने अपने चंगुल में जगड़ रखा है। जिसके चलते लोगों के दिमांग को धर्म की अफीम के नशे में इस प्रकार से विकृत और नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है कि सारी बातों को भूलकर लोग स्वर्ग और वैकुण्ठ की चाह में ब्राह्मणों द्वारा रचित एवं निर्मित उन कथित धार्मिक स्थलों पर खिंचे चले जाते हैं, जहॉं एक ओर तो मनुवादी लोग उनका दान, दक्षिणा और पूजा-पाठ के नाम पर जमकर शोषण करते हैं, वहीं दूसरी ओर लोगों की अतिसंख्या को प्रशासन एवं धर्मस्थल प्रबन्धकों द्वारा संभाल नहीं पाने के कारण अनेक घरों के चिराग हमेशा को बुझ जाते हैं।

कुछ समय पूर्व ही इलाहाबाद में कुम्भ के दौरान रेलवे स्टेशन के पुल पर अतिसंख्या में तीर्थयात्रियों के चढ जाने के कारण पुल टूट गया और बहुत सारे लोगों की मौत हो गयी। कुछ ही दिनों में उस त्रासदी को भुलाकर इस देश के भोले-भाले लोग उत्तराखण्ड की इस महात्रासदी का सामना करने को विवश हो गये। हजारों लोग बेमौत मारे गये। प्रशासन पस्त हो गया। फौज के जवान भी बेमौत मारे गये। इस दु:खद घड़ी में भी मनुवादी संघ द्वारा पोषित भाजपा के भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस महात्रासदी को भी भुनाने में जरा शर्म महसूस नहीं की और दूसरे नेताओं को भी राजनीति करने को उकसाया। इससे मनुवादियों का विकृत चेहरा सबके सामने आ चुका है।

इसके उपरान्त भी सबसे दु:खद बात तो ये है कि इतना सब हो जाने के बाद भी कोई तो प्रशासन और सरकार को कोस रहा है और कोई प्राकृतिक संसाधनों से छेड़छाड़ करने को इस त्रासदी के लिये जिम्मेदार बतला रहा है, लेकिन कोई भी राजनेता या मीडिया प्रतिनिधि इस सच को सामने लाने की कतई भी कोशिश नहीं कर रहा है कि इस त्रासदी के पीछे मनुवादियों का शोषक और विकृत चेहरा छिपा हुआ है। जिसके कारण-
-अशिक्षित और भोलेभाले लोग अपना और अपने बच्चों का पेट काटकर पापों से मुक्ति पाने और वैकुण्ठ का टिकिट कटाने की कभी न पूरी हो सकने वाली लालसा लिये इन शोषण केन्द्रों पर बेरोकटोक चले आते हैं।
-मनुवादियों के ऐजेंटों की ओर से हर स्तर पर सम्पूर्ण ऐसे प्रयास किये जाते हैं, जिसके कारण लोगों को तीर्थस्थलों पर जाने के लिये उकसाया जाता है। जिसके लिये हर दिन देश में कहीं न कहीं ढोंगी लोग मनुवाद का प्रचार-प्रसार करते रहते हैं। जिनमें अनेक तथाकथित संत भी शामिल हैं। इन सभी का प्रमुख स्त्रोत है-राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ।
-मनुवादियों के समर्थकों को पालने पोषने के लिये धर्मस्थलों पर सड़क और सार्वजनिक स्थलों पर हर मुमकिन तरीके से अतिक्रमण करके दुकाने खोली जा रही हैं और धर्मशालाओं एवं होटलों का निर्माण किया जा रहा है। जिससे लोगों को लुभाया जा सके और चंगुल में फंसाया जा सके।
-सरकार की और तीर्थयात्रियों की संख्या पर नियंत्रण के लिये किसी भी प्रकार का कोई नियमन नहीं है। ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि किस राज्य से कब और कितने लोग तीर्थस्थलों पर आ-जा सकेंगे। इस कारण से बिना किसी रोक-टोक के बेसुमार लोगों को रैला सर्वत्र पहुँच जाता है।
उपरोक्त एवं अन्य अनेक कारणों पर कोई भी ध्यान नहीं दे रहा है। जबकि इन कारणों पर ध्यान नहीं दिये जाने की वजह से हजारों लोग बमौत मारे गये हैं। दिल्ली में एक लड़की के साथ बलात्कार की घटना होने पर दिल्ली वाले सारे देश को हिला देने की बात करते हैं, जबकि मनुवादियों के इन शोषण केन्द्रों पर हजारों लोगों की मौत पर कोई मनुवाद के खिलाफ एक शब्द भी बोलना जरूरी नहीं समझता है। यह इस देश के लोगों का दौहरा और घिनौना चरित्र है। इसके लिये भी मनुवाद ही जिम्मेदार है। क्योंकि सभी मनुवादी लोगों ने इस प्रकार का षड़यंत्र रचा हुआ है कि धर्म के विरुद्ध बोलने वालों को नर्क का डर बिठा रखा है और इसके चलते लोगों को धर्म की मनमानियों और शोषणकारी व्यवस्थाओं के खिलाफ चुप्पी साध रखी है।

अब समय आ गया है, जबकि लोगों को, विशेषकर उन लोगों को जो इस शोषण की चक्की में हजारों सालों से लगातार पिस रहे हैं, उन्हें मनुवाद के इस विचित्र षड़यंत्र को तत्काल तोड़ना होगा। लोगों को इस बात को समझना होगा कि अपने माता-पिता के चरणों में जो धर्म या शान्ति है-वह न तो पहाड़ों में है और न हीं धर्म के नाम पर चलने वाले शोषण के इन असंख्य केन्द्रों में है। इस बात की पहल आज की युवा पीढी को तत्काल करनी होगी। 

Friday, May 10, 2013

दलित-आदिवासी और स्त्रियों का धर्म आधारित उत्पीड़न हमारी चिन्ता क्यों नहीं?

तत्काल समाधान हेतु इस देश में यदि आज सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वो है, देश के पच्चीस फीसदी दलितों और आदिवासियों और अड़तालीस फीसदी महिला आबादी को वास्तव में सम्मान, संवैधानिक समानता, सुरक्षा और हर क्षेत्र में पारदर्शी न्याय प्रदान करना और यदि सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वो है-दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को धर्म के नाम पर हर दिन अपमानित, शोषित और उत्पीड़ित किया जाना। यही नहीं इस देश में आज की तारीख में यदि सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न कर रहे हैं और जिन्हें धर्म और संस्द्भति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सहयोग प्रदान करते रहते हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पिछले कुछ समय से मीडिया की मेहरबानी से कुछ चतुर, चालाक, भ्रष्ट और कट्टरपंथी ताकतों ने देश की राजधानी नयी दिल्ली को अपनी प्रायोजित ताकत दिखाने और संवैधानिक सरकारों को बदनाम करने का नया तरीका ईजाद कर लिया है। जिसकी बड़ी और सार्वजनिक शुरुआत अन्ना हजारे आन्दोलन के समय हुई। इस आन्दोलन को कथित रूप से विदेशी ताकतों और देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों का खुला समर्थन था। कुछ ही समय में इस कथित जन आन्दोलन की और इसके कर्ताधर्ताओं की चारित्रिक सच्चाई देश के सामने आ गयी।

इसी प्रायोजित नाटक का सहारा प्रारम्भ से ही तथाकथित योग गुरू बाबा रामदेव भी लेते रहे हैं, लेकिन उसका शोषक व्यापारी का घिनौना चेहरा भी देश के समक्ष आ चुका है। यही नहीं देश यह भी जान चुका है कि इन तथाकथित योग गुरू का असली मकसद देश में साम्प्रदायिक और फासीवादी ताकतों को मजबूत करना तथा देश के धर्म-निरपेक्ष ढांचे का ध्वस्त करना है। यही नहीं वह जनता से प्राप्त अनुदान और योग-शुल्क के मार्फत एकत्रित राशि में से चुनावों के समय भारतीय जनता पार्टी को आर्थिक सहयोग करते रहे हैं।

इसी क्रम में अन्ना हजारे से अलग होकर अरविन्द केजरीवाल ने अपनी नयी दुकान ‘‘आम आदमी’’ के नाम पर खोल ली है और वो न मात्र भारत के लोगों को देश की संवैधानिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ सरेआम भड़का और उकसा रहे हैं, बल्कि इसके साथ-साथ ‘‘आम आदमी पार्टी’’ बनाकर, आम आदमी के नाम का भी दुरूपयोग कर रहे हैं। जबकि इस पार्टी के नीति नियंताओं में कोई भी आम आदमी नहीं है!

ये और कि इन जैसे सभी लोगों के कथित जनान्दोलनों का भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अर्थात् आरएसएस और आरएसएस के अनुसांगिक सभी संगठन, जिनमें बजरंग दल, विश्‍व हिन्दू परिषद, दुर्गा वाहिनी आदि प्रमुख हैं, खुलकर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सक्रिय सहयोग करते रहे हैं और ये सब मिलकर हर छोटे बड़े मुद्दे को सुनियोजित तरीके से मीडिया के मार्फत राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का हरसंभव अनैतिक प्रयास करते रहे हैं।

लेकिन आश्‍चर्यजनक तथ्य ये है कि भारतीय जनता पार्टी, आरएसएस और आरएसएस के अनुसांगिक संगठनों सहित ऐसी ताकतें, जो अपने आप को राष्ट्रवादी, देशभक्त और हिन्दुत्ववादी संस्कृति की संरक्षक बतलाती हैं, आश्‍चर्यजनक रूप से उस समय लम्बा मौन साध लेती हैं, जबकि दलितों, आदिवासियों और गरीब एवं पिछड़े वर्गों की स्त्रियों का सरेआम शोषण और उत्पीड़न होता है। बल्कि कड़वी सच्चाई तो ये है कि इन्हीं तथाकथित राष्ट्रवादी, देशभक्त और हिन्दुत्ववादी ताकतों के इशारों या इनके सक्रिय सहयोग और इन्हीं के उकसावे पर हर दिन देशभर में दलितों, आदिवासियों और गरीब एवं पिछड़े वर्गों की स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता रहता है। देश में हर दिन कहीं न कहीं दलितों और आदिवासियों की लड़कियों के साथ गैंग-रेप किये जा रहे हैं। दलितों और आदिवासियों का सार्वजनिक रूप से उत्पीड़न किया जाता है। उनको अमानवीय त्रासदियॉं दी जाती हैं।

कभी मंदिरों से धक्के देकर बाहर भगा दिया जाता है तो कभी बलात्कार करने में असफल होने पर दलितों और आदिवासियों की पीड़ित औरतों को विरोध करने के कारण जिन्दा जला दिया जाता है। कभी होटलों में खाना खाने की हिमाकत करने पर दलितों और आदिवासियों को अपमानित करके सरेआम सड़कों पर घसीटा जाता है। नाईयों को बाल नहीं काटने दिये जाते हैं। सार्वजनिक नल-कूपों से पानी नहीं भरने दिया जाता है। इन सब असंवैधानिक और मनमानियों को क्रियान्वित करने की आज्ञा जिन झूठे और ढोंगी ग्रंथों में दी गयी है, उन कथित धर्म ग्रंथों का सरकार और प्रशासन की नाक के नीचे, बल्कि सरकार और प्रशासन के सहयोग से हर दिन कहीं न कहीं और टीवी पर पूरे उत्साह के साथ और सार्वजनिक रूप से पठन-पाठन किया जाता है। इसी प्रकार से दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और स्त्रियों के साथ इतिहास में किये गये अन्याय के मुख्य खलनायकों का भी सार्वजनिक रूप से महिमामंडन किया जाता है।

इस प्रकार तत्काल समाधान हेतु इस देश में यदि आज सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वो है, देश के पच्चीस फीसदी दलितों और आदिवासियों और अड़तालीस फीसदी महिला आबादी को वास्तव में सम्मान, संवैधानिक समानता, सुरक्षा और हर क्षेत्र में पारदर्शी न्याय प्रदान करना और यदि सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वो है-दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को हर दिन धर्म के नाम पर अपमानित, शोषित और उत्पीड़ित किया जाना। यही नहीं इस देश में आज की तारीख में यदि सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न कर रहे हैं और जिन्हें धर्म और संस्कृति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सहयोग प्रदान करते रहते हैं।

अत: हमारे देश में भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर उपरोक्त प्रकार के अन्यायों से देश के शोषित लोगों का ध्यान भटकाया जाता है। असल में आज सबसे बड़ी जरूरत है कि हम इस बात को समझें कि इस देश की तकरीबन नब्बे फीसदी से अधिक आबादी लगातार अभावों में जीने को विवश है। अत: हमें देश के कर्णधारों से इस बात के लिये सवाल करना होगा कि उन्हें देश की बहुसंख्यक आबादी की चिन्ता क्यों नहीं है। यदि जन-आन्दोलनों या बाबा रामदेव जैसों द्वारा योग के नाम पर भटकाया जावे तो इस देश के दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को सबसे पहले उनसे भी उपरोक्त सवाल पूछने चाहिये।

-लेखक : होम्योपैथ चिकित्सक, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिसट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) और संगठित षड़यंत्र के चलते जिला जज ने उम्र कैद की सजा सुनाई, चार वर्ष से अधिक समय चार-जेलों में व्यतीत किया। हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने दोषमुक्त/निर्दोष ठहराया। मोबाइल : 085619-55619, 098285-02666

Wednesday, April 24, 2013

कुछ रोचक और महत्वपूर्ण ख़बरों तथा आलेखों के लिंक्स. (24 अप्रेल, 2013 को प्रकाशित)

केरल धमाके पर चुप्पी क्यों?-मामला आरएसएस से जुड़ा है, इसलिए मीडिया खामोश है...


अपना बिजली बिल जमा क्यों कर रही है टीम केजरीवाल ?


झाबुआ: राजनीतिक उत्पीडन में आदिवासी पर ही लगा मारा एस.टी. एक्ट

पुण्‍य प्रसून वाजपेयी ने कहा, ये मजदूर नहीं मवाली हैं!

बिना पेंदी के लोटा हुये लालू प्रसाद यादव !

Friday, January 4, 2013

विडंबनाओं के देश में स्त्री-सुरक्षा..!

दुनिया के किसी भी देश में रहने वाले इतनी विडंबनाओं के साथ नहीं जीते, जितनी विडंबनाओं के साथ हमें भारत में जीना पड़ता है। धर्म, सम्प्रदाय और राजनीति से परे हम भारतीयों में यदि कोई एकरूपता है, तो वह है, भारतीयों की सोच और कथनी, कथनी और करनी में मौजूद पाखंड। भारतीय समाज का वयस्क हिस्सा, चाहे वह पुरुष हो या महिला, अपने दैनंदिनी जीवन के प्रत्येक पल को इसी दिखावे, बनावटीपन और ओढ़े हुए झूठ के साथ जीते हैं। वह चाहे गरीबों के नाम पर आंसू बहाना हो, भ्रष्टाचार के नाम पर रोष जाहिर करना हो या फिर स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित होना हो, हम अपने पाखंड को सरलता के साथ ओढ़े रहते हैं| हमारी सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि चरित्र और नैतिकता के स्तर पर मूल्यों में दोहरापन हमें कभी कचौटता भी नहीं है।

किसी मनुष्य को जीवन में जिन तीन चीजों की कामना सबसे अधिक होती है, वे तीनों ही भारतीय सन्दर्भों में स्त्री रूप हैं| लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा| धन, बुद्धि और शक्ति। सामान्य तौर पर किसी घर में घर में कन्या का जन्म होने पर कहा जाता है कि लक्ष्मी घर में आई है| पर, उसी लक्ष्मी को कोख में ही मार देने की घटनाएं सर्वाधिक भारत में होती हैं। वही लक्ष्मी दैहिक व्यापार में धकेली जाती है और धन कमाने का साधन मानी जाती है। विडम्बना यह है कि लक्ष्मी को दैहिक व्यापार में ढकेलने के काम में भी सहायक लक्ष्मी ही बनती है।

सरस्वती ज्ञान की देवी है। उन्हीं सरस्वतियों को पढ़ लिखकर क्या करेंगी, कहकर, ज्ञान प्राप्ति से वंचित रखा जाता है। दुर्गा की उपासना करके शक्ति प्राप्त की जाती है| दुर्गा के उन्हीं अवतारों को घरों में समाज में लतियाया जाता है। यह सब करते हुए सोच के स्तर पर समाज में श्रेणी या स्तर का कोई भेदभाव नहीं है। उच्च वर्ग हो, मध्य वर्ग हो या निचला तबका, आर्थिक आधार पर हो या जाती, धर्म और सम्प्रदाय, सोच के स्तर पर सभी समान हैं| स्त्रियाँ पैर की जूती से भी कम हैं। यह सोच के स्तर पर है। स्त्रियाँ पूजनीय हैं, उनका सम्मान होना चाहिये। यह कथनी के स्तर पर है। उन्हें दबाकर रखना चाहिये और अवसर मिलते ही उनका उपभोग किया जा सकता है, यह करनी के स्तर पर है।

दिल्ली सहित पूरे देश में पिछले एक पखवाड़े से चल रहे प्रदर्शनों में यह विडम्बना आंदोलन, राजनीति और प्रशासन तीनों स्तर पर खुलकर सामने आई है। यह क्या कम विडंबनापूर्ण है कि जब इंडिया गेट पर युवाओं का रोषपूर्ण प्रदर्शन अपने चरम पर था, इलेक्ट्रानिक मीडिया के तथाकथित बुद्धिमान और विवेकपूर्ण रिपोर्टर और एंकर गला फाड़ फाड़ कर दिल्ली पोलिस ही नहीं, पूरे देश की पोलिस व्यवस्था को कोस रहे थे, देश की सरकार ही नहीं, सारे दलों के सारे राजनीतिज्ञ घडियाली आंसू बहाकर संवेदनशील दिखने की कोशिश कर रहे थे, दुनिया की सबसे बदनाम पत्रिका और बदनाम क्लबों का समूह प्लेब्वॉय भारत में उसके खुलने वाले क्लबों में शराब परोसने के लिए रखी जाने वाली “बनीज” याने लड़कियों के लिए पहनने वाली पोशाक का प्रदर्शन कर रहा था, पर, न तो इंडिया गेट पर "व्ही डिमांड जस्टिस" के नारे लगाने वालों ने, न ही चैनलों पर बलात्कार के खिलाफ प्रवचन झाड़ने वाले महिलाओं के महिला और पुरुष पक्षधरों ने, न ही गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया के रिपोर्टरों और एंकरों ने, न ही प्रिंट मीडिया के अखबारों ने और न ही घडियाली आंसू बहाने वाले राजनीतिज्ञों ने किंचित मात्र भी चिंता जताई कि कामुकता परोसने वाले इन क्लबों के खुलने का भारतीय समाज पर क्या असर पड़ेगा?

पिछले तीन दशकों ने भारत में कामुकता एक उद्योग के रूप में स्थापित हो चुकी है और महिलाएं इसमें माल के रूप में व्यापार के लिए इस्तेमाल हो रही हैं। कामुकता जब उद्योग की शक्ल ग्रहण कर लेती है, तब इसका उपभोक्ता केवल समाज का अभिजात्य अग्रणी नहीं होता, उपभोक्ताओं का विस्तार मध्यवर्ग और निचले वर्ग तक हो जाता है। ठीक उसी तरह, जैसे देश में पहले जब गुटखे का उत्पादन शुरू हुआ तो वो बड़े पेक (डिब्बे) में मिलता था और उसके ग्राहक समाज के संपन्न तबके से थे। एक दशक के बाद ही वह छोटे पेक याने पाउच में भी मिलाने लगा और उपभोक्ता समाज का प्रत्येक तबका है| यही बात कामुकता के उद्योग पर भी लागू होती है| गुटखा उद्योग समाज को गुटखे का आदी बनाता है। कामुकता का उद्योग समाज को कामुक बनाता है। आज यही होते हम देख रहे हैं। इस उद्योग में माल स्त्री है और वो इसी का दुष्परिणाम भुगत रही है।

इस कामुक समाज का प्रत्येक अंग, व्यक्ति से लेकर संस्था तक, राजनीति से लेकर धर्म तक, स्त्री से लेकर पुरुष तक, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार तक की घटनाओं पर, दहेज से लेकर डायन/टोनही कहकर महिलाओं को मार देने तक की घटनाओं पर, प्रेम निवेदन अस्वीकार कर देने से सम्मान के लिए स्त्रियों को मार देने तक की घटनाओं पर, उसी कामुक नजरिये से सोचता है। यही सोच पोलिस को लापरवाह बनाती है। यही सोच 100 में से 70 बलात्कार के अपराधियों को न्यायालय से छुड़ाती है। यही सोच बलात्कारियों को लोकसभा और विधान सभाओं में पहुंचाती है।

इस विडम्बना के बावजूद कि यही समाज तब उद्वेलित नहीं हुआ था, जब मणिपुर की मनोरमा, छत्तीसगढ़ की सोनी शोरेन, आसिया, नीलोफर या भंवरी देवी के ऊपर अत्याचार हुए थे, इस बात का स्वागत किया जाना चाहिये कि कुछ हलचल तो समाज में हुई है। पर, दुखद तो यह है कि इतना बड़ा अवसर मिलने के बावजूद भी, समाज की चिंताएं, फांसी की सजा, नपुंसक बनाने और पोलिस तथा न्यायायिक सुधार पर ही टिकी हैं। उन प्रदर्शनों में न तो व्यवस्था जन्य दोषों पर कोई बल है, न ही समाज को सेक्स के चक्कर में डालकर मूल सामाजिक समस्याओं की तरफ से भटकाने के प्रति कोई चिंता है| प्रधानमंत्री का कहना है कि उस 23 वर्षीय लड़की की कुरबानी बेकार नहीं जायेगी। उस लड़की के माता-पिता का कहना है कि उनकी बेटी की मौत से दिल्ली और देश की महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ेगी। देश की बेटियों को हक और सम्मान मिलेगा। पर, मिलेगा क्या?

देश का एक युवा क्रिकेटर लड़कियों को पटाने के दो तरीके बता रहा है। एक परफ्यूम के विज्ञापन में लड़के की फियान्सी कामुकता से प्रोत होकर लड़के के पिता के कपड़े उतार रही है। योनी को गोरा बनाने से लेकर, योनी को कसा बनाने की क्रीम तक के विज्ञापन बाजार में छाये हैं। नहीं किसी के मुँह में जहर डाल के आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वो व्यक्ति उस जहर को अमृत में बदल लेगा। इसी तरह समाज के दिमाग में कामुकता भरकर आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह उसे सदवृति में बदल लेगा।

बुनियादी बात यह है कि समाज की संस्कृति, नैतिकता का वाहक समाज का अग्रणी हिस्सा होता है। आज वही भ्रष्ट है। वही कामुकता में खो गया है। आप अपने मालिक को प्लेब्वॉय क्लब तक ले जाने वाले ड्राईवर से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह उसकी पहुँच में आ जाने वाली महिला को माल नहीं समझेगा।

विडम्बना यह है कि उस सोच के बारे में कहीं नहीं सोचा गया जो कामुकता को समाज में रोप रही है, बलात्कार, स्त्रियों को माल समझना, जिसके सहउत्पाद (BY PRODUCT) हैं। न इंडिया गेट पर, न लोकसभा में और न हमारे दिमागों में। बिना उस पर विचार किये, विडंबनाओं से भरे इस समाज में स्त्री सुरक्षा पर रोना कितना फलीभूत होगा, यह तो भविष्य ही बताएगा।

Saturday, November 3, 2012

क्यों रखे स्त्रियां करवा चौथ का व्रत?

करवा चौथ ऐसा एक व्रत है, जिसे लगभग हर हिन्दू औरत रखती है, व्रत में क्या-क्या होता है, शायद ये बताने की जरुरत नहीं! आज ये व्रत न होकर पूर्ण रूप से बाजारवाद और अन्धविश्वास के शिकंजे में आ गया है। पण्डे पुजारी जीभर के व्रत-त्योहारों के नाम पर भोले-भाले लोगो का दोहन कर रहे हैं। करवा चौथ का व्रत ही लीजिए देखिये आज कितने चढ़ावे और दान मंदिरों के पुजारियों के घर पहुच जायेगा।

पर सच क्या है व्रत का? क्यों रखना चाहिए व्रत? क्या व्रत रखने से सच में पति की आयु लम्बी होती है? जानिए व्रत का सच ...

धर्म की जिज्ञासा वाले के लिए वेद ही परम प्रमाण है। अतः हमें वेद में ही देखना चाहिए कि वेद का इस विषय में क्या आदेश है? वेद का आदेश है—-

व्रतं कृणुत ! ( यजुर्वेद ४-११ )
व्रत करो, व्रत रखो, व्रत का पालन करो
ऐसा वेद का स्पष्ट आदेश है, परन्तु कैसे व्रत करें? वेद का व्रत से क्या तात्पर्य है? वेद अपने अर्थों को स्वयं प्रकट करता है..वेद में व्रत का अर्थ है—-

अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छ्केयं तन्मे राध्यतां इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि !! ( यजुर्वेद १–५ )

हे व्रतों के पालक प्रभो! मैं व्रत धारण करूँगा, मैं उसे पूरा कर सकूँ, आप मुझे ऐसी शक्ति प्रदान करें… मेरा व्रत है—-मैं असत्य को छोड़कर सत्य को ग्रहण करता रहूँ

इस मन्त्र से स्पष्ट है कि वेद के अनुसार किसी बुराई को छोड़कर भलाई को ग्रहण करने का नाम व्रत है..शरीर को सुखाने का, रात्रि के १२ बजे तक भूखे मरने का नाम व्रत नहीं है..चारों वेदों में एक भी ऐसा मन्त्र नहीं मिलेगा, जिसमे ऐसा विधान हो कि एकादशी, पूर्णमासी या करवा चौथ आदि का व्रत रखना चाहिए और ऐसा करने से पति की आयु बढ़ जायेगी …

हाँ, व्रतों के करने से आयु घटेगी ऐसा मनुस्मृति में लिखा है

पत्यौ जीवति तु या स्त्री उपवासव्रतं चरेत् !
आयुष्यं बाधते भर्तुर्नरकं चैव गच्छति !!

जो पति के जीवित रहते भूखा मरनेवाला व्रत करती है, वह पति की आयु को कम करती है और मरकर नरक में जाती है …

अब देखें आचार्य चाणक्य क्या कहते है —

पत्युराज्ञां विना नारी उपोष्य व्रतचारिणी !
आयुष्यं हरते भर्तुः सा नारी नरकं व्रजेत् !! ( चाणक्य नीति – १७–९ )

जो स्त्री पति की आज्ञा के बिना भूखों मरनेवाला व्रत रखती है, वह पति की आयु घटाती है और स्वयं महान कष्ट भोगती है …

अब कबीर के शब्द भी देखें —

राम नाम को छाडिके राखै करवा चौथि !
सो तो हवैगी सूकरी तिन्है राम सो कौथि !!

जो ईश्वर के नाम को छोड़कर करवा चौथ का व्रत रखती है, वह मरकर सूकरी बनेगी

ज़रा विचार करें, एक तो व्रत करना और उसके परिणाम स्वरुप फिर दंड भोगना, यह कहाँ की बुद्धिमत्ता है? अतः इस तर्कशून्य, अशास्त्रीय, वेदविरुद्ध करवा चौथ की प्रथा का परित्याग कर सच्चे व्रतों को अपने जीवन में धारण करते हुए अपने जीवन को सफल बनाने का उद्योग करों।

स्त्रोत : केशव Friday November 02, 2012, नव भारत टाइम्स का ब्लॉग "आक्रोशित मन" से साभार!