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Saturday, April 30, 2016

मायावती की जीत, क्या सामाजिक न्याय की हार होगी?

मायावती की जीत, क्या सामाजिक न्याय की हार होगी?
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लेखक : Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
मनुवादी एमके गांधी द्वारा आमरण अनशन को हथियार बनाकर बाबा साहब को कम्यूनल अवार्ड को त्यागने को मजबूर किया गया। दुष्परिणामस्वरूप पूना पैक्ट अस्तित्व में आया। जिसके तहत सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े उन वर्गों को, जिनका राज्य (सरकार) की राय में प्रशासन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हो को प्रशासनिक प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए संविधान में मूलाधिकार के रूप में आरक्षण की व्यवस्था की गयी। जिसके तहत सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में अजा, अजजा एवं ओबीसी को आरक्षण प्रदान किया जा रहा है। जिसका मूल मकसद सामाजिक न्याय की स्थापना करना था। यद्यपि न्यायपालिका ने आरक्षण को अनेकों बार कमजोर करने वाले निर्णय सुनाये हैं।

इसके विपरीत संघ की राजनैतिक शाखा भाजपा की राज्य सरकारों द्वारा संविधान को धता बताकर आरक्षण प्रदान करने हेतु आर्थिक आधार को आगे बढ़ाया जाकर भाजपा की सरकारों द्वारा राजस्थान और गुजरात में सामाजिक न्याय की हत्या करने की शुरूआत की जा चुकी है। इस अन्याय के समर्थन के लिए दलित नेतृत्व पासवान, उदितराज और अठावले को भाजपा द्वारा पहले ही अपने साथ मिलाया जा चुका है। मायावती के विरुद्ध जारी आपराधिक मामलों के दबाव के जरिये उसे भी संघ द्वारा आर्थिक आधार पर आरक्षण का समर्थन करने को मजबूर किया जा चुका है। संविधान के विरूद्ध जाकर मायावती राज्यसभा में सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण प्रदान करने की अन्यायपूर्ण मांग कर चुकी हैं।

इस सबके बावजूद भी संविधान में संशोधन के बिना आर्थिक आधार पर आरक्षण को व्यवहार में लागू नहीं किया जा सकता। मगर सबसे बड़ा पेच यह है कि राज्यसभा में भाजपा के बहुमत के अभाव में संविधान संशोधन सम्भव नहीं हो पा रहा है। राज्यसभा में बहुमत के लिए भाजपा और संघ द्वारा उत्तर प्रदेश विधानसभा के अगले आम चुनाव के बाद बदलने वाली तस्वीर का इन्तजार किया जा रहा है।

चूंकि वर्तमान परिदृश्य में राजनैतिक समीक्षकों को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बहुमत में आने के आसार बहुत ही कम नजर आ रहे हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव के बाद निम्न संभावनाएं और आशंकाएं दिखाई दे रही हैं :-

1. उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा को बहुमत मिले जिससे राज्यसभा में बसपा की ताकत बढ़े। मायावती तो सीबीआई जांच के शिकंजे में छूट/ढिलाई मिले और बदले में मायावती अपनी पूर्व घोषित संघ समर्थक नीति के अनुसार सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण दिलाने के बहाने संघ/भाजपा के संविधान संशोधन के एजेंडे/प्रस्ताव का समर्थन करे।
2. उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा को बहुमत मिले जिससे राज्यसभा में भाजपा की ताकत बढ़े। जिसके बल पर भाजपा अपने एजेंडे को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करे। 
3. उक्त बिंदु एक संघ और भाजपा की पहली आकांक्षा है, क्योंकि बसपा के समर्थन से संविधान में संशोधन करके सामाजिक न्याय की हत्या करने में कथित रूप से दलितों की सबसे बड़ी पार्टी बसपा की सहमति भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से दूरगामी लाभ का सौदा होगा। भाजपा की नियत पर कम सवाल उठेंगे।
4. उत्तर प्रदेश में बसपा को जिताने के बदले में केंद्र सरकार बसपा सुप्रीमों को सीबीआई से संरक्षण प्रदान करेगी, जिसके प्रतिफल में मायावती अन्य राज्यों में कांग्रेस को हराने के लिए अपने उम्मीदवार खड़े करके भाजपा को जिताने में योगदान करेंगी।
5. संविधान संशोधन के जरिये एक बार यदि आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान संविधान में जुड़ गया तो आज नहीं तो कल, सीधे नहीं तो सुप्रीम कोर्ट के मार्फत अजा एवं जजा के आरक्षण का मूल आधार भी आर्थिक किया जाना आसान हो जाएगा। जो संघ का मूल मकसद है। इसके बाद आराक्षण का आधार जाति या वर्ग नहीं बीपीएल कार्ड होगा। जिसे खरीदना आसान होगा। आर्थिक आधार लागू होते ही पदोन्नति का आरक्षण अपने आप ख़त्म हो जाएगा और सामाजिक न्याय एक कल्पना मात्र रह जाएगा।

अत: उपरोक्त संभावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा में मायावती को जिताना वंचित वर्ग के लिए कितना घातक हो सकता है, यह वंचित MOST वर्ग के लिए समय रहते गंभीर विचार और चिंतन का विषय होना चाहिए।

जय भारत। जय संविधान।
नर-नारी, सब एक समान।।
: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/29-04-2016/03.44 PM
@—लेखक का संक्षिप्त परिचय : मूलवासी-आदिवासी अर्थात रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया। होम्योपैथ चिकित्सक और दाम्पत्य विवाद सलाहकार। राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोसिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक) और पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ।
नोट : उक्त सामग्री व्यक्तिगत रूप से केवल आपको ही नहीं, बल्कि ब्रॉड कॉस्टिंग सिस्टम के जरिये मुझ से वाट्स एप पर जुड़े सभी मित्रों/परिचितों/मित्रों द्वारा अनुशंसितों को भेजी जा रही है। अत: यदि आपको किसी भी प्रकार की आपत्ति हो तो, कृपया तुरंत अवगत करावें। आगे से आपको कोई सामग्री नहीं भेजी जायेगी। अन्यथा यदि मेरी ओर से प्रेषित सामग्री यदि आपको उपयोगी लगे तो इसे आप अपने मित्रों को भी भेज सकते हैं।
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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Wednesday, January 27, 2016

आरक्षण व्यवस्था के साथ जारी बर्बरतापूर्ण बलात्कार कैसे रुके?

आरक्षण व्यवस्था के साथ जारी
बर्बरतापूर्ण बलात्कार कैसे रुके?

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
भारत में हजारों सालों से संचालित अमानवीय मनुवादी व्यवस्था के कारण सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से वंचित वर्गों की दशा संविधान लागू होने के 66 साल बाद भी अत्यधिक दयनीय है। संविधान निर्माताओं को इन वर्गों की विशेष चिन्ता थी। इसी कारण से इन वंचित वर्गों को अजा, अजजा एवं ओबीसी वर्गों में वर्गीकृत करके, संविधान में कुछ विशेष प्रावधान किये गये थे। जिनमें विधायिका में प्रतिनिधित्व के साथ—साथ शिक्षण संस्थानों में प्रवेश तथा सरकारी नौकरियों में चयन एवं पदोन्नति के समय पात्रता में छूट, प्रमुख प्रावधान हैं। ओबीसी की दशा इस मामले में कमतर है। उनको न तो विधायिका में और न ही पदोन्नति में आरक्षण प्राप्त है। यही नहीं ओबीसी को उनकी जनंसख्या के अनुपात से आधे से भी ​कम आरक्षण प्राप्त है। जानबूझकर ओबीसी में असमान पृष्ठभूमि की जातियों को शामिल करके आरक्षण को आपसी संघर्ष का आखाड़ा बना दिया गया है।

संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था के परिणामस्वरूप या इसके दुष्परिणामस्वरूप वंचित वर्गों में विशेष रूप से अजा एवं अजजा के अनेक लोग उच्च पदों तक पहुंचे हैं। अनेक वर्तमान में भी पदस्थ हैं। इस सब के बाद भी मैं अत्यधिक दुःख के साथ, यह लिखने को विवश हूं कि उच्च प्रशासनिक और निर्णायक पदों पर पदस्थ रहते हुए, आरक्षित वर्ग के अनेक अधिकारी अपने वर्ग के आहत, पीड़ित और वंचित लोगों का प्रतिनिधित्व करने की तनिक भी परवाह नहीं करते हैं। इसके विपरीत अपने वर्ग के वंचित लोगों से दूरी बनाते देखे जा सकते हैं और बकवास (BAKVaS= B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Va-वैश्य+Sसंघी) वर्ग के मनुवादियों की खुशामद करते देखे जा सकते हैं। जिसे सीधे शब्दों में चाटुकारिता और चमचागिरी की संज्ञा दी जा सकती है।

जबकि सरकारी सेवाओं में चयन हेतु पात्रता में छूट प्रदान करने का मूल मकसद वंचित वर्गों के नये सामन्त पैदा करना कदापि नहीं था, बल्कि देश में सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु कार्यपालिका में वंचित वर्गों का पर्याप्त और सशक्त प्रतिनिधित्व स्थापित करना था। जिससे कि बकवास (BAKVaS= B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Va-वैश्य+Sसंघी) वर्ग से वंचित वर्गों के हितों की रक्षा की जा सके। वंचित वर्गों के उत्थान और संरक्षण के लिये नीतियों और कानूनों का निर्माण किया जा सके। पिछले 66 वर्ष के अनुभव को देखा जाये तो संविधान की मंशा के अनुरूप वंचित वर्गों का सच्चा और सशक्त प्रतिनिधित्व स्थापित नहीं हो सका है। इस मामले में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था असफल रही है और आरक्षण का मूल मकसद समाप्त और बेमानी हो चुका है।

आरक्षण का लाभ प्राप्त करके उच्च पदों पर पदस्थ अनेक प्रशासनिक अधिकारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों में अपने ही वंचित वर्ग के प्रति संवैधानिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का प्राय: अभाव दिखाई दे रहा है। इसके साथ—साथ यह भी देखने और सुनने में आता रहा है कि उच्च प्रशासनिक पदों पर बिराजमान आरक्षित वर्ग के अफसरों के परिजनों और सम्बन्धियों का ही प्रशासनिक पदों पर प्रमुखता से चयन हो रहा है? मुझे यह भी जानकारी मिली है कि लिखित और मुख्य परीक्षा में तुलनात्मक रूप से अधिक अंक प्राप्त करने वाले आम आरक्षित लोगों की संतानों की तुलना में, उच्च प्रशासनिक पदों पर बिराजमान आरक्षित वर्ग के अफसरों के कम अंक लाने परिजनों और सम्बन्धियों का अन्तिम रूप से चयन हो जाता है। यदि यह सत्य नहीं भी है तो क्या इसे सिर्फ संयोग ही माना जावे कि उच्च प्रशासनिक पदों पर बिराजमान लोगों के परिवार या रिश्तेदारी में ही अतिविलक्षण प्रतिभाशाली बच्चे पैदा हो रहे हैं, जिसके चलते भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में उनका चयन अवश्य हो रहा है। यदि यह सच है तो यह आरक्षण के आधार पर प्राप्त उच्च पदस्थिति का निजी हित में भयंकर दुरूपयोग और सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु लागू आरक्षण व्यवस्था के साथ सरेआम, क्रूरतापूर्ण और बर्बर बलात्कार नहीं तो और क्या है?

अब यह तथ्य किसी से छिपा नहीं रह गया है कि आरक्षण का लाभ लेकर उच्च पदों पर पदस्थ अनेक अधिकारी ऐश-ओ-आराम की जिंदगी जीते हैं और अवैध तरीकों से अकूत धन-सम्पदा अर्जित करते हैं। जिसे अपनी भावी पीढ़ियों के लिए अक्षुण्य बनाये रखने के लिए सरकारी सेवा में रहते हुए राजनैतिक दलों से नजदीकीयां बना लेते हैं और सेवानिवृति के बाद मनुवादी राजनैतिक दलों के टिकिट पर आरखित निर्वाचन क्षेत्रों से जीतकर MP या MLA बन जाते हैं। ऐसे लोगों का अपने वर्ग के आम लोगों के दुःख-दर्द या मुसीबतों या उनके हितों या अधिकारों के संरक्षण से दूर का भी वास्ता नहीं होता है। ऐसे लोग पहले प्रशासन में रहकर और बाद में विधायिका में पहुंचकर अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति करने के साथ—साथ अपने राजनैतिक दल के आकाओं के आदेशों की पालना करने के अलावा कुछ नहीं करते हैं। इसी कारण वंचित समाज के अन्दर गहरी खाई बन चुकी है और आरक्षित वर्ग के आम लोगों में गहरा असन्तोष और गुस्सा व्याप्त है। 

इन हालातों में और संविधान को लागू हुए सात दशक पूर्ण होने जा रहे हैं, तब भी क्या आरक्षित वर्ग के आम लोगों के लिये यह विशेष चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिये कि सामाजिक न्याय की वास्तविक स्थापना कैसे हो? वंचितों के प्रेरणा स्रोत ज्योतिबा फूले, विश्वस्तरीय विधिवेत्ता और बहुमुखी प्रतिभा के धनि बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेड़कर, आदिवासी हितों के लिये समर्पित प्रतिनिधि जयपालसिंह मुण्डा और आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय के मसीहा कांशीराम की सामाजिक न्याय की लड़ाई का क्या यही लक्ष्य था? मुझे नहीं लगता कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था से इन महामानवों के सपने कभी पूर्ण हो सकेंगे।

मुझे ज्ञात है कि काले धन की ताकत पर आरक्षित वर्गों के दिखावटी मसीहा बने हुए कुछ स्वार्थी पूर्व या वर्तमान प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से मेरा और मेरे विचारों का कड़ा विरोध हो सकता है, जो अनपेक्षित और अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन उनके स्वार्थपूर्ण विचारों की परवाह किये बिना समग्र वंचित समाज के संवैधानिक हित में हमें सत्य को स्वीकार कर के, इस समस्या का अविलम्ब स्थायी और संवैधानिक समाधान खोजना ही होगा।

कुछ कथित उथले विद्वान आरक्षित वर्गों में क्रीमी लेयर लागू करके इस समस्या का समाधान करने की बात करते हैं, जिसका मैं कभी समर्थन नहीं कर सकता। क्योंकि क्रीमी लेयर संवैधानिक प्रतिनिधित्व की मूल अवधारणा को ही नेस्तनाबूद कर देती है। यद्यपि मैं स्वीकरता हूं और उक्त विवेचन से प्रमाणित भी होता है कि वर्तमान व्यवस्था में वंचित वर्गों का उचित संवैधानिक प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा है। इसके बावजूद भी हम हमारे समस्त प्रतिनिधियों को शतप्रतिशित नहीं नकार सकते, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था की बदौलत ही अनेक संवेदनशील, सेवाभावी एवं जिम्मेदार अफसर और जनप्रतिनिधि, पूर्ण ईमानदारी और निष्ठा के साथ अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए वंचित वर्गों का निर्भीकतापूर्वक प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

इसके उपरान्त भी वंचित वर्ग के लिये अहितकर बन चुकी वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का स्थायी और संवैधानिक समाधान खोजना ही होगा। बल्कि अविलम्ब खोजना होगा। इसलिये सामाजिक न्याय के लिये कार्यरत और संविधान के जानकार विद्वानों को इस बारे में गम्भीरतापूर्वक चिन्तन और मंथन करने की करने की जरूरत है। मेरे मनोमस्तिष्क में भी कुछ समाधान हैं, लेकिन उन्हें प्रस्तुत करूं उससे पहले बेहतर होगा कि इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिये। जिससे मेरे विचारों से प्रभावित हुए बिना, अधिक अच्छे समाधान सामने आ सकें। अब देखना होगा कि कितने लोग वंचित समाज के प्रति चिन्तनशील हैं और कितने लोग तार्किक, संवैधानिक और समाधानकारी सुझाव प्रस्तुत करने का साहस जुटा पाते हैं?

जय भारत। जय संविधान।
नर—नारी सब एक समान।।
@—लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोशिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक), पूर्व रा महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ, दाम्पत्य विवाद सलाहकार तथा लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में एकाधिक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित। वाट्स एप एवं मो. नं. 9875066111, 27.01.2016 (11.59 AM)
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—निवेदक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Tuesday, February 28, 2012

आरक्षित उम्मीदवारों के मैरिट में चयन का औचित्य!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

कुछ समय पूर्व मैंने एक खबर पढी थी कि अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये आरक्षित उनंचास फीसदी आरक्षित कोटे के अलावा शेष बचे सामान्य वर्ग के इक्यावन फीसदी पदों पर अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के तीस फीसदी प्रत्याशी मैरिट के आधार पर नियुक्त हो गये। इसे मीडिया द्वारा सामान्य वर्ग के हिस्से पर आरक्षित वर्गों का डाका बताकर प्रचारित किया गया। मीडिया के अनुसार सामान्य वर्ग के लोगों के लिये शेष बचे इक्यावन फीसदी का तीस फीसदी कोटा आरक्षित वर्ग द्वारा मैरिट के नाम पर हथिया लिया जाता है, जो अनुचित है। जिस पर रोक लगनी चाहिये। केवल इतना ही नहीं इस मामले में कुछ संगठनों की द्वारा औपचारिक रूप से विरोध भी जताया गया। जिसे आरक्षित वर्ग विरोधी मीडिया द्वारा बढाचढाकर प्रकाशित किया।

विरोध करने वालों के अपने-अपने तर्क हैं, जबकि मैरिट के आधार पर नियुक्ति पाने वाले अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के मैरिट में स्थान प्राप्त करने वालों के पक्ष में संविधान और न्यायपालिका का पूर्ण समर्थन है। यही नहीं प्राकृतिक न्याय का सिद्धान्त भी उनके पक्ष में है, लेकिन इसके बाद भी सामान्य वर्ग के प्रत्याशियों की पीड़ा को भी नकारा नहीं जा सकता।

यह एक ऐसा विषय है, जिस पर निष्पक्ष रूप से विचार करके देखा जाये तो आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग की कुल आबादी देश की कुल आबादी का पिच्यासी फीसदी बतायी जाती है, लेकिन पिच्यासी फीसदी आरक्षित वर्ग के लोगों को मात्र उनंचास फीसदी ही आरक्षण प्रदान किया जा रहा है। ऐसे में शेष अर्थात् छत्तीस फीसदी लोगों का सरकारी सेवाओं में आनुपातिक प्रतिनिधित्व किस प्रकार से सम्भव होगा? इस विषय पर संविधान की मूल भावना अर्थात् सामाजिक न्याय की अवधारणा के प्रकाश में निष्पक्षता पूर्वक विचार नहीं किये जाने के कारण ही ऐसी अप्रिय स्थिति निर्मित की जा रही हैं। जिसके लिये तथाकथित आरक्षण विरोधी राष्ट्रीय मीडिया भी कम दोषी नहीं है।

मीडिया द्वारा आरक्षण के मुद्दे पर आपवादिक अवसरों को छोड़कर अधिकतर केवल भावनात्मक बातों को ही बढावा दिया जाता है। जबकि पृथक निर्वाचक पद्धति की मंजूरी, पृथक निर्वाचक पद्धति का एम के गांधी द्वारा दुराशय पूर्वक विरोध और अन्तत: दबे-कुचले वर्गों के ऊपर पूना पैक्ट को थोपे जाने से लेकर के आज तक के सन्दर्भ में खुलकर चर्चा और विचार करने की सख्त जरूरत है। लेकिन अपने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त भारत का मीडिया इन ऐतिहासिक और संवैधानिक मुद्दों को कभी भी निष्पक्षता से पेश नहीं करता है। जिसके चलते आरक्षित और अनारक्षित वर्गों के बीच में लगातार खाई बढती पैदा की जा रही है। जिससे समाज का माहौल लगातार खराब हो रहा है। इस बारे में तत्काल सकारत्मक कदम उठाये जाने की जरूरत है। विशेषकर मीडिया को अपना सामाजिक धर्म निभाना होगा।

इसके साथ-साथ भारत सरकार को भी इस बारे में नीतिगत निर्णय लेकर उसे कड़ाई से लागू करना होगा।वर्तमान में जारी जाति आधारित जनगणना के नतीजे इस विषय को हमेशा के लिये सुलझाने के लिये सरकार का मार्गप्रशस्त करेंगे। क्योंकि प्राप्त नतीजों से इस बात का तथ्यात्मक ज्ञान हो सकेगा कि अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग की ओर से अपनी जनसंख्या के बारे में किये जाने वाले दावों की सत्यता की पुष्टि हो सकेगी और सरकार को अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या के अनुपात में उन्हें सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व तथा शिक्षण संस्थानों में प्रवेश देने में किसी प्रकार की संवैधानिक या कानूनी अड़चन नहीं होगी। 

एक बार दबे-कुचले वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्रदान करना सुनिश्‍चित कर दिया गया तो फिर मैरिट के आधार पर अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों की तथाकथित घुसपैठ को रोकना आसान हो जायेगा। और कम से कम इस कारण से सामान्य वर्ग के प्रत्याशियों के मनोमस्तिष्क में पैदा होने वाले भावनात्मक दुराग्रहों को सदैव के लिये दूर किया जा सकेगा। ऐसे में जाति आधारित जनगणना के नतीजे आने का हम सबको सकारात्मक रूप से इन्तजार और स्वागत करने को तैयार रहना होगा।

Wednesday, January 25, 2012

आरक्षण समाप्त करना है तो आरक्षित वर्ग के वर्गद्रोही अफसर तत्काल बर्खास्त किये जायें!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

भारत के संविधान के बारे में जानकारी रखने वाले सभी विद्वान जानते हैं कि हमारे संविधान के भाग तीन अनुच्छेद-14, 15 एवं 16 में जो कुछ कहा गया है, उसका साफ मतलब यही है कि धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ किया जाने वाला विभेद असंवैधानिक होगा| समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा| इस स्पष्ठ और कठोर प्रावधान के होते हुए अनुच्छेद 16 (4) में कहा गया है कि-
‘‘इस अनुच्छेद (उक्त) की कोई बात राज्य (जिसे आम पाठकों की समझ के लिये सरकार कह सकते हैं, क्योंकि हमारे यहॉं पर प्रान्तों को भी राज्य कहा गया है|) को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों में या पदों के आरक्षण के लिए उपबन्ध करने से निवारित नहीं (रोकेगी नहीं) करेगी|’’

उक्त प्रावधान को अनेकों बार हमारे देश की सर्वोच्च न्यायपालिका ने उचित और न्याय संगत ठहराया है और साथ ही यह भी कहा है कि अनुच्छेद 14 से 16 में समानता की जो भावना संविधान में वर्णित है, वह तब ही पूरी हो सकती है, जबकि समाज के असमान लोगों के बीच समानता नहीं, बल्कि समान लोगों के बीच समानता का व्यवहार किया जावे|

इसी समानता के लक्ष्य को हासिल करने के लिये उक्त संवैधानिक प्रावधान में पिछड़े वर्ग लोगों को सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने पर जोर दिया गया है| संविधान निर्माताओं का इसके पीछे मूल ध्येय यही रहा था कि सरकारी सेवओं में हर वर्ग का समान प्रतिनिधित्व हो ताकि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय नहीं हो या सकारात्मक रूप से कहें तो सबके साथ समान रूप से न्याय हो सके| क्योंकि इतिहास को देखने से उन्हें ज्ञात हुआ कि कालान्तर में वर्ग विशेष के लोगों का सत्ता एवं व्यवस्था पर लगातार वंशानुगत कब्जा रहने के कारण समाज का बहुत बड़ा तबका (जिसकी संख्या पिच्यासी फीसदी बताई जाती है) हर प्रकार से वंचित और तिरष्कृत कर दिया गया|

ऐसे हालातों में इन वंचित और पिछड़े वर्गों को सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने की पवित्र सोच को अमलीजामा पहनाने के लिये अनुच्छेद 16 में उक्त उप अनुच्छेद (4) जोड़कर अजा, अजजा एवं अन्य पिछडा वर्ग के लोगों को नौकरियों में कम अंक प्राप्त करने पर भी आरक्षण के आधार पर नौकरी प्रदान की जाती रही हैं| 

यदि आज के सन्दर्भ में देखें तो इसी संवैधानिक प्रावधान के कारण कथित रूप से 70 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले अनारक्षित वर्ग के प्रत्याशियों को नौकरी नहीं मिलती, जबकि आरक्षित वर्ग में न्यूनतम निर्धारित अंक पाने वाले प्रत्याशी को 40 या 50 प्रतिशत या कम अंक अर्जित करने वालों को सरकारी नौकरी मिल जाती है| अनराक्षित वर्ग के लोगों की राय में इस विभेद के चलते अनारक्षित वर्ग के लोगों, विशेषकर युवा वर्ग में भारी क्षोभ, आक्रोश तथा गुस्सा भी देखा जा सकता है|

इसके बावजूद भी मेरा मानना है कि पूर्वाग्रही, अल्पज्ञानी, मनुवादी और कट्टरपंथियों को छोड़ दें तो उक्त प्रावधानों पर किसी भी निष्पक्ष, आजादी के पूर्व के घटनाक्रम का ज्ञान रखने वाले तथां संविधान के जानकार व्यक्ति कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये, क्योंकि इस प्रावधान में सरकारी सेवाओं में हर वर्ग का समान प्रतिनिधित्व स्थापित करने का न्यायसंगत प्रयास करने का पवित्र उद्देश्य अन्तर्हित है| परन्तु समस्या इस प्रावधान के अधूरेपन के कारण है|

मेरा विनम्र मत है कि उक्त प्रावधान पिछड़े वर्ग के लोगों को प्रतिनिधित्व देने के लिये निर्धारित योग्यताओं में छूट प्रदान करने सहित, विशेष उपबन्ध करने की वकालत तो करता है, लेकिन इन वर्गों का सही, संवेदनशील, अपने वर्ग के प्रति पूर्ण समर्पित एवं सशक्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने पर पूरी तरह से मौन है| इस अनुच्छेद में या संविधान के अन्य किसी भी अनुच्छेद में कहीं भी इस बात की परोक्ष चर्चा तक नहीं की गयी है कि तुलनात्मक रूप से कम योग्य होकर भी अजा, अजजा एवं अ.पि.वर्ग में आरक्षण के आधार पर उच्च से उच्चतम पदों पर नौकरी पाने वाले ऐसे निष्ठुर, बेईमान और असंवेदनशील आरक्षित वर्ग के लोक सेवकों को भी क्या सरकारी सेवा में क्यों बने रहना चाहिये, जो सरकारी नौकरी पाने के बाद अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करना तो दूर अपने आचरण से अपने आपको अपने वर्ग का ही नहीं मानते?

मैं अजा एवं अजजा संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ (जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदित राज हैं और इण्डियन जस्टिस पार्टी के भी अध्यक्ष है|) का राष्ट्रीय महासचिव रह चुका हूँ| अखिल भारतीय भील-मीणा संघर्ष मोर्चा मध्य प्रदेश का अध्यक्ष रहा हूँ| ऑल इण्डिया एसी एण्ड एसटी रेलवे एम्पलाईज एसोसिएशन में रतलाम मण्डल का कार्यकारी मण्डल अध्यक्ष रहा हूँ| अखिल भारतीय आदिवासी चेतना परिषद का परामर्शदाता रहा हूँ| वर्तमान में ऑल इण्डिया ट्राईबल रेलवे एम्पलाईज एसोसिएशन का राष्ट्रीय अध्यक्ष हूँ| इसके अलावा अजा, अजजा तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के अनेक संगठनों और मंचों से भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सम्बद्ध रहा हूँ|

इस दौरान मुझे हर कदम पर बार-बार यह अनुभव हुआ है कि आरक्षित वर्ग के मुश्किल से पॉंच प्रतिशत अफसरों को अपने वर्ग के नीचे के स्तर के कर्मचारियों तथा अपने वर्ग के आम लोगों के प्रति सच्ची सहानुभूति होती है| शेष पिच्यानवें फीसदी आरक्षित वर्ग के अफसर उच्च जाति के अनारक्षित अफसरों की तुलना में अपने वर्ग के प्रति असंवेदनशील, विद्वेषी, डरपोक होते हैं और अपने वर्ग से दूरी बनाकर रखते हैं| जिसके लिये उनके अपने अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क या बहाने हो सकते हैं, जैसे उन्हें अपने वर्ग का ईमानदारी से प्रतिनिधित्व करने पर अनारक्षित वर्ग के उच्चाधिकारी उनके रिकार्ड को खराब कर देते हैं| इस बात में एक सीमा तक सच्चाई भी है, लेकिन इस सबके उपरान्त भी उक्त और अन्य सभी तर्क कम अंक पाकर भी आरक्षण के आधार पर नौकरी पाकर अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करने के अपराध को कम नहीं कर पाते हैं! क्योंकि सरकारी सेवा में ऐसे डरपोक लोगों के लिये कोई स्थान नहीं होता है, जो अपने कानूनी और संवैधानिक दायित्वों का ईमानदारी, निष्ठा और निर्भीकतापूर्वक निर्वहन नहीं कर सकते|

इस बारे में, मैं कुछ अन्य बातें भी स्पष्ट कर रहा हूँ-अजा एवं अजजा के अधिकतर ऐसे उच्च अफसर जिनके पास प्रशासनिक अधिकार होते हैं और जिनके पास अपने वर्ग को भला करने के पर्याप्त अधिकार होते हैं| अपने मूल गॉंव/निवास को छोड़कर सपरिवार सुविधासम्पन्न शहर या महानगरों में बस जाते हैं| गॉंवों में पोस्टिंग होने से बचने के लिये रिश्वत तक देते हैं और हर कीमत पर शहरों में जमें रहते हैं| अनेक अपनी जाति या वर्ग की पत्नी को त्याग देते हैं (तलाक नहीं देते) और अन्य उच्च जाति की हाई-फाई लड़की से गैर-कानूनी तरीके से विवाह रचा लेते हैं| अनारक्षित वर्ग के अफसरों की ही भॉंति कार, एसी, बंगला, फार्म हाऊस, हवाई यात्रा आदि साधन जुटाना इनकी प्राथमिकताओं में शामिल हो जाते हैं|

ऐसे अफसरों द्वारा अपने आरक्षित वर्ग का सरकारी सेवा में संविधान की भावना के अनुसार प्रतिनिधित्व करना तो दूर, ये अपने वर्ग एवं अपने वर्ग के लोगों से दूरी बना लेते हैं और पूरी तरह से राजशाही का जीवन जीने के आदी हो जाते हैं| इस प्रकार के असंवेदनशील और वर्गद्रोही लोगों द्वारा अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करने पर भी, इनका सरकारी सेवा में बने रहना हर प्रकार से असंवैधानिक और गैर-कानूनी तो है ही, साथ ही संविधान के ही प्रकाश में पूरी तरह से अलोकतान्त्रिक भी है| क्योंकि उक्त अनुच्छेद 16 के उप अनुच्छेद (4) में ऐसे लोगों को तुलनात्मक रूप से कम योग्य होने पर भी अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करने के एक मात्र संवैधानिक उद्देश्य से ही इन्हें सरकारी सेवा में अवसर प्रदान किया जाता है|

ऐसे में अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करके, अपने वर्ग से विश्वासघात करने वालों को सरकारी सेवा में बने रहने का कोई कानूनी या नैतिक औचित्य नहीं रह जाता है| इस माने में संविधान का उक्त उप अनुच्छेद आरक्षित वर्गों को सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने की भावना को पूर्ण करने के मामले में अधूरा और असफल सिद्ध हुआ है| यही कारण है कि आज भी अजा एवं अजजा वर्ग लगातार पिछड़ता जा रहा है| जबकि सरकारी सेवाओं में आरक्षित वर्गों का सशक्त और संवेदनशील प्रतिनिधित्व प्रदान करने के उद्देश्य से ही आरक्षित वर्ग के लोगों को पीढी दर पीढी आरक्षण प्रदान करने को न्याय संगत ठहराया गया है|

मेरा मानना है कि यदि इस सन्दर्भ में प्रारम्भ से ही संविधान में यह प्रावधान किया गया होता कि आरक्षण के आधार पर नौकरी पाने वाले लोगों को तब तक ही सेवा में बने रहने का हक होगा, जब तक कि वे अपने वर्ग का ईमानदारी से सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व करते रहेंगे, तो मैं समझता हूँ कि हर एक आरक्षित वर्ग का अफसर अपने वर्ग के प्रति हर तरह से संवेदनशील और समर्पित होता| जिससे आरक्षित वर्गों का उत्थान भी होता जो संविधान की अपेक्षा भी है और इस प्रकार से मोहन दास कर्मचन्दी गॉंधी द्वारा सैपरेट इलेक्ट्रोल के हक को छीनकर जबरन थोपे गये आरक्षण के अप्रिय प्रावधान से हम एक समय में जाकर हम मुक्त होने के लक्ष्य को भी हो भी हासिल कर पाते| जो वर्तमान में कहीं दूर तक नज़र नहीं आ रहा है!

अतः अब हर एक जागरूक और राष्ट्र भक्त मंच से मांग उठनी चाहिये कि जहॉं एक ओर आरक्षित वर्ग के अफसरों को सरकारी सेवाओं में अपने वर्ग का निर्भीकता पूर्वक प्रतिनिधित्व करने के लिये अधिक सशक्त कानूनी संरक्षण प्रदान किया जावे| उनका रिकार्ड खराब करने वालों को दण्डित किया जावे और इसके उपरान्त भी आरक्षित वर्ग के अफसर यदि अपने वर्ग का निष्ठा, निर्भीकता और ईमानदारी से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं तो ऐसे अफसरों को तत्काल सेवा से बर्खास्त किया जावे| यदि हम ऐसा प्रावधान नहीं बनवा पाते हैं तो आरक्षण को जरी रखकर आरक्षण के आधार पर कम योग्य लोगों को नौकरी देकर कथित रूप से राष्ट्र के विकास को अवरुद्ध करने और समाज में सौहार्द के स्थान पर वैमनस्यता का वातावरण पैदा करने को स्वीकार करने का कोई न्यायसंगत कारण या औचित्य नजर नहीं आता है|

अत: संविधान और संविधान द्वारा प्रदत्त सामाजिक न्याय की अवधारणा में विश्‍वास रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि भारत सरकार को इस बात के लिये बाध्य किया जाये कि संविधान में इस बात का भी प्रावधान किया जावे कि आरक्षित वर्गों का सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से अनारक्षित वर्ग के लोगों की तुलना में कमतर होकर भी आरक्षण के आधार पर नौकरी पाने वालों को पूर्ण समर्पण और संवेदनशीलता के साथ अपने वर्ग और अपने वर्ग के लोगों का सकारात्मक प्रतिनिधित्व करना चाहिये और ऐसा करने में असफल रहने वाले आरक्षित वर्ग के वर्गद्रोही अफसरों या कर्मचारियों को सरकारी सेवा से बर्खास्त करने की सिफारिश करने के लिये अजा और अजजा आयोगों का संवैधानिक रूप से सशक्त किया जाना चाहिये| अन्यथा न तो कभी आरक्षण समाप्त होगा और न हीं आरक्षित वर्गों का सरकारी सेवाओं में संवैधानिक भावना के अनुसार सच्चा प्रतिनिधित्व ही स्थापित हो सकेगा|