Showing posts with label डॉ. ‘निरंकुश’. Show all posts
Showing posts with label डॉ. ‘निरंकुश’. Show all posts

Friday, May 10, 2013

दलित-आदिवासी और स्त्रियों का धर्म आधारित उत्पीड़न हमारी चिन्ता क्यों नहीं?

तत्काल समाधान हेतु इस देश में यदि आज सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वो है, देश के पच्चीस फीसदी दलितों और आदिवासियों और अड़तालीस फीसदी महिला आबादी को वास्तव में सम्मान, संवैधानिक समानता, सुरक्षा और हर क्षेत्र में पारदर्शी न्याय प्रदान करना और यदि सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वो है-दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को धर्म के नाम पर हर दिन अपमानित, शोषित और उत्पीड़ित किया जाना। यही नहीं इस देश में आज की तारीख में यदि सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न कर रहे हैं और जिन्हें धर्म और संस्द्भति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सहयोग प्रदान करते रहते हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पिछले कुछ समय से मीडिया की मेहरबानी से कुछ चतुर, चालाक, भ्रष्ट और कट्टरपंथी ताकतों ने देश की राजधानी नयी दिल्ली को अपनी प्रायोजित ताकत दिखाने और संवैधानिक सरकारों को बदनाम करने का नया तरीका ईजाद कर लिया है। जिसकी बड़ी और सार्वजनिक शुरुआत अन्ना हजारे आन्दोलन के समय हुई। इस आन्दोलन को कथित रूप से विदेशी ताकतों और देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों का खुला समर्थन था। कुछ ही समय में इस कथित जन आन्दोलन की और इसके कर्ताधर्ताओं की चारित्रिक सच्चाई देश के सामने आ गयी।

इसी प्रायोजित नाटक का सहारा प्रारम्भ से ही तथाकथित योग गुरू बाबा रामदेव भी लेते रहे हैं, लेकिन उसका शोषक व्यापारी का घिनौना चेहरा भी देश के समक्ष आ चुका है। यही नहीं देश यह भी जान चुका है कि इन तथाकथित योग गुरू का असली मकसद देश में साम्प्रदायिक और फासीवादी ताकतों को मजबूत करना तथा देश के धर्म-निरपेक्ष ढांचे का ध्वस्त करना है। यही नहीं वह जनता से प्राप्त अनुदान और योग-शुल्क के मार्फत एकत्रित राशि में से चुनावों के समय भारतीय जनता पार्टी को आर्थिक सहयोग करते रहे हैं।

इसी क्रम में अन्ना हजारे से अलग होकर अरविन्द केजरीवाल ने अपनी नयी दुकान ‘‘आम आदमी’’ के नाम पर खोल ली है और वो न मात्र भारत के लोगों को देश की संवैधानिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ सरेआम भड़का और उकसा रहे हैं, बल्कि इसके साथ-साथ ‘‘आम आदमी पार्टी’’ बनाकर, आम आदमी के नाम का भी दुरूपयोग कर रहे हैं। जबकि इस पार्टी के नीति नियंताओं में कोई भी आम आदमी नहीं है!

ये और कि इन जैसे सभी लोगों के कथित जनान्दोलनों का भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अर्थात् आरएसएस और आरएसएस के अनुसांगिक सभी संगठन, जिनमें बजरंग दल, विश्‍व हिन्दू परिषद, दुर्गा वाहिनी आदि प्रमुख हैं, खुलकर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सक्रिय सहयोग करते रहे हैं और ये सब मिलकर हर छोटे बड़े मुद्दे को सुनियोजित तरीके से मीडिया के मार्फत राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का हरसंभव अनैतिक प्रयास करते रहे हैं।

लेकिन आश्‍चर्यजनक तथ्य ये है कि भारतीय जनता पार्टी, आरएसएस और आरएसएस के अनुसांगिक संगठनों सहित ऐसी ताकतें, जो अपने आप को राष्ट्रवादी, देशभक्त और हिन्दुत्ववादी संस्कृति की संरक्षक बतलाती हैं, आश्‍चर्यजनक रूप से उस समय लम्बा मौन साध लेती हैं, जबकि दलितों, आदिवासियों और गरीब एवं पिछड़े वर्गों की स्त्रियों का सरेआम शोषण और उत्पीड़न होता है। बल्कि कड़वी सच्चाई तो ये है कि इन्हीं तथाकथित राष्ट्रवादी, देशभक्त और हिन्दुत्ववादी ताकतों के इशारों या इनके सक्रिय सहयोग और इन्हीं के उकसावे पर हर दिन देशभर में दलितों, आदिवासियों और गरीब एवं पिछड़े वर्गों की स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता रहता है। देश में हर दिन कहीं न कहीं दलितों और आदिवासियों की लड़कियों के साथ गैंग-रेप किये जा रहे हैं। दलितों और आदिवासियों का सार्वजनिक रूप से उत्पीड़न किया जाता है। उनको अमानवीय त्रासदियॉं दी जाती हैं।

कभी मंदिरों से धक्के देकर बाहर भगा दिया जाता है तो कभी बलात्कार करने में असफल होने पर दलितों और आदिवासियों की पीड़ित औरतों को विरोध करने के कारण जिन्दा जला दिया जाता है। कभी होटलों में खाना खाने की हिमाकत करने पर दलितों और आदिवासियों को अपमानित करके सरेआम सड़कों पर घसीटा जाता है। नाईयों को बाल नहीं काटने दिये जाते हैं। सार्वजनिक नल-कूपों से पानी नहीं भरने दिया जाता है। इन सब असंवैधानिक और मनमानियों को क्रियान्वित करने की आज्ञा जिन झूठे और ढोंगी ग्रंथों में दी गयी है, उन कथित धर्म ग्रंथों का सरकार और प्रशासन की नाक के नीचे, बल्कि सरकार और प्रशासन के सहयोग से हर दिन कहीं न कहीं और टीवी पर पूरे उत्साह के साथ और सार्वजनिक रूप से पठन-पाठन किया जाता है। इसी प्रकार से दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और स्त्रियों के साथ इतिहास में किये गये अन्याय के मुख्य खलनायकों का भी सार्वजनिक रूप से महिमामंडन किया जाता है।

इस प्रकार तत्काल समाधान हेतु इस देश में यदि आज सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वो है, देश के पच्चीस फीसदी दलितों और आदिवासियों और अड़तालीस फीसदी महिला आबादी को वास्तव में सम्मान, संवैधानिक समानता, सुरक्षा और हर क्षेत्र में पारदर्शी न्याय प्रदान करना और यदि सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वो है-दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को हर दिन धर्म के नाम पर अपमानित, शोषित और उत्पीड़ित किया जाना। यही नहीं इस देश में आज की तारीख में यदि सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न कर रहे हैं और जिन्हें धर्म और संस्कृति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सहयोग प्रदान करते रहते हैं।

अत: हमारे देश में भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर उपरोक्त प्रकार के अन्यायों से देश के शोषित लोगों का ध्यान भटकाया जाता है। असल में आज सबसे बड़ी जरूरत है कि हम इस बात को समझें कि इस देश की तकरीबन नब्बे फीसदी से अधिक आबादी लगातार अभावों में जीने को विवश है। अत: हमें देश के कर्णधारों से इस बात के लिये सवाल करना होगा कि उन्हें देश की बहुसंख्यक आबादी की चिन्ता क्यों नहीं है। यदि जन-आन्दोलनों या बाबा रामदेव जैसों द्वारा योग के नाम पर भटकाया जावे तो इस देश के दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को सबसे पहले उनसे भी उपरोक्त सवाल पूछने चाहिये।

-लेखक : होम्योपैथ चिकित्सक, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिसट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) और संगठित षड़यंत्र के चलते जिला जज ने उम्र कैद की सजा सुनाई, चार वर्ष से अधिक समय चार-जेलों में व्यतीत किया। हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने दोषमुक्त/निर्दोष ठहराया। मोबाइल : 085619-55619, 098285-02666

Sunday, April 28, 2013

भारत का बलात्कार करने वाले लड़ रहे हैं बलात्कार की लड़ाई!

सच तो ये है कि भारत का मतलब है भारत के असली मालिक, जो आज हर क्षेत्र में सबसे निचले पायदान पर वंचित वर्गों में शामिल हैं और इन्हीं वंचित वर्गों के हकों और स्वाभिमान का, हर क्षेत्र में दिनरात बेरोकटोक बलात्कार होता रहता है, जो वास्तव में भारत के साथ बलात्कार है। लेकिन भारत के साथ हजारों सालों से बलात्कार करने वाले इन 15 फीसदी वर्ग के लोगों में शामिल कुछ चालाक और षड़यंत्रकारी आज खुद आम आदमी की टोपी पहनकर और भगवा वस्त्र धारण करके बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करने का नाटक खेल रहे हैं। इस  षड़यंत्र में कॉंग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी बुरी तरह से फंस चुकी है, क्योंकि कॉंग्रेस पार्टी में भी, कॉंग्रेसी चोला धारण किये हुए, इन फासिस्ट और देशद्रोहियों के ऐजेंट नीति-नियन्ता पदों पर पदस्थ हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान मेरे हाथ में है, जो मुझे आम आदमी पार्टी की अजमेर (राजस्थान) की महिला कार्यकर्ता (या पदाधिकारी) मैडम कीर्ति पाठक जी ने मेल के जरिये ये दिखाने के लिये भेजा है, कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ सच में ‘‘आम आदमी’’ की पार्टी है। मैडम कीर्ति जी ने मेरे किसी लेख को पढकर पहले तो बड़े ही संयमित तथा शिष्ट तरीके से मुझसे मोबाइल पर बात की और फिर कहा कि अन्याय के खिलाफ संघर्षरत हम सभी लोगों को एक-दूसरे की कमियों को दिखाने के बजाय ‘‘आम आदमी’’ की परेशानियों के लिये मिलकर आम आदमी की लड़ाई में शामिल होना चाहिये। मैडम कीर्ति जी का कहना था कि इसके लिये ‘‘आम आदमी पार्टी’’ अरविन्द केजरीवाल जी के नेतृत्व में देशभर में अन्याय के खिलाफ संघर्षरत लोगों को एकजुट करके और साथ लेकर आम आदमी की समस्याओं के लिये संघर्ष कर रही है।

मुझे मैडम कीर्ति जी से मोबाइल पर बात करके अच्छा लगा और जब उनकी ओर से मेल के जरिये ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान और ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संकल्प पत्र (विजन डॉक्यूमेंट) मिला तो इस बात की प्रसन्नता हुई कि मैडम कीर्ति जी ने जो वायदा किया उसे पूरा किया। स्वाभावत: मैंने दोनों ही दस्तावेजों को अद्योपान्त बढा। जिस पर विस्तृत प्रतिक्रिया तो फिर कभी, लेकिन फिलवक्त तो देश की राजधानी नयी दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ लोगों के गुस्से के संदर्भ में लिखना असल मकसद है।

नयी दिल्ली में बलात्कार की घटनाओं के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों के दौरान भीड़ में अधिकतर लोगों में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की टोपी पहनने वाले और भाजपा या भाजपा से सम्बद्ध संगठनों का झंडा हाथ में लिये लोगों का टीवी पर दिखना आम बात है। जिससे लगता है कि बलात्कार की सर्वाधिक चिन्ता इन्हीं दो राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं को है। इसके अलावा टेलीवीजन पर खबरों को बेचने वालों को तो बलात्कार की सर्वाधिक चिन्ता सता ही रही है।

आम आदमी पार्टी की टोपी पहने लोग, जिस पर लिखा होता है-‘‘मैं हूँ आम आदमी’’ नयी दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करते नजर आते हैं। जो अपने इस संघर्ष को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिये देशभर के लोगों का गुस्सा दिखलाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते हैं। जिससे टीवी देखने वाला आम आदमी इस भ्रम में पड़ जाता है कि भारत की राजधानी महिलाओं के लिये सुरक्षित नहीं है और महिलाओं की सुरक्षा की सर्वाधिक चिन्ता यदि किसी को है तो ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को है। पहले इस मामले में भाजपा प्रथम स्थान पर हुआ करती थी। अब ‘‘आम आदमी पार्टी’’ ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। यही नहीं ‘‘आम आदमी पार्टी’’ हर उस मामले में आम आदमी के साथ दिखना चाहती है, जिससे वो ये दिखा सके कि वास्तव में आम आदमी की चिन्ता केवल और केवल ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को ही है।

संयोग से ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के सभी बड़े कर्ताधर्ता नयी दिल्ली में या आसपास में रहते हैं और छनछन कर प्राप्त होने वाली खबरों के मुताबिक इस समय देश को अस्थिर करने वाली ताकतें भारत के मीडिया को खरीद चुकी हैं। इसलिये मीडिया फासिस्टवादी और कमजोर लोगों के खिलाफ षड़यन्त्र करने वाली ताकतों का जमकर गुणगान कर रहा है। इन्हीं ताकतों में, ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को शामिल करना मेरी बाध्यता है, क्योंकि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के मुखिया दिल्लीवासियों से बिजली का बिल जमा नहीं करने का आह्वान करते हैं और स्वयं अपने बिजली के बिल सही समय पर जमा करवाते हैं। इस प्रकार आम लोगों को सरकार से लड़ाने का काम करते हैं। यह आम आदमी के साथ ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का खुला षड़यंत्र है।

द्वितीय ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान में इस बात को स्वीकार किया गया है कि-‘‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ वर्गों में शामिल लोग सामाजिक रूप से वंचित समूह हैं। इन वर्गों की आबादी देश की कुल आबादी का पिच्यासी फीसदी बतायी जाती है। अर्थात् इन वंचित समूहों के लोग ही इस देश में असली वंचित और आम आदमी हैं।

अत: देश की पहली प्राथमिकता इन वंचित वर्गों का उत्थान करना होनी चाहिये। ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नजर में भी स्वाभाविक रूप से इन्हीं वंचित समूहों के लोगों को इस देश का ‘‘आम आदमी’’ होना चाहिये और ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के ‘‘नीति-नियन्ता अर्थात् असली कर्ताधर्ता’’ पदों पर भी इन्हीं वंचित समूहों और वर्गों के लोगों का संवैधानिक अधिकार होना चाहिये। अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान में ऐसी सुस्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिये, जिससे कि देश की पिच्यासी फीसदी आबादी के वंचित समूहों, जो हकीकत में देश के ‘‘आम आदमी’’ हैं के हाथों में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की कमान होनी हो। 

लेकिन इस देश के आम आदमी का दुर्भाग्य यहॉं भी उसका साथ नहीं छोड़ता है और आम आदमी के नाम पर बनायी गयी ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान कहता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कुल तीस सदस्य होंगे और इन तीस पदों पर पदस्थ राष्ट्रीय कार्यकारिणी द्वारा ही देशभर में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नीतियों का निर्धारण, नीतियों का संचालन एवं क्रियान्वयन किया जायेगा, लेकिन ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान दूसरी बात यह कहता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नीतियों का निर्धारण करने में इस देश के वंचित समूहों में शामिल ‘‘आम आदमी’’ की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होगी। अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान के अनुसार देश के पिच्यासी फीसदी वंचित समूहों अर्थात् ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ के अधिकतम केवल पांच लोग ही ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा हो सकेंगे।

अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कुल तीस पदों में से पच्चीस पद उन ताकतवर वर्गों के लोगों के पास होंगे, जिनके अन्याय के और शोषण के कारण ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ वर्गों के लोग सामाजिक रूप से वंचित बनाये जा चुके हैं। अर्थात् जो 15 फीसदी शोषक वर्ग पिच्यासी फीसदी लोगों के पिछड़ेपन का कारण हैं, उसी वर्ग के शोषक और अन्यायी लोग आम आदमी के नाम पर ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संचालन करेंगे। केवल यही नहीं, बल्कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान वंचित वर्गों के विरुद्ध यहॉं तक नकारात्मक प्रावधान भी करता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सामाजिक रूप से वंचित उक्त समूहों अर्थात् के देश के 85 फीसदी लोगों का अधिकतम प्रतिनिधित्व 16 फीसदी से अधिक नहीं हो सकेगा और देश की 85 फीसदी आबादी को सामाजिक रूप से वंचित बनाये रखने, उनका शोषण एवं अन्याय करने वाले 15 फीसदी लोगों को ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 84 फीसदी से भी अधिक पदों पर पदस्थ होने का संवैधानिक अधिकार होगा।

इन तथ्यों से इस बात को प्रमाणित करने की जरूरत नहीं रह जाती है कि इस देश की 85 फीसदी आबादी को असमानता, भेदभाव, शोषण और अन्याय का शिकार बनाने के लिये, शेष 15 फीसदी लोग ही जिम्मेदार हैं। जिसमें स्वयं अपने वर्गों की महिलाओं के साथ किये जाने वाले बलात्कारी भी शामिल हैं। 

इससे भी बड़ी सच्चाई तो यह भी है कि देश की 84 फीसदी आबादी के मान-सम्मान, संवैधानिक, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और जीने के अधिकार का हजारों सालों से बलात्कार करने वाले 15 फीसदी लोगों की जैसी मानसिकता वाले लोगों द्वारा इस देश में आम आदमी के नाम पर ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का गठन किया गया है, जो महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कारों के विरुद्ध दिल्ली में घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। जिन्हें न तो आम आदमी के दु:ख दर्दों से कोई सारोकार है और न हीं आम आदमी के दु:ख दर्दों की कोई पीड़ा है।

सच तो ये है कि भारत का मतलब है भारत के असली मालिक, जो आज हर क्षेत्र में सबसे निचले पायदान पर वंचित वर्गों में शामिल हैं और इन्हीं वंचित वर्गों के हकों और स्वाभिमान का, हर क्षेत्र में दिनरात बेरोकटोक बलात्कार होता रहता है, जो वास्तव में भारत के साथ बलात्कार है। लेकिन भारत के साथ हजारों सालों से बलात्कार करने वाले इन 15 फीसदी वर्ग के लोगों में शामिल कुछ चालाक और षड़यंत्रकारी आज खुद आम आदमी की टोपी पहनकर और भगवा वस्त्र धारण करके बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करने का नाटक खेल रहे हैं। इस  षड़यंत्र में कॉंग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी बुरी तरह से फंस चुकी है, क्योंकि कॉंग्रेस पार्टी में भी, कॉंग्रेसी चोला धारण किये हुए, इन फासिस्ट और देशद्रोहियों के ऐजेंट नीति-नियन्ता पदों पर पदस्थ हैं।

-लेखक : होम्योपैथ चिकित्सक, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिसट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन और राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास), मोबाइल : 085619-55619, 098285-02666 

Friday, January 11, 2013

एसपी राजेश मीणा तो एक बहाना है! असली मकसद तो मीणा आदिवासियों को मिटाना है!!

मनुवादी किसी भी सूरत में आदिवासियों को ताकतवर होते हुए नहीं देख सकते हैं| उनके लिये यह असहनीय हो रहा है कि राजस्थान का पुलिस महा निदेशक एक आदिवासी अर्थात् मीणा है| जिसे बदनाम करने के लिये पुलिस को भ्रष्ट दिखाना और वो भी उसी की जाति के राजेश मीणा को भ्रष्टाचार और घूसखोर सिद्ध करना, क्या किसी की समझ में नहीं आ रहा है? केवल इतना ही नहीं राजस्थान की राज्यपाल पुलिस महानिदेशक को बुलाकर कहती हैं कि राज्य में स्त्रियों पर अत्याचार और पुलिस में भ्रष्टाचार बढ रहा है| ये बात गृह मंत्री की ओर से भी कही जा सकती थी, लेकिन जानबूझकर पुलिस महानिदेशक को दबाव में लाने और इस खबर को मीडिया के जरिये जनता के समक्ष लाने की सरकार की नीति को मीणा जनजाति के लोगों को समझना होगा और साथ ही इस बात को भी समझना होगा कि केवल बड़े बाबू बनने या एक पार्टी छोड़कर सत्ताधारी पार्टी का दामन थामकर लाल बत्ती प्राप्त कर लेने मात्र से आदिवासियों का उत्थान नहीं हो सकता! आदिवासी समाज की सेवा करनी है तो लालबत्ती नहीं, आदिवासियों की हरियाली की वफादारी की भावना को जिन्दा रखना होगा|

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पिछले दिनों राजस्थान के अजमेर जिले के पुलिस अधीक्षक पद पर तैनात राजेश मीणा को कथित रूप से अपने ही थानेदारों से वसूली करते हुए राजस्थान के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने दलाल के साथ रंगे हाथ पकड़ा गया | यह कोई पहली घटना नहीं है, जिसमें किसी लोक सेवक को रिश्‍वत लेते हुए पकड़ा गया हो! हर दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी लोक सेवक को रिश्‍वत लेते पकड़ा ही जाता रहता है| ऐसे में किसी को रिश्‍वत लेते पकड़े जाने पर, किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये| सरकार और प्रशासन अपने-अपने काम करते ही रहते हैं| इसी दिशा में हर एक राज्य का भ्रष्टाचार निरोधक विभाग भी अपना काम करता रहता है| इसी क्रम में राज्य की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो भी अपना काम कर ही रही है|

सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि जिस दिन से राजेश मीणा को कथित रूप से घूस लेते हुए पकड़ा है, उसी दिन से स्थानीय समाचार-पत्रों में इस खबर को इस प्रकार से प्रसारित और प्रचारित किया जा रहा है, मानो केवल मीणा जनजाति के सम्पूर्ण अधिकारी और कर्मचारी ही चोर हैं, बाकी सारे के सारे दूध के धुले हुए हैं| राजस्थान की मीणा जनजाति सहित सारे देश के सम्पूर्ण जनजाति समाज में इस बात को लेकर भयंकर रोष व्याप्त है| रोष व्याप्त होने का प्रमुख कारण ये है कि राजेश मीणा की मीडिया ट्रायल की जा रही है, जबकि दक्षिणी राजस्थान में अपनी मजदूरी मांगने जाने वाले एक आदिवासी मीणा के उच्च जाति के एक ठेकेदार द्वारा सरेआम हाथ काट दिये जाने की सही और क्रूरतम घटना को सही तरह से प्रकाशित और प्रसारित करने में इसी मीडिया को अपना धर्म याद नहीं रहा|

इसके अलावा पिछले दिनों दलित परिवार के दो नवविवाहिता जोड़ों को मन्दिर से धक्के मारकर भगा देने की घटना को इसी मीडिया द्वारा जानबूझकर दबा दिया गया| भ्रूण हत्या के आरोपों में पकड़े जाने वाले उच्च जातीय डॉक्टरों के रंगे हाथ पकड़े जाने के उपरान्त भी खबर को अन्दर के पन्नों पर दबा दिया जाता है| जब पिछड़े वर्ग से आने वाले राजनेता महीपाल मदेरणा का प्रकरण सामने आया तो उसकी भी जमकर मीडिया ट्रायल की गयी| जबकि दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों के विरुद्ध होने वाले अपराधों में पकड़े जाने वाले मनुवादी अपराधियों के क्रूर और घृणित अपराधों को जानबूझकर मीडिया द्वारा और प्रशासन द्वारा दबा दिया जाता है|

इन सब बातों का साफ और सीधा मतलब है कि चाहे कानून और संविधान कुछ भी कहता हो जो भी जाति या व्यक्ति मनुवादी व्यवस्था से टकराने का प्रयास करेगा उसे निपटाने मे मनुवादी मीडिया और प्रशासन एवं सत्ता पर काबिज मनुवादी कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे| महीपाल मदेरणा और राजेश मीणा दोनों ही मामलों में मनुवादियों की ओर से पिछड़ों और आदिवासियों को यही संकेत दिया गया है| 

राजस्थान में मीणा जाति के बच्चे कड़ा परिश्रम करते हैं| उनके माता-पिता कर्ज लेकर, अपने बच्चों को जैसे-तैसे पढा-लिखाकर योग्य बनाते हैं| जब वे अफसर या कर्मचारी नियुक्त होते हैं तो उस वर्ग की आँखों में खटकने लगते हैं, जो सदियों से मलाई खाता आ रहा है और आज भी सत्ता की असली ताकत उसी के पास है| जबकि जानबूझकर के मीणा जनजाति को बदनाम किया जा रहा है और अफवाह फैलायी जाती है कि मीणा सभी विभागों में और सभी क्षेत्रों में भरे पड़े हैं| जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है|

राजस्थान में आजादी से आज तक एक भी दलित या आदिवासी वकील को, वकीलों के लिये निर्धारित 67 फीसदी वकील कोटे से हाई कोर्ट का एक भी जज नियुक्त नहीं किया गया| इसका अर्थ क्या ये लगाया जाये कि दलित-आदिवासी वकील हाई कोर्ट के जज की कुर्सी पर बैठने लायक नहीं हैं या हाई कोर्ट के जज की कुर्सी दलित-आदिवासियों के बैठने से अपवित्र होने का खतरा है या दलित-आदिवासियों को जज नियुक्त करने पर मनुवादियों को खतरा है कि उनकी मनमानी रुक सकती हैं| कारण जो भी हो, लेकिन राजस्थान हाई कोर्ट में अपवादस्वरूप पदोन्नति कोटे से एक मात्र यादराम मीणा के नाम को छोड़ दिया जाये तो आजादी के बाद से एक भी व्यक्ति सरकार को या जज नियुक्त करने वाले लोगों को ऐसा नजर नहीं आया, जिसे जज के पद पर नियुक्त किया जा सकता!

मीणा क्यों बहुतायत में दिखते हैं? इस बात को भी समझ लेना जरूरी है| चूँकि आदिवासी वर्ग के लोग सरल व भोली प्रवृत्ति के होते हैं, इस कारण वे मनुवादियों की जैसी चालाकियों से वाकिफ नहीं होते हैं और इसी का नुकसान राजस्थान की आदिवासी मीणा जनजाति के लोगों को उठाना पड़ रहा है| सबके सब अपने नाम के आगे ‘मीणा’ सरनैम लिखते हैं| जिसके चलते सभी लोगों को हर एक क्षेत्र में मीणा ही मीणा नजर आते हैं| यदि मीणा अपने गोत्र लिखने लगें, जैसे कि-मरमट, सेहरा, मेहर, धणावत, घुणावत, सपावत, सत्तावत, जोरवाल, बारवाड़, बमणावत आदि तो क्या किसी को लगेगा कि मीणा जाति के लोगों की प्रशासन में बहुतायत है, लेकिन अभी भी मीणा जनजाति के लोगों को इतनी सी बात समझ में नहीं आ पायी है|

यह तो एक बड़ा और दूरगामी सवाल है, जिस पर फिर कभी चर्चा की जायेगी| लेकिन फिलहाल राजस्थान की मजबूत और ताकतवर कही जाने वाली मीणा जनजाति की नौकरशाही को इस बात को समझना होगा कि वे इस मुगालते में नहीं रहें कि वे बड़े बाबू बन गये तो उन्होंने कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मार लिया है| क्योंकि सारा देश जानता है कि राजस्थान की ही नहीं, बल्कि सारे देश की पुलिस व्यवस्था अंग्रेजों की बनायी पटरी पर चल रही है| जिसके तहत प्रत्येक पुलिस थाने की बोली लगती है| थानेदार उगाही करके एसपी को देता है और एसपी ऊपर पहुँचाता है, जिसको अंतत: सत्ताधारी पार्टी को पहुँचाया जाता है| हर विभाग में इस तरह की उगाही होती है| पिछले दिनों एक एक्सईएन बतला रहे थे कि राजस्थान का प्रत्येक एक्सईन अपने चीफ इंजीनियर को हर माह पचास हजार रुपये पहुँचाता है, जिसमें से सीएमडी के पास से होते हुए हर माह मोटी राशी सरकार के पास पहुँचायी जाती है|

कहने का तात्पर्य यह है कि सरकारें स्वयं अफसरों से उगाही करवाती हैं और जब कभी कोई अफसर या अफसरों का कोई धड़ा नियम कानून या संविधान के अनुसार काम करने लगता है तो वही सरकार एक पल में ऐसे अफसरों को उनकी औकात दिखा देती है| कौन नहीं जानता कि किस-किस राजनेता का चरित्र कैसा है, लेकिन महीपाल मदेरणा को ठिकाने लगाना था तो लगा दिया| इसी प्रकार से जाट जाति के बाद राजस्थान में दूसरी ताकतवर समझी जाने वाली मीणा जनजाति के अफसरों को ठिकाने लगाने की राजेश मीणा से शुरूआत करके मीणा जाति के सभी अफसरों और कथित मीणा मुखियाओं को सन्देश दिया गया है कि यदि किसी ने अपनी आँख दिखाने का साहस किया तो उसका हाल राजेश मीणा जैसा होगा|

जहॉं तक इस प्रकार के मामले को मीडिया द्वारा उछाले जाने की बात है तो कोई भी नागरिक सूचना के अधिकार के तहत सरकार से पूछ सकता है कि उसकी ओर से किस-किस समाचार-पत्र को कितने-कितने करोड़ के विज्ञापन दिये गये हैं| जिन अखबारों को हर माह करोड़ों रुपये के विज्ञापन सरकार की ओर से भेंटस्वरूप दिये जाते हैं, उन समाचार-पत्रों की ओर से सरकार का हुकम बजाना तो उनका जरूरी धर्म है|

आजकल मीडिया व्यवसाय हो गया है| जिस पर भारत में केवल और केवल मनुवादियों का कब्जा है| मनुवादी किसी भी सूरत में आदिवासियों को ताकतवर होते हुए नहीं देख सकते हैं| उनके लिये यह असहनीय हो रहा है कि राजस्थान का पुलिस महानिदेशक एक आदिवासी अर्थात् मीणा है| जिसे बदनाम करने के लिये पुलिस को भ्रष्ट दिखाना और वो भी उसी की जाति के राजेश मीणा को भ्रष्टाचार और घूसखोर सिद्ध करना, क्या किसी की समझ में नहीं आ रहा है? केवल इतना ही नहीं राजस्थान की राज्यपाल पुलिस महानिदेशक को बुलाकर कहती हैं कि राज्य में स्त्रियों पर अत्याचार और पुलिस में भ्रष्टाचार बढ रहा है| ये बात गृह मंत्री की ओर से भी कही जा सकती थी, लेकिन जानबूझकर पुलिस महानिदेशक को दबाव में लाने और इस खबर को मीडिया के जरिये जनता के समक्ष लाने की सरकार की नीति को मीणा जनजाति के लोगों को समझना होगा और साथ ही इस बात को भी समझना होगा कि केवल बड़े बाबू बनने या एक पार्टी छोड़कर सत्ताधारी पार्टी का दामन थामकर लाल बत्ती प्राप्त कर लेने मात्र से आदिवासियों का उत्थान नहीं हो सकता! आदिवासी समाज की सेवा करनी है तो लालबत्ती नहीं, आदिवासियों की हरियाली की वफादारी की भावना को जिन्दा रखना होगा| एसपी राजेश मीणा तो एक बहाना है! असली मकसद तो मीणा आदिवासियों को मिटाना है|