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Tuesday, November 25, 2014

जन्मजातीय ईश्वरीय शक्ति से सम्पन्न आर्य श्रृष्टि के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य हैं!

जन्मजातीय ईश्वरीय शक्ति से सम्पन्न आर्य श्रृष्टि के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य हैं!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

केंद्र में भाजपा के स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के सत्तासीन होने के बाद नेट के चार्जेज लगातार बढ़ रहे हैं! क्यों इस सवाल को कोई भी (यानी मीडिया) किसी से भी (यानी सरकार से) नहीं पूछ रहा! क्यों नहीं पूछ रहा इस बारे में हम आम लोग भी चुप हैं, क्योंकि शायद हम को भी कुछ पता नहीं!

मगर बहुतों को पता भी है-चुनाव में अनाप-सनाप विदेशी पैसा, देशी मीडिया को भेंट करके नए नए जुमलों और सपनों को बेचकर जनता को जमकर गुमराह किया गया। अब अपरोक्ष रूप से धन भेजने वाले विदेशियों द्वारा सरकार की मौन स्वीकृति से नेट दरें बढ़ा दी गई तो देशी मीडिया बदले में देशी-विदेशी सभी के प्रति अपना आपसी बन्दर बाँट का धर्म चुका कर मौन साधे हुए है!

इसका सीधा असर सरकारी खर्चे (जनता की कमाई) पर नेट चलाने वाले अफसरों, धनी लोगों और काले धन के मालिकों पर कुछ नहीं होगा, मगर वंचित, पिछड़े, दलित, आदिवासी वर्गों के जागरूक लोगों और विशेषकर युवा पीढ़ी को सोशल मीडिया से दूर रखने का ये घुमा फिराकर एक उलटा-सीधा, गैर सरकारी, सरकारी हथकंडा है।

मगर इन मूर्खों को नहीं पता कि ये अपनी अमानवीय मनुवादी विचारधारा को भी तो इसी सोशल मीडिया के मार्फ़त ही तो निम्न तबकों में फ़िर से फैला रहे हैं। यदि वंचित, पिछड़े, दलित, आदिवासी वर्गों को सोशल मीडिया से दूर रहने को मजबूर किया गया तो उस अमानवीय मनुवादी विचारधारा को चासनी में लपेटकर पिलाने वाली (कु) नीति का क्या हश्र होगा? 

ओहो सॉरी....... भूल हो गयी अब इन भू-देवों को सोशल मीडिया की कहाँ जरूरत रह गयी है? अब तो ये देश के मालिक हैं!

अब तो पेड इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के मार्फ़त ही जनता के धन से अपनी विचारधारा आसानी से परोसी जा सकेगी।

जैसा कि पिछले दिनों मानवता के विरोधी मनु की आदमकद मूर्ति की छत्र छाया में संचालित राजस्थान हाई कोर्ट परिसर में "सामाजिक न्याय" के नाम पर आयोजित सेमीनार में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री की मौजूदगी में संविधान को धता बताते हुए असंवैधानिक आर्थिक आरक्षण को मंत्री सहित सभी ने सामाजिक न्याय की जरूरत और समानता का आधार बताया गया। लच्छेदार भाषण दिए गए और आर्यों के मनुवादी मीडिया द्वारा इसे बेशर्मी से प्रकाशित किया गया! मगर किसी भी कथित बुद्धिजीवी (आर्य या अनार्य) ने एक शब्द इस बारे में नहीं लिखा कि ये कौनसा सामाजिक न्याय है?

अब राम राज्य आने वाला है। बल्कि आ ही गया है!
अभी से ही अनेक उदाहरण दिख रहे है-

आर्य मनुवादियों के हजारों सालों के अन्याय, भेदभाव और शोषण से शोषित और वंचित अनार्यों (विशेषकर दलित, आदिवासी और पिछड़ों) को सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकार देने की संवैधानिक जिम्मेदारी का नाटक करने को मजबूर राजस्थान सरकार में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का मंत्री एक ब्राह्मण आर्य को बना रखा है!

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के सचिव रघुवीर मीणा (आदिवासी) को समता आंदोलन समिति (जो संघ के निर्देश से काम करती है) की छोटी सी निराधार शंका पर राज्य सरकार (जो संघ के आशीर्वाद से काम करती है) ने तत्काल हटा दिया गया। आज वही अन्यायी लोग इस मंत्रालय को संचालित कर रहे हैं, जिनके अन्याय और विभेद से से बचने के लिए यह मंत्रालय संयुक्त राष्ट्र संघ से दबाव में तत्कालीन सरकार गठित किया गया था। मगर पूर्व में इस विभाग का मंत्री कोई दलित या आदिवासी ही हुआ करता था!

भाजपा सांसद साक्षी महाराज घोषणा कर चुके हैं कि-

"राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ" वर्तमान युग का भगवान हैं। 

संघ के हिन्दू मुखोटे विश्व हिन्दू परिषद के गिरिराज किशोर सिंघल (बनिया आर्य) नरेंद्र मोदी (बनिया आर्य) को आठ सौ साल के बाद में भारत का पहला स्वाभिमानी हिन्दू शासक प्रमाणित कर चुके हैं! 

उनकी नजर में अटल बिहारी वाजपेयी स्वाभिमानी हिन्दू नहीं, क्योंकि (शायद) अटल खुलकर मनुवाद का समर्थन नहीं करता था ! या इसलिए कि अटल बिहारी वाजपेयी नरेंद्र मोदी (आठ सौ साल के बाद में भारत का पहला स्वाभिमानी हिन्दू शासक जो तब का गुतरात का मुख्यमंत्री था) को शासन धर्म निभाने में असफल बताने की गलती कर बैठा था?

जब आज के युग के भगवान संघ से आशीर्वाद से संचालित सरकार को संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों और मूल निवासियों के पक्ष में किये गए संवैधानिक प्रावधानों की तक परवाह नहीं तो उनके लिए नैट के दाम बढ़ाना कौनसी बड़ी बात है? आखिर-
आर्य श्रृष्टि के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य हैं!
साक्षात ईश्वर के अवतार हैं!
कुछ भी कहने और करने को जन्मजातीय ईश्वरीय शक्ति से सम्पन्न हैं!
संविधान की क्या औकात जो वे इसका पालन करें?

Monday, April 28, 2014

फ़िक्सिंग का शिकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ?

-तनवीर जाफ़री-  

भारतीय संविधान में हालांकि मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में कहीं कोई मान्यता नहीं दी गई है। उसके बावजूद मीडिया ने स्वयं को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में प्रचारित कर रखा है। और यह ‘भ्रांति’ समाज में धीरे-धीरे एक स्वीकार्य रूप भी धारण कर चुकी है। आज पूरा देश और दुनिया मीडिया के विभिन्न माध्यमों अखबार, पत्रिका, रेडियो, टीवी आदि के माध्यम से प्राप्त होने वाले समाचारों, घटनाओं तथा विशेषण आदि पर य$कीन करती है। परंतु जिस प्रकार राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वयं को निष्पक्ष कहने वाला यही मीडिया पक्षपातपूर्ण होता दिखाई दे रहा है, या यूं कहें कि क्रिकेट मैच की तरह ‘फ़िक्सिंग का शिकार होता नज़र आ रहा है उसे देखकर यही संदेह होने लगा है कि मीडिया वास्तव में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने योग्य है भी या नहीं?

पिछले कुछ वर्षों से भारत में मीडिया के शीर्ष पदों पर बैठे तथा मीडिया जगत में अपनी अलग पहचान रखने वाले कुछ पत्रकारों के ऐसे फोन टेप उजागर हुए जिनसे यह पता चला कि मीडिया महारथी केवल खबरें ही जनता तक नहीं पहुंचाते, बल्कि केंद्र सरकार में वे अपनी ज़बरदस्त घुसपैठ रखने की क्षमता भी रखते हैं। कॉरपोरेट घरानों की पैरवी से लेकर केंद्रीय मंत्रीमंडल में किसी व्यक्ति को शामिल करने न करने जैसे देश के अतिमहत्वपूर्ण मामलों में भी इनका निर्णायक दखल है। कुछ खबरें ऐसी भी हैं कि मीडिया हाऊस पर अपनी मज़बूत पकड़ रखने वाले देश के कई जाने-माने पत्रकार बहुत ही कम समय में अकूत संपत्ति के मालिक बन चुके हैं। और तो और अब तो यह भी देखा जा रहा है कि यदि मीडिया ने किसी बाहुबली, धनाढ्य या उद्योगपति से संबंधित किसी नकारात्मक खबर को लेकर उसकी पगड़ी उछाली तो आनन-फ़ानन में वह व्यक्ति खुद ही अपना निजी मीडिया हाऊस खोल बैठता है। और मीडिया बिरादरी में शामिल होकर न केवल अपनी इज़्ज़त बचाने की कोशिश करने लग जाता है बल्कि इसके बहाने अपने प्रतिद्वंद्वियों पर भी मनमाने तरीके से निशाना साधने लग जाता है। कौन सा अखबार, पत्र-पत्रिका अथवा रेडिया या टीवी चैनल किसी व्यक्ति अथवा विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा है, आम जनता इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ रहती है।

इन दिनों एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को लेकर कुछ ऐसा ही दृश्य देखा जा रहा है। जो नरेंद्र मोदी करण थापर तथा विजय त्रिवेदी जैसे पत्रकारों के सवालों के जवाब देने से कतराते नज़र आ चुके हैं, स्टूडियो में साक्षात्कार छोडक़र अपनी पीठ दिखाते नज़र आए थे और आज भी जो नरेंद्र मोदी संवाददाता सम्मेलनों से मुंह छिपाते फिर रहे हैं। बड़े ही रहस्यमयी तरीके से इंडिया टीवी जैसे चैनल के आप की अदालत नामक कार्यक्रम में रजत शर्मा के माध्यम से जनता से मुखातिब होते दिखाई दे रहे हैं। वैसे तो रजत शर्मा स्वयं को अपने ही मुंह से इतना बड़ा पत्रकार तथा बातों-बातों में पत्रकारिता के क्षेत्र का इतना बड़ा ज्ञानी बताते हैं, गोया उनके अतिरिक्त और उनसे महान देश में कोई दूसरा पत्रकार ही न हो। परंतु 2014 के लोकसभा चुनाव के परिपेक्ष्य में यह टीवी चैनल अपनी जो पक्षपातपूर्ण भूमिका निभा रहा है उसे देखकर मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहना तो दूर कोई इसे निष्पक्ष तक नहीं स्वीकार कर सकता। इंडिया टीवी ने तो गोया नरेंद्र मोदी का गुणगान करने तथा अरविंद केजरीवाल व उनकी आम आदमी पार्टी में खा़मियां निकालने का ठेका ले रखा है।

पिछले दिनों आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह ने एक प्रेस वार्ता के दौरान इंडिया टीवी न्यूज़ चैनल पर पक्षपातपूर्ण होने का आरोप लगाया। हालांकि उसके बाद वे अपनी बात से मुकर भी गए तथा यह कहा कि उन्होंने इंडिया टीवी का नाम गलती से ले लिया था। परंतु उस घटना के बाद तो रजत शर्मा व उनका टीवी चैनल मीडिया के निष्पक्ष दायित्व निभाने की बात को भूल कर हाथ धोकर न सिर्फ आम आदमी पार्टी के पीछे पड़ गया है बल्कि साथ-साथ नरेंद्र मोदी की छवि चमकाने का गोया ठेका भी ले लिया है। आप की अदालत में रजत शर्मा ने अरविंद केजरीवाल को भी आमंत्रित किया था। परंतु उनके समक्ष रजत शर्मा की एक ऐसी प्रश्रावली थी जैसे कोई पत्रकार नहीं बल्कि केजरीवाल का धुर विरोधी उनसे प्रश्न पूछ रहा हो। यहां तक कि केजरीवाल द्वारा सही व संतोषजनक उत्तर दिए जाने के बावजूद उन्हें उलझाने की पूरी कोशिश की जाती रही। उधर केजरीवाल की ही आप की अदालत में दर्शकों का भी ऐसा समूह बिठाया गया था जो केजरीवाल की बातों पर तालियां कम बजाता था उन्हें ‘हूट’ अधिक करता था। साफ़ नज़र आ रहा था कि अरविंद केजरीवाल आप की अदालत में किसी पूर्वाग्रही पत्रकार के जाल में फंस गए हों।

परंतु नरेंद्र मोदी की इसी आप की अदालत कार्यक्रम में मौजूदगी तथा उनका साक्षात्कार शत-प्रतिशत ऐसा प्रतीत हो रहा था गोया इस कार्यक्रम में मौजूद सभी दर्शक भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता अथवा समर्थक हैं। उधर रजत शर्मा की तरकश में सवालों के भी ऐसे तीर थे जिनमें केजरीवाल की प्रश्नावली की तरह, न तो नोक थी, न ही वैसी धार। अनेक ऐसे प्रश्न जो नरेंद्र मोदी से संबंधित हैं और देश की जनता नरेंद्र मोदी से ही इन विषयों पर कुछ सुनना चाहती है ऐसे कोई प्रश्न रजत शर्मा द्वारा नरेंद्र मोदी से नहीं पूछे गए। उदाहरण के तौर पर अरविंद केजरीवाल द्वारा सार्वजनिक रूप से नरेंद्र मोदी से पूछा जा रहा यह प्रश्न कि वे जिस हवाई जहाज़ का प्रयोग चुनाव में कर रहे हैं वह किस का है और किस शर्त पर वह उसे प्रयोग कर रहे हैं? यह सवाल नहीं किया गया। अरविंद केजरीवाल द्वारा उठाए जा रहे गैस की क़ीमतें बढ़ाने संबंधी प्रश्न नरेंद्र मोदी से नहीं पूछा गया। येदियुरप्पा, श्री रामलूलु जैसे नेताओं के भाजपा में रहते हुए भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने के दावे पर कोई सवाल नहीं? अमित शाह की आपराधिक कारगुज़ारियों तथा उस जैसे व्यक्ति को जिसे कि गृहमंत्री होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया हो उसे यूपी जैसे प्रमुख राज्य का प्रभारी बनाए जाने का कारण व रहस्य संबंधी कोई सवाल नहीं? स्वयं नरेंद्र मोदी का नाम एक महिला की जासूसी से जुड़ा था, इस विषय पर इंडिया टीवी अथवा रजत शर्मा की प्रश्रावली में कोई प्रश्न नहीं? आप की अदालत देश की जनता के मन में उठने वाला इतना बड़ा प्रश्न तक नहीं पूछ सकी कि श्रीमान जी तथाकथित रूप से अपनी सुनामी की लहर होने के बावजूद आख़िर आप दो सीटों से चुनाव क्यों लड़ रहे हैं? देश यह जानने का भी इच्छुक है कि देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाला व्यक्ति शादी के बाद अपनी पत्नी को क्यों छोड़ गया? पर रजत शर्मा के लिए यह कोई सवाल नहीं। धीरू भाई अंबानी के विदेशी खातों के विषय पर कोई प्रश्न नहीं। बाबू भाई बोखारिया जैसे व्यक्ति जिसे खदान घोटाले में सज़ा हो चुकी है वह मोदी के मंत्रिमंडल का सदस्य है इस विषय पर रजत शर्मा की प्रश्रावली में कोई जगह नहीं। 400 करोड़ रुपये के मछली घोटाले का आरोपी पुरुषोत्तम सोलंकी, मोदी मंत्रिमंडल सदस्य कैसे यह कोई सवाल नहीं? दीनू भाई सोलंकी जो कि आरटी आई कार्यकर्ता अमित जेठवा के क़त्ल का मुख्य आरोपी है तथा अवैध माईनिंग व्यापार का माफ़िया सरगना है एवं विठल रदाडिय़ा जैसे व्यक्ति जिसपर डकैती जैसे कई आपराधिक केस चल रहे हैं उनके भाजपा का सांसद व नेता रहते हुए भ्रष्टाचार व अपराधमुक्त राजनीति की कल्पना कैसे? इस विषय पर भी कोई सवाल नहीं? गुजरात दंगों तथा राजधर्म निभाने जैसी बातों को तो अलग ही छोड़ दीजिए परंतु उपरोक्त कई प्रश्न निश्चित रूप से ऐसे थे जिन्हें कि किसी भी निष्पक्ष पत्रकार को अपनी प्रश्रावली में शामिल करने चाहिए। परंतु रजत शर्मा ने इन सवालों को शामिल नहीं किया बल्कि ठीक इसके विपरीत वे ‘दुम हिलाने’ की मुद्रा में नरेंद्र मोदी से प्रश्न पूछते दिखाई दिए तथा पूरा स्टूडियो मोदी-मोदी का गुणगान करते नज़र आया। किसी फ़िक्स कार्यक्रम का इससे बड़ा दूसरा उदाहरण देखने को नहीं मिल सकता।

इंडिया टीवी पर प्रसारित हुए इस कार्यक्रम आप की अदालत के फौरन बाद इस मीडिया हाऊस के संपादकीय सलाहकार तथा देश की पत्रकारिता की एक जानी-मानी निष्पक्ष हस्ती कमर वाहिद नक़वी ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। देश के और भी कई ऐसे वरिष्ठ पत्रकार तथा संपादक स्तर के अनेक लोग हैं जो मीडिया घरानों की इस फ़िक्सिंग व पक्षपातपूर्ण रवैये से बेहद दु:खी है।

स्त्रोत : प्रवक्ता 

Monday, August 12, 2013

दुर्गा शक्ति के बहाने ताकतवर होती आईएएस लॉबी

"हमें हजारों सालों से एक ही बात सिखायी गयी है कि उच्च वर्ग और शासक वर्ग कभी गलत नहीं होता, उसे कभी बड़ी सजा नहीं दी जा सकती और छोटे लोग या निम्न वर्ग सेवा करने, सजा पाने और देश के कानून को तथा सत्ताधारियों व सत्ता के दलालों के हर आदेश को मानने के लिये पैदा हुए हैं।" "ये मनोभाव आज भी इस देश के लोगों के अवचेतन में विद्यमान है और यही रुग्ण मानसिकता, अनेक प्रकार के शोषण एवं विभेद के लिये जिम्मेदार है। जब तक इस मानसिकता को पैदा करने वाले कारकों को शक्ति से नहीं बदला जायेगा दुर्गा शक्ति नागपाल जैसियों के बहाने आईएएस अधिक ताकतवर होते रहेंगे और कमजोर वर्ग शोषण का शिकार होता रहेगा।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा युवा आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित कर दिये जाने के मुद्दे को कॉर्पोरेट तथा धनाढ्य वर्ग के चंगुल में कैद मीडिया द्वारा जमकर उछाला गया है। इस मुद्दे के बहाने मीडिया व हितबद्ध लोगों द्वारा तरह-तरह की चर्चाएँ और परिचर्चाएँ आयोजित और सम्पन्न करवायी गयी। प्रिंट और सोसल मीडिया पर कई सौ आलेख इस विषय पर लिखे जा चुके हैं। इस मुद्दे को प्रचारित करने का आधार ये बताया जा रहा है कि दुर्गा शक्ति नागपाल नाम की ये निलम्बित आईएएस ईमानदार बतायी जाती हैं और इन्होंने कथित रूप से माफिया से टक्कर लेने की कौशिश की। जबकि उत्तर प्रदेश की सरकार का पक्ष है कि रमजान के पवित्र महिने में इस्लाम के अनुयाईयों की ओर से किये जा रहे मस्जिद की निर्माण में व्यवधान डालने का प्रयास करके दुर्गा शक्ति नागपाल ने कथित रूप से सामाजिक सौहार्द और शान्ति को भंग करने का प्रयास किया।

इस मुद्दे को जहॉं एक ओर तो देश की आईएएस लॉबी ने अपनी आन-बान और शान से जोड़ दिया है, वहीं दूसरी और इस देश की संस्कृति, ईमानदारी, चाल, चरित्र और सभी सामाजिक मूल्यों की ठेकेदारी करने वाली सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक ताकतों ने इसे इस प्रकार से उछालने का प्रयास किया है, मानो दुर्गा शक्ति नागपाल के निलम्बन से आसमान टूट पड़ा हो और मानो इससे देश का सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और ईमानदारी का ढांचा ही बिखर जायेगा। इन ताकतों का मानना है कि इस देश के प्रबुद्ध वर्ग का नेतृत्व आईएएस करता है और वही देश को सही दिशा दे सकता है। इसलिये हर हाल में आईएएस का सम्मान होना चाहिये और आईएएस चाहे कुछ भी करे, उसे स्थानान्तरित किये जाने से बड़ी कोई सजा दी ही नहीं जानी चाहिये।

अन्यथा क्या कारण है कि गुजरात के आईपीएस संजीव भट्ट के साथ कोई क्यों खड़ा नहीं हुआ और प्रतिदिन कई सौ छोटे कर्मचारी कठोर श्रम करने के बाद भी अपनी ईमानदारी और संविधान के प्रति निष्ठा के चलते हुए भी आईएएस और पीएसएसी अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किये जा रहे हैं, लेकिन उनके साथ कोई खड़ा नहीं होता है। उनके साथ होने वाला अन्याय कोई अन्याय नहीं और दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित किया जाना देशभर में इस प्रकार से चर्चा का विषय बना दिया गया है, मानो दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ कोई भयंकर अमानवीय दुर्व्यवहार या दुर्घटना हो गयी है।

स्वयं सुप्रीम कोर्ट अनेक बार कहा चुका है कि "निलम्बन कोई सजा नहीं है। अत: निलम्बन को चुनौती नहीं दी जा सकती।" हॉं ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट के ऐसे निर्णय उन छोटे कर्मचारियों को राहत नहीं देते हुए सुनाये जाते रहे हैं, जिनमें राज्य लोक सेवा आयोग और संघ लोक सेवा आयोग के उत्पाद महामानव, महान विभूतियों द्वारा मनमाने तरीके से छोटे कर्मचारियों का निलम्बन किया जाता रहा है, ऐसे में दुर्गा शक्ति नागपाल के मामले में आने वाले समय में स्वयं सुप्रीम कोर्ट भी मीडिया की भॉंति अपना नया "विपरीत रुख" अपना ले तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट हड़ताल करने को असंवैधानिक घोषित करने के बाद भी ओबीसी वर्ग को संविधान में वर्णित सामाजिक न्याय की अवधारणा के अनुसार उच्च शिक्षण संस्थानों में, ओबीसी की जनसंख्या से बहुत कम फीसदी आरक्षण दिये जाने के सरकारी आदेश के विरुद्ध, उच्च वर्ग के डॉक्टरों द्वारा विरोध स्वरूप, गैर कानूनी तरीके से की गयी हड़ताल को, सुप्रीम कोर्ट अपने पिछले आदेश की अनदेखी करते हुए न मात्र संवैधानिक ठहरा चुका है, बल्कि केन्द्र सरकार को निर्देश भी दे चुका है कि हड़ताली डॉक्टरों को हड़ताल की अवधि का वेतन दिया जावे।

ऐसे में "आईएएस अधिकारी का निलम्बन भी सुप्रीम कोर्ट को सजा नजर आ जाये तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये!" जिसका सबसे बड़ा कारण यही है कि "हमें हजारों सालों से एक ही बात सिखायी गयी है कि उच्च वर्ग और शासक वर्ग कभी गलत नहीं होता, उसे कभी बड़ी सजा नहीं दी जा सकती और छोटे लोग या निम्न वर्ग सेवा करने, सजा पाने और देश के कानून को तथा सत्ताधारियों व सत्ता के दलालों के हर आदेश को मानने के लिये पैदा हुए हैं।" "ये मनोभाव आज भी इस देश के लोगों के अवचेतन में विद्यमान है और यही रुग्ण मानसिकता, अनेक प्रकार के शोषण एवं विभेद के लिये जिम्मेदार है। जब तक इस मानसिकता को पैदा करने वाले कारकों को शक्ति से नहीं बदला जायेगा दुर्गा शक्ति नागपाल जैसियों के बहाने आईएएस अधिक ताकतवर होते रहेंगे और कमजोर वर्ग शोषण का शिकार होता रहेगा।

Sunday, April 7, 2013

मीडिया मैनेजमेंट की उपज है नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय कद !

मीडिया मैनेजमेंट की उपज है नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय कद!
मोदी को भाजपा का आइकन बनाने में मीडिया की कितनी बड़ी भूमिका है, इसका अंदाजा आप इसी बात ये लगा सकते हैं कि हाल ही में एक टीवी चैनल पर लाइव बहस के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार ने मोदी को अपरिहार्य आंधी कह कर इतनी सुंदर और अलंकारयुक्त व्याख्या की, जितनी कि पैनल डिस्कशन में मौजूद भाजपा नेता भी नहीं कर पाए। आखिर एंकर को कहना पड़ा कि आपने तो भाजपाइयों को ही पीछ़े छोड़ दिया। इतना शानदार प्रोजेक्शन तो भाजपाई भी नहीं कर पाए। हो सकता है उस पत्रकार अपनी निजी सोच वैसी ही हो जैसा वह बोल रहा था लेकिन एक हकीकत यह भी है कि मोदी ने मीडिया मैनजमेन्ट पर जितना ध्यान दिया है उतना और किसी दूसरे काम पर नहीं। पिछले छह सालों में मोदी की ओर से टेलीवीजन और न्यू मीडिया को साधने की जमकर कोशिश की गई है। उसी का परिणाम है कि मोदी के जितने मित्र और समर्थक उनकी अपनी पार्टी भाजपा में नहीं हैं उससे ज्यादा मीडिया में हैं। मोदी और उनकी टीम द्वारा मीडिया में जनसंपर्क का जो सघन अभियान चलाया गया उसका सुखद परिणाम आज मोदी के सामने है।
तेजवानी गिरीधर

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्तमान में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में सबसे आगे आ चुके हैं, इसमें अब कोई दो राय नहीं हो सकती। मगर जितना सच यह है उतना ही सच यह भी है कि यह सब मीडिया का किया धरा है और जो कुछ है वह सब मोदी के मीडिया मैनेजमेंट का कमाल है। आज भले ही निचले स्तर पर भाजपा के कार्यकर्ताओं को मोदी में ही पार्टी के तारणहार के दर्शन हो रहे हों, मगर सच ये है कि उन्हें भाजपा नेतृत्व ने जितना प्रोजेक्ट नहीं किया, उससे कई गुना अधिक मीडिया ने शोर मचाया है। जैसा कि हमारे देश में भेड़चाल का चलन है, इसी प्रोपेगंडा से प्रभावित होकर भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेता, छुटभैये और कार्यकर्ता उनके नाम की रट लगाए हुए हैं।

उनके विकास का मॉडल भी धरातल पर उतना वास्तविक नहीं है, जितना की मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने खड़ा किया है। इसका बाद में खुलासा भी हुआ। पता लगा कि ट्विटर पर उनकी जितनी फेन्स फॉलोइंग है, उसमें तकरीबन आधे फाल्स हैं। फेसबुक पर ही देख लीजिए। मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने वाली पोस्ट बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से डाली जाती रही हैं। गौर से देखें तो साफ नजर आता है कि इसके लिए कोई प्रोफेशनल्स बैठाए गए हैं, जिनका कि काम पूरे दिन केवल मोदी को ही प्रोजेक्ट करना है। बाकी कसर भेड़चाल ने पूरी कर दी। हां, इतना जरूर है कि चूंकि भाजपा के पास कोई दमदार चेहरा नहीं है, इस कारण मोदी की थोड़ी सी भी चमक भाजपा कार्यकर्ताओं को कुछ ज्यादा की चमकदार नजर आने लगती है। शाइनिंग इंडिया व लोह पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी का बूम फेल हो जाने के बाद यूं भी भाजपाइयों को किसी नए आइकन की जरूरत थी, जिसे कि मोदी के जरिए पूरा करने की कोशिश की जा रही है।

आपको जानकारी होगी कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने की शुरुआत उनके तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने से पहले की शुरू हो गई थी। मुख्यमंत्री पद पर फिर काबिज होने के लिए मोदी ने मीडिया के जरिए ऐसा मायाजाल फैलाया कि विशेष रूप से गुजरात में उनके पक्ष में एक लहर सी चलने लगी। और जीतने के बाद तो मानो भूचाल ही आ गया। सच तो ये है कि प्रधानमंत्री पद के दावेदारों तक ने कभी अपनी ओर से यह नहीं कहा कि मोदी भी दावेदार हैं। वे कहने भी क्यों लगे। मीडिया ने ही उनके मुंह में जबरन मोदी का नाम ठूंसा। मीडिया ही सवाल खड़े करता था कि क्या मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं तो भाजपा नेताओं को मजबूरी में यह कहना ही पड़ता था कि हां, वे प्रधानमंत्री पद के योग्य हैं। इक्का-दुक्का को छोड़ कर अधिसंख्य भाजपा नेताओं ने कभी ये नहीं कहा कि मोदी ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं। वे यही कहते रहे कि भाजपा में मोदी सहित एकाधिक योग्य दावेदार हो सकते हैं। और इसी को मीडिया ने यह कह कर प्रचारित किया कि मोदी प्रबल दावेदार हैं। सीधी सी बात है कि भला कौन यह कहता कि नहीं, वे इस पद के योग्य नहीं हैं अथवा दावेदार नहीं हो सकते। और आज हालत ये है कि चारों ओर मोदी की ही आंधी चल पड़ी है।

मोदी को भाजपा का आइकन बनाने में मीडिया की कितनी बड़ी भूमिका है, इसका अंदाजा आप इसी बात ये लगा सकते हैं कि हाल ही में एक टीवी चैनल पर लाइव बहस के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार ने मोदी को अपरिहार्य आंधी कह कर इतनी सुंदर और अलंकारयुक्त व्याख्या की, जितनी कि पैनल डिस्कशन में मौजूद भाजपा नेता भी नहीं कर पाए। आखिर एंकर को कहना पड़ा कि आपने तो भाजपाइयों को ही पीछ़े छोड़ दिया। इतना शानदार प्रोजेक्शन तो भाजपाई भी नहीं कर पाए। हो सकता है उस पत्रकार अपनी निजी सोच वैसी ही हो जैसा वह बोल रहा था लेकिन एक हकीकत यह भी है कि मोदी ने मीडिया मैनजमेन्ट पर जितना ध्यान दिया है उतना और किसी दूसरे काम पर नहीं। पिछले छह सालों में मोदी की ओर से टेलीवीजन और न्यू मीडिया को साधने की जमकर कोशिश की गई है। उसी का परिणाम है कि मोदी के जितने मित्र और समर्थक उनकी अपनी पार्टी भाजपा में नहीं हैं उससे ज्यादा मीडिया में हैं। मोदी और उनकी टीम द्वारा मीडिया में जनसंपर्क का जो सघन अभियान चलाया गया उसका सुखद परिणाम आज मोदी के सामने है।

यह मीडिया की ही देन है कि हाल ही अमरीकी प्रतिनिधिमंडल की मोदी से मुलाकात को इस रूप में स्थापित करने की कोशिश की कि अब अमरीका का रुख मोदी के प्रति सकारात्मक हो गया है। उन्हें अमरीका अपने यहां बुलाने को आतुर है। बाद में पता लगा कि वह प्रतिनिधिमंडल अधिकृत नहीं था और एक टूर प्रोग्राम के तहत उस प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से राशि वसूली गई थी। खैर, जहां तक उनके लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का सवाल है तो वे पहले व्यक्ति नहीं है। और भी उदाहरण हैं। और लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना यानि प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो जाना भी गले उतरने वाली बात नहीं है। इसी प्रकार इस बार जब मोदी को भाजपा संसदीय दल में शामिल किया गया तो मीडिया ने उसे इतना उछाला है, मानो कोई अजूबा हो गया है। संसदीय बोर्ड में तो वे पहले भी रहे हैं।

भाजपा के थिंक टैंक रहे गोविंदाचार्य ने इसको कुछ इस तरीके से कहा है-मोदी 6 साल पहले भी संसदीय बोर्ड में थे और अगर फिर उनको शामिल कर दिया गया है तो इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई है। गोविंदाचार्य ने आगे कहा कि मोदी को देश के बारे में कोई ठोस समझ नहीं है, मीडिया प्रबंधन की वजह से कई बार व्यक्ति पद तो पा जाता है, लेकिन काम नहीं कर पाता। अभी मोदी को बहुत कुछ सीखने और समझने की जरूरत है। जरूरी नहीं की जो अच्छा पत्रकार हो वो अच्छा सम्पादक ही हो जाए या अच्छा अध्यापक बहुत अच्छा प्रधानाध्यापक बन जाए, उसी तरह जरूरी नहीं की एक अच्छा मुख्यमंत्री, अच्छा प्रधानमंत्री ही बन जाए।

कुल मिला कर आज हालत ये हो गई है कि मोदी भाजपा नेतृत्व और संघ के लिए अपरिहार्य हो गए हैं। व्यक्ति गौण व विचारधारा अहम के सिद्धांत वाली पार्टी तक में एक व्यक्ति इतना हावी हो गया है, उसके अलावा कोई और दावेदार नजर ही नहीं आता। संघ के दबाव में फिर से हार्ड कोर हिंदूवाद की ओर लौटती भाजपा को भी उनमें अपना भविष्य नजर आने लगा है। यह दीगर बात है कि उनके प्रति आम सहमति बन पाती है या नहीं, उसकी घोषणा करना मीडिया की जिम्मेदारी नहीं, फिर भी वह करने से बाज नहीं आ रहा। सहयोगी दलों की स्वीकार्यता तो अभी दूर की कौड़ी है।
स्त्रोत : राजनामा, 

Friday, February 15, 2013

मीडिया द्वारा बड़ी घटनाएँ दबा दी जाती हैं और .....!


मीडिया द्वारा बड़ी घटनाएँ दबा दी जाती हैं और प्रायोजित घटनाएँ खबर बना दी जाती हैं!
दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण इलाहाबाद में कुम्भ के दौरान हुए हादसे में कई दर्जन निर्दोष लोगों की जान चली जाने का है, जिसमें कोई राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहा है, तो कोई रेलवे मंत्रालय को, जबकि कोई भी इस बात को नहीं उठा रहा है कि कुम्भ जैसे अवैज्ञानिक और अश्‍लील आयोजनों की जरूरत ही क्या है? जहॉं पर संत का चौला पहने हजारों लोग स्त्रियों की उपस्थिति में नग्न होकर स्नान करते हैं!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

देश की दो फीसदी आबादी का देश के 70 फीसदी संसाधनों तथा पूँजी पर कब्जा है और ये लोग मीडिया के जरिये देश को अपनी योजनानुसार बरगलाते और दिग्भ्रमित करते रहते हैं। ये लोग बड़ी से बड़ी घटना को दबवा देते हैं और देशहित की बातों से ध्यान हटाने के लिये प्रायोजित और बनावटी घटनाओं को ज्वलन्त व सनसनीखेज सबर बनाकर पेश करवा देते हैं। जिसके चलते देश के लोगों को वास्तविक हालातों का ज्ञान ही नहीं हो पाता है और भोले-भाले ऊर्जावान युवा अपने दुश्मनों के दुष्चक्र में फंसकर अपने ही पैरों पर कुल्हा़ड़ी मारने को उद्यत हो जाते हैं।

इस प्रकार के मामले इस देश में अनेकों बार, बल्कि बार-बार दोहराये जाते रहते हैं। जिनकी शुरूआत हुई मण्डल कमीशन के विरोध में मीडिया द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को ही सड़कों पर उतारने को उकसाया गया। जिसमें युवाओं को आरक्षण के खिलाफ सड़कों पर विरोध करते हुए दिखाया गया और जानबूझकर मनुवादियों ने अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों के युवाओं को ही आगे कर दिया। जिन्हें मीडिया के सामने लाकर केरोसीन तथा पेट्रोल से नहलाकर आग के हवाले कर दिया गया। मीडिया ने इसे आरक्षण विराध के रूप में प्रचारित किया। इसी प्रकार से गुजरात में दंगों के दौरान मनुवादियों ने हिन्दुत्व का जहर घोलकर वहॉं के अशिक्षित, विपन्न, शोषित और पिछड़े और दूर-दराज के पिछड़े क्षेत्रों में निवास करने वाले आदिवासियों को आगे कर दिया। जो आज भी कोर्ट-कचेहरियों के चक्कर काट रहे हैं, जबकि नरेन्द्र मोदी और भाजपा इस घिनौने कत्लेआम के प्रतिफल में गुजरात की सत्ता पर लगातार काबिज हो चुके हैं।

उसी गुजरात में पिछले सप्ताह चालीस आदिवासियों को मनुवादियों ने खौलते तेल में हाथ डालकर अग्नि परीक्षा देने के लिये विवश कर दिया और इस दुष्कृत्य को मीडिया ने खबर बनाने के बजाय प्रायोजित तरीके से दबा दिया। जबकि अग्नि परीक्षा जैसी धूर्त चालों के जरिये लोगों को मूर्ख बनाने वाले मनुवादियों के षड़यन्त्र को मीडिया द्वारा प्रमुखता से विश्‍व के समक्ष उजागर करना चाहिये था! सवाल तो यह भी उठना चाहिये कि जब सति-प्रथा जैसी अवैज्ञानिक और अमानवीय कुप्रथा को प्रतिबन्धित करके, इसका महिमामंडन प्रतिबन्धित और अपराध घोषित किया जा चुका है तो किसी भी प्रकार से अग्नि परीक्षा जैसी अमानवीय और नृशंस क्रूरता की कपोल-कल्पित कहानियों से भरे पड़े मनुवादियों के ग्रंथों को क्यों प्रतिबन्धित नहीं किया जा रहा है? जिनके चलते ही लोगों के अवचेतन मन में ऐसे अमानवीय और क्रूर विचार पनपते हैं। दुर्भाग्य यह है कि देश का तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया मनुवादियों के कब्जे में है, जो फिर से इस देश को मनुवाद से शासित होते देखने के लिये लगातार प्रयास करता रहता है, उस मीडिया से ये अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह मनुवादियों के षड़यन्त्रों को ध्वस्त करने वाली खबरों को प्रमुखता से प्रचारित, प्रसारित और प्रकाशित करे!

इसी का दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण इलाहाबाद में कुम्भ के दौरान हुए हादसे में कई दर्जन निर्दोष लोगों की जान चली जाने का है, जिसमें कोई राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहा है, तो कोई रेलवे मंत्रालय को, जबकि कोई भी इस बात को नहीं उठा रहा है कि कुम्भ जैसे अवैज्ञानिक और अश्‍लील आयोजनों की जरूरत ही क्या है? जहॉं पर संत का चौला पहने हजारों लोग स्त्रियों की उपस्थिति में नग्न होकर स्नान करते हैं!

सच तो यह है कि मनुवादियों ने इस देश के लोगों के अवचेतन में इस प्रकार की अनेक रुग्णताएँ गहरे में स्थापित कर दी हैं कि उनसे लोगों को रोगमुक्त करने के लिये लगातार वर्षों तक प्रयास करने की जरूरत है। जबकि इसके ठीक विपरीत कुम्भ स्नान की कपोल-कल्पित कहानियों का मीडिया लागातार महिमामण्डन कर रहा है और आर्यों के इस अश्‍लील आयोजन को बढाने के लिये प्रयास जारी हैं। जबकि दुर्भाग्यपूर्ण सच यह है कि मूल निवासियों को युद्ध में हराने के जश्‍न के रूप में कुम्भ का आयोजन किया जाता है, जिसमें बढचढकर मूल निवासी ही हिस्सा ले रहे हैं!

मीडिया के जरिये क्रूर और चालाक मनुवादी व्यवस्था के संचालक एक बार फिर से अपने अवैज्ञानिक सिद्धान्तों को आस्था की चाशनी में लपेटकर भोलेभाले देशवासियों के समक्ष इस प्रकार से परोस रहे हैं कि इस षड़यन्त्र में फंसकर आम लोगों, विशेषकर स्त्रियों, पिछड़ों, आदिवासियों और दलितों के वर्तमान और भविष्य को बर्बाद किया जा रहा है। इसी सुनियोजित षड़यन्त्र की क्रूर परिणिती है-इलाहबाद की रेलवे पुल की रैलिंग टूटने की दु:खद घटना, जिसके लिये और कोई नहीं केवल और केवल मनुवादी व्यवस्था जिम्मेदार है। जिससे निजात दिलाने की मीडिया और राजनेताओं से दूर-दूर तक कहीं कोई संभावना नजर नहीं आ रही है|

हालांकि खुशी इस बात की है कि अमानवीय और अवैज्ञानिक मनुवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई को इस देश के ब्राह्मण समाज के कुछ युवा समझ रहे हैं और वे इसके विरुद्ध खड़े भी हो रहे हैं। जिसके चलते दलित आन्दोलन को ताकत मिल सकती है। यद्यपि बामसेफ जैसे संगठन इस दिशा में लागातार अच्छा काम कर रहे हैं और देशवासियों को ब्राह्मणवादी और मनुवादी व्यवस्था के चंगुल से मुक्त करवाने के लिये देशभर में अभियान चलाये हुए हैं, जो मुनवादी मीडिया के समक्ष नाकाफी ही है!