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Friday, April 29, 2016

भारत की संयुक्त राष्ट्र संघ में घेराबंदी??

भारत की संयुक्त राष्ट्र संघ में घेराबंदी??
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
इस बात में कोई दो राय नहीं कि वर्तमान भाजपा की केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा का 100 फीसदी नेतृत्व करती है। यह भी सर्वविदित है कि संघ मनुवादी आतंक, जनजातीय विभेद, वर्गवाद, वर्णवाद, जातिवाद, अमानवीयता, साम्प्रदायिकता, अंधश्रद्धा, अंधभक्ति, अंधविश्वास, बामणवाद, सामन्तशाही, भ्रष्टचार, अत्याचार, उत्पीड़न, लिंग भेद, स्त्री अत्याचार जैसी हजारों बुराईयों का पोषक है। अत: ऐसी बुराइयां भारत में अचानक पैदा नहीं हुई हैं, बल्कि सदियों से व्याप्त रही हैं। इसके बावजूद अचानक भारत के मन्दिरों और मस्जिदों/दरगाहों में स्त्रियों के प्रवेश का मुद्दा राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गर्माया रहा है। जिसके लिए देशभर में संघ, मनुवाद, भाजपा, बामणवाद, आदि को कोसा जा रहा है। कोसा जाना भी चाहिए, लेकिन इसके पीछे निहित मकसद को भी समझने की जरूरत है। क्योंकि जो कुछ या जिन बुराईयों को प्रचारित किया जा रहा है, वे न तो अचानक पैदा हुई हैं और न ही नयी हैं और न हीं वर्तमान भाजपा की केंद्र सरकार की दैन हैं। अत: इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं:-

1. संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटो पावर प्राप्त करना भारत का दशकों से सपना रहा है। जिसके लिए पिछले 15 वर्षों में बहुत काम किया गया है। ऐसे में भारत को रोकने के लिये विश्व के सामने भारत की छवि की ध्वस्त करना कुछ विश्वव्यापी ताकतों का दुराशय हो सकता है। अत: सम्भव है कि भारत में स्त्रियों के मानवाधिकारों के हनन को मुद्दा बनाकर भारत को घेरने की योजना पर काम हो रहा है। जिसमें प्राथमिक सफलता मिल चुकी है।
2. दूसरा कारण, जिसका भारत को फायदा होगा। वह, यह कि भाजपा को बदनाम करने के लिए प्रोपेगण्डा चलाया जा रहा है।
पहला मुद्दा अत्यंत गम्भीर और विचारणीय है।

जय भारत। जय संविधान।
नर-नारी, सब एक समान।।
: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/28-04-2016/10.26 PM
@—लेखक का संक्षिप्त परिचय : मूलवासी-आदिवासी अर्थात रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया। होम्योपैथ चिकित्सक और दाम्पत्य विवाद सलाहकार। राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोसिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक) और पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ।
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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Tuesday, November 25, 2014

जन्मजातीय ईश्वरीय शक्ति से सम्पन्न आर्य श्रृष्टि के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य हैं!

जन्मजातीय ईश्वरीय शक्ति से सम्पन्न आर्य श्रृष्टि के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य हैं!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

केंद्र में भाजपा के स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के सत्तासीन होने के बाद नेट के चार्जेज लगातार बढ़ रहे हैं! क्यों इस सवाल को कोई भी (यानी मीडिया) किसी से भी (यानी सरकार से) नहीं पूछ रहा! क्यों नहीं पूछ रहा इस बारे में हम आम लोग भी चुप हैं, क्योंकि शायद हम को भी कुछ पता नहीं!

मगर बहुतों को पता भी है-चुनाव में अनाप-सनाप विदेशी पैसा, देशी मीडिया को भेंट करके नए नए जुमलों और सपनों को बेचकर जनता को जमकर गुमराह किया गया। अब अपरोक्ष रूप से धन भेजने वाले विदेशियों द्वारा सरकार की मौन स्वीकृति से नेट दरें बढ़ा दी गई तो देशी मीडिया बदले में देशी-विदेशी सभी के प्रति अपना आपसी बन्दर बाँट का धर्म चुका कर मौन साधे हुए है!

इसका सीधा असर सरकारी खर्चे (जनता की कमाई) पर नेट चलाने वाले अफसरों, धनी लोगों और काले धन के मालिकों पर कुछ नहीं होगा, मगर वंचित, पिछड़े, दलित, आदिवासी वर्गों के जागरूक लोगों और विशेषकर युवा पीढ़ी को सोशल मीडिया से दूर रखने का ये घुमा फिराकर एक उलटा-सीधा, गैर सरकारी, सरकारी हथकंडा है।

मगर इन मूर्खों को नहीं पता कि ये अपनी अमानवीय मनुवादी विचारधारा को भी तो इसी सोशल मीडिया के मार्फ़त ही तो निम्न तबकों में फ़िर से फैला रहे हैं। यदि वंचित, पिछड़े, दलित, आदिवासी वर्गों को सोशल मीडिया से दूर रहने को मजबूर किया गया तो उस अमानवीय मनुवादी विचारधारा को चासनी में लपेटकर पिलाने वाली (कु) नीति का क्या हश्र होगा? 

ओहो सॉरी....... भूल हो गयी अब इन भू-देवों को सोशल मीडिया की कहाँ जरूरत रह गयी है? अब तो ये देश के मालिक हैं!

अब तो पेड इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के मार्फ़त ही जनता के धन से अपनी विचारधारा आसानी से परोसी जा सकेगी।

जैसा कि पिछले दिनों मानवता के विरोधी मनु की आदमकद मूर्ति की छत्र छाया में संचालित राजस्थान हाई कोर्ट परिसर में "सामाजिक न्याय" के नाम पर आयोजित सेमीनार में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री की मौजूदगी में संविधान को धता बताते हुए असंवैधानिक आर्थिक आरक्षण को मंत्री सहित सभी ने सामाजिक न्याय की जरूरत और समानता का आधार बताया गया। लच्छेदार भाषण दिए गए और आर्यों के मनुवादी मीडिया द्वारा इसे बेशर्मी से प्रकाशित किया गया! मगर किसी भी कथित बुद्धिजीवी (आर्य या अनार्य) ने एक शब्द इस बारे में नहीं लिखा कि ये कौनसा सामाजिक न्याय है?

अब राम राज्य आने वाला है। बल्कि आ ही गया है!
अभी से ही अनेक उदाहरण दिख रहे है-

आर्य मनुवादियों के हजारों सालों के अन्याय, भेदभाव और शोषण से शोषित और वंचित अनार्यों (विशेषकर दलित, आदिवासी और पिछड़ों) को सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकार देने की संवैधानिक जिम्मेदारी का नाटक करने को मजबूर राजस्थान सरकार में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का मंत्री एक ब्राह्मण आर्य को बना रखा है!

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के सचिव रघुवीर मीणा (आदिवासी) को समता आंदोलन समिति (जो संघ के निर्देश से काम करती है) की छोटी सी निराधार शंका पर राज्य सरकार (जो संघ के आशीर्वाद से काम करती है) ने तत्काल हटा दिया गया। आज वही अन्यायी लोग इस मंत्रालय को संचालित कर रहे हैं, जिनके अन्याय और विभेद से से बचने के लिए यह मंत्रालय संयुक्त राष्ट्र संघ से दबाव में तत्कालीन सरकार गठित किया गया था। मगर पूर्व में इस विभाग का मंत्री कोई दलित या आदिवासी ही हुआ करता था!

भाजपा सांसद साक्षी महाराज घोषणा कर चुके हैं कि-

"राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ" वर्तमान युग का भगवान हैं। 

संघ के हिन्दू मुखोटे विश्व हिन्दू परिषद के गिरिराज किशोर सिंघल (बनिया आर्य) नरेंद्र मोदी (बनिया आर्य) को आठ सौ साल के बाद में भारत का पहला स्वाभिमानी हिन्दू शासक प्रमाणित कर चुके हैं! 

उनकी नजर में अटल बिहारी वाजपेयी स्वाभिमानी हिन्दू नहीं, क्योंकि (शायद) अटल खुलकर मनुवाद का समर्थन नहीं करता था ! या इसलिए कि अटल बिहारी वाजपेयी नरेंद्र मोदी (आठ सौ साल के बाद में भारत का पहला स्वाभिमानी हिन्दू शासक जो तब का गुतरात का मुख्यमंत्री था) को शासन धर्म निभाने में असफल बताने की गलती कर बैठा था?

जब आज के युग के भगवान संघ से आशीर्वाद से संचालित सरकार को संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों और मूल निवासियों के पक्ष में किये गए संवैधानिक प्रावधानों की तक परवाह नहीं तो उनके लिए नैट के दाम बढ़ाना कौनसी बड़ी बात है? आखिर-
आर्य श्रृष्टि के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य हैं!
साक्षात ईश्वर के अवतार हैं!
कुछ भी कहने और करने को जन्मजातीय ईश्वरीय शक्ति से सम्पन्न हैं!
संविधान की क्या औकात जो वे इसका पालन करें?

Tuesday, August 13, 2013

कहां लुप्त हो गई बाबा रामदेव की राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी?

बाबा रामदेव की संकुचित सोच का पता तो उसी समय चल गया था, जबकि अन्ना हज़ारे द्वारा जनलोकपाल विधेयक संसद में पास कराए जाने की मांग को लेकर जंतरमंतर पर एक ऐतिहासिक धरना दिया गया और बाबा रामदेव ने इस मुहिम को अपना पूरा समर्थन देने के बजाए उल्टे यह महसूस करना शुरु कर दिया कि अन्ना हज़ारे ने यूपीए सरकार के विरुद्ध इतनी बड़ी संख्या में लोगों को जंतरमंतर पर इकट्टा कर मेरे कद को आखिर कैसे छोटा कर दिया? और इसी बात ने उन्हें रामलीला मैदान पर अपना निजी ‘शो’ आयोजित करने की प्रेरणा दी। उसके बाद की स्थिति क्या हुई यह भी पूरे देश ने देखा।
बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात साफ शब्दों में रखने वाले दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने रामदेव की राजनीति में सक्रियता के शुरुआती दौर में ही उन्हें भाजपा व आरएसएस का एजेंट व उन्हीं के लिए काम करने वाला व्यक्ति बता दिया था। परंतु उस समय दिग्विजय सिंह की बातों पर कोई इसलिए यकीन नहीं कर रहा था, क्योंकि कांग्रेस पार्टी के नेता अक्सर अपने विरोधियों पर संघ या भाजपा का एजेंट होने का लेबल लगाते रहते हैं। परंतु रामलीला मैदान से फऱार होने की घटना के बाद रामदेव ने जिस प्रकार भाजपा की भाषा बोलनी शुरु की तथा भाजपा नेताओं के प्रति उनका आकर्षण देखा जा रहा है, उसे देखकर यकीनी तौर पर अब यह कहा जा सकता है कि रामदेव शुरु से ही भारतीय जनता पार्टी व संघ के इशारों पर ही काम कर रहे थे।

निर्मल रानी 

देश की 121 करोड़ जनता को अपना प्रशंसक व अनुयायी समझने की गलतफहमी पालने वाले बाबा रामदेव 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पूर्व एक बार फिर पूरी सक्रियता से राजनैतिक बयानबाजि़यां करते देखे जा रहे हैं। अपने योग प्रशिक्षण के माध्यम से नि:संदेह उन्होंने देश-विदेश में काफी लोकप्रियता व ख्याति अर्जित की। परंतु इसी योग विद्या के कारण उनकी ओर आकर्षित होती जनता को उन्होंने भूलवश अपना अंधसमर्थक व अनुयायी भी समझना शुरु कर दिया। और योग सीखने वालों की बढ़ती भीड़ को देखकर उनके भीतर राजनैतिक महत्वाकांक्षा भी जागने लगी। और यह महत्वाकांक्षा इस हद तक जा पहुंची कि 2009 के लोकसभा चुनाव से पूर्व उन्होंने विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काले धन के विरुद्ध अच्छा-खासा शोर-शराबा खड़ा कर स्वयं को देश में एक राजनैतिक विकल्प के रूप में खड़ा करने का प्रयास किया। और तभी उन्होंने पातंजलि पीठ, दिव्य फार्मेसी और योग प्रशिक्षण के अतिरिक्त एक नया राजनैतिक झंडा बुलंद करने की घोषणा की और अपने इस स्वगठित राजनैतिक दल का नाम रखा राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी।

2009 में हुए लोकसभा चुनाव के कुछ ही समय पहले रामदेव ने अपनी इस नई-नवेली राजनैतिक पार्टी की घोषणा की थी। जहां-जहां उनके योग समर्थक अनुयायी थे, उन्होंने उन्हीं के माध्यम से राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी का सदस्यता अभियान भी छेड़ा। यहां तक कि देश के तमाम मध्यम व छोटे शहरों में स्वाभिमान पार्टी की ओर से स्कूटर व कार रैलियां भी निकाली गईं। यह सारी कवायद केवल इसीलिए चल रही थी, ताकि वे यह समझ सकें कि दरअसल राजनैतिक पार्टी का संचालन राष्ट्रीय स्तर पर किया भी जा सकता है अथवा नहीं। 636 फी़ट के स्थान पर योग सीखने बैठे एक व्यक्ति के हिसाब से योग शिविर में दूर तक नज़र आने वाली योग प्रशिक्षुओं की भीड़ को देखकर गदगद रहने वाले रामदेव जी अपनी पार्टी के भविष्य को तौलने के लिए लगभग पूरे देश में भ्रमण भी करते रहे। वे योग सीखने के बहाने लोगों को अपने शिविर में बुलाते तथा योग पर थोड़ी-बहुत चर्चा करने के अतिरिक्त पूरे समय राजनैतिक भड़ास निकालते। ग्वालियर में तो एक अर्धसैनिक बल के जवान ने उनकी इसी बात पर नाराज़ होकर उनपर जूता भी फेंका। इसके बावजूद भी 2009 में वे चुनावी घमासान में वे शिरकत नहीं कर सके।

ऐसा माना जा सकता है कि समय की कमी के कारण संभवत: 2009 में उन्होंने चुनावी युद्ध में कूदने की कोशिश न की हो। परंतु उसी समय इस बात का अंदाज़ा ज़रूर लगाया जा रहा था कि यदि रामदेव 2009 में सक्रिय नहीं भी हो सके तो उनके बुलंद हौसलों व कथित रूप से 121 करोड़ देशवासियों के मध्य उनकी लोकप्रियता के दावों के चलते वे 2014 के लोकसभा चुनावों में तो अवश्य ही सक्रिय होंगे। अब 2014 के चुनाव सिर पर आ चुके हैं, परंतु बाबा रामदेव की राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी की सक्रियता अभी तक तो कहीं भी देखने व सुनने को नहीं मिल रही है। हां रामदेव स्वयं कभी-कभार टी वी चैनल के माध्यम से या समाचार पत्रों में अपने बयानों के द्वारा सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह व राहुल गांधी पर अपनी भड़ास निकालते देखे जा रहे हैं।

बाबा रामदेव की संकुचित सोच का पता तो उसी समय चल गया था, जबकि अन्ना हज़ारे द्वारा जनलोकपाल विधेयक संसद में पास कराए जाने की मांग को लेकर जंतरमंतर पर एक ऐतिहासिक धरना दिया गया और बाबा रामदेव ने इस मुहिम को अपना पूरा समर्थन देने के बजाए उल्टे यह महसूस करना शुरु कर दिया कि अन्ना हज़ारे ने यूपीए सरकार के विरुद्ध इतनी बड़ी संख्या में लोगों को जंतरमंतर पर इकट्टा कर मेरे कद को आखिर कैसे छोटा कर दिया? और इसी बात ने उन्हें रामलीला मैदान पर अपना निजी ‘शो’ आयोजित करने की प्रेरणा दी। उसके बाद की स्थिति क्या हुई यह भी पूरे देश ने देखा।

ठीक उसी तरह जैसे कि पाकिस्तान में परवेज़ मुशर्रफ द्वारा कराए गए आप्रेशन लाल मस्जिद के समय वहां का प्रमुख मौलवी अब्दुल अज़ीज़ नकाब पहनकर अपनी जान बचाता हुआ औरतों के बीच में घुसकर फरार होने की कोशिश करते समय पकड़ा गया था, उसी प्रकार बाबा रामदेव भी अपनी एक समर्थक महिला का वस्त्र पहनकर दिल्ली पुलिस के कहर से बचकर भागते हुए पकड़े गए। निश्चित रूप से इस घटना ने उनके दिमाग से राजनीति में सक्रिय होने का नशा तो बिल्कुल उतार दिया होगा। हां इतना ज़रूर है कि रामलीला मैदान से उन्हें औरत के लिबास में पकडऩे तथा उनके शो को तितर-बितर करने के बाद उनके भीतर सत्तारुढ़ यूपीए विशेषकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के प्रति कटुता तथा बदला लेने की भावना और भी बढ़ गई। परिणामस्वरूप दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त की नीति पर चलते हुए इन्होंने कांग्रेस व यूपीए विरोधी दलों विशेषकर भारतीय जनता पार्टी की ओर झुकना शुरु कर दिया।

हालांकि बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात साफ शब्दों में रखने वाले दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने रामदेव की राजनीति में सक्रियता के शुरुआती दौर में ही उन्हें भाजपा व आरएसएस का एजेंट व उन्हीं के लिए काम करने वाला व्यक्ति बता दिया था। परंतु उस समय दिग्विजय सिंह की बातों पर कोई इसलिए यकीन नहीं कर रहा था, क्योंकि कांग्रेस पार्टी के नेता अक्सर अपने विरोधियों पर संघ या भाजपा का एजेंट होने का लेबल लगाते रहते हैं। परंतु रामलीला मैदान से फऱार होने की घटना के बाद रामदेव ने जिस प्रकार भाजपा की भाषा बोलनी शुरु की तथा भाजपा नेताओं के प्रति उनका आकर्षण देखा जा रहा है, उसे देखकर यकीनी तौर पर अब यह कहा जा सकता है कि रामदेव शुरु से ही भारतीय जनता पार्टी व संघ के इशारों पर ही काम कर रहे थे। और अब भी वही कर रहे हैं। भाजपा के प्रति अपने प्रेम की पुष्टि उन्होंने पिछले दिनों उस समय पूरी तरह से कर डाली, जबकि उन्होंने हरिद्वार में नरेंद्र मोदी को आमंत्रित कर उनकी शान में कसीदे पढऩे शुरु कर दिए। आज बाबा रामदेव को भी देश में नरेंद्र मोदी से बेहतर प्रधानमंत्री पद का कोई दावेदार नज़र नहीं आता। जबकि नरेंद्र मोदी भाजपा के भीतरी अंतर्विरोध से लेकर देश के अन्य कई राजनैतिक दलों के कितने मुखर विरोध का सामना कर रहे हैं, यह भी पूरा देश भलीभांति देख रहा है। परंतु बाबा रामदेव को नरेंद्र मोदी से बेहतर कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री पद के योग्य नज़र नहीं आता। ऐसे में पूर्व में दिग्विजय सिंह द्वारा रामदेव पर छोड़े गए बाणों को गलत या बेबुनियाद कैसे कहा जा सकता है।

बाबा रामदेव, उनकी स्वाभिमान पार्टी व नरेंद्र मोदी से जुड़ा एक और तथ्य ऐसा है जो कि रामदेव के संघ व भाजपा समर्थक होने की पुष्टि करता है। जिस समय बाबा रामदेव ने राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी के गठन की घोषणा की थी, उस समय इनके राजनैतिक सलाहकारों में एक प्रमुख नाम पूर्व भाजपा नेता गोविंदाचार्य का भी था। हो सकता है राजनीति के दिग्गज रह गोविंदाचार्य उस समय स्वयं इस गलतफहमी में रहे हों कि रामदेव की राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी कांग्रेस व बीजेपी के विकल्प के रूप में देश में एक तीसरी शक्तिशाली पार्टी बनकर उभर सकती है और शायद इसी सोच ने गोविंदाचार्य को रामदेव का साथ देने के लिए प्रोत्साहित किया हो। परंतु रामलीला मैदान कांड के बाद बाबा रामदेव ने राजनैतिक विकल्प पेश करने के दूसरों की सोच पर तो पानी फेर ही दिया साथ-साथ भाजपा व नरेंद्र मोदी के विशेष प्रवक्ता के रूप में उनका गुणगान करना ज़रूर शुरु कर दिया। अब ज़रा गौर कीजिए कि जिस गोविंदाचार्य को बाबा रामदेव अपना राजनैतिक सलाहकार बनाने की हैसियत वाला नेता समझने के लिए मजबूर थे, वही गोविंदाचार्य आज नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य तथा 2002 के गुजरात दंगों के लिए जि़म्मेदार मान रहे हैं। परंतु बाबा रामदेव को इसके विपरीत नरेंद्र मोदी से बेहतर प्रधानमंत्री पद का दूसरा दावेदार ही नज़र नहीं आ रहा। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी के विषय में गोविंदाचार्य को जितनी जानकारी है बाबा रामदेव हो हरगिज़ नहीं।

पिछले दिनों एक समाचार यह सुनने को मिला कि रामदेव सोनिया गांधी को हराने के लिए रायबरेली में डेरा डालने की तैयारी कर रहे हैं। यह भी रामदेव का सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का एक तीसरे दर्जे का हथकंडा मात्र है। यदि उन्हें रामलीला मैदान में अपने अपमानित होने का बदला सोनिया गांधी से लेना ही है तो उन्हें राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी के किसी उम्मीदवार को अथवा स्वयं को ही रायबरेली से उम्मीदवार बनना चाहिए। इसी प्रकार गत् दिनों पाकिस्तान द्वारा भारत की सीमा में घुसकर भारतीय सैनिकों की हत्या किए जाने के विषय पर अपने बयान देते हुए बाबा रामदेव फरमा रहे थे कि पांच सैनिकों के बदले में पांच सौ पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काट कर लाए जाने चाहिएं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आज नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री होते तो वह ऐसा ही करते। ऐसी भाषा आम भारतीय नागरिक के मुंह से सुनते हुए तो शायद अच्छी लगे। एक सच्चे राष्ट्रहितैषी की भाषा भी यह कही जा सकती है, परंतु स्वंय को योगगुरु बताने वाला व्यक्ति और वह भी देश को दिशा देने व देश की दशा सुधारने जैसे दावे ठोंकने वाला व्यक्ति अपने मुंह से इस प्रकार की गैरज़िम्मेदाराना बातें करे यह एक योगगुरु को कतई शोभा नहीं देता।

योगनीति तथा योगक्रिया भी इस बात की इजाज़त नहीं देती कि पांच के बदले पांच सौ व्यक्तियों की जानें ली जाएं। कहा जा सकता है कि अपनी राजनैतिक इच्छाओं की पूर्ति न हो पाने तथा उदय से पूर्व ही उनकी राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी के अस्त हो जाने की छटपटाहट के मारे हुए बाबा रामदेव अब अपने अस्तित्व को जीवित रखने के लिए कभी नरेंद्र मोदी के पिछलग्गू बनने की कोशिश कर रहे हैं तो कभी सोनिया गांधी को रायबरेली मे जाकर हराने का दावा कर रहे हैं, रामदेव नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवा पाएंगे अथवा नहीं व सोनिया गांधी को चुनाव में पराजित करवा पाएंगे या नहीं यह तो भविष्य ही बता पाएगा, परंतु फ़िलहाल उनकी राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी चुनावी रण में ज़ोरआज़माईश करने से पूर्व ही लुप्त हो गई है!
नाम :   निर्मल रानी अंबाला में रहनेवाली निर्मल रानी पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं. - See more at: http://www.kranti4people.com/article.php?aid=3594#sthash.M44AHm0T.dpuf
स्त्रोत : क्रांति४पीपुल 
Saturday 10 August 2013
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Thursday, July 18, 2013

अपने ही इतिहास से डरते हैं संघी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : भारतीय फासीवादियों की असली जन्मकुण्डली

अभि‍नव–(मजदूर बिगुल)

भारत में फासीवाद का इतिहास लगभग उतना ही पुराना है जितना कि जर्मनी और इटली में। जर्मनी और इटली में फासीवादी पार्टियाँ 1910 के दशक के अन्त या 1920 के दशक की शुरुआत में बनीं। भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में नागपुर में विजयदशमी के दिन हुयी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक थे केशव बलिराम हेडगेवार। हेडगेवार जिस व्यक्ति के प्रभाव में फासीवादी विचारों के सम्पर्क में आये थे वह था मुंजे। मुंजे 1931 में इटली गया था और वहाँ उसने मुसोलिनी से भी मुलाकात की थी। 1924 से 1935 के बीच आर.एस.एस. से करीबी रखने वाले अख़बार ‘केसरी’ ने मुसोलिनी और उसकी फासीवादी सत्ता की प्रशंसा में लगातार लेख छापे। मुंजे ने हेडगेवार को मुसोलिनी द्वारा युवाओं के दिमाग़ों में ज़हर घोलकर उन्हें फासीवादी संगठन में शामिल करने के तौर-तरीकों के बारे में बताया। हेडगेवार ने उन तौर-तरीकों का इस्तेमाल उसी समय से शुरू कर दिया और आर.एस.एस. आज भी उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करती है। 1930 के दशक के अन्त तक भारतीय फासीवादियों ने बम्बई में उपस्थित इतालवी कांसुलेट से भी सम्पर्क स्थापित कर लिया। वहाँ मौजूद इतालवी फासीवादियों ने हिन्दू फासीवादियों से सम्पर्क कायम रखा।

लगभग इसी समय एक अन्य हिन्दू कट्टरपन्थी विनायक दामोदर सावरकर, जिनके बड़े भाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापकों में से एक थे, ने जर्मनी के नात्सियों से सम्पर्क स्थापित किया। सावरकर ने जर्मनी में हिटलर द्वारा यहूदियों के सफाये को सही ठहराया और भारत में मुसलमानों की ”समस्या” के समाधान का भी यही रास्ता सुझाया। जर्मनी में ‘यहूदी प्रश्न’ का ‘अन्तिम समाधान’ सावरकर के लिये एक मॉडल था। सावरकर के लिये नात्सी राष्ट्रवादी थे जबकि यहूदी राष्ट्र-विरोधी और साम्प्रदायिक। लेनिन ने बहुत पहले ही आगाह किया था कि नस्लवादी अन्‍धराष्ट्रवादी पागलपन अक्सर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का चोला पहनकर आ सकता है। भारत में हिन्दू साम्प्रदायिक अन्‍धराष्ट्रवाद भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जामा पहनकर ही सामने आ रहा था।

आर.एस.एस. ने भी खुले तौर पर जर्मनी में नात्सियों द्वारा यहूदियों के कत्ले-आम का समर्थन किया। हेडगेवार ने मृत्यु से पहले गोलवलकर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड‘ और बाद में प्रकाशित हुयी‘बंच ऑफ थॉट्स‘ में जर्मनी में नात्सियों द्वारा उठाये गये कदमों का अनुमोदन किया था। गोलवलकर आर.एस.एस. के लोगों के लिये सर्वाधिक पूजनीय सरसंघचालक थे। उन्हें आदर से संघ के लोग ‘गुरुजी’ कहते थे। गोलवलकर ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मेडिकल की पढ़ाई की और उसके बाद कुछ समय के लिये वहाँ पढ़ाया भी। इसी समय उन्हें ‘गुरुजी’ नाम मिला। हेडगेवार के कहने पर गोलवलकर ने संघ की सदस्यता ली और कुछ समय तक संघ में काम किया। अपने धार्मिक रुझान के कारण गोलवलकर कुछ समय के लियेआर.एस.एस. से चले गये और किसी गुरु के मातहत संन्यास रखा। इसके बाद 1939 के करीब गोलवलकर फिर से आर.एस.एस. में वापस आये। इस समय तक हेडगेवार अपनी मृत्युशैया पर थे और उन्होंने गोलवलकर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। 1940 से लेकर 1973 तक गोलवलकर आर.एस.एस. के सुप्रीमो रहे।

गोलवलकर के नेतृत्व में ही आर.एस.एस. के वे सभी संगठन अस्तित्व में आये जिन्हें आज हम जानते हैं। आर.एस.एस. ने इसी दौरान अपने स्कूलों का नेटवर्क देश भर में फैलाया। संघ की शाखाएँ भी बड़े पैमाने पर इसी दौरान पूरे देश में फैलीं। विश्व हिन्दू परिषद जैसे आर.एस.एस. के आनुषंगिक संगठन इसी दौरान बने। गोलवलकर ने ही आर.एस.एस. कीफासीवादी विचारधारा को एक सुव्यवस्थित रूप दिया और उनके नेतृत्व में ही आर.एस.एस. की पहुँच महाराष्ट्र के ब्राह्मणों से बाहर तक गयी। आर.एस.एस. सही मायनों में एक अखिल भारतीय संगठन गोलवलकर के नेतृत्व में ही बना। यही कारण है कि गोलवलकर आज भी संघ के लोगों में सबसे आदरणीय माने जाते हैं और अभी दो वर्ष पहले ही संघियों ने देश भर में उनकी जन्मशताब्दी मनायी थी।

आर.एस.एस. ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ किसी भी स्वतन्त्रता संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया। संघ हमेशा ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के साथ तालमेल करने के लिये तैयार था। उनका निशाना शुरू से ही मुसलमान, कम्युनिस्ट और ईसाई थे। लेकिन ब्रिटिश शासक कभी भी उनके निशाने पर नहीं थे। ‘भारत छोड़ो आन्दोलन‘ के दौरान संघ देशव्यापी उथल-पुथल में शामिल नहीं हुआ था। उल्टे जगह-जगह उसने इस आन्दोलन का बहिष्कार किया और अंग्रेज़ों का साथ दिया था। श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा बंगाल में अंग्रेज़ों के पक्ष में खुलकर बोलना इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण था। ग़लती से अगर कोई संघ का व्यक्ति अंग्रेज़ों द्वारा पकड़ा गया या गिरफ्तार किया गया तो हर बार उसने माफीनामा लिखते हुये ब्रिटिश शासन के प्रति अपनी वफादारी को दोहराया और हमेशा वफादार रहने का वायदा किया। स्वयं पूर्व प्रधानमन्‍त्री अटलबिहारी वाजपेयी ने भी यह काम किया। ऐसे संघियों की फेहरिस्त काफी लम्बी है जो माफीनामे लिख-लिखकर ब्रिटिश जेलों से बाहर आये और जिन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम सेनानियों के ख़िलाफ अंग्रेज़ों से मुख़बिरी करने का घिनौना काम तक किया।

ब्रिटिश उपनिवेशवादी राज्य ने भी इसी वफादारी का बदला चुकाया और हिन्दू साम्प्रदायिक फासीवादियों को कभी भी निशाना नहीं बनाया। संघ आज राष्ट्रवादी होने का चाहे जितना गुण गा ले वह स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल न होने और अंग्रेज़ों का साथ देने का दाग़ अपने दामन से कभी नहीं मिटा सकता है। इतिहास को फिर से लिखने के संघ के प्रयासों के पीछे का मुख्य कारण यही है। वे अपने ही इतिहास से डरते हैं। वे जानते हैं कि उनका इतिहास ग़द्दारियों और कायरताओं का एक काला इतिहास रहा है। हिंसा से उनको बहुत प्रेम है, लेकिन झुण्ड में पौरुष प्रदर्शन वाली हिंसा से। वे कभी किसी जनान्दोलन में शामिल नहीं हुये और उनमें किसी दमन को झेलने की ताक़त नहीं है। हमेशा सत्ता के साथ नाभिनालबद्ध रहते हुये व्यवस्था के ख़िलाफ लड़ने वालों पर कायराना हिंस्र हमले करना इनकी फितरत रही है। चाहे वे मुसलमान रहे हों, ईसाई या फिर कोई भी राजनीतिक विरोधी। बहादुराना संघर्ष से इनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहा है, कभी नहीं।

संघ का पूरा ढाँचा शुरू से ही फासीवादी रहा था। यह लम्बे समय तक सिर्फ पुरुषों के लिये ही खुला था। संघ की महिला शाखा बहुत बाद में बनायी गयी।

संघ का पूरा आन्तरिक ढाँचा हिटलर और मुसोलिनी की पार्टियों से हूबहू मेल खाता है। हर सदस्य यह शपथ लेता है कि वह सरसंघचालक के हर आदेश का बिना सवाल किये पालन करेगा। सरसंघचालक सबसे ऊपर होता है और उसके नीचे एक सरकार्यवाह होता है जिसे सरसंघचालक ही नियुक्त करता है। एक केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल होता है जिसे स्वयं सरसंघचालक चुनता है। अपना उत्तराधिकारी भी सरसंघचालक चुनता है। यानी पूरी तरह एक ‘कमाण्ड स्ट्रक्चर’ जिसमें जनवाद की कोई जगह नहीं है। नात्सी और फासीवादी पार्टी का पूरा ढाँचा इसी प्रकार का था। नात्सी पार्टी में ‘फ्यूहरर‘ के नाम पर शपथ ली जाती थी और फासीवादी पार्टी में ‘डयूस‘ के नाम पर शपथ ली जाती थी।

यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि यह हमेशा से सिर्फ हिन्दुओं के लिये खुला रहा है। यह खुले तौर पर कहता है कि यह हिन्दुओं के हितों की सेवा करने के लिये है। संघ ने कभी भी निचली जातियों या निचले वर्गों के हिन्दुओं के लिये कोई काम नहीं किया है। इनका समर्थन भी हमेशा से उजड़े टुटपुँजिया पूँजीपति वर्ग, नवधनाढ्यों और लम्पट सर्वहारा के बीच रहा है। संघ के सामाजिक आधार पर हम आगे आयेंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत में फासीवाद का अपना मौलिक संस्करण तैयार किया। इसकी हिटलर और मुसोलिनी के फासीवाद से काफी समानताएँ थीं और उनसे इन्होंने काफी कुछ सीखा। गोलवलकर अपनी पुस्तक ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड’ में लिखते हैं –”आज दुनिया की नज़रों में सबसे ज्यादा जो दूसरा राष्ट्र है, वह है जर्मनी। यह राष्ट्रवाद का बहुत ज्वलन्त उदाहरण है। आधुनिक जर्मनी कर्मरत है तथा जिस कार्य में वह लगा हुआ है, उसे काफी हद तक उसने हासिल भी कर लिया है… पितृभूमि के प्रति जर्मन गर्वबोध, जिसके प्रति उस जाति का परम्परागत लगाव रहा है, सच्ची राष्ट्रीयता का ज़रूरी तत्व है। आज वह राष्ट्रीयता जाग उठी है तथा उसने नये सिरे से विश्वयुद्ध छेड़ने का जोखिम उठाते हुये अपने ”पुरखों के क्षेत्र” पर एकजुट, अतुलनीय, विवादहीन, जर्मन साम्राज्य की स्थापना करने की ठान ली है।…” (गोलवलकर, ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड, पृ. 34-35)

गोलवलकर ने इसी पुस्तक में यहूदियों के कत्लेआम का भरपूर समर्थन किया और इसे भारत के लिये एक सबक मानते हुये लिखा – ”…अपनी जाति और संस्कृति की शुद्धता बनाये रखने के लिये जर्मनी ने देश से सामी जातियों – यहूदियों का सफाया करके विश्व को चौंका दिया है। जाति पर गर्वबोध यहाँ अपने सर्वोच्च रूप में व्यक्त हुआ है। जर्मनी ने यह भी बता दिया है कि सारी सदिच्छाओं के बावजूद जिन जातियों और संस्कृतियों के बीच मूलगामी फर्क हों, उन्हें एक रूप में कभी नहीं मिलाया जा सकता। हिन्दुस्तान में हम लोगों के लाभ के लिये यह एक अच्छा सबक है।” (गोलवलकर, वही, पृ. 35)।

हिटलर की इसी सोच को गोलवलकर भारत पर लागू कैसे करते हैं, देखिये : ”…जाति और संस्कृति की प्रशंसा के अलावा मन में कोई और विचार न लाना होगा, अर्थात हिन्दू राष्ट्रीय बन जाना होगा और हिन्दू जाति में मिलकर अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को गँवा देना होगा, या इस देश में पूरी तरह हिन्दू राष्ट्र की गुलामी करते हुये, बिना कोई माँग किये, बिना किसी प्रकार का विशेषाधिकार माँगे, विशेष व्यवहार की कामना करने की तो उम्मीद ही न करें; यहाँ तक कि बिना नागरिकता के अधिकार के रहना होगा। उनके लिये इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं छोड़ना चाहिये। हम एक प्राचीन राष्ट्र हैं। हमें उन विदेशी जातियों से जो हमारे देश में रह रही हैं उसी प्रकार निपटना चाहिये जैसे कि प्राचीन राष्ट्र विदेशी नस्लों से निपटा करते हैं।” (गोलवलकर, वही, पृ. 47-48)

बात बिल्कुल साफ है। मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति संघ के विचार वही हैं जो यहूदियों के प्रति हिटलर के थे।
(फासीवाद क्‍या है और इससे कैसे लड़ें – बि‍गुल पु‍स्‍तिका से)

Wednesday, July 17, 2013

जब भी मुँह खोलते हैं मोदी, देश को बाँटने वाली भाषा बोलते हैं

एल.एस.हरदेनिया

नरेन्द्र मोदी जब भी बोलते हैं, देश को बाँटने वाली बातें कहते हैं। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने कम से कम तीन आपत्तिजनक बातें कही हैं।

पहली आपत्तिजनक बात यह है कि उन्होंने सन् 2002 के राज्य प्रायोजित हत्याकाण्ड में मारे गये लोगों की तुलना कुत्ते के पिल्ले से की है। दूसरी आपत्तिजनक बात उन्होंने यह कही है कि वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं। तीसरी आपत्तिजनक बात यह कही कि कांग्रेस अपनी असफलताओं को छिपाने के लिये धर्मनिरपेक्षता का बुर्का ओड़ लेती है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि जो लोग कुत्तों को पालते हैं, उनके मरने पर उन्हें वैसा ही दुःख होता है जैसे उनके परिवार का कोई सदस्य चला गया हो। परन्तु यह भी एक वास्तविकता है कि जब कोई अपने दुश्मन के बारे में यह कहता है कि वह कुत्ते की मौत मरे, तो वह उसके प्रति अपनी गहरी घृणा प्रगट कर रहा होता है। कुत्ते की मौत बड़ी दर्दनाक होती है। बहुसंख्यक मामलों में, उसे मृत्यु के पूर्व भारी यंत्रणा से गुजरना पड़ता है। इसलिये मोदी ने जब 2002 में हुयी मौतों की तुलना कुत्ते के पिल्ले की मौत से की तो वे वास्तव में अपने मन की असली भावना को प्रगट कर रहे थे। वे मुसलमानों से अपने मन की गहराईयों से घृणा करते हैं। उनकी दिली इच्छा होगी कि सभी मुसलमानों को वैसी ही यंत्रणायुक्त मौत मिले, जैसी कुत्तों को मिलती है। वैसे भी, आज गुजरात में बहुसंख्यक मुसलमान जिस तरह की जिन्दगी जी रहे हैं जो आवारा कुत्ते की होती है। अहमदाबाद जैसे शहर में भी मुसलमानों की लगभग सभी बस्तियों में आज भी वे सुविधायें उपलब्ध नहीं हैं, जो एक नागरिक को मिलनी चाहिये। आज भी अनेक मुसलमान, जिन्हें 2002 में अपने गाँव छोड़ने पड़े थे, वे वापस नहीं आ पाये हैं। मैंने स्वयम् अहमदाबाद में मुसलमानों की एक ऐसी बस्ती देखी जिसकी गलियों में स्ट्रीट लाईट की व्यवस्था वहाँ के निवासियों को स्वयम् करनी पड़ी थी। इस तरह के भेदभाव के अनेक उदाहरण गुजरात के अनेक क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं।

उसी इंटरव्यू में, जिसमें मोदी ने कहा था कि कुत्ते के पिल्ले की मौत पर भी उन्हें दुःख होता है, उन्होंने यह भी कहा था, ‘‘चूँकि मैं हिन्दू हूँ और राष्ट्रवादी हूं इसलिये मैं हिन्दू राष्ट्रवादी हूँ। राष्ट्रवादी का एक अर्थ राष्ट्रभक्त भी होता है। इस तरह, यह कहकर कि वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं, मोदी ने राष्ट्रभक्तों के बीच विभाजन की रेखा खींच दी है। यदि हमारे देश में राष्ट्रभक्ति की पहचान धर्म के आधार पर होगी तो हमारे देश में विभिन्न प्रकार के राष्ट्रभक्त हो जायेंगे। यदि इस देश के कुछ नागरिक हिन्दू नेशनलिस्ट हैं, तो फिर मुस्लिम, ईसाई, सिक्ख, और बौद्ध और जैन नेशनलिस्ट भी होंगे। जब धर्म के आधार पर नेशनलिस्टों की पहचान होगी तब धर्म के आधार पर नेशन अर्थात राष्ट्र की पहचान भी होगी। इस तरह, हमारे देश में धर्म-आधारित अनेक राष्ट्र हो जायेंगे।

सबसे पहले विनायक दामोदर सावरकर ने कहा था कि भारत में दो राष्ट्र हैं-एक हिन्दू राष्ट्र और दूसरा मुस्लिम राष्ट्र। इसी बात को जिन्ना ने भी दोहराया था। सच पूछा जाए तो सावरकर द्वारा दी गयी राष्ट्रवाद की धर्म-आधारित परिभाषा ने ही हमारे देश का विभाजन किया था। फिर, सावरकर ने यह भी कहा था कि जिनकी जन्मभूमि और पुण्यभूमि भारत में है उन्हें ही भारत में रहने का अधिकार है। अर्थात् जिन धर्मों की उत्पत्ति भारत में हुयी थी उन्हें मानने वाले ही भारत में रह सकते हैं। इस तरह, भारत में हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध और जैन ही रह सकते हैं। इस परिभाषा ने ही मुसलमानों के मन में शंका पैदा की और उन्हें लगा कि आजाद भारत में उन्हें देश का नागरिक नहीं समझा जायेगा। मुसलमानों के एक वर्ग में उत्पन्न इसी शंका का लाभ उठाकर पाकिस्तान का नारा दिया गया और अन्ततः हमारे देश का विभाजन हुआ।

हिन्दू राष्ट्रवादी या मुस्लिम राष्ट्रवादी कहना वैसा ही है जैसे एक समय प्लेटफार्म पर हिन्दू चाय और मुस्लिम चाय या हिन्दू पानी और मुस्लिम पानी की आवाजें लगती थीं। सच पूछा जाय तो स्वयम् को हिन्दू राष्ट्रवादी कहकर, मोदी ने फिर देश के मानस को बांटने की कोशिश की है।

अभी कुछ दिन पहले, मोदी ने एक और विवादग्रस्त बयान दिया था। उन्होंने कहा कि जब भी कांग्रेस की आलोचना होती है कांग्रेस, धर्मनिरपेक्षता के बुर्के से अपना चेहरा ढँक लेती है। यह प्रायः देखा गया है कि मोदी जब भी कोई बात करते हैं या किसी की आलोचना करते हैं तो मुस्लिम प्रतीकों का उपयोग करते हैं। एक समय था जब वे कहा करते थे कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं परन्तु यह एक वास्तविकता है कि सभी आतंकवादी, मुसलमान हैं। मोदी अपने व्यवहार में, अपनी बातचीत के लहजे में, हिटलर की नकल करते हैं। हिटलर का एक सिद्धान्त था कि एक झूठ की बार-बार पुनरावृत्ति करो तो वह आम आदमी को सच प्रतीत होने लगता है। इसलिये, यह जानते हुये भी कि वे झूठ बोल रहे हैं, वे उसे बार-बार दोहराते हैं। उन्होंने एक झूठ और बोला है। वे देश की बढ़ती हुयी आबादी का जिक्र करते हुये उसका दोष मुसलमानों पर थोपते हैं। इस बारे में वे मुसलमानों की तरफ इशारा करते हुये कहते हैं कि ‘‘हम पांच, हमारे पच्चीस’’। इसका अर्थ होता है कि एक मुसलमान पुरूष की चार बीवियाँ होती हैं और फिर उनसे 25 सन्ताने होती हैं। इससे बड़ा झूठ और कोई नहीं हो सकता। परन्तु मोदी जानते हैं कि एक झूठ को बार-बार कहने से वह सच प्रतीत होने लगता है। इस तरह, समस्या कुछ भी हो, वे उसका दोषरोपण मुसलमानों पर कर देते हैं।

मोदी को समझना चाहिये कि धर्मनिरपेक्षता, भारतीय राष्ट्र की बुनियाद है। सभी को उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता रखनी चाहिये। धर्मनिरपेक्षता मखौल की वस्तु नहीं है। मोदी राष्ट्रीय स्वयम्सेवक संघ के प्रशिक्षित स्वयम्सेवक हैं। स्वयम् राष्ट्रीय स्वयम्सेवक संघ ने कभी भी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्त को स्वीकार नहीं किया। संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरू गोलवलकरसमेत सभी संघ प्रमुखों ने यह कहा है कि धर्मनिरपेक्षता, भारतीय राष्ट्र का आधार हो ही नहीं सकती। अभी भी संघ के नेताओं के भाषणों और उनके प्रकाशनों में धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाया जाता है। भारतीय जनता पार्टी समेत संघ से जुड़े अनेक संगठन, धर्मनिरपेक्षता में आस्था रखने वालों को छद्म धर्मनिरपेक्षवादी कहते हैं। इस तरह मोदी ने बुर्के को धर्मनिरपेक्षता से जोड़कर, धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाया है। मोदी इस बात को भूल जाते हैं कि उन्होंने उस संविधान की रक्षा की शपथ ली है जिसका मूल आधार धर्मनिरपेक्षता है। इसके बावजूद यदि वे धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाते हैं तो सच पूछा जाए तो वे संविधान का अपमान करते हैं। और यदि ऐसा व्यक्ति जिसने स्वयम् संविधान की रक्षा की शपथ ली है वह उस शपथ के विपरीत आचरण करे तो वह उस पद पर बने रहने की पात्रता खो देता है। जिस संविधान के प्रावधानों के अन्तर्गत वे विधायक और मुख्यमंत्री बने हैं, उस संविधान का मखौल बनाने का उन्हें अधिकार नहीं है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं। एल.एस.हरदेनिया। लेखक वरिष्ठ 
पत्रकार व धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं। L. S. Hardenia. As a professional journalist, a trade unionist, and officer of organizations like Sarvadhrma Sadbhav Samiti, Samprdayikta Virodhi Committee, Qaumi Ekta Trust, National Secular Forum, Centre for Study of Society and Secularism, and Madhya Pradesh government’s National Integration Committee, for many years.
स्त्रोत : हस्तक्षेप डॉट कॉम, 17/07/2013 |

Friday, May 10, 2013

दलित-आदिवासी और स्त्रियों का धर्म आधारित उत्पीड़न हमारी चिन्ता क्यों नहीं?

तत्काल समाधान हेतु इस देश में यदि आज सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वो है, देश के पच्चीस फीसदी दलितों और आदिवासियों और अड़तालीस फीसदी महिला आबादी को वास्तव में सम्मान, संवैधानिक समानता, सुरक्षा और हर क्षेत्र में पारदर्शी न्याय प्रदान करना और यदि सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वो है-दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को धर्म के नाम पर हर दिन अपमानित, शोषित और उत्पीड़ित किया जाना। यही नहीं इस देश में आज की तारीख में यदि सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न कर रहे हैं और जिन्हें धर्म और संस्द्भति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सहयोग प्रदान करते रहते हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पिछले कुछ समय से मीडिया की मेहरबानी से कुछ चतुर, चालाक, भ्रष्ट और कट्टरपंथी ताकतों ने देश की राजधानी नयी दिल्ली को अपनी प्रायोजित ताकत दिखाने और संवैधानिक सरकारों को बदनाम करने का नया तरीका ईजाद कर लिया है। जिसकी बड़ी और सार्वजनिक शुरुआत अन्ना हजारे आन्दोलन के समय हुई। इस आन्दोलन को कथित रूप से विदेशी ताकतों और देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों का खुला समर्थन था। कुछ ही समय में इस कथित जन आन्दोलन की और इसके कर्ताधर्ताओं की चारित्रिक सच्चाई देश के सामने आ गयी।

इसी प्रायोजित नाटक का सहारा प्रारम्भ से ही तथाकथित योग गुरू बाबा रामदेव भी लेते रहे हैं, लेकिन उसका शोषक व्यापारी का घिनौना चेहरा भी देश के समक्ष आ चुका है। यही नहीं देश यह भी जान चुका है कि इन तथाकथित योग गुरू का असली मकसद देश में साम्प्रदायिक और फासीवादी ताकतों को मजबूत करना तथा देश के धर्म-निरपेक्ष ढांचे का ध्वस्त करना है। यही नहीं वह जनता से प्राप्त अनुदान और योग-शुल्क के मार्फत एकत्रित राशि में से चुनावों के समय भारतीय जनता पार्टी को आर्थिक सहयोग करते रहे हैं।

इसी क्रम में अन्ना हजारे से अलग होकर अरविन्द केजरीवाल ने अपनी नयी दुकान ‘‘आम आदमी’’ के नाम पर खोल ली है और वो न मात्र भारत के लोगों को देश की संवैधानिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ सरेआम भड़का और उकसा रहे हैं, बल्कि इसके साथ-साथ ‘‘आम आदमी पार्टी’’ बनाकर, आम आदमी के नाम का भी दुरूपयोग कर रहे हैं। जबकि इस पार्टी के नीति नियंताओं में कोई भी आम आदमी नहीं है!

ये और कि इन जैसे सभी लोगों के कथित जनान्दोलनों का भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अर्थात् आरएसएस और आरएसएस के अनुसांगिक सभी संगठन, जिनमें बजरंग दल, विश्‍व हिन्दू परिषद, दुर्गा वाहिनी आदि प्रमुख हैं, खुलकर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सक्रिय सहयोग करते रहे हैं और ये सब मिलकर हर छोटे बड़े मुद्दे को सुनियोजित तरीके से मीडिया के मार्फत राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का हरसंभव अनैतिक प्रयास करते रहे हैं।

लेकिन आश्‍चर्यजनक तथ्य ये है कि भारतीय जनता पार्टी, आरएसएस और आरएसएस के अनुसांगिक संगठनों सहित ऐसी ताकतें, जो अपने आप को राष्ट्रवादी, देशभक्त और हिन्दुत्ववादी संस्कृति की संरक्षक बतलाती हैं, आश्‍चर्यजनक रूप से उस समय लम्बा मौन साध लेती हैं, जबकि दलितों, आदिवासियों और गरीब एवं पिछड़े वर्गों की स्त्रियों का सरेआम शोषण और उत्पीड़न होता है। बल्कि कड़वी सच्चाई तो ये है कि इन्हीं तथाकथित राष्ट्रवादी, देशभक्त और हिन्दुत्ववादी ताकतों के इशारों या इनके सक्रिय सहयोग और इन्हीं के उकसावे पर हर दिन देशभर में दलितों, आदिवासियों और गरीब एवं पिछड़े वर्गों की स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता रहता है। देश में हर दिन कहीं न कहीं दलितों और आदिवासियों की लड़कियों के साथ गैंग-रेप किये जा रहे हैं। दलितों और आदिवासियों का सार्वजनिक रूप से उत्पीड़न किया जाता है। उनको अमानवीय त्रासदियॉं दी जाती हैं।

कभी मंदिरों से धक्के देकर बाहर भगा दिया जाता है तो कभी बलात्कार करने में असफल होने पर दलितों और आदिवासियों की पीड़ित औरतों को विरोध करने के कारण जिन्दा जला दिया जाता है। कभी होटलों में खाना खाने की हिमाकत करने पर दलितों और आदिवासियों को अपमानित करके सरेआम सड़कों पर घसीटा जाता है। नाईयों को बाल नहीं काटने दिये जाते हैं। सार्वजनिक नल-कूपों से पानी नहीं भरने दिया जाता है। इन सब असंवैधानिक और मनमानियों को क्रियान्वित करने की आज्ञा जिन झूठे और ढोंगी ग्रंथों में दी गयी है, उन कथित धर्म ग्रंथों का सरकार और प्रशासन की नाक के नीचे, बल्कि सरकार और प्रशासन के सहयोग से हर दिन कहीं न कहीं और टीवी पर पूरे उत्साह के साथ और सार्वजनिक रूप से पठन-पाठन किया जाता है। इसी प्रकार से दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और स्त्रियों के साथ इतिहास में किये गये अन्याय के मुख्य खलनायकों का भी सार्वजनिक रूप से महिमामंडन किया जाता है।

इस प्रकार तत्काल समाधान हेतु इस देश में यदि आज सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वो है, देश के पच्चीस फीसदी दलितों और आदिवासियों और अड़तालीस फीसदी महिला आबादी को वास्तव में सम्मान, संवैधानिक समानता, सुरक्षा और हर क्षेत्र में पारदर्शी न्याय प्रदान करना और यदि सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वो है-दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को हर दिन धर्म के नाम पर अपमानित, शोषित और उत्पीड़ित किया जाना। यही नहीं इस देश में आज की तारीख में यदि सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न कर रहे हैं और जिन्हें धर्म और संस्कृति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सहयोग प्रदान करते रहते हैं।

अत: हमारे देश में भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर उपरोक्त प्रकार के अन्यायों से देश के शोषित लोगों का ध्यान भटकाया जाता है। असल में आज सबसे बड़ी जरूरत है कि हम इस बात को समझें कि इस देश की तकरीबन नब्बे फीसदी से अधिक आबादी लगातार अभावों में जीने को विवश है। अत: हमें देश के कर्णधारों से इस बात के लिये सवाल करना होगा कि उन्हें देश की बहुसंख्यक आबादी की चिन्ता क्यों नहीं है। यदि जन-आन्दोलनों या बाबा रामदेव जैसों द्वारा योग के नाम पर भटकाया जावे तो इस देश के दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को सबसे पहले उनसे भी उपरोक्त सवाल पूछने चाहिये।

-लेखक : होम्योपैथ चिकित्सक, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिसट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) और संगठित षड़यंत्र के चलते जिला जज ने उम्र कैद की सजा सुनाई, चार वर्ष से अधिक समय चार-जेलों में व्यतीत किया। हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने दोषमुक्त/निर्दोष ठहराया। मोबाइल : 085619-55619, 098285-02666

Sunday, April 7, 2013

मीडिया मैनेजमेंट की उपज है नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय कद !

मीडिया मैनेजमेंट की उपज है नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय कद!
मोदी को भाजपा का आइकन बनाने में मीडिया की कितनी बड़ी भूमिका है, इसका अंदाजा आप इसी बात ये लगा सकते हैं कि हाल ही में एक टीवी चैनल पर लाइव बहस के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार ने मोदी को अपरिहार्य आंधी कह कर इतनी सुंदर और अलंकारयुक्त व्याख्या की, जितनी कि पैनल डिस्कशन में मौजूद भाजपा नेता भी नहीं कर पाए। आखिर एंकर को कहना पड़ा कि आपने तो भाजपाइयों को ही पीछ़े छोड़ दिया। इतना शानदार प्रोजेक्शन तो भाजपाई भी नहीं कर पाए। हो सकता है उस पत्रकार अपनी निजी सोच वैसी ही हो जैसा वह बोल रहा था लेकिन एक हकीकत यह भी है कि मोदी ने मीडिया मैनजमेन्ट पर जितना ध्यान दिया है उतना और किसी दूसरे काम पर नहीं। पिछले छह सालों में मोदी की ओर से टेलीवीजन और न्यू मीडिया को साधने की जमकर कोशिश की गई है। उसी का परिणाम है कि मोदी के जितने मित्र और समर्थक उनकी अपनी पार्टी भाजपा में नहीं हैं उससे ज्यादा मीडिया में हैं। मोदी और उनकी टीम द्वारा मीडिया में जनसंपर्क का जो सघन अभियान चलाया गया उसका सुखद परिणाम आज मोदी के सामने है।
तेजवानी गिरीधर

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्तमान में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में सबसे आगे आ चुके हैं, इसमें अब कोई दो राय नहीं हो सकती। मगर जितना सच यह है उतना ही सच यह भी है कि यह सब मीडिया का किया धरा है और जो कुछ है वह सब मोदी के मीडिया मैनेजमेंट का कमाल है। आज भले ही निचले स्तर पर भाजपा के कार्यकर्ताओं को मोदी में ही पार्टी के तारणहार के दर्शन हो रहे हों, मगर सच ये है कि उन्हें भाजपा नेतृत्व ने जितना प्रोजेक्ट नहीं किया, उससे कई गुना अधिक मीडिया ने शोर मचाया है। जैसा कि हमारे देश में भेड़चाल का चलन है, इसी प्रोपेगंडा से प्रभावित होकर भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेता, छुटभैये और कार्यकर्ता उनके नाम की रट लगाए हुए हैं।

उनके विकास का मॉडल भी धरातल पर उतना वास्तविक नहीं है, जितना की मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने खड़ा किया है। इसका बाद में खुलासा भी हुआ। पता लगा कि ट्विटर पर उनकी जितनी फेन्स फॉलोइंग है, उसमें तकरीबन आधे फाल्स हैं। फेसबुक पर ही देख लीजिए। मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने वाली पोस्ट बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से डाली जाती रही हैं। गौर से देखें तो साफ नजर आता है कि इसके लिए कोई प्रोफेशनल्स बैठाए गए हैं, जिनका कि काम पूरे दिन केवल मोदी को ही प्रोजेक्ट करना है। बाकी कसर भेड़चाल ने पूरी कर दी। हां, इतना जरूर है कि चूंकि भाजपा के पास कोई दमदार चेहरा नहीं है, इस कारण मोदी की थोड़ी सी भी चमक भाजपा कार्यकर्ताओं को कुछ ज्यादा की चमकदार नजर आने लगती है। शाइनिंग इंडिया व लोह पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी का बूम फेल हो जाने के बाद यूं भी भाजपाइयों को किसी नए आइकन की जरूरत थी, जिसे कि मोदी के जरिए पूरा करने की कोशिश की जा रही है।

आपको जानकारी होगी कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने की शुरुआत उनके तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने से पहले की शुरू हो गई थी। मुख्यमंत्री पद पर फिर काबिज होने के लिए मोदी ने मीडिया के जरिए ऐसा मायाजाल फैलाया कि विशेष रूप से गुजरात में उनके पक्ष में एक लहर सी चलने लगी। और जीतने के बाद तो मानो भूचाल ही आ गया। सच तो ये है कि प्रधानमंत्री पद के दावेदारों तक ने कभी अपनी ओर से यह नहीं कहा कि मोदी भी दावेदार हैं। वे कहने भी क्यों लगे। मीडिया ने ही उनके मुंह में जबरन मोदी का नाम ठूंसा। मीडिया ही सवाल खड़े करता था कि क्या मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं तो भाजपा नेताओं को मजबूरी में यह कहना ही पड़ता था कि हां, वे प्रधानमंत्री पद के योग्य हैं। इक्का-दुक्का को छोड़ कर अधिसंख्य भाजपा नेताओं ने कभी ये नहीं कहा कि मोदी ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं। वे यही कहते रहे कि भाजपा में मोदी सहित एकाधिक योग्य दावेदार हो सकते हैं। और इसी को मीडिया ने यह कह कर प्रचारित किया कि मोदी प्रबल दावेदार हैं। सीधी सी बात है कि भला कौन यह कहता कि नहीं, वे इस पद के योग्य नहीं हैं अथवा दावेदार नहीं हो सकते। और आज हालत ये है कि चारों ओर मोदी की ही आंधी चल पड़ी है।

मोदी को भाजपा का आइकन बनाने में मीडिया की कितनी बड़ी भूमिका है, इसका अंदाजा आप इसी बात ये लगा सकते हैं कि हाल ही में एक टीवी चैनल पर लाइव बहस के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार ने मोदी को अपरिहार्य आंधी कह कर इतनी सुंदर और अलंकारयुक्त व्याख्या की, जितनी कि पैनल डिस्कशन में मौजूद भाजपा नेता भी नहीं कर पाए। आखिर एंकर को कहना पड़ा कि आपने तो भाजपाइयों को ही पीछ़े छोड़ दिया। इतना शानदार प्रोजेक्शन तो भाजपाई भी नहीं कर पाए। हो सकता है उस पत्रकार अपनी निजी सोच वैसी ही हो जैसा वह बोल रहा था लेकिन एक हकीकत यह भी है कि मोदी ने मीडिया मैनजमेन्ट पर जितना ध्यान दिया है उतना और किसी दूसरे काम पर नहीं। पिछले छह सालों में मोदी की ओर से टेलीवीजन और न्यू मीडिया को साधने की जमकर कोशिश की गई है। उसी का परिणाम है कि मोदी के जितने मित्र और समर्थक उनकी अपनी पार्टी भाजपा में नहीं हैं उससे ज्यादा मीडिया में हैं। मोदी और उनकी टीम द्वारा मीडिया में जनसंपर्क का जो सघन अभियान चलाया गया उसका सुखद परिणाम आज मोदी के सामने है।

यह मीडिया की ही देन है कि हाल ही अमरीकी प्रतिनिधिमंडल की मोदी से मुलाकात को इस रूप में स्थापित करने की कोशिश की कि अब अमरीका का रुख मोदी के प्रति सकारात्मक हो गया है। उन्हें अमरीका अपने यहां बुलाने को आतुर है। बाद में पता लगा कि वह प्रतिनिधिमंडल अधिकृत नहीं था और एक टूर प्रोग्राम के तहत उस प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से राशि वसूली गई थी। खैर, जहां तक उनके लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का सवाल है तो वे पहले व्यक्ति नहीं है। और भी उदाहरण हैं। और लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना यानि प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो जाना भी गले उतरने वाली बात नहीं है। इसी प्रकार इस बार जब मोदी को भाजपा संसदीय दल में शामिल किया गया तो मीडिया ने उसे इतना उछाला है, मानो कोई अजूबा हो गया है। संसदीय बोर्ड में तो वे पहले भी रहे हैं।

भाजपा के थिंक टैंक रहे गोविंदाचार्य ने इसको कुछ इस तरीके से कहा है-मोदी 6 साल पहले भी संसदीय बोर्ड में थे और अगर फिर उनको शामिल कर दिया गया है तो इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई है। गोविंदाचार्य ने आगे कहा कि मोदी को देश के बारे में कोई ठोस समझ नहीं है, मीडिया प्रबंधन की वजह से कई बार व्यक्ति पद तो पा जाता है, लेकिन काम नहीं कर पाता। अभी मोदी को बहुत कुछ सीखने और समझने की जरूरत है। जरूरी नहीं की जो अच्छा पत्रकार हो वो अच्छा सम्पादक ही हो जाए या अच्छा अध्यापक बहुत अच्छा प्रधानाध्यापक बन जाए, उसी तरह जरूरी नहीं की एक अच्छा मुख्यमंत्री, अच्छा प्रधानमंत्री ही बन जाए।

कुल मिला कर आज हालत ये हो गई है कि मोदी भाजपा नेतृत्व और संघ के लिए अपरिहार्य हो गए हैं। व्यक्ति गौण व विचारधारा अहम के सिद्धांत वाली पार्टी तक में एक व्यक्ति इतना हावी हो गया है, उसके अलावा कोई और दावेदार नजर ही नहीं आता। संघ के दबाव में फिर से हार्ड कोर हिंदूवाद की ओर लौटती भाजपा को भी उनमें अपना भविष्य नजर आने लगा है। यह दीगर बात है कि उनके प्रति आम सहमति बन पाती है या नहीं, उसकी घोषणा करना मीडिया की जिम्मेदारी नहीं, फिर भी वह करने से बाज नहीं आ रहा। सहयोगी दलों की स्वीकार्यता तो अभी दूर की कौड़ी है।
स्त्रोत : राजनामा, 

Friday, January 11, 2013

ऐसे लोगों का महिलाएं करें बहिष्कार!



नई दिल्ली में गत् 16 दिसंबर की रात एक 23 वर्षीय छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म तथा उसकी सिंगापुर में हुई मौत के बाद जहां देश व दुनिया में इसकी घोर निंदा की जा रही है तथा ऐसे बलात्कारियों के विरुद्ध कठोरतम सज़ा का प्रावधान किए जाने की मांग की जा रही है वहीं देश के कई तथाकथित संत-महात्मा, राजनीतिज्ञ, व जाने-माने लोग इस अति संवेदनशील व गंभीर विषय पर अपने तरह-तरह के हास्यास्पद व विवादास्पद बयान देने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। विभिन्न प्रकार की नकारात्मक बातें भी की जा रही हैं। इस क्रम में जहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक के प्रमुख एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवादी विचारधारा के स्वयंभू संर
क्षक मोहन भागवत ने देश की शहरी संस्कृति व सभ्यता पर निशाना साधते हुए यह कहा था कि बलात्कार इंडिया में अधिक होते हैं भारत में नहीं। गोया उनके कहने का सीधा तात्पर्य यही था कि आधुनिकता व प्रगतिशीलता के इस युगा में भी देश की महिलाएं कल्पना चावला व सुनीता विलियम्स तथा किरण बेदी जैसी शिक्षित महिलाओं को अपना आदर्श मानने के बजाए आज भी गांव की सीधी-सादी, भोली-भाली व खेती, पशुपालन व चूल्हा-चक्की में लगी रहने वाली महिलाओं का ही अनुसरण करें। 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ही दूसरे सदस्य तथा मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के नेता व प्रदेश के एक प्रमुख मंत्री विजयवर्गीय ने तो दिल्ली गौंगरेप के संदर्भ में यहां तक कह डाला कि यदि लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन होगा तो सामने रावण आ ही जाएगा। गोया उन्होंने महिलाओं को सीमाओं के भीतर रहने की हिदायत दी। भागवत व विजयवर्गीय दोनों के बयानों में का$फी समानता है। यह तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवादी आज भी रूढ़ीवादी सोच में जकड़े हुए हैं तथा महिलाओं को भी मात्र बंधक, गुलाम या दासी बनाकर रखे जाने के ही पक्षधर हैं। तभी तो मोहन भागवत कई जगहों पर अपने स्वागत के दौरान महिलाओं से अपने चरण धुलवाते देखे गए हैं। यानी नारी को दासी बनाए रखने की यही प्राचीन प्रथा इन्हें सुहाती है। औरतों का स्कूल-कॉलेज जाना, शिक्षित होना, आत्मनिर्भर होना, आधुनिकता के मार्ग पर चलना शायद इन्हें रास नहीं आता। इसके बावजूद दुर्गावाहिनी तथा अन्य महिला प्रकोष्ठ बनाकर यही संघ महिलाओं में सांप्रदायिकता का ज़हर भरने तथा इन्हें आत्मरक्षा के नाम पर सांप्रदायिक दंगों में सक्रिय होने का प्रशिक्षण देने से भी बाज़ नहीं आता।

अब एक और धर्म व अध्यात्म का कथित पाठ पढ़ाने वाले संत आसाराम ने इसी गैंगरेप कांड के संदर्भ में कुछ ऐसी निरर्थक व महिलाओं के प्रति असम्मानजनक बातें की हैं जिससे न केवल महिलाओं को आसाराम बापू के वक्तव्य से घोर निराशा हाथ लगी है बल्कि इससे उनकी भी महिला विरोधी मानसिकता का सा$फ पता चल गया है। $गैरतलब है कि आसाराम स्वयं भी कई बार महिला उत्पीडऩ तथा व्यभिचार संबंधी मामलों में मीडिया व समाचार पत्रों के निशाने पर रह चुके हैं। परंतु उनके ऊंचे रुसू$ख तथा धनबल व बड़े पैमाने पर उनके अनुयायी होने के चलते बार-बार वे ऐसी घटनाओं पर पर्दा डालने में सफल रहे हैं। परंतु अपनी महिला विरोधी घटिया मानसिकता से वे बाज़ आने का अब भी नाम नहीं लेते। दिल्ली कांड के संदर्भ में संत आसाराम की राय है कि मृतक व पीडि़ता लडक़ी को उन बलात्कारी दरिंदों में से किन्हीं दो को अपना भाई बना लेना चाहिए था। उनके पैर पकडक़र उनसे सहायता की गुहार करनी चाहिए थी। इतना ही नहीं बल्कि यह कथित संत यह भी $फरमाते हैं कि तालियां दोनों हाथों से बजती हैं। गोया इस दरिंदगीपूर्ण घटना में मृतक लडक़ी भी बलात्कारियों व कातिलों के साथ-साथ बराबर की दोषी थी।

ऐसा मानना है घोर निराशा फैलाने वाले आसाराम का। वे यह भी कहते हैं कि लडक़ी को घटना के समय ईश्वर का नाम लेना चाहिए था। इतना ही नहीं बल्कि एक ओर जबकि पूरा देश इस हादसे से स्तब्ध है, पूरे देश में इस घटना को लेकर व्यापक रूप से गुस्से की लहर दौड़ती देखी जा रही है तथा पूरा देश एक स्वर से कठोरतम कानून बनाने की मांग कर रहा है। यहां तक कि ऐसे बलात्कारियों को फांसी की सज़ा दिए जाने की मांग तक ज़ोर पकड़ रही है ऐसे में संत आसाराम फांसी जैसे सख्त कानून के विरुद्ध खड़े हो गए हैं। उनकी हमदर्दी फांसी पर लटकाए जाने वाले दुष्कर्मियों के परिवारजनों के साथ है। वे कहते हैं कि जिसको फांसी दी जाती है उसकी पत्नी, मां-बाप, बहन-भाई और बच्चे जीते-जी मर जाते हैं। 

बहरहाल, आसाराम के इस विवादास्पद बयान के बाद पूरे देश में उनके विरुद्ध आक्रोश फैल गया है। यहां तक कि उनके गृह राज्य गुजरात में उनके विरुद्ध कई स्थानों पर प्रदर्शन किए गए तथा अहमदाबाद के यशोदानगर क्षेत्र में प्रदर्शनकारियों द्वारा उनका पुतला भी फंूका गया। अहमदाबाद में ही उनके पोस्टर में उनके मुंह पर कालिख पोती गई। बिहार के मुजफ्फरपुर में उनके इसी वक्तव्य हो लेकर एक अदालत में महिलाओं के स्वाभिमान पर सीधा कुठाराघात करने संबंधी मुकद्दमा भी दर्ज हुआ है। परंतु अपने कटु एवं विवादित तथा महिला विरोधी वचनों को संभवत: ईश्वरीय वचन समझने वाले इस विवादित तथाकथित संत को अपनी आलोचना सुनना पसंद नहीं आया। और उपरोक्त विवादित बयान दिए जाने के बाद तथा इन बयानों पर आने वाली प्रतिक्रियाएं, आलोचनाएं, तथा अपने विरुद्ध हो रहे व्यापक आक्रोश व प्रदर्शन की

खबरें सुनने के बाद उन्होंने अपने अगले ‘प्रवचन’ में अपने आलोचकों को कुत्ता तक कह डाला। उन्होंने कहा कि ‘जब हाथी चलता है तो पहले एक कुत्ता भौंकता है, फिर दूसरा भौंकता है और जल्द ही पड़ोस के सभी कुत्ते भौंकने लगते हैं। यदि हाथी कुत्तों के पीछे दौड़ता है तो कुत्तों का महत्व बढ़ता है। इस वजह से हाथी पीछे नहीं मुड़ता। बल्कि आगे ही बढ़ता जाता है। लिहाज़ा मुझे क्यों कुत्तों के पीछे लगना चाहिए’। आसाराम ने अपने अति निम्रसतरीय प्रवचन को यहीं पर नहीं रोका बल्कि उन्होंने सख्त कानून बनाए जाने के संदर्भ में एक ऐसा वाक्य प्रयोग किया जिसमें औरत के साथ उन्होंने ‘बाज़ारू’ शब्द का भी इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए कानून का दुरुपयोग कर सकते हैं और इसके लिए ‘बाज़ारू’ औरतों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। 

पूरे देश को भी भलीभांति मालूम है कि बच्चों की हत्याओं, संपत्ति विवाद, अनधिकृत रूप से अपने आश्रम के लिए ज़मीन पर कब्ज़े किए जाने तथा व्याभिचार संबंधी अनेक मामलों में आसाराम तथा उनके पुत्र दोनों के ही नाम कई बार उजागर हो चुके हैं। परंतु अपने ‘लंबे हाथों’ के चलते बार-बार इनके विरुद्ध कई मामले रफा-दफा हो गए तथा कई अब भी विचाराधीन हैं। सवाल यह है कि ऐसा संत आखिर इतना संदिग्ध, विवादित तथा बड़बोला होने के बावजूद भी क्योंकर लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है? यदि हम इस विषय पर गहरी नज़र डालें तो इसमें भी हमें सबसे अधिक दोष महिलाओं का ही मिलेगा। महिला विरोधी मानसिकता रखने वाले ऐसे एक आसाराम ही नहीं बल्कि तमाम तथाकथित संतों, सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों, रूढ़ीवादियों तथा महिला विरोधी मानसिकता रखने वाले लोगों को दरअसल महिलाएं ही प्रोत्साहित करती हैं।

इनके सत्संगों, प्रवचनों तथा इनकी सभाओं में जाकर महिलाएं ही बेवजह तथा बिना किसी बात को समझे-बूझे हुए कई महिलाएं नाचने लगती हैं तो कभी तालियां बजाती रहती हैं। महिला विरोधी मानसिकता रखने वाले तथा राक्षसी प्रवृति के ऐसे तमाम लोगों को महिलाएं भी भगवान समझने लगती हैं। इतना ही नहीं तमाम अंधभक्त महिलाएं तो इनके चरणों के धुले हुए पानी को भी अमृत समझकर पी जाती हैं। तमाम महिलाएं इनके आश्रमों की दासियां बने रहने में स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती हैं। ऐसे लोगों के चित्र अपने घरों के मंदिरों में महिलाएं इस प्रकार स्थापित करती हैं, गोया भगवान या किसी देवी-देवता का चित्र स्थापित कर दिया गया हो। 

ज़ाहिर है अपना इतना अधिक आदर, मान-सम्मान व असीमित सत्कार होता देख आसाराम क्या कोई भी व्यक्ति स्वयं को ईश्वर, भगवान या देवता ही समझने लगेगा। और उसके पश्चात वह अपनी मानसिकता के अनुरूप जब और जो चाहेगा बकवास करता रहेगा और यह उम्मीद भी रखेगा कि उसके मुंह से निकले प्रत्येक अपशब्द को भी ईश्वरीय वचन के रूप में हमारे अंधभक्त स्वीकर करें। और जो इनकी आलोचना करे वह ‘कुत्ते’ के समान है। महिलाओं को नीचा दिखाने वाले ऐसे महापुरुष अपनी तुलना हाथी जैसे जानवर से भी करने लग जाते हैं। उनके पूरे वक्तव्य में मुझे तो सुखद केवल यही लगा कि उन्होंने भले ही हाथी से अपनी तुलना की परंतु कम से कम अपने जानवर होने का एहसास तो उन्होंने व्यक्त कर ही दिया। अपने आलोचकों को उनहोंने कुत्तों की संज्ञा भी ज़रूर दी परंतु संभवत: उन्हें कुत्तों की वफादारी का ज्ञान नहीं है। कुल मिलाकर देश की महिलाओं द्वारा ऐसे लोगों से न केवल सचेत रहने बल्कि इनका बहिष्कार करने तथा जगह-जगह पर इनका प्रबल विरोध किए जाने की सख्त ज़रूरत है। दरअसल यह वही पीर हैं जिनके बारे में यह कहा गया है कि औरतों का पीर कभी भूखा नहीं मरता। लिहाज़ा अब औरतों को संगठित होकर ऐसे निचली मानसिकता रखने वाले तथाकथित पीरों को यह बता देना चाहिए कि अब औरतें मानसिक रूप से शिक्षित व जागरूक हो चुकी हैं तथा अब वह किसी ऐसे ढोंगी संतों, महात्माओं एवं कथित राष्ट्रवादियों के अध्यात्मवाद या राष्ट्रवाद के ढोंगपूर्ण झांसों में नहीं आने वाली। स्त्रोत : Thursday 10 January 2013 | क्रांति 4 पीपुल 
लेखिका : निर्मल रानी, अंबाला में रहनेवाली निर्मल रानी पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं.

Thursday, November 1, 2012

मुनवादी लोगों ने दलित जोड़ों को मन्दिर से अपमानित कर भगाया!

यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि देश में अमन-चैन बना रहे और समाज के सभी दबे-कुचले लोग तरक्की करें और सम्मान के साथ जीवन यापन करें तो हमें मनुवाद को तत्काल प्रतिबन्धित करने और मुनवादी कुकृत्यों को अंजाम देने वालों को देशद्रोही के समान दण्डनीय अपराध घोषित करने की सख्त जरूरत है| जिसके लिये संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 13 (1) एवं 13 (3) में सरकार को सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं| यदि सरकार में राजनैतिक इच्छा-शक्ति हो तो इस प्रावधान के तहत मनुवादी दैत्य को नेस्तनाबूद किया जा सकता है| लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है, जिसके पीछे हर पार्टी में मनुवादियों का वर्चस्व होना बड़ा कारण है|
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

राजस्थान के अजमेर सम्भाग मुख्यालय से प्रकाशित प्रमुख समाचार-पत्र ‘‘दैनिक नवज्योति’’ 29 अक्टूबर, 2012 के अंक के मुखपृष्ठ पर-‘‘दलित जोड़ों को धक्के मारकर मन्दिर से निकाला’’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित हुआ है| जिसमें कहा गया है कि 26 अक्टूबर को अनुसूचित जाति के दो नवविवाहित जोड़े मन्दिर में भगवान के समक्ष नतमस्तक होकर (जिसे स्थानीय आंचलिक बोली में ‘धोक देना’ कहा जाता है) आशीर्वाद लेने गये, लेकिन मन्दिर के पुजारी सहित कुछ मनुवादी लोगों ने और कुछ महिलाओं ने मिलकर न मात्र उन्हें मन्दिर से धक्के देकर बाहर कर दिया, बल्कि उनके साथ जाति सूचक शब्दों का अभद्रतापूर्ण तरीके से उपयोग करते हुए गाली-गलोंच भी की गयी और उन्हें मन्दिर से निकाल दिया गया| इस मामले में खेतड़ीनगर पुलिस ने आठ लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया है| 

Manwadi System
इस मामले में जानकारी करने पर सूत्रों का कहना है कि अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल ‘मेघवाल’ जाति के लोगों को स्थानीय सवर्ण जाति के लोग मन्दिरों में प्रवेश नहीं करने देते हैं और जब भी इन लोगों को में से किसी को मन्दिर में स्थापित भगवान का आशीर्वाद लेना होता है तो मन्दिर के सामने रास्ते या जमीन पर खड़े होकर ही भगवान का आशीर्वाद लिया जा सकता है| इस बार दो नव विवाहित जोड़ों ने मन्दिर के अन्दर जाकर न मात्र भगवान का दर्शन करके आशीर्वाद लेने की हिमाकत की, बल्कि मन्दिर में स्थापित भगवान की पूजा-अर्चना करने का भी अपराध भी कर डाला| जो मन्दिर के पुजारी को नागवार गुजरा| जिस पर मन्दिर के पुजारी घीसाराम स्वामी ने कुछ स्थानीय स्त्री-पुरुषों के साथ मिलकर नवविवाहित जोड़ों को मन्दिर से खदेड़ दिया|

सूत्रों का कहना है कि उक्त पुजारी कट्टर हिन्दू है और मनु द्वारा स्थापित ब्राह्मणवादी व्यवस्था को लागू करना अपना पवित्र धार्मिक कर्त्तव्य मानता है| जिसमें स्थानीय उच्च कुलीन हिन्दू साथ देते हैं| सूत्रों का यह भी कहना है कि पकड़े गये लोगों का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी से निकट सम्बन्ध हैं|

यहॉं विचारणीय गम्भीर प्रश्‍न यह है कि हो सकता है कि कानून के अनुसार आरोपियों के विरुद्ध मुकदमा चले और कुछ वर्षों के विचारण के बाद कुछ लोगों को सजा भी हो जाये, जिसकी कम ही सम्भावना है, लेकिन असल सवाल ये है कि आखिर मनुवाद द्वारा स्थापित यह कुव्यवस्था कब समाप्त होगी और चरित्र निर्माण की बात करने वाला संघ कब तक मनुवादी लोगों का पोषण तथा संरक्षण करता रहेगा?

जब तक मनुवाद और मनुवाद के पोषक संघ तथा संघ की घृणित और समाज तोड़क दोगली सोच को ध्वस्त नहीं कर दिया जाता है, तब तक अकेला कानून कुछ भी नहीं कर सकता है| क्योंकि राजस्थान और अन्य अनेक राज्यों में आये दिन मनुवादियों द्वारा इस प्रकार की अमानवीय और आदिकालीन सोच की परिचायक घटनाओं को लागातार और बेखोफ अंजाम दिया जाता रहा है| जिसे संघ एवं भाजपा से जुड़े लोगों का खुला राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है| जिसका दु:खद परिणाम ये होता है कि आये दिन दलित उत्पीड़न होता रहता है| उत्पीड़न के कुछ मामलों में मुकदमे भी दर्ज होते हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में गवाहों को डराया और धमकाया जाता है| डराने और धमकाने से नहीं मानने पर उनके साथ मारपीट की जाती है, उनकी औरतों और लडकियों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया जाता है और अन्तत: शोषित तथा भयभीत दलित दर जाते हैं! परिणामस्वरूप अधिकतर मुकदमे निरस्त हो जाते हैं, जिन्हें यह कहकर प्रचारित किया जाता है कि दलित लोगों द्वारा बनावटी मुकदमे दर्ज करवाये जाते हैं| 

यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि देश में अमन-चैन बना रहे और समाज के सभी दबे-कुचले लोग तरक्की करें और सम्मान के साथ जीवन यापन करें तो हमें मनुवाद को तत्काल प्रतिबन्धित करने और मुनवादी कुकृत्यों को अंजाम देने वालों को देशद्रोही के समान दण्डनीय अपराध घोषित करने की सख्त जरूरत है| जिसके लिये संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 13 (1) एवं 13 (3) में सरकार को सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं| यदि सरकार में राजनैतिक इच्छा-शक्ति हो तो इस प्रावधान के तहत मनुवादी दैत्य को नेस्तनाबूद किया जा सकता है| लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है, जिसके पीछे हर पार्टी में मनुवादियों का वर्चस्व होना बड़ा कारण है|

Friday, August 3, 2012

अन्ना के समर्थकों के समक्ष निराशा का आसन्न संकट?

आखिरकार अन्ना ने सत्ता के बजाय व्यवस्था को बदलने के लिये कार्य करने की सोच को स्वीकार कर ही लिया है। जिसकी लम्बे समय से मॉंग की जाती रही है। जहॉं तक अन्ना की प्रस्तावित राजनैतिक विचारधारा का सवाल है तो सबसे पहली बात तो ये कि यह सवाल उठाने का देश के प्रत्येक व्यक्ति को हक है!
दूसरी बात ये कि अन्ना और उसकी टीम की करनी और कथनी में कितना अंतर है या है भी या नहीं! ये भी अपने आप में एक सवाल है, जो अनेक बार उठा है, लेकिन अब इसका उत्तर जनता को मिलना तय है।

अन्ना की ओर से अपना नजरिया साफ करने से पूर्व ही इन सारी बातों पर, विशेषकर ‘‘वैब मीडिया’’ पर ‘‘गर्मागरम बहस’’ लगातार जारी है, जिसमें अभद्र और अश्‍लील शब्दावली का खुलकर उपयोग और प्रदर्शन हो रहा है। अनेक "न्यूजपोर्टल्स" ने शायद इस प्रकार की सामग्री और टिप्पणियों के प्रदर्शन और प्रकाशन को ही अन्ना टीम की भॉंति खुद को पापुलर करने का "सर्वोत्तम तरीका" समझ लिया है।

कारण जो भी हों, लेकिन किसी भी विषय पर "चर्चा सादगी और सभ्य तरीके से होनी चाहिए" और अन्ना के उन समर्थकों को जो कुछ समय बाद "अन्ना विरोधी" होने जा रहे हैं! उनको अब अन्ना को छोड़कर शीघ्र ही कोई नया मंच तलाशना होगा! उनके सामने अपने अस्तित्व को बचाने का एक आसन्न संकट मंडराता दिख रहा है। उन्हें ऐसे मंच की जरूरत है जो जो मीडिया के जरिये देश में सनसनी फ़ैलाने में विश्‍वास करता हो तथा इस प्रकार के घटनाक्रम में आस्था रखता हो! हॉं बाबा रामदेव की दुकान में ऐसे लोगों को कुछ समय के लिए राहत की दवाई जरूर मिल सकती है! हालांकि वहॉं पर भी कुछ समय बाद "सामाजिक न्याय तथा धर्मनिरपेक्षता रूपी राजनैतिक विचारधारा" को "शुद्ध शहद की चासनी" में लपेटकर बेचे जाने की पूरी-पूरी सम्भावना व्यक्त की जा रही है।

मैं यहॉं साफ कर दूँ यह मेरा राजनैतिक अनुमान है, कि धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के मुद्दों को अपनाये बिना, इस देश में कोई राजनैतिक पार्टी स्थापित होकर राष्ट्रीय स्तर पर सफल हो ही नहीं सकती और इसे "अन्ना का दुर्भाग्य कहें या इस देश का"-कि अन्ना की सभाओं में या रैलियों में अभी तक जुटती रही भीड़ को ये दोनों ही संवैधानिक अवधारणाएँ कतई भी मंजूर नहीं हैं! बल्कि कड़वा सच तो यही है कि अन्ना अन्दोलन में अधिकतर वही लोग बढचढकर भाग लेते रहे हैं, जिन्हें देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप में कतई भी आस्था नहीं है। जिन्हें इस देश में अल्पसंख्यक, विशेषकर मुसलमान फूटी आँख नहीं सुहाते हैं और जो हजारों वर्षों से गुलामी का दंश झेलते रहे दमित वर्गों को समानता का संवैधानिक हक प्रदान किये जाने के सख्त विरोध में हैं। जो स्त्री को घर की चार दीवारी से बाहर शक्तिसम्पन्न तथा देश के नीति-नियन्ता पदों पर देखना पसन्द नहीं करते हैं।

यह भी सच है कि इस प्रकार के लोग इस देश में पॉंच प्रतिशत से अधिक नहीं हैं, लेकिन इन लोगों के कब्जे में वैब मीडिया है। जिस पर केवल इन्हीं की आवाज सुनाई देती है। जिससे कुछ मतिमन्दों को लगने लगता है कि सारा देश अन्ना के साथ या आरक्षण या धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ चिल्ला रहा है। जबकि सम्भवत: ये लोग ही इस देश की आधुनिक छूत की राजनैतिक तथा सामाजिक बीमारियों के वाहक और देश की भ्रष्ट तथा शोषक व्यवस्था के असली पोषक एवं समर्थक हैं।

इस कड़वी सच्चाई का ज्ञान और विश्‍वास कमोबेश अन्ना तथा बाबा दोनों को हो चुका है। इसलिये दोनों ने ही संकेत दे दिये हैं कि अब देश के सभी वर्गों को साथ लेकर चलना होगा। बाबा का रुख कुछ दिनों में और अधिक साफ हो जाने वाला है| जहाँ तक अन्ना का सवाल है तो अभी तक के रुख से यही लगता है कि अन्ना चाहकर भी न तो साम्प्रदायिकता का खुलकर समर्थन कर सकने की स्थिति में हैं और न हीं वे देश के दबे-कुचले वर्गों के उत्थान की नीति और स्त्री समानता का विरोध कर सकते हैं, जो "सामाजिक न्याय की आत्मा" हैं। इसलिये अन्ना के कथित समर्थकों के समक्ष निराशा का भारी आसन्न संकट मंडरा रहा है। उनके लिये इससे उबरना आसान नहीं होगा।

इसलिये अन्ना टीम की विचारधारा की घोषणा सबसे अधिक यदि किसी को आहत करने वाली है तो अन्ना के कथित कट्टर समर्थकों को ही इसका सामना करना होगा। इसके विपरीत जो लोग अभी तक अन्ना का विरोध कर रहे थे या जो अभी तक तटस्थ थे या जिन्हें अन्ना से कोई खास मतलब नहीं है और न हीं जिन लोगों को देश की संवैधानिक या राजनैतिक विचारधारा से कोई खास लेना देना है। ऐसे लोगों के लिये अवश्य अन्ना एक प्रायोगिक विकल्प बन सकते हैं और यदि अन्ना टीम कोई राजनैतिक पार्टी बनती है तो इससे सबसे अधिक नुकसान "भारतीय जनता पार्टी" को होने की सम्भावना है, क्योंकि अभी तक जो लोग अन्ना के साथ "भावनात्मक या रागात्मक" रूप से जुड़े दिख रहे हैं, वे "संघ और भाजपा" के भी इर्दगिर्द मंडराते देखे जाते रहे हैं।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

Tuesday, November 15, 2011

क्या भारत का मतदाता भहरूपियों को नयी दिल्ली की गद्दी सौंपने को तैयार है?


इस समय देश की दिशा और दशा दोनों ही डगमगाने लगी हैं| सम्पूर्ण भारत में मंहगाई सुरसा की भांति विकराल रूप धारण करती जा रही है| जिसके प्रति केन्द्र सरकार तनिक भी चिन्तित नहीं दिखती है| परिणामस्वरूप जहॉं एक ओर गरीब मर रहा है| उसके लिये जीवनयापन भी मुश्किल हो गया है| किसान आत्महत्या कर रहे हैं| जबकि इसके विपरीत सम्पन्न और शासक वर्ग दिनोंदिन धनवान होकर विलासतपूर्ण जीवन जीने और उसका प्रदर्शन करने से भी नहीं चूक रहा है|

इन हालातों में जहॉं एक ओर युवा वर्ग निराशा और अवसाद से ग्रस्त होकर सृजन के बजाय विसृजन तथा आपराधिक कार्यों की ओर प्रवृत्त हो रहा है| जिसके चलते सड़क पर चलती औरतों के जैवर लूटे जा रहे हैं, चोरी-डकैतियॉं और एटीम मसीनों को चुराने तक की घटनाओं में भारत का भविष्य अर्थात् युवावर्ग लिप्त हो रहा है|

प्रतिपक्ष जिसका कार्य, सत्ताधारी दल की राजनैतिक असफलताओं, कमजोरियों और मनमानी नीतियों को उजागर करके देश और समाज के सामने लाना है, वह निचले दबके और अल्पसंख्यकों के प्रति पाले हुए स्थायी दुराग्रहों और धर्मान्धता की बीमारी से मुक्त नहीं हो पा रहा है| स्वयं प्रतिपक्षी पार्टी के लोग जो कभी ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ की बात किया करते थे, खुद भी उसी प्रकार से सत्ताधारियों की भांति भ्रष्ट हैं और गिरगिट की भांति रंग बदल रहे हैं| जिस प्रकार से कांशीराम के अवसान के बाद मायावती ने ‘तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार’ के नारे को भूलकर ब्राह्मणों के साथ दिखावटी दोस्ती करके सत्ता पर काबिज हो चुकी हैं| यही नहीं माया ने अन्य सभी राजनैतिक दलों को अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को भी मजबूर कर दिया है|

सत्ताधारियों और सत्ता से बेदखल लोगों का चरित्र कहॉं है, आम लोग समझ ही नहीं पाते हैं| जो पार्टी सिर्फ सोनिया तथा मनमोहन की पूँजीवादी नीतियों के इर्दगिर्द घूमती रही है, उस पार्टी को मिश्रित अर्थव्यवस्था के जन्मदाता जवाहर लाल नेहरू को अचानक अपने बैनरों पर छाप देना और इन्दिरा, लाल बहादुर, राजीव और नरसिम्हाराव को एक ओर कर देना अपने आप में अनेक भ्रम और भ्रान्तियों का शिकार होने का द्योतक है| इसका मतलब ये समझा जाये कि अब मनमोहन सिंह के दिन लद गये हैं? जबकि स्वयं यूपीए का कहना है कि दुनिया के तमाम देश आर्थिक संकट से त्रस्त हैं, लेकिन भारत में अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री होने के कारण ही भारत की अर्थव्यवस्था बच सकी है?

भारत की सबसे बड़ी दूसरी पार्टी भाजपा का रिमोट कंट्रोल संघ भी अब अपने आपको इस कदर नीचे गिरा चुका है कि जबरन अन्ना के पीछे लग रहा है, जबकि अन्ना मानने को ही तैयार ही नहीं है| यह बात अलग है कि अब तो सारा देश जान चुका है कि अन्ना भाजपा और संघ का ही संयुक्त उत्पाद है| इसके बावजूद अन्ना अभी भी संघ और भाजपा से दूरी बनाये रखने में क्या कोई ऐसी राजनीति खेल रहे हैं, जिसके परिणाम यूपीए को उसकी बेवकूफियों और हठधर्मिता का दुष्परिणाम भोगने को विवश कर देंगे?

अब तो कॉंग्रेस से दशकों से जुड़े कट्टर कॉंग्रेसी भी यह मानने लगा है कि कॉंग्रेस दिशाभ्रम की शिकार होने के साथ-साथ भाजपा-संघ-हिन्दुत्वादी ताकतों के चक्रव्यूह में इतनी बुरी तरह से फंसती जा रही है कि २०१४ के चुनाव में कॉंग्रेस की नैया पार लगना आसान नहीं होगा| वहीं दूसरी ओर कॉंग्रेस की राजनीतिक सूझबूझ के जानकारों का कहना है कि २०१४ आने तक तो देश का परिदृश्य ही बदल चुका होगा| उनका कहना है कि नीतीश कुमार भाजपा से पीछा छुड़ा चुके होंगे और आडवाणी, मोदी, स्वराज, जेटली, राजनाथ सिंह और गडकरी की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाओं से टकराकर भाजपा बिखरने के कगार पर पहुँच चुकी होगी| जबकि कुछ दूसरे जनाकारों का कहना है कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो भाजपा के नेतृत्व की कमान पण्डित मुरली मनोहर जोशी को मिल सकती है, जो लम्बे समय से इन्तजार में हैं|

इन हालातों में भारत की दिशा और दशा दोनों ही पटरी से उतरी हुई लगती हैं, जिसके चलते न मात्र देश का शासकीय भविष्य भ्रष्ट ब्यूराक्रेट्स की मनमानी नीतियों का शिकार है, बल्कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और श्रीश्री रविशंकर जैसे लोग भी नीति और अनीति को भूलकर इसी स्थिति का लाभ उठाकर तथा एकजुट होकर अपनी पूरी ताकत झोंक देने का रिस्क ले चुके हैं और हर हाल में इस देश में मुस्लिम, दमित, दलित, पिछड़ा, आदिवासी और महिला उत्थान के विराधी होने और साथ ही साथ हिन्दुत्वादी राष्ट्र की स्थापना करने की बातें करने का समय-समय पर नाटक करने वाले लोगों को भारत की सत्ता में दिलाने के हर संभव प्रयास कर रहे हैं| 

अब सबसे बड़ा सवाल यही है की क्या भारत का धर्मनिरपेक्ष, सामाजिक न्याय को समर्पित और सौहार्दपूर्ण संस्कारों में आस्था तथा विश्‍वास रखने वाला आम मतदाता, मंहगाई और भ्रष्टाचार से तंग होकर ऐसे भहरूपियों को नयी दिल्ली की गद्दी सौंपने को तैयार है? लगता तो नहीं, लेकिन यूपीए सरकार की वर्तमान आम आदमी विरोधी नीतियों से निजात पाने के लिये मतदाता गुस्से में कुछ भी गलती कर सकता है!

Tuesday, October 18, 2011

मैंने क़सम ली-मैं फासिस्ट राजनीति और उसके कारिंदों के खिलाफ कुछ नहीं लिखूंगा

शेष नारायण सिंह

प्रशांत भूषण की पिटाई के बाद इस देश की राजनीति ने करवट नहीं कई पल्थे खाए हैं . जिन लोगों को अपना मान कर प्रशांत भूषण क्रान्ति लाने चले थे उन्होंने उनकी विधिवत कुटम्मस की .टी वी पर उनकी हालत देख कर मैं भी डर गया हूँ . जिन लोगों ने प्रशांत जी की दुर्दशा की वही लोग तो पोर्टलों पर मेरे लेख पढ़कर गालियाँ लिखते हैं . लिखते हैं कि मेरे जैसे देशद्रोहियों को देश से निकाल दिया जाएगा. मार डाला जाएगा, काट डाला