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Saturday, April 30, 2016

मायावती की जीत, क्या सामाजिक न्याय की हार होगी?

मायावती की जीत, क्या सामाजिक न्याय की हार होगी?
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लेखक : Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
मनुवादी एमके गांधी द्वारा आमरण अनशन को हथियार बनाकर बाबा साहब को कम्यूनल अवार्ड को त्यागने को मजबूर किया गया। दुष्परिणामस्वरूप पूना पैक्ट अस्तित्व में आया। जिसके तहत सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े उन वर्गों को, जिनका राज्य (सरकार) की राय में प्रशासन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हो को प्रशासनिक प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए संविधान में मूलाधिकार के रूप में आरक्षण की व्यवस्था की गयी। जिसके तहत सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में अजा, अजजा एवं ओबीसी को आरक्षण प्रदान किया जा रहा है। जिसका मूल मकसद सामाजिक न्याय की स्थापना करना था। यद्यपि न्यायपालिका ने आरक्षण को अनेकों बार कमजोर करने वाले निर्णय सुनाये हैं।

इसके विपरीत संघ की राजनैतिक शाखा भाजपा की राज्य सरकारों द्वारा संविधान को धता बताकर आरक्षण प्रदान करने हेतु आर्थिक आधार को आगे बढ़ाया जाकर भाजपा की सरकारों द्वारा राजस्थान और गुजरात में सामाजिक न्याय की हत्या करने की शुरूआत की जा चुकी है। इस अन्याय के समर्थन के लिए दलित नेतृत्व पासवान, उदितराज और अठावले को भाजपा द्वारा पहले ही अपने साथ मिलाया जा चुका है। मायावती के विरुद्ध जारी आपराधिक मामलों के दबाव के जरिये उसे भी संघ द्वारा आर्थिक आधार पर आरक्षण का समर्थन करने को मजबूर किया जा चुका है। संविधान के विरूद्ध जाकर मायावती राज्यसभा में सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण प्रदान करने की अन्यायपूर्ण मांग कर चुकी हैं।

इस सबके बावजूद भी संविधान में संशोधन के बिना आर्थिक आधार पर आरक्षण को व्यवहार में लागू नहीं किया जा सकता। मगर सबसे बड़ा पेच यह है कि राज्यसभा में भाजपा के बहुमत के अभाव में संविधान संशोधन सम्भव नहीं हो पा रहा है। राज्यसभा में बहुमत के लिए भाजपा और संघ द्वारा उत्तर प्रदेश विधानसभा के अगले आम चुनाव के बाद बदलने वाली तस्वीर का इन्तजार किया जा रहा है।

चूंकि वर्तमान परिदृश्य में राजनैतिक समीक्षकों को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बहुमत में आने के आसार बहुत ही कम नजर आ रहे हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव के बाद निम्न संभावनाएं और आशंकाएं दिखाई दे रही हैं :-

1. उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा को बहुमत मिले जिससे राज्यसभा में बसपा की ताकत बढ़े। मायावती तो सीबीआई जांच के शिकंजे में छूट/ढिलाई मिले और बदले में मायावती अपनी पूर्व घोषित संघ समर्थक नीति के अनुसार सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण दिलाने के बहाने संघ/भाजपा के संविधान संशोधन के एजेंडे/प्रस्ताव का समर्थन करे।
2. उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा को बहुमत मिले जिससे राज्यसभा में भाजपा की ताकत बढ़े। जिसके बल पर भाजपा अपने एजेंडे को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करे। 
3. उक्त बिंदु एक संघ और भाजपा की पहली आकांक्षा है, क्योंकि बसपा के समर्थन से संविधान में संशोधन करके सामाजिक न्याय की हत्या करने में कथित रूप से दलितों की सबसे बड़ी पार्टी बसपा की सहमति भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से दूरगामी लाभ का सौदा होगा। भाजपा की नियत पर कम सवाल उठेंगे।
4. उत्तर प्रदेश में बसपा को जिताने के बदले में केंद्र सरकार बसपा सुप्रीमों को सीबीआई से संरक्षण प्रदान करेगी, जिसके प्रतिफल में मायावती अन्य राज्यों में कांग्रेस को हराने के लिए अपने उम्मीदवार खड़े करके भाजपा को जिताने में योगदान करेंगी।
5. संविधान संशोधन के जरिये एक बार यदि आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान संविधान में जुड़ गया तो आज नहीं तो कल, सीधे नहीं तो सुप्रीम कोर्ट के मार्फत अजा एवं जजा के आरक्षण का मूल आधार भी आर्थिक किया जाना आसान हो जाएगा। जो संघ का मूल मकसद है। इसके बाद आराक्षण का आधार जाति या वर्ग नहीं बीपीएल कार्ड होगा। जिसे खरीदना आसान होगा। आर्थिक आधार लागू होते ही पदोन्नति का आरक्षण अपने आप ख़त्म हो जाएगा और सामाजिक न्याय एक कल्पना मात्र रह जाएगा।

अत: उपरोक्त संभावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा में मायावती को जिताना वंचित वर्ग के लिए कितना घातक हो सकता है, यह वंचित MOST वर्ग के लिए समय रहते गंभीर विचार और चिंतन का विषय होना चाहिए।

जय भारत। जय संविधान।
नर-नारी, सब एक समान।।
: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/29-04-2016/03.44 PM
@—लेखक का संक्षिप्त परिचय : मूलवासी-आदिवासी अर्थात रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया। होम्योपैथ चिकित्सक और दाम्पत्य विवाद सलाहकार। राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोसिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक) और पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ।
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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Monday, April 11, 2016

वंचितों पर जिन्दा वंचित वर्ग विरोधी पत्रिका का संघ की सह पर आरक्षण विरोधी अभियान जारी

वंचितों पर जिन्दा वंचित वर्ग विरोधी पत्रिका का
संघ की सह पर आरक्षण विरोधी अभियान जारी
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' 
एक तरफ तो राजनैतिक लाभ उठाने के लिये बकवास@ वर्ग द्वारा देशभर में बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेड़कर की 125वीं जयन्ति मनाने का षड़यंत्रपूर्ण नाटक खेला जा रहा है। जिसकी छद्म और छलपूर्ण खबरें मीडिया में छायी हुई हैं। वहीं दूसरी और वंचित मोस्ट@ वर्ग की ओर से बाबा साहब की जयन्ति मनाने की वास्तविक और देश को जगाने वाली खबरों को बकवासवर्गी मीडिया द्वारा जानबूझकर दबाया जा रहा है। तीसरी ओर बकवासवर्गी मीडिया की ओर से देश के लोगों को लगातार गुमराह करके आरक्षण के विषय पर भड़काया जा रहा है। इस सबके कारण सामाजिक न्याय विषय पर अनारक्षित वर्ग के संविधान के प्रावधानों और आरक्षण व्यवस्था से अनजान युवा लोगों की अज्ञानता को बढावा देकर, रुग्ण मानसिकता को हवा दी जा रही है।

इसी क्रम में राजस्थान पत्रिका के 11 अप्रेल, 2016 के जयपुर शहर संस्करण के सम्पादकीय पृष्ठ आठ आर्य पुत्र एसएन शुक्ला, (महासचिव—लोकप्रहरी) का लेख प्रकाशित किया गया है, जिसका शीर्षक है—'आरक्षण—जातिगत आधार से निकलकर सभी धर्मों के गरीबी रेखा से नीचे वाले लोगों को मिले लाभ अब आर्थिक आधार अपनाने का वक्त'। जिसमें मूल रूप से दो गलत, आपत्तिजनक, असंवैधानिक और भ्रामक बातें लिखी/प्रकाशिक की गयी हैं :—

पहली सुप्रीम कोर्ट के हवाले से कहा गया है कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि ''आरक्षण केवल जातिगत आधार पर नहीं दिया जा सकता।'' जबकि इन आर्यपुत्र लेखक शुक्ला और आर्यपुत्र पत्रिका प्रकाशक गुलाबचन्द कोठारी को शायद अच्छी तरह से ज्ञान है कि संविधान में जातिगत आधार आरक्षण है ही नहीं और न केवल पिछले साल, बल्कि​ संविधान लागू होने के तत्काल बाद से सुप्रीम कोर्ट अनेकों बार इस बात को निर्णीत कर चुका है कि आरक्षण जातिगत आधार पर नहीं दिया जा सकता। क्योंकि आरक्षण जातियों को नहीं, बल्कि जातियों के समूह अर्थात् समाज के वंचित वर्गों को प्रदान किया गया है। आरक्षण के लिये सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी एक समान जातियों को वर्गीकरण करके मिलते-जुलते वर्गों में बांटकर आरक्षण प्रदान किया गया है। जिसकी संवैधानिकता की पुष्टि करते हुए पश्चिम बंगाल बनाम अनवर अली सरकार, एआईआर 1952 एसएसी 75, 88 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि
''चूंकि जब तक कानून उन सबके लिये, जो किसी एक वर्ग के हों, एक जैसा व्यवहार करता है, तब तक समान संरक्षण के नियम का अतिक्रमण नहीं होता, (अनुच्छेद 14 समान संरक्षण की बात कहता है) इसलिये व्यक्तियों का तथा जिनकी स्थितियां सारभूत रूप से एक जैसी हों उन्हें एक ही प्रकार की विधि के नियमों के अधीन (आरक्षण प्रदान करके) रखने का असंंदिग्ध अधिकार विधायिका को प्राप्त है।''
डॉ. प्रद्युम्न कुमार त्रिपाठी द्वारा लिखित ग्रंथ 'भारतीय संविधान के प्रमुख तत्व' के पृष्ठ 277 को आर्यपुत्र लेखक शुक्ला, पत्रिका प्रकाशक कोठारी और उन जैसे पूर्वाग्रही एवं रुग्ण मानसिकता के लोगों को निम्न पंक्तियों को समझना चाहिये। जिसमें स्पष्ट शब्दों में लिखा गया है कि—
समानता के मूल अधिकार का संवैधानिक प्रावधान करने वाला ''अनुच्छेद 14 विभेद की मनाही नहीं करता, वह केवल कुटिल विभेद की मनाही करता है, वर्गीकरण की मनाही नहीं करता, प्रतिकूल वर्गीकरण की मनाही करता है।'' इस प्रकार आरक्षण जातिगत नहीं है। अत: यह जाति आधारित विभेद नहीं है, बल्कि जाति आधारित कुटिल विभेद मिटाने के लिये वंचित जातियों के लोगों का न्यायसंगत वर्गीकरण है।
पत्रिका में प्रकाशित उक्त लेख में आर्य—पुत्र लेखक शुक्ला और प्रकाशक कोठारी ने समाज में वैमनस्यता फैलाने वाली दूसरी बात लिखी है कि—'मण्डल आयोग के बाद प्रशासनिक दक्षता नीचे गयी।'' इन दोनों आर्य पुत्रों को क्या यह ज्ञात नहीं है कि मण्डल आयोग की सिफारिशों के आधार पर करीब 55 फीसदी ओबीसी आबादी को बकवासवर्गी सरकारों ने मात्र 27 फीसदी आरक्षण ही प्रदान किया था और अभी तक नीति—नियन्ता प्रशासनिक पदों पर ओबीसी को एक फीसदी भी आरक्षण नहीं मिला है? अजा एवं अजजा को साढे बाईस फीसदी आरक्षण के होते हुए प्रथम श्रेणी प्रशासनिक पदों पर पांच फीसदी भी प्रतिनिधत्व नहीं हैं और नीति—नियन्ता पदों पर प्रतिनिधित्व शून्य है।

ऐसे में प्रशासनिक दक्षता गिरने के लिये आरक्षण व्यवस्था को दोषी ठहराना सार्वजनिक रूप से सम्पूर्ण समाज को गुमराह करने का गम्भीर अपराध है। जिसके लिये ऐसे दुराग्रही लेखक औ प्रकाशक के विरुद्ध सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने, लोगों को संविधान के विरुद्ध उकसाने, वंचित वर्गों के संवैधानिक हकों को छीनने और देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाना चाहिये। मगर दु:ख है कि वंचित वर्ग के लोग ऐसे मामलों में चुप्पी साधे बैठे रहते हैं और वंचित वर्ग के संवैधानिक राजनैतिक तथा प्रशासनिक प्रतिनिधि बकवास वर्ग की गुलामी करने में मस्त रहते हैं। जिसका दुखद दुष्परिणाम है—शुक्ला और कोठारी जैसों द्वारा खुलकर संविधान की अवमानना करने वाले लेख लिखकर प्रकाशित करना और समाज को गुमराह करते रहना।
शब्दार्थ :
@बकवास (BKVaS= Brahman + Kshatriy+ Vaishay + Sanghi)
@मोस्ट (MOST=Minority+OBC+SC+Tribals)/ 
- : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/03-04-2016/09.02 AM
@—लेखक का संक्षिप्त परिचय : मूलवासी-आदिवासी अर्थात रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया। होम्योपैथ चिकित्सक और दाम्पत्य विवाद सलाहकार। राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोसिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक) और पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ।
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Thursday, February 25, 2016

आखिर देश बड़ा या आरक्षण? देशद्रोह और राष्ट्रहित क्या है?

आखिर देश बड़ा या आरक्षण?
देशद्रोह और राष्ट्रहित क्या है?
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग में शामिल किसी भी जाति या किसी भी वर्ग या किसी हिस्से की ओर से जब—जब भी सामाजिक न्याय के संवैधानिक हक अर्थात् बराबरी की मांग या गुहार की जाती है, बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्गी मानसिकता के लोगों द्वारा हर बार, विभिन्न माध्यमों से यही सवाल उठाया जाता है कि देश बड़ा या आरक्षण? पहले गूजर आरक्षण आन्दोलन के दौरान और इन दिनों जाट आरक्षण आन्दोलन को लेकर फिर से यही उठाया जा रहा है। जब कभी मुसलमानों की ओर से ऐसा कोई या किसी प्रकार का कोई आन्दोलन किया जाता है तो उन्हें तो इन बकवासवर्गी मानसिकता के लोगों द्वारा सीधे—सीधे देशद्रोही और पाकिस्तान परस्त करार दे दिया जाता है।
ऐसे में सवाल यह है कि आखिर देश है क्या?

अल्पसंख्यक, ओबीसी, दलित, आदिवासी, घुमुंतू, विमुक्त आदि कोई भी वंचित वर्ग अपने हकों की मांग करता है तो उनको बकवासवर्गी लोगों द्वारा हक और हिस्सेदारी दी नहीं जाती। जब संवैधानिक हक एवं समान हिस्सेदारी के लिये सड़कों पर उतरकर आन्दोलन किये जाते हैं तो ऐसे आन्दोलन देशहित के खिलाफ करार दे दिये जाते हैं! बल्कि ऐसे लोगों को देशद्रोही करार दे दिया जाता है। अत: 'आखिर देश है क्या?' इस सवाल का उत्तर तलाशने से पहले हमें 'देशहित और देशद्रोह की परिभाषा क्या है?' इस दूसरे सवाल का उत्तर भी तलाशना होगा।

भारत में बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग के संवैधानिक हक और समान हिस्सेदारी की बात या मांग करना, बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्गी लोगों की नजर में देशद्रोह है। राष्ट्रहित के विरुद्ध है। क्योंकि राष्ट्रहित और देशद्रोह की परिभाषा गढने का हक भी सत्ता पर हजारों सालों से काबिज इसी बकवासवर्गी मानसिकता के लोगों द्वारा अपने पास कैद किया हुआ है। जिसे बकवासवर्गी मीडिया लगातार बकवास वर्ग के पक्ष में हवा देता रहता है। बकवासवर्गी मीडिया, बकवासवर्गी विचारों के पक्ष में और वंचित मोस्ट वर्ग के विरुद्ध लोगों को गुमराह तैयार करता रहता है। जिसे बकवासवर्गी लोग जनमत कहते हैं। जब भी बकवास वर्ग के असंवैधानिक और जबरन काबिज हितों में कमी होने की आशंका नजर आती है, ऐसे प्रयाय देश के विरुद्ध करार दे दिये जाते हैं। मांग करने वालों को देशद्रोही करार दे दिया जाता है।

अत: भारत में बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग को गम्भीरतापूर्वक इस कड़वी सच्चई को जितना जल्दी सम्भव हो समझने की जरूरत है कि आखिर बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्गी लोगों के शोषण या मनमानी या तानाशाही या मनुवादी आतंक के विरुद्ध या बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग के संवैधानिक हक और समान हिस्सेदारी के समर्थन में कोई भी मांग या आन्दोलन देशद्रोह क्यों है? राष्ट्रहित के विरुद्ध क्यों है? इस सवाल का उत्तर जान लेने के बात स्वत: ही इस सवाल का जवाब मिल जायेगा कि 'आखिर देश है क्या?'

वास्तव में देखा जाये तो इन दिनों—'बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्ग' की सत्ता, मनमानी, बकवास वर्ग का मनुवादी आतंक, शोषण, बलात्कार, गुण्डाराज और तानाशाही ही देश का पर्याय बन चुके हैं। इन सब अपराधों के विरुद्ध कोई भी मांग, गुहार या आन्दोलन बकवास वर्गी लोगों द्वारा देशद्रोह और राष्ट्रहितों के विरुद्ध करार दे दिये जाते हैं! आरक्षण भी बकवासवर्गी लोगों के प्रशासनिक अधिपत्य को तोड़ता है, अत: इनकी दृष्टि में राष्ट्रहित के विरुद्ध है।

यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि बकवासवर्गी मीडिया के मार्फत जाट आन्दोलन के दौरान हिंसा तथा अपराध की जो खबरें प्रकाशित, प्रचारित एवं प्रसारित की जा रही हैं, यदि वे सच हैं तो निन्दनीय हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जाटों को इस आन्दोलन के लिये विवश किसने और क्यों किया?

जब त​क भारत के बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग को उसके सभी संवैधानिक हक और समान हिस्सेदारी नहीं मिलेगी, वंचित मोस्ट वर्ग का आक्रोश ऐसे आन्दोलनों में प्रकट होता रहेगा। दु:ख इस बात का है कि ऐसे आन्दोलनों से पीड़ित होने वाले में अधिकतर मोस्ट वर्ग के लोग ही होते हैं। बकवास वर्ग ऐसे आन्दोलनों से अप्रभावित ही रहता है। अत: भारत के बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग को संवैधानिक हकों और समान हिस्सेदारी के लिये ऐसी योजना और रणनीति बनाने की जरूरत है कि 'बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्ग' तुरन्त घुटने टेकने को मजबूर हो जाये। देश के मोस्ट वर्ग के चिन्तनशील लोगों को इस बारे में तत्काल गम्भीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।

जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी सब एक समान!!
@—लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोशिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक), पूर्व रा महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ, दाम्पत्य विवाद सलाहकार तथा लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में एकाधिक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित। वाट्स एप एवं मो. नं. : 9875066111 / दि.25.02.16/ 08.54AM
नोट : उक्त सामग्री व्यक्तिगत रूप से केवल आपको ही नहीं, बल्कि ब्रॉड कॉस्टिंग सिस्टम के जरिये मुझ से वाट्स एप पर जुड़े सभी मित्रों को भेजी जा रही है। अत: यदि आपको किसी भी प्रकार की आपत्ति हो तो, कृपया अवगत करावें। आगे से आपको कोई सामग्री नहीं भेजी जायेगी। अन्यथा मेरी ओर से प्रेषित सामग्री यदि आपको उपयोगी लगे और यदि आप चाहते हैं कि आपको मेरे आलेख और आॅडियो/वीडियो आपके वाट्स एप इन बॉक्स में सदैव मिलते रहें तो आपको मेरे वाट्स एप नं. 9875066111 को अपने मोबाइल में सेव करके वाट्स एप नं. 9875066111 पर एड होने की इच्छा की जानकारी भेजनी होगी। तदोपरान्त आपका परिचय प्राप्त करके आपको एड कर लिया जायेगा। धन्यवाद।
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अति—महत्वूपर्ण नोट : बकवासवर्गीय मीडिया हमारे विचारों को दबाता है। ऐसे में वंचित वर्गों के पास शोसल मीडिया ही विचार सम्प्रेषण का एक मात्र माध्यम है। अत: यदि हम वंचित वर्गों से जुड़े महत्वूपर्ण विषयों से सम्बन्धित जानकारी को अपने मित्रों और परिचितों को अग्रेषित कर सकें तो हम वंचित वर्गों के जनजागरण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं।
—निवेदक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Monday, February 22, 2016

बकवास वर्ग द्वारा कभी भी देश को गृहयुद्ध के बहाने आपातकाल की ओर धकेला जा सकता है!

बकवास वर्ग द्वारा कभी भी देश को गृहयुद्ध के
बहाने आपातकाल की ओर धकेला जा सकता है!
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

24 अक्टूबर, 2015 को ''देश गृहयुद्ध और आपातकाल की ओर—क्या हम इसके लिये तैयार हैं?'' शीर्षक से मैंने एक लेख लिखा था। जिसमें मैंने लिखा था कि———
''———मैं कभी भी किसी जाति के नाम से कोई टिप्पणी लिखने में विश्वास नहीं करता। लेकिन ब्राह्मणों की ओर से सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करना कि—''आरक्षण के फन को कुचलेगा ब्राह्मण संगठन'' मुझ जैसे संयमित प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले व्यक्ति को भी जवाबी प्रतिक्रिया व्यक्त करने को विवश किया जा रहा है। यद्यपि खुद ब्राह्मणीय व्यवस्थानुसार ब्राह्मण जाति, जाति नहीं, बल्कि कथित हिन्दू धर्म का सर्वोच्च वर्ण है। अत: ब्राह्मण को जाति मानकर नहीं, बल्कि वर्ण मानकर और उनकी असंवैधानिक ललकार को पढकर मैं संवैधानिक सच्चाई और प्रथमदृष्टया नजर आ रहे हालात को लिखने को विवश हूं।

मुझे यह जानकर आश्चर्य होता है कि अपने आप को भू—देव अर्थात् इस पृथ्वीलोक का साक्षात देवता कहने वाले, 'वसुधैव कुटम्बकम' की बात लिखने वाले ब्राह्मणों के मात्र 2-3 फीसदी वंशज—ब्राह्मण वर्ग के लोग सार्वजनिक रूप से देश की तीन चौथाई आरक्षित (3/4) आबादी के संवैधानिक हकों को सांप का फन सम्बोधित करके कुचलने की बात कहते हैं। मनुवादी तथा कॉर्पोरेट मीडिया ऐसी असंवैधानिक खबर को प्रमुखता से प्रकाशित भी करता है। सरकार चुप्पी साधे हुए हैं। संविधान को धता बताकर आरक्षण को कुचलने की बात पढकर भी आरक्षित वर्ग के लोग या तो भयभीत हैं या फिर उनको अपने बहरूपिये राजनेताओं पर अति-आत्मविश्वास है। क्या इसे संवैधानिक भारतीय लोकतांत्रिक गणतंत्र कहा जा सकता है? क्या इन हालातों में भारत के कमजोर तबके के सुरक्षित जीवित रहने की आशा की जा सकती है? इसके पीछे के कारण विश्वस्तरीय चिन्ता का कारण बनते जा रहे हैं।

कारण जो भी हों लेकिन इस समय देश के हालात शर्मनाक और आम व्यक्ति तथा वंचित तबकों के लिये चिन्ताजनक हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अर्थात् आरएसएस और केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के बयानों तथा उनके व्यक्तिगत क्रियाकलापों से ऐसा प्रतीत होता है कि आरक्षण तथा जातीय हिंसा के बहाने देश को गृहयुद्ध में धकेला जा रहा है। साफ तौर पर हालात ऐसे नजर आ रहे हैं कि गृहयुद्ध के बहाने देश में आपात काल लागू कर के सत्ताधारी पार्टी मनुवादी व्यवस्था लागू करने की ओर अग्रसर होती दिख रही है।——''

उपरोक्त लेख में व्यक्त विचारों के साथ—साथ देश के वर्तमान हालातों में भारत की सत्ता पर काबिज बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्ग द्वारा या बकवास वर्ग की मानसिकता की सरकार द्वारा सामाजिक न्याय की आधारशिला जातिगत जनगणना को जानबूझकर सार्वजनिक नहीं किये जाने के साथ—साथ बकवास वर्गीय मानकिता के द्वारा अंजाम दी गयी कुछ अमानवीय और असंवैधानिक घटनाओं पर सतर्कतापूर्वक ध्यान दिये जाने की जरूरत है। राजस्थान के डांगावास में दलितों को बेरहमी से कुचला गया। उत्तर प्रदेश में पुलिस की उपस्थिति में दलित महिलाओं में सरेराह नंगी करके दौड़ाया गया। मध्य प्रदेश में सरकार द्वारा प्रायोजित सामूहिक विवाह कार्यक्रम से पहले बिनाकिसी विधिक प्राधिकार के आदिवासी लड़कियों का कौमर्य और गर्भ परीक्षण। संविधान को धता बताकर बिना किसी मांग और बिना किसी वैधानिक औचित्य के राजस्थान की उच्चवर्णीय जातियों के तथाकथित गरीब लोगों को 14 फीसदी आरक्षण का बिल राजस्थान विधानसभा में पारित किया गया, जबकि तथाकथित गरीबों की कुल जनसंख्या एक फीसदी से भी कम है। राजस्थान की गुर्जर जाति को वर्षों से संवैधानिक हकों से लगातार वंचित किया जा रहा है। छत्तीसगढ एवं झारखण्ड में आदिवासी महिलाओं के साथ आयेदिन सामूहिक बलात्कार। छत्तीसगढ आदिवासी लड़कियों के स्तन निचोड़कर एवं सार्वजनिक रूप उनके अधोवस्त्रों को हटाकर पुरुष फोर्स द्वारा उनके यौनांगों का निरीक्षण—परीक्षण कर कौमार्य की परीक्षा करना। हैदराबाद विश्वविद्यालय में वंचितवर्गीय रोहित वेमुला को आत्महत्या के लिये विवश करना, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पुखराज मीणा का उत्पीड़न और जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में कन्हैया कुमार को देशद्रोही करार देना। इससे कुछ समय पूर्व हरियाणा में दलित बच्चों को जिन्दा जलाया जाना। अरुणाचल प्रदेश में बिना संवैधानिक औचित्य के आपातकाल लगाने की सिफारिश करना। पहले सुप्रीम कोर्ट के मार्फत जाट जाति का आरक्षण समाप्त करवाना फिर, गुजरात से पटेलों के मार्फत ललकार की 'पटेलों को आरक्षण नहीं तो किसी को नहीं' और अब जाट जाति का आरक्षण आन्दोलन। यह सब क्या है? देश किस ओर जा रहा है? इन विकट हालातों में भी वंचित वर्ग के कुछ आर्य—शूद्र, जो खुद को अतिविद्वान सझते हैं, जाट जाति के आरक्षण के विरुद्ध जाट जाति के राजनैतिक एवं प्रशासनिक प्रतिनिधित्व के आंकड़े गिनवाने में व्यस्त हैं। ऐसे लोगों के पास बकवास वर्ग के कथित गरीबों को आरक्षण दिलाने की मांग करने वाली मायावती के विरुद्ध बोलने के लिये एक शब्द नहीं होता है। न हीं मायावती को बकवास वर्ग के आंकड़े उपलब्ध करवाये जाते हैं।

राजस्थान विधानसभा में राज्य की एक फीसदी से भी कम उच्चवर्गीय जातियों के कथित गरीब लोगों को 14 फीसदी आरक्षण का बिल पास करते समय बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग की जातियों के विधायकों द्वारा विरोध करना तो दूर पक्ष एवं विपक्ष दोनों ओर से समर्थन में तालियां बजाई गयी। ऐसे हालात में धनप्रतिनिधि और दलप्रतिनिधि बन चुके, जनप्रतिनिधियों के भरासे संविधान, लोकतंत्र और गणतंत्र की रक्षा की उम्मीद करना अपने आप को धोखा देने के सदृश्य है। यदि अभी भी बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग नहीं जागा तो बहुत जल्द सब कुछ समाप्त हो जाने वाला है। विशेषकर इस कारण कि वंचित वर्ग के जनप्रतिनिधि मौन साधे हुए हैं। देश में चाहे कितने ही अन्याय और अत्याचार हो जायें, वंचित वर्ग के जनप्रतिनिधि तब तक मौन ही साधे रहेंगे, जब​ तक की उनके राजनैतिक दल के बकवासवर्गीय आलाकामना की ओर से बोलने की स्वीकृति नहीं मिलेगी। यह लड़ाई बहुत बड़ी है। जिसे आमजन को ही लड़ना होगा और बकवासवर्गीय लोगों को राष्ट्र, राष्ट्रहित, देशद्रोह, सामाजिक न्याय एवं भागीदारी की परिभाषा समझानी होगी। मीडिया को उसका दायित्व समझाना होगा। अब भारत की सत्ता पर काबिज बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्ग से भारत की आजादी का बिगुल बजाना ही होगा। जिसका एक मात्र रास्ता है। निष्पक्ष जातिगत जनगणना के आंकड़े घोषित हों और वर्तमान अजा, अजजा एवं आबीसी तीन वर्गों को समाप्त कर, समान पृष्ठभूमि की जातियों के एक दर्जन से अधिक वर्ग बनाकर सभी को सत्ता एवं संसाधानों में समान भागीदारी एवं हिस्सेदारी मिले। अन्यथा बकवास वर्ग द्वारा कभी भी देश को गृहयुद्ध के बहाने आपातकाल की ओर धकेला जा सकता है!
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी सब एक समान!!

@—लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोशिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक), पूर्व रा महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ, दाम्पत्य विवाद सलाहकार तथा लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में एकाधिक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित। वाट्स एप एवं मो. नं. : 9875066111 / दि.22.02.16/06.44AM
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—निवेदक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Wednesday, January 27, 2016

आरक्षण व्यवस्था के साथ जारी बर्बरतापूर्ण बलात्कार कैसे रुके?

आरक्षण व्यवस्था के साथ जारी
बर्बरतापूर्ण बलात्कार कैसे रुके?

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
भारत में हजारों सालों से संचालित अमानवीय मनुवादी व्यवस्था के कारण सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से वंचित वर्गों की दशा संविधान लागू होने के 66 साल बाद भी अत्यधिक दयनीय है। संविधान निर्माताओं को इन वर्गों की विशेष चिन्ता थी। इसी कारण से इन वंचित वर्गों को अजा, अजजा एवं ओबीसी वर्गों में वर्गीकृत करके, संविधान में कुछ विशेष प्रावधान किये गये थे। जिनमें विधायिका में प्रतिनिधित्व के साथ—साथ शिक्षण संस्थानों में प्रवेश तथा सरकारी नौकरियों में चयन एवं पदोन्नति के समय पात्रता में छूट, प्रमुख प्रावधान हैं। ओबीसी की दशा इस मामले में कमतर है। उनको न तो विधायिका में और न ही पदोन्नति में आरक्षण प्राप्त है। यही नहीं ओबीसी को उनकी जनंसख्या के अनुपात से आधे से भी ​कम आरक्षण प्राप्त है। जानबूझकर ओबीसी में असमान पृष्ठभूमि की जातियों को शामिल करके आरक्षण को आपसी संघर्ष का आखाड़ा बना दिया गया है।

संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था के परिणामस्वरूप या इसके दुष्परिणामस्वरूप वंचित वर्गों में विशेष रूप से अजा एवं अजजा के अनेक लोग उच्च पदों तक पहुंचे हैं। अनेक वर्तमान में भी पदस्थ हैं। इस सब के बाद भी मैं अत्यधिक दुःख के साथ, यह लिखने को विवश हूं कि उच्च प्रशासनिक और निर्णायक पदों पर पदस्थ रहते हुए, आरक्षित वर्ग के अनेक अधिकारी अपने वर्ग के आहत, पीड़ित और वंचित लोगों का प्रतिनिधित्व करने की तनिक भी परवाह नहीं करते हैं। इसके विपरीत अपने वर्ग के वंचित लोगों से दूरी बनाते देखे जा सकते हैं और बकवास (BAKVaS= B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Va-वैश्य+Sसंघी) वर्ग के मनुवादियों की खुशामद करते देखे जा सकते हैं। जिसे सीधे शब्दों में चाटुकारिता और चमचागिरी की संज्ञा दी जा सकती है।

जबकि सरकारी सेवाओं में चयन हेतु पात्रता में छूट प्रदान करने का मूल मकसद वंचित वर्गों के नये सामन्त पैदा करना कदापि नहीं था, बल्कि देश में सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु कार्यपालिका में वंचित वर्गों का पर्याप्त और सशक्त प्रतिनिधित्व स्थापित करना था। जिससे कि बकवास (BAKVaS= B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Va-वैश्य+Sसंघी) वर्ग से वंचित वर्गों के हितों की रक्षा की जा सके। वंचित वर्गों के उत्थान और संरक्षण के लिये नीतियों और कानूनों का निर्माण किया जा सके। पिछले 66 वर्ष के अनुभव को देखा जाये तो संविधान की मंशा के अनुरूप वंचित वर्गों का सच्चा और सशक्त प्रतिनिधित्व स्थापित नहीं हो सका है। इस मामले में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था असफल रही है और आरक्षण का मूल मकसद समाप्त और बेमानी हो चुका है।

आरक्षण का लाभ प्राप्त करके उच्च पदों पर पदस्थ अनेक प्रशासनिक अधिकारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों में अपने ही वंचित वर्ग के प्रति संवैधानिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का प्राय: अभाव दिखाई दे रहा है। इसके साथ—साथ यह भी देखने और सुनने में आता रहा है कि उच्च प्रशासनिक पदों पर बिराजमान आरक्षित वर्ग के अफसरों के परिजनों और सम्बन्धियों का ही प्रशासनिक पदों पर प्रमुखता से चयन हो रहा है? मुझे यह भी जानकारी मिली है कि लिखित और मुख्य परीक्षा में तुलनात्मक रूप से अधिक अंक प्राप्त करने वाले आम आरक्षित लोगों की संतानों की तुलना में, उच्च प्रशासनिक पदों पर बिराजमान आरक्षित वर्ग के अफसरों के कम अंक लाने परिजनों और सम्बन्धियों का अन्तिम रूप से चयन हो जाता है। यदि यह सत्य नहीं भी है तो क्या इसे सिर्फ संयोग ही माना जावे कि उच्च प्रशासनिक पदों पर बिराजमान लोगों के परिवार या रिश्तेदारी में ही अतिविलक्षण प्रतिभाशाली बच्चे पैदा हो रहे हैं, जिसके चलते भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में उनका चयन अवश्य हो रहा है। यदि यह सच है तो यह आरक्षण के आधार पर प्राप्त उच्च पदस्थिति का निजी हित में भयंकर दुरूपयोग और सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु लागू आरक्षण व्यवस्था के साथ सरेआम, क्रूरतापूर्ण और बर्बर बलात्कार नहीं तो और क्या है?

अब यह तथ्य किसी से छिपा नहीं रह गया है कि आरक्षण का लाभ लेकर उच्च पदों पर पदस्थ अनेक अधिकारी ऐश-ओ-आराम की जिंदगी जीते हैं और अवैध तरीकों से अकूत धन-सम्पदा अर्जित करते हैं। जिसे अपनी भावी पीढ़ियों के लिए अक्षुण्य बनाये रखने के लिए सरकारी सेवा में रहते हुए राजनैतिक दलों से नजदीकीयां बना लेते हैं और सेवानिवृति के बाद मनुवादी राजनैतिक दलों के टिकिट पर आरखित निर्वाचन क्षेत्रों से जीतकर MP या MLA बन जाते हैं। ऐसे लोगों का अपने वर्ग के आम लोगों के दुःख-दर्द या मुसीबतों या उनके हितों या अधिकारों के संरक्षण से दूर का भी वास्ता नहीं होता है। ऐसे लोग पहले प्रशासन में रहकर और बाद में विधायिका में पहुंचकर अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति करने के साथ—साथ अपने राजनैतिक दल के आकाओं के आदेशों की पालना करने के अलावा कुछ नहीं करते हैं। इसी कारण वंचित समाज के अन्दर गहरी खाई बन चुकी है और आरक्षित वर्ग के आम लोगों में गहरा असन्तोष और गुस्सा व्याप्त है। 

इन हालातों में और संविधान को लागू हुए सात दशक पूर्ण होने जा रहे हैं, तब भी क्या आरक्षित वर्ग के आम लोगों के लिये यह विशेष चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिये कि सामाजिक न्याय की वास्तविक स्थापना कैसे हो? वंचितों के प्रेरणा स्रोत ज्योतिबा फूले, विश्वस्तरीय विधिवेत्ता और बहुमुखी प्रतिभा के धनि बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेड़कर, आदिवासी हितों के लिये समर्पित प्रतिनिधि जयपालसिंह मुण्डा और आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय के मसीहा कांशीराम की सामाजिक न्याय की लड़ाई का क्या यही लक्ष्य था? मुझे नहीं लगता कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था से इन महामानवों के सपने कभी पूर्ण हो सकेंगे।

मुझे ज्ञात है कि काले धन की ताकत पर आरक्षित वर्गों के दिखावटी मसीहा बने हुए कुछ स्वार्थी पूर्व या वर्तमान प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से मेरा और मेरे विचारों का कड़ा विरोध हो सकता है, जो अनपेक्षित और अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन उनके स्वार्थपूर्ण विचारों की परवाह किये बिना समग्र वंचित समाज के संवैधानिक हित में हमें सत्य को स्वीकार कर के, इस समस्या का अविलम्ब स्थायी और संवैधानिक समाधान खोजना ही होगा।

कुछ कथित उथले विद्वान आरक्षित वर्गों में क्रीमी लेयर लागू करके इस समस्या का समाधान करने की बात करते हैं, जिसका मैं कभी समर्थन नहीं कर सकता। क्योंकि क्रीमी लेयर संवैधानिक प्रतिनिधित्व की मूल अवधारणा को ही नेस्तनाबूद कर देती है। यद्यपि मैं स्वीकरता हूं और उक्त विवेचन से प्रमाणित भी होता है कि वर्तमान व्यवस्था में वंचित वर्गों का उचित संवैधानिक प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा है। इसके बावजूद भी हम हमारे समस्त प्रतिनिधियों को शतप्रतिशित नहीं नकार सकते, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था की बदौलत ही अनेक संवेदनशील, सेवाभावी एवं जिम्मेदार अफसर और जनप्रतिनिधि, पूर्ण ईमानदारी और निष्ठा के साथ अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए वंचित वर्गों का निर्भीकतापूर्वक प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

इसके उपरान्त भी वंचित वर्ग के लिये अहितकर बन चुकी वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का स्थायी और संवैधानिक समाधान खोजना ही होगा। बल्कि अविलम्ब खोजना होगा। इसलिये सामाजिक न्याय के लिये कार्यरत और संविधान के जानकार विद्वानों को इस बारे में गम्भीरतापूर्वक चिन्तन और मंथन करने की करने की जरूरत है। मेरे मनोमस्तिष्क में भी कुछ समाधान हैं, लेकिन उन्हें प्रस्तुत करूं उससे पहले बेहतर होगा कि इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिये। जिससे मेरे विचारों से प्रभावित हुए बिना, अधिक अच्छे समाधान सामने आ सकें। अब देखना होगा कि कितने लोग वंचित समाज के प्रति चिन्तनशील हैं और कितने लोग तार्किक, संवैधानिक और समाधानकारी सुझाव प्रस्तुत करने का साहस जुटा पाते हैं?

जय भारत। जय संविधान।
नर—नारी सब एक समान।।
@—लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोशिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक), पूर्व रा महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ, दाम्पत्य विवाद सलाहकार तथा लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में एकाधिक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित। वाट्स एप एवं मो. नं. 9875066111, 27.01.2016 (11.59 AM)
नोट : उक्त सामग्री व्यक्तिगत रूप से केवल आपको ही नहीं, बल्कि ब्रॉड कॉस्टिंग सिस्टम के जरिये मुझ से वाट्स एप पर जुड़े सभी मित्रों को भेजी जा रही है। अत: यदि आपको किसी भी प्रकार की आपत्ति हो तो, कृपया अवगत करावें। आगे से आपको कोई सामग्री नहीं भेजी जायेगी। यदि उक्त सामग्री आपको पसन्द है तो कृपया इसे अपने मित्रों को अग्रेषित/फॉरवर्ड करने का कष्ट करें। हमारे पूर्व प्रकाशित आलेख पढने के लिए करें : http://hrd-newsletter.blogspot.in/ एवं http://ppnewschannel.blogspot.in/ ब्लॉग्स पर क्लिक करें या फेसबुक ग्रुप https://www.facebook.com/groups/Sachkaaaina/ में जुड़ कर भारत की 90 फीसदी वंचित (MOST=Minority+OBC+SC+Tribals) आबादी के सरोकारों से जुड़े विषयों पर चर्चा का हिस्सा बनें।
अति—महत्वूपर्ण नोट : बकवासवर्गीय मीडिया हमारे विचारों को दबाता है। ऐसे में वंचित वर्गों के पास शोसल मीडिया ही विचार सम्प्रेषण का एक मात्र माध्यम है। अत: यदि हम वंचित वर्गों से जुड़े महत्वूपर्ण विषयों से सम्बन्धित जानकारी को अपने मित्रों और परिचितों को अग्रेषित कर सकें तो हम वंचित वर्गों के जनजागरण में महत्वूपर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं।
—निवेदक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Monday, December 7, 2015

अम्बेडकर पर संसद में चर्चा विचार दरकिनार ,सिर्फ गुणगान !

अम्बेडकर पर संसद में चर्चा
विचार दरकिनार ,सिर्फ गुणगान !

भारतीय संसद ने संविधान निर्माण में अम्बेडकर के योगदान पर दो दिन तक काफी सार्थक चर्चा करके एक कृतज्ञ राष्ट्र होने का दायित्व निभाया है .इस चर्चा ने कुछ प्रश्नों के जवाब दिये है तो कुछ नए प्रश्न खड़े भी किये है ,जिन पर आगे विमर्श जारी रहेगा .दो दिन तक सर्वोच्च सदन का चर्चा करना अपने आप में ऐतिहासिक माना जायेगा .यह इसलिये भी महत्वपूर्ण हो गया कि जो पार्टियाँ गाहे बगाहे अब तक डॉ अम्बेडकर के संविधान निर्माता होने पर संदेह प्रकट करती रही , आलोचना करती रही ,उनके भी सुर बदले है तथा उन्होंने भी माना कि संविधान निर्माण में डॉ अम्बेडकर का योगदान अतुलनीय है ,उसको नकारा नहीं जा सकता है .

जो लोग यह कहकर अम्बेडकर के महत्व को कम करने की कोशिश करते है कि संविधान सभा के अध्यक्ष तो डॉ राजेन्द्र प्रसाद थे .अम्बेडकर तो महज़ ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष थे .जिसमे उनके समेत कुल 9 सदस्य थे ,जिसमे के एम मुंशी ,गोपाल स्वामी अयंगार और कृष्ण स्वामी अय्यर जैसे विद्वान भी शामिल थे .अकेले अम्बेडकर ने क्या किया .अम्बेडकर के आलोचकों को संविधान सभा की बहस और कार्यवाही का अध्ययन करना चाहिए ताकि अम्बेडकर के योगदान को समझा जा सके .अब यह ऐतिहासिक सत्य है कि जो 9 लोग प्रारूप समिति में थे ,उनमे से एक ने त्यागपत्र दे दिया था .एक अमेरिका चला गया .दो सदस्य अपने स्वास्थ्य कारणों से दिल्ली से दूर रहे .एक राजकीय मामलों में व्यस्तता के चलते समय नहीं दे पाया और शेष लोग भी अपने अपने कारणों से प्रारूप निर्माण में अपनी भागीदारी नहीं निभा सके .इसलिए संविधान का प्रारूप तैयार करने का सारा उत्तरदायित्व अकेले डॉ अम्बेडकर के कन्धों पर आ पड़ा जिसे उन्होंने बखूबी निभाया .इसीलिए उन्हें भारतीय संविधान का असली निर्माता कहा जाता है .

संसद में पहले दिन की बहस का आगाज़ करते हुए केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथसिंह ने कहा कि अम्बेडकर का इस देश में बहुत अपमान हुआ ,लेकिन उन्होंने कभी देश छोड़ने की बात नहीं सोची .वे सच्चे अर्थों में राष्ट्रऋषि थे .दुसरे दिन बहस का समापन करते हुए प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अम्बेडकर ने जहर खुद पिया और अमृत हमारे लिए छोड़ गए .गृहमंत्री का डॉ अम्बेडकर को राष्ट्रऋषि कहना और प्रधानमंत्री का उन्हें हलाहल पीनेवाला नीलकंठ निरुपित करना कई सवाल खड़े करता है .जब राजनाथसिंह कहते है कि देश में अम्बेडकर का बहुत अपमान हुआ ,तो उन्हें और साफगोई बरतनी चाहिये और देश को यह बताना चाहिये था कि आखिर वो कौन लोग थे ,जिन्होंने अम्बेडकर को अपमानित किया .तत्कालीन व्यवस्था और धार्मिक कारण तो थे ही जिनको अम्बेडकर ने आगे चलकर ठुकरा दिया था ,लेकिन आज़ादी के आन्दोलन के कई चमकते सितारों ने भी अम्बेडकर को अपमानित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी .उन पर कालाराम मंदिर प्रवेश आन्दोलन के वक़्त पत्थर बरसाने वाले कौन लोग थे ? उनकी उपस्थिति के बाद उन स्थानों को गंगाजल और गौमूत्र छिडक कर पवित्र करने वाले लोग कौन थे ? वो कोन थे जिन्होंने अछूतों से पृथक निर्वाचन का हक छीन लिया था और डॉ अम्बेडकर को खून के आंसू रोने को विवश किया था .वो कौनसी विचारधारा के लोग थे जिन्होंने अम्बेडकर को हिन्दू कोड बिल नहीं लाने दिया और अंततः उन्हें भारी निराशा के साथ केन्द्रीय मंत्रिमंडल छोड़ना पड़ा था .इससे भी आगे बढ़ कर एक दिन उन्हें देश ना सही बल्कि धर्म को छोड़ना पड़ा .इन बातों पर भी चर्चा होती तो कई कुंठाओं को समाधान मिल सकता था .जब प्रधानमन्त्री यह स्वीकारते है कि डॉ अम्बेडकर को जहर खुद पीना पड़ा तो वो क्या जहर था ,उससे देश को अवगत होना चाहिये .यह देश को जानने का हक है कि किन परिस्थितियों में अम्बेडकर ने अपना सार्वजनिक जीवन जिया और सब कुछ सहकर भी देश को अपना सर्वश्रेष्ठ देने की महानता दिखाई .

संसद में यह पहली बार हुआ कि एक कांग्रेसी सांसद मल्लिकार्जुन खरगे ने बामसेफ के संस्थापक बहुजन राजनीती के सूत्रधार कांशीराम के केडर केम्पों की भाषा का इस्तेमाल किया .उन्होंने राजनाथसिंह को जोरदार जवाब देते हुए एक नयी बहस को जन्म दिया है .हालाँकि मीडिया ने उसे बहुत खूबसूरती से दबा दिया है .आश्चर्य होता है कि असहिष्णुता पर आमिर खान के बयान को तिल का ताड़ बनाने वाला मीडिया ,हर छोटी छोटी प्रतिक्रिया को विवादित बयान में बदलनेवाला मीडिया मल्लिकार्जुन खरगे के बयान पर कैसे मौन रह गया .देश भर से कोई नहीं उठ खड़ा हुआ कि खरगे ने ऐसा क्यों कहा कि –“आप विदेशी लोग है ,आप आर्य है ,बाहर से आये है .अम्बेडकर और हम लोग तो इस देश के मूलनिवासी है ,पांच हजार साल से मार खा खा कर भी हम यहीं बने हुए है “. खरगे के बयान में इस देश में बर्षों से जारी आर्य- अनार्य ,आर्य -द्रविड़ ,यूरेशियन विदेशी आर्यन्स की अवधारणा पर नए सिरे से विमर्श पैदा कर दिया है ,लेकिन सत्तापक्ष और मीडिया ने बहुत ही चालाकी से खरगे के बयान को उपेक्षित कर दिया है ताकि इस बात पर कहीं कोई बहस खड़ी ना हो जाये और सच्चाई की परतें नहीं उतरने लगे .यह विचारधाराओं के अवश्यम्भावी संघर्ष को टालने की असफल कोशिश लगती है .इस एक बयान से मल्लिकार्जुन खरगे देश के अनार्यों के नए हीरो के रूप में उभरते दिखाई दे रहे है ,हालाँकि वे अपने इस प्रकार के बयान पर कितना मजबूती से टिके रहते है ,यह तो भविष्य में ही पता चल पायेगा मगर खरगे की साफगोई ने दलित बहुजन मूलनिवासी आन्दोलन में नई वैचारिक प्राणवायु संचरित की है .

इस बहस का सबसे बड़ा फलितार्थ आरक्षण और संविधान को बदलने की दक्षिणपंथी बकवास को मिला एक मुकम्मल जवाब माना जा सकता है .लुटियंस के टीले से नागपुर के केशव भवन को मिला यह अब तक का सबसे कड़वा जवाब है ,जिसमें संघ के प्रचारक रह चुके स्वयंसेवक प्रधानमन्त्री ने परमपूज्य सरसंघचालक मोहन राव भागवत को दो टूक शब्दों में कह दिया है कि ना तो आरक्षण की व्यवस्था में कोई बदलाव किया जायेगा और ना ही संविधान बदला जायेगा ,क्योंकि ऐसा करना आत्महत्या करने के समान होगा .इस कड़े जवाब से देश के वंचित समुदाय में एक राहत देखी जा रही है .अभी यह कहना जल्दबाजी ही होगी कि ऐसा कह कर मोदी देश के दलित वंचितों का भरोसा जीत पाने में वे कामयाब हो गए है ,लेकिन जिस तरह से बिहार चुनाव परिणाम से लेकर भारतीय संसद की बहस ने भागवत की किरकिरी की है ,उससे हाशिये का तबका ख़ुशी जरुर महसूस कर रहा है .

संसद में हुयी दो दिवसीय चर्चा और राष्ट्रव्यापी संविधान दिवस का मनाया जाना भारतीय राष्ट्र राज्य के लिए एक ऐतिहासिक आयोजन है ,मगर इन सबके मध्य बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर को अतिमानव बना कर उनके अवतारीकरण की कोशिशों को खतरे के रूप में देखने की जरुरत है .अम्बेडकर को भगवान बनाना उनके उस विचार की हत्या करना है जिसमे वे सदैव व्यक्तिपूजा के विरोधी रहे .उन्हें मसीहाकरण से सख्त ऐतराज़ रहा ,मगर आज हम देख रहे है कि लन्दन से लेकर मुंबई के इंदु मिल तक स्थापित किये जा रहे स्मारकों के पीछे वही हीरो वर्सिपिंग का ही अलोकतांत्रिक विचार काम कर रहा है .कहीं ऐसा ना हो कि अम्बेडकर के विचारों को पूरी तरह दफन करते हुए कल उनके मंदिर बना दिये जाये ,उन्हें विष्णु का ग्यारहवां अवतार घोषित कर दिया जाये और मंदिरों में पंडित लोग घंटे घड़ियाल बजा कर आरतियाँ उतारने लगे .यह खतरा इसलिये बढ़ता जा रहा है क्योंकि कोई उन्हें आधुनिक मनु तो कोई राष्ट्रऋषि और कोई जहर पीनेवाला नीलकंठ बताने पर उतारू है .

आज सब लोग एक रस्म अदायगी की तरह डॉ अम्बेडकर की प्रशंसा में लगे है ,पर 26 नवम्बर 1949 को संविधान सौंपते हुए उनके द्वारा कही गयी बात पर चर्चा नहीं हो रही है कि आर्थिक एवं सामाजिक गैर बराबरी मिटाये बगैर यह राजनीतिक समानता स्थायी नहीं हो सकती है .काश ,इस विषय पर देश की संसद विचार विमर्श करती ,मगर अफ़सोस कि अम्बेडकर की व्यक्ति पूजा चालू है ,उनका अनथक गुणगान जारी है. बड़ी ही चालाकी से उनके विचारों को दरकिनार किया जा रहा है .एक राष्ट्र के नाते बाबा साहब जो चाहते थे क्या हम वो लक्ष्य प्राप्त करने में सफल रहे है ? इस सवाल पर मेरे देश की संसद मौन है !

- भंवर मेघवंशी
( स्वतंत्र पत्रकार )

Monday, April 13, 2015

एनसीआरटी की स्थापना से आज तक अजा/अजजा के कर्मचारियों के साथ भेदभाव जारी कार्यवाही हेतु हक रक्षक दल के प्रमुख ने प्रधानमंत्री और मानव संसाधन मंत्री को लिखा पत्र

एनसीआरटी की स्थापना से आज तक अजा/अजजा के कर्मचारियों के साथ भेदभाव जारी
कार्यवाही हेतु हक रक्षक दल के प्रमुख ने प्रधानमंत्री और मानव संसाधन मंत्री को लिखा पत्र
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जयपुर। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) में अजा/अजजा के कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का हनन, अत्याचार, भेदभाव और मनमानी के विरुद्ध दण्डात्मक कार्यवाही करने के सम्बन्ध में हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन के राष्ट्रीय प्रमुख डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नयी दिल्ली और मानव संसाधन मंत्री भारत सरकार, नयी दिल्ली को पत्र लिखकर मांग की है कि अजा एवं अजजा वर्गों के कर्मचारियों को जानबूझकर क्षति पहुंचाने वाले गैर अजा/अजजा प्रशासकों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्यवाही की जावे और अभियान चलाकर अजा एवं अजजा वर्गों के कर्मचारियों को पदोन्नतियां प्रदान की जावें।
पत्र में डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने लिखा है कि हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन के राष्ट्रीय प्रमुख डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नयी दिल्ली और मानव संसा को प्राप्त जानकारी के अनुसार-भारत सरकार के मानव संसाधन विभाग के अधीन संचालित राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद में इसकी स्थापना से आज तक अजा एवं अजजा के कर्मचारियों को संविधान में निर्धारित प्रावधानों और सरकारी नीति तथा प्रक्रियानुसार पदोन्नति में आरक्षण प्रदान करने के लिये विधिवत रोस्टर बनाकर लागू नहीं किया गया है। रोस्टर में जानबूझकर विसंगतियॉं छोड़ने वाले कर्मचारियों को अनारक्षित वर्ग के उच्चाधिकारियों का दुराशयपूर्ण संरक्षण प्राप्त है। अजा एवं अजजा वर्गों के कर्मचारियों के उच्च श्रेणी में पद रिक्ति होने के वर्षों बाद तक डीपीसी का गठन नहीं किया जाता है। यही नहीं अजा एवं अजजा वर्गों के कर्मचारियों की पदोन्नति की पात्रता में किसी भी प्रकार की छूट का नियम लागू नहीं किया गया है। जबकि भारत सरकार की सभी मंत्रालयों में इस प्रकार की छूट के स्पष्ट प्रावधान लागू हैं।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने आगे लिखा है कि इस प्रकार उपरोक्त कारणों से राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की स्थापना से आज तक अनारक्षित वर्ग के उच्च पदस्थ प्रशासकों द्वारा निम्न से उच्च पदों पर अजा एवं अजजा के कर्मचारियों की पदोन्नति दुराशयपर्वक बाधित की जाती रही हैं और इस कारण राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की स्थापना से आज तक उच्चतम पदों पर अजा एवं अजजा वर्गों का संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के अनुसार पर्याप्त और निर्धारित प्रतिनिधित्व सम्भव नहीं हो पाया है। जिसके चलते अजा एवं अजजा के निम्न स्तर के कर्मचारियों का संरक्षण और उनका उत्थान असंसभव हो चुका है। परिषद के उच्च पदस्थ गैर-अजा एवं अजजा वर्ग के प्रशासकों का यह कृत्य अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की धारा 3 (1) (9) के तहत दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आता है।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने उपरोक्त तथ्यों से अवगत करवाकर प्रधानमंत्री और मानव संसाधन मंत्री  से आग्रह है कि-

1. अजा एवं अजजा वर्गों के कर्मचारियों को पदोन्नति की क्षति पहुँचाने वाले गैर-अजा एवं अजजा वर्गों के उपरोक्तानुसार लिप्त रहे सभी प्रशासकों के विरुद्ध अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की धारा 3 (1) (9) के तहत आपराधिक मुकदम दर्ज करवाकर उन्हें कारवास की सजा दिलवाई जावे और साथ ही साथ ऐसे प्रशासकों के विरुद्ध विभागीय सख्त अनुशासनिक कार्यवाही भी की जावे। जिससे भविष्य में अजा एवं अजजा वर्गों के हितों को नुकसान पहुँचाने की कोई गैर-अजा एवं अजजा वर्गों का प्रशासक हिम्मत नहीं जुटा सके।
2. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की स्थापना से आज तक अजा एवं अजजा वर्गों को हुए नुकसान की भरपाई करने के लिये किसी बाहरी स्वतन्त्र और निष्पक्ष ऐजेंसी से सभी पदों का सही रोस्टर बनवाया जावे और भारत सरकार की नीति के अनुसार पदोन्नति पात्रता में शिथिलता प्रदान करते हुए अजा एवं अजजा वर्गों के समस्त रिक्त पदों को अभियान चलाकर तुरन्त प्रभाव से भरवाये जाने के आदेश प्रदान किये जावें।
पत्र के अंत में डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने लिखा है की पत्र पर की जाने वाली कार्यवाही सेहक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन को अवगत करवाने का कष्ट करें।

(डॉ. पुरुषोत्तम मीणा)
राष्ट्रीय प्रमुख
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लिखा गया पात्र  ----------------------------------------------------------------------------
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प्रेषक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन 
राष्ट्रीय कार्यालय : 7, तंवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
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पत्रांक : /भारत सरकार/पत्र/2 दिनांक : 13.04.2015
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प्रतिष्ठा में :
प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नयी दिल्ली।
शिक्षामंत्री, भारत सरकार, नयी दिल्ली।

विषय : राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) में अजा/अजजा के कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का हनन, अत्याचार, भेदभाव और मनमानी के विरुद्ध दण्डात्मक कार्यवाही करने के सम्बन्ध में।
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इस संगठन को प्राप्त जानकारी के अनुसार-

भारत सरकार के मानव संसाधन विभाग के अधीन संचालित राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद में इसकी स्थापना से आज तक अजा एवं अजजा के कर्मचारियों को संविधान में निर्धारित प्रावधानों और सरकारी नीति तथा प्रक्रियानुसार पदोन्नति में आरक्षण प्रदान करने के लिये विधिवत रोस्टर बनाकर लागू नहीं किया गया है। रोस्टर में जानबूझकर विसंगतियॉं छोड़ने वाले कर्मचारियों को अनारक्षित वर्ग के उच्चाधिकारियों का दुराशयपूर्ण संरक्षण प्राप्त है। अजा एवं अजजा वर्गों के कर्मचारियों के उच्च श्रेणी में पद रिक्ति होने के वर्षों बाद तक डीपीसी का गठन नहीं किया जाता है। यही नहीं अजा एवं अजजा वर्गों के कर्मचारियों की पदोन्नति की पात्रता में किसी भी प्रकार की छूट का नियम लागू नहीं किया गया है। जबकि भारत सरकार की सभी मंत्रालयों में इस प्रकार की छूट के स्पष्ट प्रावधान लागू हैं।

इस प्रकार उपरोक्त कारणों से राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की स्थापना से आज तक अनारक्षित वर्ग के उच्च पदस्थ प्रशासकों द्वारा निम्न से उच्च पदों पर अजा एवं अजजा के कर्मचारियों की पदोन्नति दुराशयपर्वक बाधित की जाती रही हैं और इस कारण राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की स्थापना से आज तक उच्चतम पदों पर अजा एवं अजजा वर्गों का संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के अनुसार पर्याप्त और निर्धारित प्रतिनिधित्व सम्भव नहीं हो पाया है। जिसके चलते अजा एवं अजजा के निम्न स्तर के कर्मचारियों का संरक्षण और उनका उत्थान असंसभव हो चुका है। परिषद के उच्च पदस्थ गैर-अजा एवं अजजा वर्ग के प्रशासकों का यह कृत्य अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की धारा 3 (1) (9) के तहत दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आता है।

अत: आपको उपरोक्त तथ्यों से अवगत करवाकर आग्रह है कि-

  • 1. अजा एवं अजजा वर्गों के कर्मचारियों को पदोन्नति की क्षति पहुँचाने वाले गैर-अजा एवं अजजा वर्गों के उपरोक्तानुसार लिप्त रहे सभी प्रशासकों के विरुद्ध अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की धारा 3 (1) (9) के तहत आपराधिक मुकदम दर्ज करवाकर उन्हें कारवास की सजा दिलवाई जावे और साथ ही साथ ऐसे प्रशासकों के विरुद्ध विभागीय सख्त अनुशासनिक कार्यवाही भी की जावे। जिससे भविष्य में अजा एवं अजजा वर्गों के हितों को नुकसान पहुँचाने की कोई गैर-अजा एवं अजजा वर्गों का प्रशासक हिम्मत नहीं जुटा सके।
  • 2. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की स्थापना से आज तक अजा एवं अजजा वर्गों को हुए नुकसान की भरपाई करने के लिये किसी बाहरी स्वतन्त्र और निष्पक्ष ऐजेंसी से सभी पदों का सही रोस्टर बनवाया जावे और भारत सरकार की नीति के अनुसार पदोन्नति पात्रता में शिथिलता प्रदान करते हुए अजा एवं अजजा वर्गों के समस्त रिक्त पदों को अभियान चलाकर तुरन्त प्रभाव से भरवाये जाने के आदेश प्रदान किये जावें।
  • 3. उक्त पत्र पर की जाने वाली कार्यवाही से इस संगठन को अवगत करवाने का कष्ट करें।

भवदीय 
(डॉ. पुरुषोत्तम मीणा)
राष्ट्रीय प्रमुख

Monday, August 12, 2013

दुर्गा शक्ति के बहाने ताकतवर होती आईएएस लॉबी

"हमें हजारों सालों से एक ही बात सिखायी गयी है कि उच्च वर्ग और शासक वर्ग कभी गलत नहीं होता, उसे कभी बड़ी सजा नहीं दी जा सकती और छोटे लोग या निम्न वर्ग सेवा करने, सजा पाने और देश के कानून को तथा सत्ताधारियों व सत्ता के दलालों के हर आदेश को मानने के लिये पैदा हुए हैं।" "ये मनोभाव आज भी इस देश के लोगों के अवचेतन में विद्यमान है और यही रुग्ण मानसिकता, अनेक प्रकार के शोषण एवं विभेद के लिये जिम्मेदार है। जब तक इस मानसिकता को पैदा करने वाले कारकों को शक्ति से नहीं बदला जायेगा दुर्गा शक्ति नागपाल जैसियों के बहाने आईएएस अधिक ताकतवर होते रहेंगे और कमजोर वर्ग शोषण का शिकार होता रहेगा।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा युवा आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित कर दिये जाने के मुद्दे को कॉर्पोरेट तथा धनाढ्य वर्ग के चंगुल में कैद मीडिया द्वारा जमकर उछाला गया है। इस मुद्दे के बहाने मीडिया व हितबद्ध लोगों द्वारा तरह-तरह की चर्चाएँ और परिचर्चाएँ आयोजित और सम्पन्न करवायी गयी। प्रिंट और सोसल मीडिया पर कई सौ आलेख इस विषय पर लिखे जा चुके हैं। इस मुद्दे को प्रचारित करने का आधार ये बताया जा रहा है कि दुर्गा शक्ति नागपाल नाम की ये निलम्बित आईएएस ईमानदार बतायी जाती हैं और इन्होंने कथित रूप से माफिया से टक्कर लेने की कौशिश की। जबकि उत्तर प्रदेश की सरकार का पक्ष है कि रमजान के पवित्र महिने में इस्लाम के अनुयाईयों की ओर से किये जा रहे मस्जिद की निर्माण में व्यवधान डालने का प्रयास करके दुर्गा शक्ति नागपाल ने कथित रूप से सामाजिक सौहार्द और शान्ति को भंग करने का प्रयास किया।

इस मुद्दे को जहॉं एक ओर तो देश की आईएएस लॉबी ने अपनी आन-बान और शान से जोड़ दिया है, वहीं दूसरी और इस देश की संस्कृति, ईमानदारी, चाल, चरित्र और सभी सामाजिक मूल्यों की ठेकेदारी करने वाली सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक ताकतों ने इसे इस प्रकार से उछालने का प्रयास किया है, मानो दुर्गा शक्ति नागपाल के निलम्बन से आसमान टूट पड़ा हो और मानो इससे देश का सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और ईमानदारी का ढांचा ही बिखर जायेगा। इन ताकतों का मानना है कि इस देश के प्रबुद्ध वर्ग का नेतृत्व आईएएस करता है और वही देश को सही दिशा दे सकता है। इसलिये हर हाल में आईएएस का सम्मान होना चाहिये और आईएएस चाहे कुछ भी करे, उसे स्थानान्तरित किये जाने से बड़ी कोई सजा दी ही नहीं जानी चाहिये।

अन्यथा क्या कारण है कि गुजरात के आईपीएस संजीव भट्ट के साथ कोई क्यों खड़ा नहीं हुआ और प्रतिदिन कई सौ छोटे कर्मचारी कठोर श्रम करने के बाद भी अपनी ईमानदारी और संविधान के प्रति निष्ठा के चलते हुए भी आईएएस और पीएसएसी अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किये जा रहे हैं, लेकिन उनके साथ कोई खड़ा नहीं होता है। उनके साथ होने वाला अन्याय कोई अन्याय नहीं और दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित किया जाना देशभर में इस प्रकार से चर्चा का विषय बना दिया गया है, मानो दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ कोई भयंकर अमानवीय दुर्व्यवहार या दुर्घटना हो गयी है।

स्वयं सुप्रीम कोर्ट अनेक बार कहा चुका है कि "निलम्बन कोई सजा नहीं है। अत: निलम्बन को चुनौती नहीं दी जा सकती।" हॉं ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट के ऐसे निर्णय उन छोटे कर्मचारियों को राहत नहीं देते हुए सुनाये जाते रहे हैं, जिनमें राज्य लोक सेवा आयोग और संघ लोक सेवा आयोग के उत्पाद महामानव, महान विभूतियों द्वारा मनमाने तरीके से छोटे कर्मचारियों का निलम्बन किया जाता रहा है, ऐसे में दुर्गा शक्ति नागपाल के मामले में आने वाले समय में स्वयं सुप्रीम कोर्ट भी मीडिया की भॉंति अपना नया "विपरीत रुख" अपना ले तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट हड़ताल करने को असंवैधानिक घोषित करने के बाद भी ओबीसी वर्ग को संविधान में वर्णित सामाजिक न्याय की अवधारणा के अनुसार उच्च शिक्षण संस्थानों में, ओबीसी की जनसंख्या से बहुत कम फीसदी आरक्षण दिये जाने के सरकारी आदेश के विरुद्ध, उच्च वर्ग के डॉक्टरों द्वारा विरोध स्वरूप, गैर कानूनी तरीके से की गयी हड़ताल को, सुप्रीम कोर्ट अपने पिछले आदेश की अनदेखी करते हुए न मात्र संवैधानिक ठहरा चुका है, बल्कि केन्द्र सरकार को निर्देश भी दे चुका है कि हड़ताली डॉक्टरों को हड़ताल की अवधि का वेतन दिया जावे।

ऐसे में "आईएएस अधिकारी का निलम्बन भी सुप्रीम कोर्ट को सजा नजर आ जाये तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये!" जिसका सबसे बड़ा कारण यही है कि "हमें हजारों सालों से एक ही बात सिखायी गयी है कि उच्च वर्ग और शासक वर्ग कभी गलत नहीं होता, उसे कभी बड़ी सजा नहीं दी जा सकती और छोटे लोग या निम्न वर्ग सेवा करने, सजा पाने और देश के कानून को तथा सत्ताधारियों व सत्ता के दलालों के हर आदेश को मानने के लिये पैदा हुए हैं।" "ये मनोभाव आज भी इस देश के लोगों के अवचेतन में विद्यमान है और यही रुग्ण मानसिकता, अनेक प्रकार के शोषण एवं विभेद के लिये जिम्मेदार है। जब तक इस मानसिकता को पैदा करने वाले कारकों को शक्ति से नहीं बदला जायेगा दुर्गा शक्ति नागपाल जैसियों के बहाने आईएएस अधिक ताकतवर होते रहेंगे और कमजोर वर्ग शोषण का शिकार होता रहेगा।

Friday, February 15, 2013

मीडिया द्वारा बड़ी घटनाएँ दबा दी जाती हैं और .....!


मीडिया द्वारा बड़ी घटनाएँ दबा दी जाती हैं और प्रायोजित घटनाएँ खबर बना दी जाती हैं!
दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण इलाहाबाद में कुम्भ के दौरान हुए हादसे में कई दर्जन निर्दोष लोगों की जान चली जाने का है, जिसमें कोई राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहा है, तो कोई रेलवे मंत्रालय को, जबकि कोई भी इस बात को नहीं उठा रहा है कि कुम्भ जैसे अवैज्ञानिक और अश्‍लील आयोजनों की जरूरत ही क्या है? जहॉं पर संत का चौला पहने हजारों लोग स्त्रियों की उपस्थिति में नग्न होकर स्नान करते हैं!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

देश की दो फीसदी आबादी का देश के 70 फीसदी संसाधनों तथा पूँजी पर कब्जा है और ये लोग मीडिया के जरिये देश को अपनी योजनानुसार बरगलाते और दिग्भ्रमित करते रहते हैं। ये लोग बड़ी से बड़ी घटना को दबवा देते हैं और देशहित की बातों से ध्यान हटाने के लिये प्रायोजित और बनावटी घटनाओं को ज्वलन्त व सनसनीखेज सबर बनाकर पेश करवा देते हैं। जिसके चलते देश के लोगों को वास्तविक हालातों का ज्ञान ही नहीं हो पाता है और भोले-भाले ऊर्जावान युवा अपने दुश्मनों के दुष्चक्र में फंसकर अपने ही पैरों पर कुल्हा़ड़ी मारने को उद्यत हो जाते हैं।

इस प्रकार के मामले इस देश में अनेकों बार, बल्कि बार-बार दोहराये जाते रहते हैं। जिनकी शुरूआत हुई मण्डल कमीशन के विरोध में मीडिया द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को ही सड़कों पर उतारने को उकसाया गया। जिसमें युवाओं को आरक्षण के खिलाफ सड़कों पर विरोध करते हुए दिखाया गया और जानबूझकर मनुवादियों ने अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों के युवाओं को ही आगे कर दिया। जिन्हें मीडिया के सामने लाकर केरोसीन तथा पेट्रोल से नहलाकर आग के हवाले कर दिया गया। मीडिया ने इसे आरक्षण विराध के रूप में प्रचारित किया। इसी प्रकार से गुजरात में दंगों के दौरान मनुवादियों ने हिन्दुत्व का जहर घोलकर वहॉं के अशिक्षित, विपन्न, शोषित और पिछड़े और दूर-दराज के पिछड़े क्षेत्रों में निवास करने वाले आदिवासियों को आगे कर दिया। जो आज भी कोर्ट-कचेहरियों के चक्कर काट रहे हैं, जबकि नरेन्द्र मोदी और भाजपा इस घिनौने कत्लेआम के प्रतिफल में गुजरात की सत्ता पर लगातार काबिज हो चुके हैं।

उसी गुजरात में पिछले सप्ताह चालीस आदिवासियों को मनुवादियों ने खौलते तेल में हाथ डालकर अग्नि परीक्षा देने के लिये विवश कर दिया और इस दुष्कृत्य को मीडिया ने खबर बनाने के बजाय प्रायोजित तरीके से दबा दिया। जबकि अग्नि परीक्षा जैसी धूर्त चालों के जरिये लोगों को मूर्ख बनाने वाले मनुवादियों के षड़यन्त्र को मीडिया द्वारा प्रमुखता से विश्‍व के समक्ष उजागर करना चाहिये था! सवाल तो यह भी उठना चाहिये कि जब सति-प्रथा जैसी अवैज्ञानिक और अमानवीय कुप्रथा को प्रतिबन्धित करके, इसका महिमामंडन प्रतिबन्धित और अपराध घोषित किया जा चुका है तो किसी भी प्रकार से अग्नि परीक्षा जैसी अमानवीय और नृशंस क्रूरता की कपोल-कल्पित कहानियों से भरे पड़े मनुवादियों के ग्रंथों को क्यों प्रतिबन्धित नहीं किया जा रहा है? जिनके चलते ही लोगों के अवचेतन मन में ऐसे अमानवीय और क्रूर विचार पनपते हैं। दुर्भाग्य यह है कि देश का तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया मनुवादियों के कब्जे में है, जो फिर से इस देश को मनुवाद से शासित होते देखने के लिये लगातार प्रयास करता रहता है, उस मीडिया से ये अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह मनुवादियों के षड़यन्त्रों को ध्वस्त करने वाली खबरों को प्रमुखता से प्रचारित, प्रसारित और प्रकाशित करे!

इसी का दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण इलाहाबाद में कुम्भ के दौरान हुए हादसे में कई दर्जन निर्दोष लोगों की जान चली जाने का है, जिसमें कोई राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहा है, तो कोई रेलवे मंत्रालय को, जबकि कोई भी इस बात को नहीं उठा रहा है कि कुम्भ जैसे अवैज्ञानिक और अश्‍लील आयोजनों की जरूरत ही क्या है? जहॉं पर संत का चौला पहने हजारों लोग स्त्रियों की उपस्थिति में नग्न होकर स्नान करते हैं!

सच तो यह है कि मनुवादियों ने इस देश के लोगों के अवचेतन में इस प्रकार की अनेक रुग्णताएँ गहरे में स्थापित कर दी हैं कि उनसे लोगों को रोगमुक्त करने के लिये लगातार वर्षों तक प्रयास करने की जरूरत है। जबकि इसके ठीक विपरीत कुम्भ स्नान की कपोल-कल्पित कहानियों का मीडिया लागातार महिमामण्डन कर रहा है और आर्यों के इस अश्‍लील आयोजन को बढाने के लिये प्रयास जारी हैं। जबकि दुर्भाग्यपूर्ण सच यह है कि मूल निवासियों को युद्ध में हराने के जश्‍न के रूप में कुम्भ का आयोजन किया जाता है, जिसमें बढचढकर मूल निवासी ही हिस्सा ले रहे हैं!

मीडिया के जरिये क्रूर और चालाक मनुवादी व्यवस्था के संचालक एक बार फिर से अपने अवैज्ञानिक सिद्धान्तों को आस्था की चाशनी में लपेटकर भोलेभाले देशवासियों के समक्ष इस प्रकार से परोस रहे हैं कि इस षड़यन्त्र में फंसकर आम लोगों, विशेषकर स्त्रियों, पिछड़ों, आदिवासियों और दलितों के वर्तमान और भविष्य को बर्बाद किया जा रहा है। इसी सुनियोजित षड़यन्त्र की क्रूर परिणिती है-इलाहबाद की रेलवे पुल की रैलिंग टूटने की दु:खद घटना, जिसके लिये और कोई नहीं केवल और केवल मनुवादी व्यवस्था जिम्मेदार है। जिससे निजात दिलाने की मीडिया और राजनेताओं से दूर-दूर तक कहीं कोई संभावना नजर नहीं आ रही है|

हालांकि खुशी इस बात की है कि अमानवीय और अवैज्ञानिक मनुवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई को इस देश के ब्राह्मण समाज के कुछ युवा समझ रहे हैं और वे इसके विरुद्ध खड़े भी हो रहे हैं। जिसके चलते दलित आन्दोलन को ताकत मिल सकती है। यद्यपि बामसेफ जैसे संगठन इस दिशा में लागातार अच्छा काम कर रहे हैं और देशवासियों को ब्राह्मणवादी और मनुवादी व्यवस्था के चंगुल से मुक्त करवाने के लिये देशभर में अभियान चलाये हुए हैं, जो मुनवादी मीडिया के समक्ष नाकाफी ही है!

Tuesday, August 28, 2012

समानता का मूल अधिकार विभेद की मनाही नहीं करता!


समानता का मतलब सबको आँख बंद करके एक समान मानना नहीं है, बल्कि सरकार के द्वारा समान लोगों के साथ समान व्यवहार करना है, जिसके लिए एक समान लोगों, समूहों और जातिओं का वर्गीकरण करना समानता के मूल अधिकार को लागू करने के लिए अत्यंत जरूरी है! अत: अनुच्छेद 14 में वर्णित समानता के मूल अधिकार को वास्तव में सकारात्मक रूप से लागू करने के लिये दमित और सदियों से दबे-कुचले वर्गों को अजा, अजजा और पिछड़े वर्गों में वर्गीद्भत करके उनको सरकार एवं प्रशासन में समान भागीदारी प्रदान करना संविधान में वर्णित समानता के मूल अधिकार का असली मकसद है। जिसके विरुद्ध किसी भी प्रकार की व्यवस्था समानता के मूल सिद्धान्त की मूल भावना के विपरीत और अमानवीय होगी।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
इन दिनों मोहनदास गांधी द्वारा धोखे से सेपरेट इलेक्ट्रोल के हक को छीनकर और अनशन के जरिये भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. अम्बेड़कर को विवश करके अजा एवं अजजा वर्गों पर जबरन थोपे गये आरक्षण को समाप्त करने और छीनने के लिये फिर से लगातार हमले हो रहे हैं।

स्वघोषित और स्वनामधन्य अनेक ऐसे पूर्वाग्रही लेखक और लेखिकाओं द्वारा जिन्होंने संविधान को पढना तो दूर, शायद कभी संविधान के पन्ने तक नहीं पलटे, वे भी संविधान की व्याख्या कर रहे हैं। लोगों को भ्रमित करते हुए लिख रहे हैं कि सरकारी सेवाओं और शिक्षण संस्थाओं में अजा एवं अजजा को आरक्षण केवल दस वर्ष के लिये दिया गया था, जिसे बार-बार बढाया जाता रहा है।! ऐसे लेखकों से मेरा सदैव की भांति फिर से इस आलेख के माध्यम से आग्रह है कि वे ऐसा लिखने या कहने से पूर्व कितना अच्छा होता कि उस प्रावधान का भी उल्लेख कर देते, जिसमें और जहॉं लिखा गया है कि अजा एवं अजजा के लिये दस वर्ष के आरक्षण का प्रावधान क्यों और किसलिए किया गया था!

ऐसे विष वमन करने वालों से मसाज के सौहार्द को बचाने के लिये मैं साफ कर दूँ कि दस वर्ष का आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद 334 में संसद और विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए किया गया था, न कि नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए? अनुच्छेद 15 (4) एवं 16 (4) के अनुसार नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए? अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान संविधान का स्थायी हिस्सा है! यह अजा एवं अजजातियों का मूल अध्किार है। जिसे न कभी बढाया गया और न ही बढ़ाये जाने की जरूरत है! हॉं इस प्रावधान को अनेक बार इस देश की महान न्यायपालिका के अनेक निर्णयों ने अनेक प्रकार से कमजोर करने का प्रयास जरूर किया है! जिसे नयी दिल्ली पर शासन करने वाले हर दल की केन्द्रीय सरकार के नकार दिया और समय-समय पर संसद की संवैधानिक विधयी शक्ति के मार्फत अनेक बार मजबूत और स्पष्ट किया है! इसके उपरान्त भी भारत की न्यायपालिका में विचारधारा विशेष से ग्रसित कुछ जजों की ओर से अजा एवं अजजा वर्गों पर कुठाराघात करने वाले निर्णय आते ही रहते हैं। पिछले दिनों पदोन्नति में आरक्षण पर रोक सम्बन्धी निर्णय को भी सामाजिक न्याय के सिद्धान्त के विपरीत इसी प्रकार का एक विभेदकारी निर्णय बताया जा रहा है। जिसे निष्प्रभावी करने के लिये केन्द्र सरकार और सभी राजनैतिक दल सहमत हैं और इस बारे में शीघ्र ही संविधान में संशोधन किये जाने की आशा की जा सकती है।  

कुछ सामाजिक न्याय में आस्था नहीं रखने वाले लोगों का कहना है कि संविधान की प्रस्तावना में केवल ‘समानता’ की बात कही है, उसमें कहीं भी आरक्षण का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इसलिये ऐेसे लोग आरक्षण को संविधान की प्रस्तावना की भावना के विपरीत मानते हैं।

जहॉं तक संविधान की प्रस्तावना में किसी विषय का उल्लेख होने या न होने के सवाल है तो मेरा इस बारे में विनम्रतापूर्वक यही कहना है कि हर व्यक्ति अपने हिसाब (स्वार्थ) और अपनी सुविधा से इसका अर्थ लगाता है और अपनी सुविधा से ही किसी बात को समझना चाहता है! अन्यथा संविधान की प्रस्तावना में साफ शब्दों में लिखा गया है कि ‘‘अवसर की समता’’ और ‘‘व्यक्ति की गरिमा’’ सुनिश्‍चित करना संविधान का लक्ष्य है! जिसे पूर्ण करने के किये ही सरकारी नौकरियों, सरकारी शिक्षण संस्थानों और विधायिका में जातिगत आरक्षण की व्यवस्था की गयी है!

इसके आलावा ये बात भी बिनापूर्वाग्रह के समझने की है कि संविधान की प्रस्तावना में सब कुछ और हर एक विषय को विस्तार से नहीं लिखा जा सकता! ‘‘अवसर की समता’’ और ‘‘व्यक्ति की गरिमा’’ सुनिश्‍चित करने के प्रावधान का प्रस्तावना में उल्लेख करने के आधार पर ही आज भारत में महिलाओं, छोटे बच्चों और नि:शक्तजनों के लिए हर स्तर पर विशेष कल्याणकारी प्रावधान किये गए हैं! जो अनेक बार सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी संविधान सम्मत ठहराये जा चुके हैं।

संविधान की प्रस्तावना में तो स्पष्ट रूप से कहीं भी निष्पक्ष चुनाव प्रणाली के बारे में एक शब्द तक नहीं लिखा गया है, लेकिन ‘‘अभिव्यक्ति’’ शब्द सब कुछ खुद ही बयां करता है! इस प्रकार संविधान की प्रस्तावना में केवल मौलिक बातें ही लिखी जाती हैं। इसीलिये संविधान की प्रस्तावना को संविधान का आमुख भी कहा जाता है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि केवल चेहरा देखकर ही अन्तिम निर्णय नहीं लिया जा सकता। इसलिये प्रस्तावना सब कुछ या अन्तिम सत्य नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण संविधान और संविधान पर न्यायपालिका के निर्णयों के प्रकाश में विधायिका की नीतियॉं ही संविधान को ठीक से समझने का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

अत: यदि हममें से जो भाी संविधान के जानकर हैं और यदि हम देश और समाज में सभी की खुशहाली चाहते हैं तो हमें अपने ज्ञान का उपयोग देश के सभी लोगों के लिए और विशेषकर वंचित तथा जरूरतमंद लोगों के हित में उपयोग करना चाहिये। न का लोगों को भड़काने या भ्रमित करने के लिये, जैसा कि कुछ पूर्वाग्रही लोग करते रहते हैं।
अन्त में, मैं सामाजिक न्याय के विरोधी लोगों, विचारकों, चिन्तकों और लेखकों से कहना चाहता हूँ कि वे इस बात को समझने का प्रयास करें कि आरक्षित वर्गों में शामिल जातियों को विगत में हजारों सालों तक जन्म, वंश और जाति के आधार पर न मात्र उनके हकों से वंचित ही किया गया, न मात्र उनके हकों को छीना और लूटा ही गया, बल्कि उन्हें कदम-कदम पर सामाजिक, सांस्द्भतिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से लगातार उत्पीड़ित करके, उनका शोषण भी किया जाता रहा है! ऐसे में इन वर्गों में शामिल जातियों का उत्थान करना और उनको उनके हकों को वापिस देना इस देश के शोषकों के वंशजों और सरकार का कानूनी, नैतिक और संवैधानिक दायित्व है। जिसे मोहन दास कर्मचन्द गांधी के धोखेभरे निर्णयों के बाद केवल जातिगत आरक्षण के मार्फ़त ही सुधारे जाने की आधी अधूरी आशा की जा सकती है! यदि अभी भी सच्चाई तथा न्याय के सच्चे पक्षधर मो. क. गांधी के अन्याय से आरक्षित वर्गों को बचाना चाहते हैं और देश से आरक्षण को समाप्त करना चाहते हैं, तो उनको चाहिये कि वे अजा एवं अजजातियों को सेपेरेट इलेक्ट्रोल का छीना गया हक वापिस दिलाने में सच्चा सहयोग करें। अन्यथा आरक्षण को खुशीखुशी सहने की आदत डालें, क्योंकि संवैधानिक आरक्षण के समाप्त होने की कोई आशा नहीं है।

आरक्षण किसी प्रकार का विभेद या समानता मूल अधिकार का हनन नहीं करता है। बल्कि यह न्याय करने का एक संवैधानिक तरीका बताया और माना गया है। इसीलिये संविधान में जाति, धर्म आदि अनेक आधारों पर वर्गीकरण (जिसे कुछ लोग विभेद मानते हैं) करने को हमारे संविधान और विधायिका द्वारा मान्यता दी गयी है!
प्रोफ़ेसर प्रद्युमन कुमार त्रिपाठी (बीएससी, एलएल एम, दिल्ली, जेएसडी-कोलंबिया) लिखित ग्रन्थ ‘‘भारतीय संविधान के प्रमुख तत्व’’ (जिसे भारत सरकार के विधि साहित्य प्रकाशन विभाग द्वारा पुरस्द्भत और प्रकाशित किया गया है) के पेज 277 पर कहा गया है कि-

जब समाज के लोगों का स्वयं विधायिका ही वर्गीकरण कर देती है तो समानता के मूल अधिकार (के उल्लंघन) संबंधी कोई गंभीर प्रश्‍न उठने की सम्भावना नहीं होती (जैसे की कुछ पूर्वाग्रही लोगों द्वारा निहित स्वार्थवश सवाल उठाये जाते रहे हैं), क्योंकि....विधायिका विशेष वर्गों की समस्याओं, आवश्यकताओं तथा उलझनों को ध्यान में रखकर ही उनके लिये विशेष कानून बनाती है, असंवैधानिक या वर्जनीय विभेद के उद्देश्य से नहीं! उदाहरणार्थ केवल हिन्दुओं (हिन्दू आदिवासियों को छोड़कर) के लिए ‘हिन्दू विवाह अधिनियम’ बनाने का उद्देश्य हिन्दुओं (जिसमें में भी हिन्दू आदिवासियों पर ये लागू नहीं होता है) तथा अन्य धर्मों के अनुयाईयों में (सामान्य हिन्दुओं और आदिवासी हिन्दुओं में) भेद करना नहीं है, बल्कि संसद द्वारा बनाया गया यह अधिनियम हिन्दुओं (आदिवासी हिन्दुओं सहित) के इतिहास, उनकी मान्यताओं, उनके सामाजिक विकास के स्तर तथा उनकी आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए, उनके कल्याण की कामना से पारित किया गया है। अत: यह अधिनियम केवल हिन्दुओं (हिन्दू आदिवासियों को छोड़कर) पर लागू होता है तो भी कोई हिन्दू तथा अहिन्दू (सामान्य हिन्दू और आदिवासी हिन्दू) इसे इस आधार पर चुनौती नहीं दे सकते कि यह हिन्दू तथा अहिन्दू (सामान्य हिन्दू और आदिवासी हिन्दू) में कुटिल विभेद करता है। संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का मूल अधिकार) विभेद की मनाही नहीं करता, वह केवल कुटिल विभेद की मनाही करता है, वर्गीकरण की मनाहीं नहीं करता, कुटिल वर्गीकरण की मनाहीं करता है! 

जिसे सुप्रीम कोर्ट ने एन एम टामस, ए आई आर. 1976, एस सी 490 में इस प्रकार से स्पष्ट किया है-
सरकारी सेवाओं में नियुक्ति और पदोन्नति पाने के सम्बन्ध में अजा और अजजा के नागरिकों को जो सुविधा प्रदान की गयी है, वह अनुच्छेद 16 (4) के प्रावधानों से आच्छादित न होते हुए भी स्वयं मूल अनुच्छेद 16 खंड (1) के आधार पर ही वैध है, क्योंकि यह प्रावधान निश्‍चय ही एक विशिष्ठ पिछड़े हुए वर्गों (अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग) के लोगों का संविधान के अनुच्छेद 46 में उपबंधित नीति निदेशक तत्व की पूर्ति करने तथा अनुच्छेद 335 में की गयी घोषणा की कार्यान्वित करने के उद्देश्य से किया गया, वैध वर्गीकरण है जो समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं, बल्कि इसका सही और सकारात्मक क्रियान्वयन करता है।

पश्‍चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार, ए आई आर 1952 एस सी 75, 88 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि-
समानता का मतलब सबको आँख बंद करके एक समान मानना नहीं है, बल्कि सरकार के द्वारा समान लोगों के साथ समान व्यवहार करना है, जिसके लिए एक समान लोगों, समूहों और जातिओं का वर्गीकरण करना समानता के मूल अधिकार को लागू करने के लिए अत्यंत जरूरी है! अत: अनुच्छेद 14 में वर्णित समानता के मूल अधिकार को वास्तव में सकारात्मक रूप से लागू करने के लिये दमित और सदियों से दबे-कुचले वर्गों को अजा, अजजा और पिछड़े वर्गों में वर्गीद्भत करके उनको सरकार एवं प्रशासन में समान भागीदारी प्रदान करना संविधान में वर्णित समानता के मूल अधिकार का असली मकसद है। जिसके विरुद्ध किसी भी प्रकार की व्यवस्था समानता के मूल सिद्धान्त की मूल भावना के विपरीत और अमानवीय होगी।

Thursday, February 9, 2012

एम के गॉंधी के-निष्ठुर, हृदयहीन तथा धोखेभरे निर्णयों को सहना ही होगा!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पॉंच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में किसका ऊंट किस करवट बैठेगा, इस बात का सही-सही पता तो चुनाव परिणामों के बाद ही चलेगा, लेकिन हर ओर उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणामों के बारे में सर्वाधिक चर्चा हो रही है| हो भी क्यों नहीं, जब दिल्ली की सत्ता का किला उत्तर प्रदेश के रास्ते ही फतह किया जा सकने की सारी सम्भावनाएँ हैं|

यूपीए की केन्द्रीय सरकार को उत्तर प्रदेश चुनावों से ठीक पहले आबीसी के अन्दर अल्पसंख्यकों को अलग से आरक्षण प्रदान करने की बात याद आ रही है| यही नहीं भाजपा को भी उत्तर प्रदेश की सत्ता के लिये राम का नाम और राम मन्दिर याद आने लगा है| यही नहीं भाजपा और भाजपा से सम्बद्ध संगठनों को पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण की चिन्ता भी सताने लगी है| जबकि सामान्यत: ये सारे कथित राष्ट्रवादी, हिन्दूवादी और भारतीय संस्कृति के महारक्षक हर राजनैतिक और गैर-राजनैतिक मंच से सामाजिक न्याय की संवैधानिक अवधारणा के विरोध में बयान जारी करते रहते हैं|

इसी सोच के चलते इन लोगों ने जाति आधारित जनगणना का कड़ा विरोध करने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी| जिसकी भी असली वजह है, कि ये महामहिम राष्ट्रवादी लोग चाहते ही नहीं कि इस देश के सभी वर्गों और सभी जातियों के लोगों को उनकी जनसंख्या के अनुसार सत्ता, प्रशासन और संसाधनों में संवैधान की मूल भावना के अनुसार समान हिस्सेदारी मिले| ये लोग चाहते हैं कि अन्य पिछड़ा वर्ग सहित, सभी आरक्षित वर्गों की सही-सही जनसंख्या का देश की सरकार को पता ही नहीं चलना चाहिये| अन्यथा इनके पास कोर्ट को भ्रमित करने के सारे रास्ते बन्द हो जायेंगे|

यही नहीं इन सबकी नजर में सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ों को भी यदि बहुत जरूरी हो तो आरक्षण देने का प्रावधान केवल और केवल आर्थिक आधार पर ही नजर आता है और दूसरी ओर आर्थिक रूप से पिछड़े अन्य पिछड़ा वर्ग को उच्च शिक्षा में आरक्षण प्रदान करने पर ये ही लोग गला फाड़-फाड़ कर उसका विरोध करने के लिये सड़कों पर उतर आते हैं| आज इन लोगों को भी ओबीसी के आरक्षण में से साढे चार फीसदी हिस्सा अल्पसंख्यकों को दे देने पर, महान भारत राष्ट्र के खण्डित होने के खतरे सहित, ओबीसी के साथ कथित रूप से हो रहे घोर अन्याय के कारण हार्ट अटैक आने जैसी वेदना हो रही है|

जबकि कड़वी सच्चाई यही है कि अल्पसंख्यकों की केवल और केवल उन्हीं पिछड़ी जातियों को ही साढे चार फीसदी आरक्षण प्रदान किया गया है, जो ओबीसी वर्ग में पूर्व से ही शामिल हैं और जिनका समानुपातिक दृष्टि से साढे चार फीसदी हक ओबीसी के सत्ताईस फीसदी आरक्षण में बनता है|

यही नहीं ऐसा निर्णय करने से पूर्व भारत सरकार ने हर प्रकार से अध्ययन और जानकारी एकत्रित करके इस बात को जॉंचा-परखा है कि अल्पसंख्यकों की जातियों को ओबीसी वर्ग में कितनी हिस्सेदारी मिल रही है| जिसके बाद ही अलग से आरक्षण प्रदान करने का निर्णय लिया गया है| यह अलग बात है कि यह निर्णय राजनैतिक लाभ पाने के लिये पॉंच राज्यों के विधानसभा चुनावों से ठीक पूर्व लिया गया है| जिसे संवैधानिक भावना के अनुकूल नहीं माना जा सकता| इस सबके उपरान्त भी लगातार आरक्षण और आरक्षित वर्गों के हितों का विरोध करने को ही राष्ट्रहित बतलाने वाली भाजपा और भाजपा के अनुसांगिक संगठनों को भारत सरकार के इस निर्णय का विरोध करने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता है|

जहॉं तक धर्म के आधार पर अल्पसंख्यकों को आरक्षण प्रदान करने की बात है तो ये बात तो प्रारम्भ से ही लागू की जाती रही है| ओबीसी की सूची में इस्लाम से सम्बन्धित जातियों को शामिल किया गया है| यही नहीं अजा एवं अजजा वर्गों की सूचियों में भी किस-किस धर्म की कौन-कौन सी धर्म-परिवर्तित जातियों को आरक्षण प्राप्त होगा और किस-किस धर्म की धर्म-परिवर्तित जातियों को आरक्षण प्राप्त नहीं होगा| इस बारे में स्पष्ट नीति बनाकर लागू की हुई है| जिसका आज तक इसी आधार पर विरोध क्यों नहीं किया गया? इस बात पर भी चर्चा होनी चाहिये| भाजपा और भाजपा के अनुसांगिक संगठनों को क्या यह नहीं पता कि आदिवासियों के सत्तर फीसदी हक को केवल कुछ मुठ्ठीभर ईसाई आदिवासी छीन रहे हैं| इस बारे में एक भी आवाज सामने नहीं आती है| क्योंकि निरीह आदिवासियों के बारे में भाजपा और उससे सम्बद्ध लोग क्योंकर अपनी ऊर्जा खपाने लगे?

इसी सन्दर्भ में यह बात भी स्पष्ट कर देना जरूरी है कि वेब मीडिया सहित अनेक मंचों पर यह सवाल उठाया जाता रहा है कि आने वाले दिनों में यदि अजा एवं अजजा वर्गों में शामिल अल्पसंख्यक जातियों को भी अलग से आरक्षण प्रदान किया जायेगा, तब अजा एवं अजजा के प्रतिनिधियों, कार्यकर्ताओं, विचारकों और बुद्धिजीवियों का क्या विचार (तर्क) होगा| मैं इस बारे में यहॉं पर यह कहना बेहद जरूरी समझता हूँ कि जिन मानदण्डों और जिन पैमानों के आधार पर ओबीसी वर्ग की सूची में शामिल अल्पसंख्यक वर्ग की जातियों को अलग से साढे चार फीसदी आरक्षण दिया गया है| यदि उन्हीं सब मानदण्डों और पैमानों पर अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि अजा एवं अजजा वर्गों में शामिल अल्पसंख्यक धर्मावलम्बियों की जातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है तो अवश्य ही उन्हें उनकी जनसंख्या के अनुपात में अलग से ‘आरक्षण के अन्दर आरक्षण’ दिया ही जाना चाहिये| केवल यही नहीं-अजा एवं अजजा वर्ग में शामिल हिन्दू या अहिंदू या अन्य धर्मावलम्बी जातियों में भी विभाजन होना चाहिये| जिससे सभी जातियों और समूहों को संविधान की सामाजिक न्याय की मंसा के अनुरूप सत्ता और प्रशासन में अपने-अपने प्रतिनिधि भेजने का अवसर मिल सकें| आखिर हमें, हमारे संविधान की भावना का आदर तो करना ही होगा| 

बेशक यह सब हमें सेपरेट इलेक्ट्रोल के हक को मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी द्वारा धोखे से छीने जाने के कारण सहना और करना पड़ रहा है| अन्यथा यदि डॉ. भीमराव अम्बेड़कर की सैपरेट इलेक्ट्रोल की न्यायसंगत मांग को मानकर के भी गॉंधी द्वारा छलपूर्वक देश पर पूना पैक्ट नहीं थोपा गया होता तो सरकारी सेवाओं में और सरकारी शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण नाम की कोई अवधारणा भारत में होती ही नहीं! गॉंधी की विरासत को संभालते हुए हमें एम के गॉंधी के निष्ठुर और हृदयहीनता के पिरचायक धोखेभरे निर्णयों को भी तो सहना ही होगा|

Wednesday, January 25, 2012

आरक्षण समाप्त करना है तो आरक्षित वर्ग के वर्गद्रोही अफसर तत्काल बर्खास्त किये जायें!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

भारत के संविधान के बारे में जानकारी रखने वाले सभी विद्वान जानते हैं कि हमारे संविधान के भाग तीन अनुच्छेद-14, 15 एवं 16 में जो कुछ कहा गया है, उसका साफ मतलब यही है कि धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ किया जाने वाला विभेद असंवैधानिक होगा| समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा| इस स्पष्ठ और कठोर प्रावधान के होते हुए अनुच्छेद 16 (4) में कहा गया है कि-
‘‘इस अनुच्छेद (उक्त) की कोई बात राज्य (जिसे आम पाठकों की समझ के लिये सरकार कह सकते हैं, क्योंकि हमारे यहॉं पर प्रान्तों को भी राज्य कहा गया है|) को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों में या पदों के आरक्षण के लिए उपबन्ध करने से निवारित नहीं (रोकेगी नहीं) करेगी|’’

उक्त प्रावधान को अनेकों बार हमारे देश की सर्वोच्च न्यायपालिका ने उचित और न्याय संगत ठहराया है और साथ ही यह भी कहा है कि अनुच्छेद 14 से 16 में समानता की जो भावना संविधान में वर्णित है, वह तब ही पूरी हो सकती है, जबकि समाज के असमान लोगों के बीच समानता नहीं, बल्कि समान लोगों के बीच समानता का व्यवहार किया जावे|

इसी समानता के लक्ष्य को हासिल करने के लिये उक्त संवैधानिक प्रावधान में पिछड़े वर्ग लोगों को सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने पर जोर दिया गया है| संविधान निर्माताओं का इसके पीछे मूल ध्येय यही रहा था कि सरकारी सेवओं में हर वर्ग का समान प्रतिनिधित्व हो ताकि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय नहीं हो या सकारात्मक रूप से कहें तो सबके साथ समान रूप से न्याय हो सके| क्योंकि इतिहास को देखने से उन्हें ज्ञात हुआ कि कालान्तर में वर्ग विशेष के लोगों का सत्ता एवं व्यवस्था पर लगातार वंशानुगत कब्जा रहने के कारण समाज का बहुत बड़ा तबका (जिसकी संख्या पिच्यासी फीसदी बताई जाती है) हर प्रकार से वंचित और तिरष्कृत कर दिया गया|

ऐसे हालातों में इन वंचित और पिछड़े वर्गों को सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने की पवित्र सोच को अमलीजामा पहनाने के लिये अनुच्छेद 16 में उक्त उप अनुच्छेद (4) जोड़कर अजा, अजजा एवं अन्य पिछडा वर्ग के लोगों को नौकरियों में कम अंक प्राप्त करने पर भी आरक्षण के आधार पर नौकरी प्रदान की जाती रही हैं| 

यदि आज के सन्दर्भ में देखें तो इसी संवैधानिक प्रावधान के कारण कथित रूप से 70 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले अनारक्षित वर्ग के प्रत्याशियों को नौकरी नहीं मिलती, जबकि आरक्षित वर्ग में न्यूनतम निर्धारित अंक पाने वाले प्रत्याशी को 40 या 50 प्रतिशत या कम अंक अर्जित करने वालों को सरकारी नौकरी मिल जाती है| अनराक्षित वर्ग के लोगों की राय में इस विभेद के चलते अनारक्षित वर्ग के लोगों, विशेषकर युवा वर्ग में भारी क्षोभ, आक्रोश तथा गुस्सा भी देखा जा सकता है|

इसके बावजूद भी मेरा मानना है कि पूर्वाग्रही, अल्पज्ञानी, मनुवादी और कट्टरपंथियों को छोड़ दें तो उक्त प्रावधानों पर किसी भी निष्पक्ष, आजादी के पूर्व के घटनाक्रम का ज्ञान रखने वाले तथां संविधान के जानकार व्यक्ति कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये, क्योंकि इस प्रावधान में सरकारी सेवाओं में हर वर्ग का समान प्रतिनिधित्व स्थापित करने का न्यायसंगत प्रयास करने का पवित्र उद्देश्य अन्तर्हित है| परन्तु समस्या इस प्रावधान के अधूरेपन के कारण है|

मेरा विनम्र मत है कि उक्त प्रावधान पिछड़े वर्ग के लोगों को प्रतिनिधित्व देने के लिये निर्धारित योग्यताओं में छूट प्रदान करने सहित, विशेष उपबन्ध करने की वकालत तो करता है, लेकिन इन वर्गों का सही, संवेदनशील, अपने वर्ग के प्रति पूर्ण समर्पित एवं सशक्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने पर पूरी तरह से मौन है| इस अनुच्छेद में या संविधान के अन्य किसी भी अनुच्छेद में कहीं भी इस बात की परोक्ष चर्चा तक नहीं की गयी है कि तुलनात्मक रूप से कम योग्य होकर भी अजा, अजजा एवं अ.पि.वर्ग में आरक्षण के आधार पर उच्च से उच्चतम पदों पर नौकरी पाने वाले ऐसे निष्ठुर, बेईमान और असंवेदनशील आरक्षित वर्ग के लोक सेवकों को भी क्या सरकारी सेवा में क्यों बने रहना चाहिये, जो सरकारी नौकरी पाने के बाद अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करना तो दूर अपने आचरण से अपने आपको अपने वर्ग का ही नहीं मानते?

मैं अजा एवं अजजा संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ (जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदित राज हैं और इण्डियन जस्टिस पार्टी के भी अध्यक्ष है|) का राष्ट्रीय महासचिव रह चुका हूँ| अखिल भारतीय भील-मीणा संघर्ष मोर्चा मध्य प्रदेश का अध्यक्ष रहा हूँ| ऑल इण्डिया एसी एण्ड एसटी रेलवे एम्पलाईज एसोसिएशन में रतलाम मण्डल का कार्यकारी मण्डल अध्यक्ष रहा हूँ| अखिल भारतीय आदिवासी चेतना परिषद का परामर्शदाता रहा हूँ| वर्तमान में ऑल इण्डिया ट्राईबल रेलवे एम्पलाईज एसोसिएशन का राष्ट्रीय अध्यक्ष हूँ| इसके अलावा अजा, अजजा तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के अनेक संगठनों और मंचों से भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सम्बद्ध रहा हूँ|

इस दौरान मुझे हर कदम पर बार-बार यह अनुभव हुआ है कि आरक्षित वर्ग के मुश्किल से पॉंच प्रतिशत अफसरों को अपने वर्ग के नीचे के स्तर के कर्मचारियों तथा अपने वर्ग के आम लोगों के प्रति सच्ची सहानुभूति होती है| शेष पिच्यानवें फीसदी आरक्षित वर्ग के अफसर उच्च जाति के अनारक्षित अफसरों की तुलना में अपने वर्ग के प्रति असंवेदनशील, विद्वेषी, डरपोक होते हैं और अपने वर्ग से दूरी बनाकर रखते हैं| जिसके लिये उनके अपने अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क या बहाने हो सकते हैं, जैसे उन्हें अपने वर्ग का ईमानदारी से प्रतिनिधित्व करने पर अनारक्षित वर्ग के उच्चाधिकारी उनके रिकार्ड को खराब कर देते हैं| इस बात में एक सीमा तक सच्चाई भी है, लेकिन इस सबके उपरान्त भी उक्त और अन्य सभी तर्क कम अंक पाकर भी आरक्षण के आधार पर नौकरी पाकर अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करने के अपराध को कम नहीं कर पाते हैं! क्योंकि सरकारी सेवा में ऐसे डरपोक लोगों के लिये कोई स्थान नहीं होता है, जो अपने कानूनी और संवैधानिक दायित्वों का ईमानदारी, निष्ठा और निर्भीकतापूर्वक निर्वहन नहीं कर सकते|

इस बारे में, मैं कुछ अन्य बातें भी स्पष्ट कर रहा हूँ-अजा एवं अजजा के अधिकतर ऐसे उच्च अफसर जिनके पास प्रशासनिक अधिकार होते हैं और जिनके पास अपने वर्ग को भला करने के पर्याप्त अधिकार होते हैं| अपने मूल गॉंव/निवास को छोड़कर सपरिवार सुविधासम्पन्न शहर या महानगरों में बस जाते हैं| गॉंवों में पोस्टिंग होने से बचने के लिये रिश्वत तक देते हैं और हर कीमत पर शहरों में जमें रहते हैं| अनेक अपनी जाति या वर्ग की पत्नी को त्याग देते हैं (तलाक नहीं देते) और अन्य उच्च जाति की हाई-फाई लड़की से गैर-कानूनी तरीके से विवाह रचा लेते हैं| अनारक्षित वर्ग के अफसरों की ही भॉंति कार, एसी, बंगला, फार्म हाऊस, हवाई यात्रा आदि साधन जुटाना इनकी प्राथमिकताओं में शामिल हो जाते हैं|

ऐसे अफसरों द्वारा अपने आरक्षित वर्ग का सरकारी सेवा में संविधान की भावना के अनुसार प्रतिनिधित्व करना तो दूर, ये अपने वर्ग एवं अपने वर्ग के लोगों से दूरी बना लेते हैं और पूरी तरह से राजशाही का जीवन जीने के आदी हो जाते हैं| इस प्रकार के असंवेदनशील और वर्गद्रोही लोगों द्वारा अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करने पर भी, इनका सरकारी सेवा में बने रहना हर प्रकार से असंवैधानिक और गैर-कानूनी तो है ही, साथ ही संविधान के ही प्रकाश में पूरी तरह से अलोकतान्त्रिक भी है| क्योंकि उक्त अनुच्छेद 16 के उप अनुच्छेद (4) में ऐसे लोगों को तुलनात्मक रूप से कम योग्य होने पर भी अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करने के एक मात्र संवैधानिक उद्देश्य से ही इन्हें सरकारी सेवा में अवसर प्रदान किया जाता है|

ऐसे में अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करके, अपने वर्ग से विश्वासघात करने वालों को सरकारी सेवा में बने रहने का कोई कानूनी या नैतिक औचित्य नहीं रह जाता है| इस माने में संविधान का उक्त उप अनुच्छेद आरक्षित वर्गों को सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने की भावना को पूर्ण करने के मामले में अधूरा और असफल सिद्ध हुआ है| यही कारण है कि आज भी अजा एवं अजजा वर्ग लगातार पिछड़ता जा रहा है| जबकि सरकारी सेवाओं में आरक्षित वर्गों का सशक्त और संवेदनशील प्रतिनिधित्व प्रदान करने के उद्देश्य से ही आरक्षित वर्ग के लोगों को पीढी दर पीढी आरक्षण प्रदान करने को न्याय संगत ठहराया गया है|

मेरा मानना है कि यदि इस सन्दर्भ में प्रारम्भ से ही संविधान में यह प्रावधान किया गया होता कि आरक्षण के आधार पर नौकरी पाने वाले लोगों को तब तक ही सेवा में बने रहने का हक होगा, जब तक कि वे अपने वर्ग का ईमानदारी से सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व करते रहेंगे, तो मैं समझता हूँ कि हर एक आरक्षित वर्ग का अफसर अपने वर्ग के प्रति हर तरह से संवेदनशील और समर्पित होता| जिससे आरक्षित वर्गों का उत्थान भी होता जो संविधान की अपेक्षा भी है और इस प्रकार से मोहन दास कर्मचन्दी गॉंधी द्वारा सैपरेट इलेक्ट्रोल के हक को छीनकर जबरन थोपे गये आरक्षण के अप्रिय प्रावधान से हम एक समय में जाकर हम मुक्त होने के लक्ष्य को भी हो भी हासिल कर पाते| जो वर्तमान में कहीं दूर तक नज़र नहीं आ रहा है!

अतः अब हर एक जागरूक और राष्ट्र भक्त मंच से मांग उठनी चाहिये कि जहॉं एक ओर आरक्षित वर्ग के अफसरों को सरकारी सेवाओं में अपने वर्ग का निर्भीकता पूर्वक प्रतिनिधित्व करने के लिये अधिक सशक्त कानूनी संरक्षण प्रदान किया जावे| उनका रिकार्ड खराब करने वालों को दण्डित किया जावे और इसके उपरान्त भी आरक्षित वर्ग के अफसर यदि अपने वर्ग का निष्ठा, निर्भीकता और ईमानदारी से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं तो ऐसे अफसरों को तत्काल सेवा से बर्खास्त किया जावे| यदि हम ऐसा प्रावधान नहीं बनवा पाते हैं तो आरक्षण को जरी रखकर आरक्षण के आधार पर कम योग्य लोगों को नौकरी देकर कथित रूप से राष्ट्र के विकास को अवरुद्ध करने और समाज में सौहार्द के स्थान पर वैमनस्यता का वातावरण पैदा करने को स्वीकार करने का कोई न्यायसंगत कारण या औचित्य नजर नहीं आता है|

अत: संविधान और संविधान द्वारा प्रदत्त सामाजिक न्याय की अवधारणा में विश्‍वास रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि भारत सरकार को इस बात के लिये बाध्य किया जाये कि संविधान में इस बात का भी प्रावधान किया जावे कि आरक्षित वर्गों का सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से अनारक्षित वर्ग के लोगों की तुलना में कमतर होकर भी आरक्षण के आधार पर नौकरी पाने वालों को पूर्ण समर्पण और संवेदनशीलता के साथ अपने वर्ग और अपने वर्ग के लोगों का सकारात्मक प्रतिनिधित्व करना चाहिये और ऐसा करने में असफल रहने वाले आरक्षित वर्ग के वर्गद्रोही अफसरों या कर्मचारियों को सरकारी सेवा से बर्खास्त करने की सिफारिश करने के लिये अजा और अजजा आयोगों का संवैधानिक रूप से सशक्त किया जाना चाहिये| अन्यथा न तो कभी आरक्षण समाप्त होगा और न हीं आरक्षित वर्गों का सरकारी सेवाओं में संवैधानिक भावना के अनुसार सच्चा प्रतिनिधित्व ही स्थापित हो सकेगा|

Monday, August 29, 2011

पूना पैक्‍ट

पूना पैक्ट

1-लेखक-माता प्रसाद, पूर्व राज्यपाल

स्वतंत्र भारत के पूर्व, स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने के लिए ब्रिटेन की सरकार ने, भारत के सभी राजनैतिक दलों, नवाबों के प्रतिनिधियों और कुछ निर्दलीय बुद्धिजीवियों की एक गोल मेज कोंफ्रेंस लंदन में बुलाई जिसमें दलित प्रतिनिधि के रूप में डॉ.बी.आर. आंबेडकर और राय साहब श्री निवासन भी आमंत्रित थे। निर्दलियों से सर, तेज बहादुर सप्रु० और सी० वाई चिन्तामणि भी उसमें सम्मिलित थे। इसकी पहली बैठक १२ नवम्बर १९३० ई० से १८ जनवरी १९३१ ई० तक तथा दूसरी बैठक ०७ सितम्बर १९३१ से ०९ दिसम्बर १९३१ ई० तक लंदन में चली। जिसकी अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर रैमजे मैकानाल्ड ने की थी। इन बैठकों में डॉ. अम्बेडकर ने भारत में दलितों की दुर्दशा बताते हुए उनकी सामाजिक, राजनीतिक स्थिति में सुधार के लिए दलितों के लिए "पृथक निर्वाचन" की मांग रखी। पृथक निर्वाचन में दलितों को दो मत देना होता जिसमें एक मत दलित मतदाता, केवल दलित उम्मीदवार को देते और दूसरा मत वे जनरल कास्ट के उम्मीदवार को। महात्मा गाँधी ने डॉ. अम्बेडकर के पृथक निर्वाचन की इस मांग का विरोध किया । दोनों कांफ्रेंसों में सर्वसम्मति से निर्णय न होने पर सभी ने ब्रिटिश प्रधानमन्त्री पर इसका निर्णय लेने की जिम्मेदारी छोड़ दिया और कांफ्रेंस ख़त्म हो गयी।


ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर रैमजे मैकानाल्ड ने १७ अगस्त १९३२ ई० को कम्युनल एवार्ड की घोषणा की उसमें दलितों के पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार कर लिया था। जब गांधी जी को इसकी सूचना मिली, तो उन्होंने इसका विरोध किया और २० सितम्बर १९३२ ई ० को इसके विरोध में यरवदा जेल में आमरण अनशन करने की घोषणा कर दी। महात्मा गाँधी जहां पृथक निर्वाचन के विरोध में अनशन कर रहे थे वही पर डॉ० अम्बेडकर के समर्थक पृथक निर्वाचान के पक्ष में खुशियाँ मना रहे थे इसलिए दोनों समर्थकों में झड़पें होने लगी। तीसरे दिन गाँधी जी की दशा बिगड़ने लगी तब डॉ.अम्बेडकर पर दबाव बढ़ा कि वह अपनी पृथक निर्वाचन की मांग को वापस ले लें किन्तु उन्होंने अपनी मांग वापस न लेने को कहा। उधर गाँधी जी भी अपने अनशन पर अड़े रहे। इन दोनों के बीच सर तेज बहादुर सप्रू बात करके कोई बीच का रास्ता निकालने का प्रयास कर रहे थे। २४ सितम्बर १९३२ ई० को सर तेज बहादुर सप्रू ने दोनों से मिलकर एक समझौता तैयार किया जिसमें डॉ.आंबेडकर को पृथक निर्वाचन की मांग को वापस लेना था और गाँधी जी के दलितों को केन्द्रीय और राज्यों की विधान सभाओं एवं स्थानीय संस्थाओं में दलितों की जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व देना एवं सरकारी नौकरियों में भी प्रतिनिधित्व देना था। इसके अलावा शैक्षिक संस्थाओं में दलितों को विशेष सुविधाएं देना भी था। दोनों नेता इस समझौते पर सहमत हो गये। २४ सितम्बर १९३२ को इस समझौते पर सहमत हो गये। २४ सितम्बर १९३२ ई० को इस समझौते पर गाँधी जी और डॉ. अम्बेडकर ने तथा इनके सभी समर्थकों ने अपने हस्ताक्षर कर दिए। इस समझौते को "पूना पैक्ट" कहा गया।
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2-यह घटना है सितंबर, 1932 में पूना पैक्‍ट की। जब ब्रिटिश सरकार पूरी तरह तय कर चुकी थी कि 'कम्‍यूनल अवार्ड' के तहत अस्‍पृश्‍य जातियों को अल्‍पसंख्‍यकों और अन्‍य समुदायों की तरह अलग से संविधान में पृथक निर्वाचन की व्‍यवस्‍था की जाएगी तब महात्‍मा गांधी ने इसे भारत की एकता को खंडित करने वाला कदम बता कर यरवदा जेल में 20 सितंबर, 1932 को आमरण अनशन शुरु कर दिया था। गांधी जी की तबियत इस अनशन से बहुत तेजी से खराब होने लगी थी। डॉ. अंबेडकर जानते थे कि अगर इस अनशन से गांधी जी की मृत्‍यु हो जाती है तो देश भर के सवर्ण अछूतों का नरसंहार कर देंगे। इसलिए बेहद मानसिक दबाव और तनाव में डॉ. अंबेडकर ने गांधी जी के साथ 24 सितंबर, 1932 को यरवदा जेल में पूना पैक्‍ट किया था। इस समझौते के तहत पृथक निर्वाचन के बजाय दलितों के लिए अलग से सीटें आरक्षित करने और नौकरियों में भी आरक्षण का प्रावधान था। इस पैक्‍ट को लेकर बहुत विवाद हैं, दलितों के एक तबके का मानना है कि डॉ. अंबेडकर को गांधी जी के आगे नहीं झुकना चाहिए था। लेकिन भारतीय समाज के इतिहास में यह बहुत बड़ी ऐतिहासिक घटना है जो दर्शाती है कि बहुसंख्‍यक समाज को हर दौर में अपने ही हितों की कुर्बानी देनी पड़ती है फिर वो चाहे देश का मामला हो या भाषा का। कल्‍पना कीजिए कि अगर दलितों के आत्‍म निर्णय और पृथक निर्वाचन को कानूनी दर्जा मिल जाता तो क्‍या होता?
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3-सितम्बर का एक काला दिन! (पूना पैक्ट) 
(25.09.10)

सितम्बर के महीने का भारत के दलित, पिछड़े समुदाय की वैचारिक जागृति के नजरिये से बहुत बड़ा महत्व है।

सबसे बड़ी घटना तो अम्बेडकर और हिंदू नेताओं के बीच पूना समझौते की है। वैसे यह हैरानी की बात है कि इस देश के समाज और संस्कृति के लिए अत्यन्त दुखद पूना पैक्ट को लेकर भारतीय इतिहासकारों के बीच एक खामोशी बनी रही है। इसी महीने की 17 तारीख को ई.वी. रामास्वामी नायकर पेरियार का जन्म हुआ था। दलित पिछड़े समुदाय के आत्मसम्मान की सबसे बड़ी लड़ाई की शुरुआत थी यह घटना।

हमें यह जानना चाहिए कि पेरियार वैज्ञानिक समझ और तार्किकता की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण वैचारिकी के प्रतीक थे। यूरोप के बुद्धिजीवी जिस तार्किकता और विज्ञान बोध के चलते नई से नई वैज्ञानिक उपलब्धियां प्राप्त कर रहे थे, उसके भारत में सबसे बड़े प्रतिनिधि पेरियार ही थे।

देश के इतिहास का यह विचित्र दुर्भाग्य है कि पेरियार एक बड़े और तार्किक चिन्तन के कारण उत्तर भारत और दक्षिण को छोड़कर अन्य भागों में क्षोभ के साथ खारिज किए जाते रहे। उनकी पुस्तकों के जो हिंदी अनुवाद हुए उन पर उत्तर प्रदेश की सरकार ने ही प्रतिबंध लगा दिया था। यह अलग बात है कि पेरियार की पुस्तकों का हिंदी अनुवाद करने वाले ललई सिंह यादव ने बाद में मुकदमा जीता और प्रतिबंध हटा। यह जरूर आश्चर्य की बात है कि दिल्ली की एक लोकप्रिय, गैर साहित्यिक पत्रिका लगातार पेरियार के विचारों को प्रकाशित करती रही थी।

लेकिन सितम्बर माह की घटना पूना पैक्ट को लेकर जहां समूचा इतिहास खामोश है वहीं इसी मुद्दे पर भगत सिंह के विचार हैरान करने वाले हैं। भगत सिंह भारतीय इतिहास में जातिवादी भेदभाव के प्रति अत्यन्त संवेदनशील थे। भगत सिंह ने 1928 में अपने एक लेख में लिखा था- हम तो यह समझते हैं कि उनका स्वयं को संगठनबद्ध करना और मुस्लिमों के बराबर गिनती में होने के कारण उनके बराबर अधिकारों की मांग करना बहुत आशाजनक संकेत है। या तो साम्प्रदायिक भेदभाव का झंझट ही खत्म करो नहीं तो उनके अलग अधिकार उन्हें दे दो।

इस लेख से लगभग छह महीने पहले डॉ. अम्बेडकर ने महाड़ में मनुस्मृति की होली जलाई थी। पहली बार साइमन कमीशन 13 फरवरी 1928 में भारत आया था। इसी साइमन कमीशन ने कम्युनल अवार्ड की घोषणा की थी। इस कम्युनल एवार्ड के जरिये दलितों को हिंदुओं से अलग राष्ट्रीयता और अपने प्रतिनिधि को अलग निर्वाचित करने का अधिकार मिलता था। हिंदू समुदाय को यह तो स्वीकार था कि मुसलमानों और सिखों को अपना अलग प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दे दिया जाए पर वह दलितों को यह अधिकार नहीं देना चाहता था।

यह समुदाय साइमन कमीशन के कम्युनल अवार्ड का गहरा विरोध इसलिए करता था कि इस अवार्ड के बाद हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाता। डॉ. अम्बेडकर ने इसी साइमन कमीशन के सामने अपने बयान में कहा था- 'सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहता हूं कि हमको हिंदू समाज से अलग अल्पसंख्यक माना जाए। आशय यह है कि हमें स्वतंत्र अल्पसंख्यक वर्ग माना जाए। 

दूसरे मेरा कहना यह है कि दलित अल्पसंख्यक वर्ग के लिए ब्रिाटिश भारत में किसी भी अल्पसंख्यक वर्ग की अपेक्षा अधिकाधिक राजनीतिक सुरक्षा की जरूरत है। इसका कारण यह है कि दलित शिक्षा की दृष्टि से सबसे ज्यादा पिछड़े हुए हैं, आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक निर्धन हैं, सामाजिक दृष्टि से सर्वाधिक गुलाम हैं और राजनीतिक दृष्टि से ये लोग सर्वाधिक पीड़ित और अशक्त हैं।'

निश्चय ही अगर दलित उस वक्त हिंदुओं से अलग संप्रदाय बन गए होते तो उनकी सामाजिक स्थिति में बुनियादी परिवर्तन आ चुका होता। भगत सिंह ने दलित समस्या को अम्बेडकर की नजर से ही देखा था तभी उन्होंने लिखा था-'या तो साम्प्रदायिक भेद मिटाओ या फिर उनके अलग अधिकार उन्हें दे दो।'

यह हैरानी की बात है कि बेहद अल्पायु में भगत सिंह कम्युनल अवार्ड की बुनियाद समझ गये थे जबकि देश के क्रांतिकारी इस समझ से दूर ही रहे थे। निस्संदेह जहां इतिहास पूना पैक्ट भूला हुआ है, वहीं बामसेफ सहित अन्य दलितों, पिछड़ों के संगठन इस दिन को आज भी 'काला दिवस' मानते और मनाते हैं। स्त्रोत : समय लाइव