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Sunday, April 20, 2014

भारत में फलता-फूलता मुकदमेबाजी उद्योग


  1. इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जिसमें व्यापारी वर्ग को किसी शासन व्यवस्था से कभी कोई शिकायत रही हो, क्योंकि वे पैसे की शक्ति को पहचानते हैं तथा पैसे के बल पर अपना रास्ता निकाल लेते हैं। चाहे शासन प्रणाली या शासन कैसा भी क्यों न हो।
  2. “हमारा सबसे पहला कार्य वकीलों को समाप्त करना है।”-विलियम शेक्स्पेअर।
  3. न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के लिए मात्र कानून का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु वह व्यक्ति चरित्र, मनोवृति और बुद्धिमता के दृष्टिकोण से भी योग्य होना चाहिए, क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति के भी कुटिल होने का जोखिम बना रहता है।
  4. विधि आयोग की 197 वीं रिपोर्ट के अनुसार भारत में दोषसिद्धि की दर मात्र 2 प्रतिशत है, जिससे सम्पूर्ण न्यायतंत्र की क्षमता–योग्यता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। जबकि अमेरिका के संघीय न्यायालयों की दोष सिद्धि की जो दर 1972 में 75 प्रतिशत, 1992 में 85 प्रतिशत और 2011 में 93 थी।
  5. जहां सामने सशक्त पक्ष हो तो न्यायाधीश भी अपने आपको असहाय और लाचार पाते हैं-उनकी श्रेष्ठ न्यायिक शक्तियां अंतर्ध्यान हो जाती हैं। जहां दोषी व्यक्ति शक्तिसंपन्न हो, वहां कानून के हाथ भी छोटे पड़ जाते हैं। देश के न्यायाधीशों की निष्पक्षता, तटस्थता और स्वतंत्रता खतरे में दिखाई देती है। देश का न्यायिक वातावरण दूषित है और इसकी गरिमा प्रश्नास्पद है। इस वातावरण में प्रतिभाशाली और ईमानदार लोगों के लिए कोई स्थान दिखाई नहीं देता है।
  6. उच्च न्यायालयों में भी सुनवाई के लिए वकील अनुकूल बेंच की प्रतीक्षा करते रहते हैं-स्थगन लेते रहते हैं, .... जिसका एक अर्थ यह निकलता है कि उच्च न्यायालय की बेंचें फिक्स व मैनेज की जाती हैं व कानून गौण हो जाता है। कोई भी मूल प्रार्थी, अपवादों को छोड़कर, किसी याचिका पर निर्णय में देरी करने के प्रयास नहीं करेगा, फिर भी देखा गया है कि मूल याची या याची के वकील भी अनुकूल बेंच के लिए प्रतीक्षा करते हैं।
मनीराम शर्मा, एडवोकेट
  
भारतीय न्यायातंत्र उर्फ मुकदमेबाजी उद्योग ने बड़ी संख्या में रोजगार उपलब्ध करवा रखा है। देश में अर्द्ध–न्यायिक निकायों को छोड़कर 20,000 से ज्यादा न्यायाधीश, 2,50,000 से ज्यादा सहायक स्टाफ, 25,00,000 से ज्यादा वकील, 10,00,000 से ज्यादा मुंशी टाइपिस्ट, 23,00,000 से ज्यादा पुलिसकर्मी इस व्यवसाय में नियोजित हैं और वैध–अवैध ढंग से जनता से धन ऐंठ रहे हैं। अर्द्ध-न्यायिक निकायों में भी समान संख्या और नियोजित है। फिर भी परिणाम और इन लोगों की नीयत लाचार जनता से छुपी हुई नहीं हैं। भारत में मुक़दमेबाजी उद्योग एक कुचक्र की तरह संचालित है, जिसमें सत्ता में शामिल सभी पक्षकार अपनी-अपनी भूमिका निसंकोच और निर्भीक होकर बखूबी निभा रहे हैं। प्राय: झगड़ों और विवादों का प्रायोजन अपने स्वर्थों के लिए या तो राजनेता स्वयं करते हैं या वे इनका पोषण करते हैं। अधिकाँश वकील किसी न किसी राजनैतिक दल से चिपके रहते हैं और उनके माध्यम से वे अपना व्यवसाय प्राप्त करते हैं, क्योंकि विवाद के पश्चात पक्षकार सुलह–समाधान के लिए अक्सर राजनेताओं के पास जाते हैं और कालांतर में राजनेताओं से घनिष्ठ संपर्क वाले वकील ही न्यायाधीश बन पाते हैं। इस बात का खुलासा सिंघवी सीडी प्रकरण ने भी कर दिया है। इस प्रकरण ने यह भी दिखा दिया कि न्यायाधीश बनने के लिए आशार्थी को किन कठिन परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। भारत में किसी चयन प्रक्रिया में न्यायाधीशों या विपक्ष को भी शामिल करने का कोई लाभ नहीं है, क्योंकि जिस प्रक्रिया में जितने ज्यादा लोग शामिल होंगे; उसमें भ्रष्टाचार उतना ही अधिक होगा। प्रक्रिया में शामिल सभी लोग तुष्ट होने पर ही कार्यवाही आगे बढ़ पाएगी। यदि निर्णय प्रक्रिया में भागीदारों की संख्या बढाने या विपक्ष को शामिल करने से स्वच्छता आती तो हमें विधायिकाओं के अतिरिक्त किसी अन्य संस्था की आवश्यकता क्यों पड़ती। इसलिए प्रक्रिया में जितना प्रसाद मिलेगा, उसका बँटवारा प्रत्येक भागीदार की मोलभाव शक्ति के अनुसार होगा और अंतत: यह बंदरबांट का रूप ले लेगी। कहने को चाहे संवैधानिक न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायाधीश करते होंगे, किन्तु वास्तव में यह भी राजनीति की इच्छाशक्ति की सहमति से ही होता है। जहां राजनीति किसी नियुक्ति पर असहमत हो तो, देश में वकील और न्यायाधीश कोई संत पुरुष तो हैं नहीं, वे प्रस्तावित व्यक्ति के विरुद्ध किसी शिकायत की जांच खोलकर उसकी नियुक्ति बाधित कर देते हैं। अन्यथा दागी के विरुद्ध किसी प्रतिकूल रिपोर्ट को भी नजर अंदाज कर दबा दिया जाता है। विलियम शेक्स्पेअर ने भी (हेनरी 4 भाग 2 नाट्य 4 दृश्य 2) में कहा है , “हमारा सबसे पहला कार्य वकीलों को समाप्त करना है।”

वैसे भी भारत की राजनीति किसी दलदल से कम नहीं है और लगभग सभी नामी और वरिष्ठ वकील किसी न किसी राजनैतिक दल से जुड़े हुए हैं, जिसमें दोनों का आपसी हित है और दोनों एक दूसरे का संरक्षण करते हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया तो वैसे ही गोपनीय है और उसमें पारदर्शिता का नितांत अभाव है। न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के लिए मात्र कानून का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु वह व्यक्ति चरित्र, मनोवृति और बुद्धिमता के दृष्टिकोण से भी योग्य होना चाहिए, क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति के भी कुटिल होने का जोखिम बना रहता है। अमेरिका में न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के समय उसकी पात्रता–बुद्धिमता, योग्यता, निष्ठा, ईमानदारी आदि की कड़ी जांच होती है और प्रत्येक पद के लिए दो गुने प्रत्याशियों की सूची राज्यपाल को नियुक्ति हेतु सौंपी जाती है, जबकि भारत में ऐसा कदाचित नहीं होता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों पर यौन शोषण के आरोप लगे और यह पाया गया कि उन्होंने शाराब का सेवन किया तथा पीड़ित महिला को भी इसके लिए प्रस्ताव रखा। इससे यह प्रामाणित होता है कि वे लोग अभक्ष्य पदार्थों का भक्षण करने वाले रहे हैं, जिनमें सात्विक और सद्बुद्धि की कल्पना नहीं की जा सकती। निश्चित रूप से ऐसे चरित्रवान लोगो को इन गरिमामयी पदों पर नियुक्त करने में देश से भारी भूलें हुई हैं, चाहे उन्हें दण्डित किया जाता है या नहीं। न्यायाधीश होने के लिए मात्र विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु वह मन से सद्बुद्धि और सात्विक होना चाहिए। अन्यथा सद्चरित्र के अभाव में ऐसा पांडित्य तो रावण के समान चरित्र को ही प्रतिबिंबित कर सकता है और इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।

विधि आयोग की 197 वीं रिपोर्ट के अनुसार भारत में दोषसिद्धि की दर मात्र 2 प्रतिशत है, जिससे सम्पूर्ण न्यायतंत्र की क्षमता–योग्यता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। जबकि अमेरिका के संघीय न्यायालयों की दोष सिद्धि की जो दर 1972 में 75 प्रतिशत थी, वह बढ़कर 1992 में 85 प्रतिशत हो गयी है। वहीं वर्ष 2011 में अमरीकी न्याय विभाग ने दोष सिद्धि की दर 93 प्रतिशत बतायी है। भारत में आपराधिक मामलों में पुलिस अनुसंधान में विलंब करती है, फिर भी दोष सिद्धियाँ मात्र 2 प्रतिशत तक ही सीमित रह जाती हैं। इसका एक संभावित कारण है कि पुलिस वास्तव में मामले की तह तक नहीं जाती, अपितु कुछ कहानियां गढ़ती है और झूठी कहानी गढ़ने में उसे समय लगना स्वाभाविक है। दोष सिद्धि की दर अमेरिकी राज्य न्यायालयों में भी पर्याप्त ऊँची है। रिपोर्ट के अनुसार यह टेक्सास में 84 प्रतिशत, कैलिफ़ोर्निया में 82 प्रतिशत, न्यूयॉर्क में 72 प्रतिशत उतरी कैलिफ़ोर्निया में 67 प्रतिशत और फ्लोरिडा में 59 प्रतिशत है। इंग्लॅण्ड के क्राउन कोर्ट्स में भी दोष सिद्धि की दर 80 प्रतिशत है। हांगकांग के सत्र न्यायालयों में 92 प्रतिशत, वेल्स के सत्र न्यायालयों में 80 प्रतिशत, कनाडा के समान न्यायालयों में 69 प्रतिशत और ऑस्ट्रेलिया के न्यायालयों में 79 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में क्या भारत में मात्र 2 प्रतिशत दोष सिद्धि जनता पर एक भार नहीं हैं? क्या इतना परिणाम यदि देश में बैंकिंग या अन्य उद्योग दें तो सरकार इसे बर्दास्त कर सकेगी? फिर न्यायतंत्र के ऐसे निराशाजनक परिणामों को सत्तासीन और विपक्ष दोनों क्योंकर बर्दास्त कर रहे हैं? इससे न्यायतंत्र के भी राजनैतिक उपयोग की बू आती है। देश में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा वसूली हेतु दायर किये गए मामलों में भी, जहां पूरी तरह से सुरक्षित दस्तावेज बनाकर ऋण दिए जाते हैं, वसूली मात्र 2 प्रतिशत वार्षिक तक सीमित है, जबकि इनमें लागत 15 प्रतिशत आ रही है। देश की जनता को न्यायतंत्र की इतनी विफलता में क्रमश: न्यायपालिका, विधायिका, पुलिस व वकीलों के अलग-अलग योगदान को जानने का अधिकार है। 

जहां तक नियुक्ति या निर्णयन की किसी प्रक्रिया में पक्ष-विपक्ष को शामिल करने का प्रश्न है, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि जो पक्ष आज सता में है-कल विपक्ष में हो सकता है और ठीक इसके विपरीत भी। अत: इन दोनों समूहों में वास्तव में आपस में कोई संघर्ष-टकराव नहीं होता है, जो भी संघर्ष होता है-वह मात्र सस्ती लोकप्रियता व वोट बटोरने और जनता को मूर्ख बनाने के लिए होता है। यद्यपि प्रजातंत्र कोई मूकदर्शी खेल नहीं है, अपितु यह तो जनता की सक्रिय भागीदारी से संचालित शासन व्यवस्था का नाम है। जनतंत्र में न तो जनता जनप्रतिनिधियों के बंधक है और न ही जनतंत्र किसी अन्य द्वारा निर्देशित कोई व्यवस्था का नाम है। न्यायाधिपति सौमित्र सेन पर महाभियोग का असामयिक पटाक्षेप और राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भल्ला द्वारा अपर सत्र न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले को देश की जनता देख ही चुकी है, जहां मात्र अनुचित नियुक्तियों को निरस्त ही किया गया और किसी दोषी के गिरेबान तक कानून का हाथ नहीं पहुँच सका। जिससे यह प्रमाणित है कि जहां दोषी व्यक्ति शक्तिसंपन्न हो, वहां कानून के हाथ भी छोटे पड़ जाते हैं। देश के न्यायाधीशों की निष्पक्षता, तटस्थता और स्वतंत्रता खतरे में दिखाई देती है। देश का न्यायिक वातावरण दूषित है और इसकी गरिमा प्रश्नास्पद है। इस वातावरण में प्रतिभाशाली और ईमानदार लोगों के लिए कोई स्थान दिखाई नहीं देता है। न्यायाधीशों के पदों पर नियुक्ति हेतु आशार्थियों की सूची को पहले सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि अवांछनीय और अपराधी लोग इस पवित्र व्यवसाय में अतिक्रमण नहीं कर सकें। वर्तमान में तो इस व्यवसाय के संचालन में न्याय-तंत्र का अनुचित महिमामंडन करने वाले वकील, उनके सहायक, न्यायाधीश और पुलिस ही टिक पा रहे हैं।

हाल ही में उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीश की पदस्थापना के लिए यह नीति बनायी गयी कि मुख्य न्यायाधीश किसी बाहरी राज्य का हो,  किन्तु यह नीति न तो उचित है और न ही व्यावहारिक है। न्यायाधीश पूर्व वकील होते हैं और वे राजनीति के गहरे रंग में रंगे होते हैं। इस वास्तविकता की ओर आँखें नहीं मूंदी जा सकती। अत: देशी राज्य के वकीलों का ध्रुवीकरण हो जाता है और बाहरी राज्य का अकेला मुख्य न्यायाधीश अलग थलग पड़ जाता है तथा वह चाहकर भी कोई सुधार का कार्य हाथ में नहीं ले पाता, क्योंकि संवैधानिक न्यायालयों में प्रशासनिक निर्णय समूह द्वारा लिए जाते हैं। वैसे भी यह नीति देश की न्यायपालिका में स्वच्छता व गतिशीलता रखने और स्थानान्तरण की सुविचारित नीति के विरूद्ध है। जहां एक ओर सत्र न्यायाधीशों के लिए समस्त भारतीय स्तर की सेवा की पैरवी की जाती है, वहीं उच्च न्यायालयों के स्तर के न्यायाधीशों के लिए इस तरह की नीति के विषय में कोई विचार तक नहीं किया जा रहा है, जिससे न्यायिक उपक्रमों में स्वच्छता लाने की मूल इच्छा शक्ति पर ही संदेह होना स्वाभाविक है। उच्च न्यायालयों द्वारा आवश्यकता होने पर पुलिस केस डायरी मंगवाई जाती है, किन्तु उसे बिना न्यायालय के आदेश के ही लौटा दिया जाता है। जिससे यह सन्देश जाता है कि न्यायालय और पुलिस हाथ से हाथ मिलाकर कार्य कर रहे हैं न कि वे स्वतंत्र हैं। क्या न्यायालय एक आम नागरिक द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज को भी बिना न्यायिक आदेश के लौटा देते हैं? केरल उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने एक बार राज्य के महाधिवक्ता द्वारा प्रकरणों में तैयार होकर न आने पर न्यायालय से ही वाक आउट कर दिया, बजाय इसके कि कार्यवाही को आगे बढ़ाते अथवा महाधिवक्ता पर समुचित कार्यवाही करते अर्थात जहां सामने सशक्त पक्ष हो तो न्यायाधीश भी अपने आपको असहाय और लाचार पाते हैं-उनकी श्रेष्ठ न्यायिक शक्तियां अंतर्ध्यान हो जाती हैं। भारत का आम नागरिक तो न्यायालयों में चलने वाले पैंतरों, दांव-पेंचों आदि से परिचित नहीं हैं, किन्तु देश के वकीलों को ज्ञान है कि देश में कानून या संविधान का अस्तित्व संदिग्ध है। अत: वे अपनी परिवेदनाओं और मांगों के लिए दबाव बनाने हेतु धरनों, प्रदर्शनों, हड़तालों, विरोधों आदि का सहारा लेते हैं। आखिर पापी पेट का सवाल है। कदाचित उन्हें सम्यक न्यायिक उपचार उपलब्ध होते तो वे ऐसा रास्ता नहीं अपनाते। सामान्यतया न्यायार्थी जब वकील के पास जाता है तो उसके द्वारा मांगी जानी वाली आधी राहतों के विषय में तो उसे बताया जाता है कि ये कानून में उपलब्ध नहीं हैं और शेष में से अधिकाँश देने की परम्परा नहीं है अथवा साहब देते नहीं हैं।

पारदर्शिता और भ्रष्टाचार में कोई मेलजोल नहीं होता है, इस कारण न्यायालयों एवं पुलिस का स्टाफ अपने कार्यों में कभी पारदर्शिता नहीं लाना चाहता है। देश के 20,000 न्यायालयों के कम्प्यूटरीकरण की ईकोर्ट प्रक्रिया 1990 में प्रारंभ हुई थी और यह आज तक 20 उच्च न्यायालयों के स्तर तक भी पूर्ण नहीं हो सकी है। दूसरी ओर देखें तो देश की लगभग 1,00,000 सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक शाखाओं के कम्प्यूटरीकरण का कार्य 10 वर्ष में पूर्ण हो गया। इससे न्यायतंत्र से जुड़े लोगों की कम्प्यूटरीकरण में अरुचि का सहज अनुमान लगाया जा सकता है जो माननीय कहे जाने वाले न्यायाधीशों के सानिध्य में ही संचालित हैं। देश के न्यायालयों में सुनवाई पूर्ण होने की के बाद भी निर्णय घोषित नहीं किये जाते तथा ऐसे भी मामले प्रकाश में आये हैं, जहां पक्षकारों से न्यायाधीशों ने मोलभाव किया और निर्णय जारी करने में 6 माह तक का असामान्य विलम्ब किया। वैसे भी निर्णय सुनवाई पूर्ण होने के 5-6 दिन बाद ही घोषित करना एक सामान्य बात है। कई बार पीड़ित पक्षकार को अपील के अधिकार से वंचित करने के लिए निर्णय पीछे की तिथि में जारी करके भी न्यायाधीश पक्षकार को उपकृत करते हैं। जबकि अमेरिका में निर्णय सुनवाई पूर्ण होने के बाद निश्चित दिन ही जारी किया जाता है और उसे अविलम्ब इन्टरनेट पर उपलब्ध करवा दिया जाता है। अपने अहम की संतुष्टि और शक्ति के बेजा प्रदर्शन के लिए संवैधानिक न्यायालय कई बार भारी खर्चे भी लगाते हैं, जबकि इसके लिए उन्होंने ऐसे कोई नियम नहीं बना रखे हैं, क्योंकि नियम बनाने की उन्हें कोई स्वतंत्र शक्तियां प्राप्त भी नहीं हैं। एक मामले में बम्बई उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने 40 लाख रुपये खर्चा लगाया जो उच्चतम न्यायालय ने घटाकर मात्र 25 हजार रुपये कर दिया। इस दृष्टांत से स्पष्ट है कि न्यायाधीश लोग निष्पक्ष की बजाय पूर्वाग्रहों पर आधारित होते हैं व देश की अस्वच्छ राजनीति की ही भांति उनका आपसी गठबंधन व गुप्त समझौता होता है और समय पर एक दूसरे के काम आते हैं। अत: निर्णय चाहे एक सदस्यीय पीठ दे या बहु सदस्यीय पीठ दे, उसकी गुणवता में कोई ज्यादा अंतर नहीं आता है। न्यायालयों द्वारा कई बार नागरिकों पर भयावह खर्चे लगाए जाते हैं, जबकि खर्चे शब्द का शाब्दिक अर्थ लागत की पूर्ति करना होता है और उसमें दंड शामिल नहीं है व लागत की गणना भी किया जाना आवश्यक है। जिस प्रकार न्यायालय पक्षकारों से अपेक्षा करते हैं। यदि किसी व्यक्ति पर किसी कानून के अंतर्गत दंड लगाया जाना हो तो संविधान के अनुसार उसे उचित सुनवाई का अवसर देकर ही ऐसा किया जा सकता है, किन्तु वकील ऐसे अवसरों पर मौन रहकर अपने पक्षकार का अहित करते हैं। 

वकालत का पेशा भी कितना विश्वसनीय है, इसकी बानगी हम इस बात से देख सकते हैं कि परिवार न्यायालयों, श्रम आयुक्तों, (कुछ राज्यों में) सूचना आयुक्तों आदि के यहाँ वकील के माध्यम से प्रतिनिधित्व अनुमत नहीं है अर्थात इन मंचों में वकीलों को न्याय पथ में बाधक माना गया है। फिर वकील अन्य मंचों पर साधक किस प्रकार हो सकते हैं? उच्च न्यायालयों में भी सुनवाई के लिए वकील अनुकूल बेंच की प्रतीक्षा करते रहते हैं-स्थगन लेते रहते हैं, यह तथ्य भी कई बार सामने आया है। जिसका एक अर्थ यह निकलता है कि उच्च न्यायालय की बेंचें फिक्स व मैनेज की जाती हैं व कानून गौण हो जाता है। कोई भी मूल प्रार्थी, अपवादों को छोड़कर, किसी याचिका पर निर्णय में देरी करने के प्रयास नहीं करेगा, फिर भी देखा गया है कि मूल याची या याची के वकील भी अनुकूल बेंच के लिए प्रतीक्षा करते हैं, जिससे उपरोक्त अवधारणा की फिर पुष्टि होती है।

देश में आतंकवादी गतिविधियाँ भी प्रशासन, पुलिस और राजनीति के सहयोग और समर्थन के बिना संचालित नहीं होती हैं। आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में भी परिवहन, व्यापार आदि चलते रहते हैं, जो कि पुलिस और आतंकवादियों व संगठित अपराधियों दोनों को प्रोटेक्शन मनी देने पर ही संभव है। वैसे भी इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जिसमें व्यापारी वर्ग को किसी शासन व्यवस्था से कभी कोई शिकायत रही हो, क्योंकि वे पैसे की शक्ति को पहचानते हैं तथा पैसे के बल पर अपना रास्ता निकाल लेते हैं। चाहे शासन प्रणाली या शासन कैसा भी क्यों न हो। पुलिस के भ्रष्टाचार का अक्सर यह कहकर बचाव किया जाता है कि उन्हें उचित प्रशिक्षण प्राप्त नहीं है। अत: कार्य सही नहीं किया गया, किन्तु रिश्वत लेने का भी तो उन्हें कोई प्रशिक्षण नहीं होता फिर वे इसके लिए किस प्रकार रास्ता निकाल लेते हैं। ठीक इसी प्रकार एक व्यक्ति को गृहस्थी के संचालन का भी प्रारम्भ में कोई अनुभव नहीं होता, किन्तु अवसर मिलने पर वह आवश्यकतानुसार सब कुछ सीख लेता है। देश में प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ गिरफ्तारियां होती हैं, जिनमें से 60 प्रतिशत अनावश्यक होती हैं। ये गिरफ्तारियां भी बिना किसी अस्वच्छ उद्देश्य के नहीं होती हैं, क्योंकि राजसत्ता में भागीदार पुलिस, अर्द्ध-न्यायिक अधिकारी व प्रशासनिक अधिकारी आदि को इस बात का विश्वास है कि वे चाहे जो मर्जी करें, उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है और देश में वास्तव में ऐसा कोई मंच नहीं है जो प्रत्येक शक्ति-संपन्न व सत्तासीन दोषी को दण्डित कर सके। जहां कहीं भी अपवाद स्वरूप किसी पुलिसवाले के विरुद्ध कोई कार्यवाही होती है, वह तो मात्र नाक बचाने और जनता को भ्रमित करने के लिए होती है। यदि पुलिस द्वारा किसी मामले में गिरफ्तारी न्यायोचित हो तो वे, घटना समय के अतिरिक्त अन्य परिस्थितियों में, गिरफ्तारी हेतु मजिस्ट्रेट से वारंट प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु न तो ऐसा किया जाता है और न ही देश का न्याय तंत्र ऐसी कोई आवश्यकता समझता है और न ही कोई वकील अपने मुवक्किल के लिए कभी मांग करता देखा गया है। यदि न्यायपालिका पुलिस द्वारा अनुसंधान में के मनमानेपन को नियंत्रित नहीं कर सकती, जिससे मात्र 2 प्रतिशत दोष सिद्धियाँ हासिल हो रही हों, तो फिर उसे दूसरे नागरिकों पर नियंत्रण स्थापित करने का नैतिक अधिकार किस प्रकार प्राप्त हो जाता है?

Friday, February 1, 2013

देश का माहौल बिगाड़ने वाले तथाकथित बड़े लोग


"मनुवादी आशीष नन्दी कहते हैं कि भ्रष्टाचार के जनक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोक सेवक हैं। आशीष नन्दी को ये सब कहने का साहस इस कारण से हुआ कि कुछ ही दिन पूर्व प्रवीण तोगड़िया ने कहा कि यदि वह भारत का प्रधानमंत्री बन जाये तो मुसलमानों से सभी प्रकार के संवैधानिक हकों को एक झटके में छीन लेंगे। इस बयान पर देश के शूद्र, तथाकथित बुद्धिजीवी, संविधान के रक्षक चुप्पी साधे रहे। सभी जानते हैं कि देश के 90 फीसदी से अधिक मुसलमानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों के पूर्वजों के वंशज हिन्दुओं से धर्मपरिवर्तित होकर मुसलमान बने हैं, जो मनुवादियों के लिये आज भी शूद्र ही हैं।"

डॉ पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

यदि हम इतिहास उठाकर देखें तो पायेंगे कि हर क्षेत्र में हर बार भारत का सौहार्द बिगाड़ने का काम भारत के तथाकथित बड़े कहलाने वाले लोगों ने ही किया है। इसकी शुरूआत कभी भी भारत के आम आदमी ने नहीं की है। चाहे बात अखण्ड भारत के स्वतन्त्रता सेनानी और पाकिस्तान के जनक मुहम्मत अली जिन्ना से शुरू की जाये या भारत के बहुसंख्यक शूद्रों (दलित, आदिवासियों और पिछड़ों) के सेपरेट इलेक्ट्रोल के अधिकार को छीनने के लिये अनशन को हथियार बनाने वाले मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी की करें या अहिंसा के नाटककार पुजारी मो. क. गॉंधी के हत्यारे और कट्टरपंथी हिन्दू नाथूराम गोडसे की बात की जाये।

आगे चलकर अयोध्या-बाबरी विवाद को जानबूझकर भड़काने वाले लालकृष्ण आडवाणी की बात करें या कट्टर हिन्दुत्व को भड़काकर अपनी रोटी सेकने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उत्पाद प्रवीण तोगड़िया, उमा भारती, विनय कटारिया, नरेन्द्र मोदी जैसे मुसलमान विरोधी लोगों की बात करें या शिव सेना के बाला साहेब ठाकरे, उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे और उनके गुण्डों के कुकर्मों को देखें या फिर कथित बुद्धिजीवी कहलाने वाले समाज विज्ञानी और प्रोफेसर आशीष नन्दी की बात करें। स्त्री एवं शूद्र विरोधी ढोंगी संत आसाराम या हिंदुत्व के ठेकेदार संघ के मुखिया मोहन भागवत की बात करें। ये सब के सब इस देश के बहुसंख्यक लोगों (अर्थात शूद्रों), स्त्रियों और मुसलमानों को दूसरे, तीसरे और चौथे दर्जे का नागरिक मानते हैं। शूद्र, स्त्री एवं मुसलमानों को देश की कुल आबादी में से घटाने के बाद बचे शेष कुलीन मुनवादी लोग इस देश पर विगत हजारों सालों की भांति आगे भी हजारों सालों तक अपना अमानवीय राज कायम रखने के लिये तरह-तरह के पेंतरे चलते रहते हैं। जिसके लिये इन लोगों ने शूद्रों, स्त्रियों और मुसलमानों में से भी कुछ समाज-द्रोहियों को ललचाकर अपने मिला लिया है। जिन्हें दिखावटी तौर पर आगे रखकर ये सभी वर्गों के हितचिन्तक होने का ढोंग करते रहते हैं!

हिन्दुत्व के ये कथित संरक्षण अपनी संविधानेत्तर और कथित धार्मिक सत्ता और मनुवादी विचारधारा को हर कीमत पर कायम रखने के लिये अपनी खुद की गुण्डा-पुलिस रखते हैं। जो 14 फरवरी को वेलैटाइंस डे पर, मुम्बई से उत्तर भारतीयों को खदेड़ते समय, दलितों को मन्दिरों से लतियाते समय और स्त्रियों को धार्मिक आयोजनों पर बहिष्कृत करते हुए और छेड़ते समय अपना कमाल दिखाती रहती है। ये पुलिस देश में धर्म के नाम पर तरह-तरह के कुकर्म करती रहती है। जिसके सुफल गुजरात के डाण्डिया रास के बाद गर्भपात क्लीनिकों के आंकड़ों से प्रमाणित होते हैं। जिसे रोकने के लिये अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने तो बाकायदा डाण्डिया रास स्थलों के आसपास सरकारी खर्चे पर लाखों गर्भनिरोधक पिल्स और कण्डोम वितरित करवाकर इस बात को प्रमाणित किया था कि धार्मिक आयोजन कुलीन हिन्दुओं के लिये आज भी ऐश-ओ-आराम के सुअवसर होते हैं। आजाद भारत में जबकि देवदासी बनाने की अमानवीय हिन्दू प्रथा संवैधानिक तौर पर समाप्त हो चुकी है तो ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों का भव्यता से आयोजन किया जाने लगा है, जिनमें युवा लड़कियां धर्म के नाम पर घर से बाहर निकलती हैं और उनके साथ मनुवादियों की स्व-घोषित पुलिस के कमाण्डर और पैदल सेना के लोग यौनसुख भोगने को उसी प्रकार से आजाद होते हैं, जैसे कि देवदासियों के साथ उनके पूर्वज हुआ करते थे। इसी का परिणाम है कि आज डाण्डिया रास गुजरात से निकलकर अनेक प्रान्तों में अपने पैर पसार चुका है!

इसके उपरान्त भी मनुवादी आशीष नन्दी कहते हैं कि भ्रष्टाचार के जनक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोक सेवक हैं। आशीष नन्दी को ये सब कहने का साहस इस कारण से हुआ कि कुछ ही दिन पूर्व प्रवीण तोगड़िया ने कहा कि यदि वह भारत का प्रधानमंत्री बन जाये तो मुसलमानों से सभी प्रकार के संवैधानिक हकों को एक झटके में छीन लेंगे। इस बयान पर देश के शूद्र, तथाकथित बुद्धिजीवी, संविधान के रक्षक चुप्पी साधे रहे। सभी जानते हैं कि देश के 90 फीसदी से अधिक मुसलमानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों के पूर्वजों के वंशज हिन्दुओं से धर्मपरिवर्तित होकर मुसलमान बने हैं, जो मनुवादियों के लिये आज भी शूद्र ही हैं।

शूद्रों को अजा, अजजा, ओबीसी और मुसलमानों के नाम पर मनुवादी लगातार गालियॉं देते रहते हैं और शूद्र चुपचाप सब कुछ सहते और सुनते रहते हैं। यही कारण है कि शूद्र विरोधी भारतीय न्यायपालिका के कुछ जजों ने ऐसे निर्णय दिये हैं, जिनके कारण इस देश के सामाजिक माहौल को बिगाड़ने का काम किया है। इन निर्णयों से इस देश का माहौल मनुवाद को मजबूत करने में सहायक का काम कर रहा है। सभी जानते हैं कि शूद्रों को हजारों सालों तक भारत में मानव नहीं समझा गया। इसी वजह से उन्हें सरकारी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिये आरक्षण प्रदान किया गया। जिसे अमलीजामा पहनाने के लिये संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में साफ़ तौर पर प्रारम्भ से ही ये सुस्पष्ट व्यवस्था की गयी थी कि आरक्षण "नियुक्ति के समय" अर्थात् "नौकरी प्राप्त करते समय" और "पदों पर" अर्थात् "पदोन्नति के समय" दिया जायेगा। जिसकी मनुवादी विचारधारा के पोषक जजों ने बार-बार, मनुवादियों और आरक्षणविरोधियों के पक्ष में और संसद की भावना के विपरीत व्याख्या की गयी, जिसे संसद ने अनेक बार ख़ारिज किया और शूद्रों को आरक्षण के हक से वंचित करने के लिये अनेकों बार न्यायिक शक्ति की आड़ में सताया गया! ये सिलसिला अनवरत आज भी जारी है। इस प्रकार इस देश के सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और न्यायिक माहोल को बिगाड़ने में सबसे अधिक यदि किसी का योगदान है तो वे हैं शूद्र-विरोधी-मनुवादी तथाकथित बड़े-बुद्धिजीवी, राजनेता, धर्मनेता और जज|

Friday, January 11, 2013

एसपी राजेश मीणा तो एक बहाना है! असली मकसद तो मीणा आदिवासियों को मिटाना है!!

मनुवादी किसी भी सूरत में आदिवासियों को ताकतवर होते हुए नहीं देख सकते हैं| उनके लिये यह असहनीय हो रहा है कि राजस्थान का पुलिस महा निदेशक एक आदिवासी अर्थात् मीणा है| जिसे बदनाम करने के लिये पुलिस को भ्रष्ट दिखाना और वो भी उसी की जाति के राजेश मीणा को भ्रष्टाचार और घूसखोर सिद्ध करना, क्या किसी की समझ में नहीं आ रहा है? केवल इतना ही नहीं राजस्थान की राज्यपाल पुलिस महानिदेशक को बुलाकर कहती हैं कि राज्य में स्त्रियों पर अत्याचार और पुलिस में भ्रष्टाचार बढ रहा है| ये बात गृह मंत्री की ओर से भी कही जा सकती थी, लेकिन जानबूझकर पुलिस महानिदेशक को दबाव में लाने और इस खबर को मीडिया के जरिये जनता के समक्ष लाने की सरकार की नीति को मीणा जनजाति के लोगों को समझना होगा और साथ ही इस बात को भी समझना होगा कि केवल बड़े बाबू बनने या एक पार्टी छोड़कर सत्ताधारी पार्टी का दामन थामकर लाल बत्ती प्राप्त कर लेने मात्र से आदिवासियों का उत्थान नहीं हो सकता! आदिवासी समाज की सेवा करनी है तो लालबत्ती नहीं, आदिवासियों की हरियाली की वफादारी की भावना को जिन्दा रखना होगा|

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पिछले दिनों राजस्थान के अजमेर जिले के पुलिस अधीक्षक पद पर तैनात राजेश मीणा को कथित रूप से अपने ही थानेदारों से वसूली करते हुए राजस्थान के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने दलाल के साथ रंगे हाथ पकड़ा गया | यह कोई पहली घटना नहीं है, जिसमें किसी लोक सेवक को रिश्‍वत लेते हुए पकड़ा गया हो! हर दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी लोक सेवक को रिश्‍वत लेते पकड़ा ही जाता रहता है| ऐसे में किसी को रिश्‍वत लेते पकड़े जाने पर, किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये| सरकार और प्रशासन अपने-अपने काम करते ही रहते हैं| इसी दिशा में हर एक राज्य का भ्रष्टाचार निरोधक विभाग भी अपना काम करता रहता है| इसी क्रम में राज्य की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो भी अपना काम कर ही रही है|

सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि जिस दिन से राजेश मीणा को कथित रूप से घूस लेते हुए पकड़ा है, उसी दिन से स्थानीय समाचार-पत्रों में इस खबर को इस प्रकार से प्रसारित और प्रचारित किया जा रहा है, मानो केवल मीणा जनजाति के सम्पूर्ण अधिकारी और कर्मचारी ही चोर हैं, बाकी सारे के सारे दूध के धुले हुए हैं| राजस्थान की मीणा जनजाति सहित सारे देश के सम्पूर्ण जनजाति समाज में इस बात को लेकर भयंकर रोष व्याप्त है| रोष व्याप्त होने का प्रमुख कारण ये है कि राजेश मीणा की मीडिया ट्रायल की जा रही है, जबकि दक्षिणी राजस्थान में अपनी मजदूरी मांगने जाने वाले एक आदिवासी मीणा के उच्च जाति के एक ठेकेदार द्वारा सरेआम हाथ काट दिये जाने की सही और क्रूरतम घटना को सही तरह से प्रकाशित और प्रसारित करने में इसी मीडिया को अपना धर्म याद नहीं रहा|

इसके अलावा पिछले दिनों दलित परिवार के दो नवविवाहिता जोड़ों को मन्दिर से धक्के मारकर भगा देने की घटना को इसी मीडिया द्वारा जानबूझकर दबा दिया गया| भ्रूण हत्या के आरोपों में पकड़े जाने वाले उच्च जातीय डॉक्टरों के रंगे हाथ पकड़े जाने के उपरान्त भी खबर को अन्दर के पन्नों पर दबा दिया जाता है| जब पिछड़े वर्ग से आने वाले राजनेता महीपाल मदेरणा का प्रकरण सामने आया तो उसकी भी जमकर मीडिया ट्रायल की गयी| जबकि दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों के विरुद्ध होने वाले अपराधों में पकड़े जाने वाले मनुवादी अपराधियों के क्रूर और घृणित अपराधों को जानबूझकर मीडिया द्वारा और प्रशासन द्वारा दबा दिया जाता है|

इन सब बातों का साफ और सीधा मतलब है कि चाहे कानून और संविधान कुछ भी कहता हो जो भी जाति या व्यक्ति मनुवादी व्यवस्था से टकराने का प्रयास करेगा उसे निपटाने मे मनुवादी मीडिया और प्रशासन एवं सत्ता पर काबिज मनुवादी कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे| महीपाल मदेरणा और राजेश मीणा दोनों ही मामलों में मनुवादियों की ओर से पिछड़ों और आदिवासियों को यही संकेत दिया गया है| 

राजस्थान में मीणा जाति के बच्चे कड़ा परिश्रम करते हैं| उनके माता-पिता कर्ज लेकर, अपने बच्चों को जैसे-तैसे पढा-लिखाकर योग्य बनाते हैं| जब वे अफसर या कर्मचारी नियुक्त होते हैं तो उस वर्ग की आँखों में खटकने लगते हैं, जो सदियों से मलाई खाता आ रहा है और आज भी सत्ता की असली ताकत उसी के पास है| जबकि जानबूझकर के मीणा जनजाति को बदनाम किया जा रहा है और अफवाह फैलायी जाती है कि मीणा सभी विभागों में और सभी क्षेत्रों में भरे पड़े हैं| जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है|

राजस्थान में आजादी से आज तक एक भी दलित या आदिवासी वकील को, वकीलों के लिये निर्धारित 67 फीसदी वकील कोटे से हाई कोर्ट का एक भी जज नियुक्त नहीं किया गया| इसका अर्थ क्या ये लगाया जाये कि दलित-आदिवासी वकील हाई कोर्ट के जज की कुर्सी पर बैठने लायक नहीं हैं या हाई कोर्ट के जज की कुर्सी दलित-आदिवासियों के बैठने से अपवित्र होने का खतरा है या दलित-आदिवासियों को जज नियुक्त करने पर मनुवादियों को खतरा है कि उनकी मनमानी रुक सकती हैं| कारण जो भी हो, लेकिन राजस्थान हाई कोर्ट में अपवादस्वरूप पदोन्नति कोटे से एक मात्र यादराम मीणा के नाम को छोड़ दिया जाये तो आजादी के बाद से एक भी व्यक्ति सरकार को या जज नियुक्त करने वाले लोगों को ऐसा नजर नहीं आया, जिसे जज के पद पर नियुक्त किया जा सकता!

मीणा क्यों बहुतायत में दिखते हैं? इस बात को भी समझ लेना जरूरी है| चूँकि आदिवासी वर्ग के लोग सरल व भोली प्रवृत्ति के होते हैं, इस कारण वे मनुवादियों की जैसी चालाकियों से वाकिफ नहीं होते हैं और इसी का नुकसान राजस्थान की आदिवासी मीणा जनजाति के लोगों को उठाना पड़ रहा है| सबके सब अपने नाम के आगे ‘मीणा’ सरनैम लिखते हैं| जिसके चलते सभी लोगों को हर एक क्षेत्र में मीणा ही मीणा नजर आते हैं| यदि मीणा अपने गोत्र लिखने लगें, जैसे कि-मरमट, सेहरा, मेहर, धणावत, घुणावत, सपावत, सत्तावत, जोरवाल, बारवाड़, बमणावत आदि तो क्या किसी को लगेगा कि मीणा जाति के लोगों की प्रशासन में बहुतायत है, लेकिन अभी भी मीणा जनजाति के लोगों को इतनी सी बात समझ में नहीं आ पायी है|

यह तो एक बड़ा और दूरगामी सवाल है, जिस पर फिर कभी चर्चा की जायेगी| लेकिन फिलहाल राजस्थान की मजबूत और ताकतवर कही जाने वाली मीणा जनजाति की नौकरशाही को इस बात को समझना होगा कि वे इस मुगालते में नहीं रहें कि वे बड़े बाबू बन गये तो उन्होंने कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मार लिया है| क्योंकि सारा देश जानता है कि राजस्थान की ही नहीं, बल्कि सारे देश की पुलिस व्यवस्था अंग्रेजों की बनायी पटरी पर चल रही है| जिसके तहत प्रत्येक पुलिस थाने की बोली लगती है| थानेदार उगाही करके एसपी को देता है और एसपी ऊपर पहुँचाता है, जिसको अंतत: सत्ताधारी पार्टी को पहुँचाया जाता है| हर विभाग में इस तरह की उगाही होती है| पिछले दिनों एक एक्सईएन बतला रहे थे कि राजस्थान का प्रत्येक एक्सईन अपने चीफ इंजीनियर को हर माह पचास हजार रुपये पहुँचाता है, जिसमें से सीएमडी के पास से होते हुए हर माह मोटी राशी सरकार के पास पहुँचायी जाती है|

कहने का तात्पर्य यह है कि सरकारें स्वयं अफसरों से उगाही करवाती हैं और जब कभी कोई अफसर या अफसरों का कोई धड़ा नियम कानून या संविधान के अनुसार काम करने लगता है तो वही सरकार एक पल में ऐसे अफसरों को उनकी औकात दिखा देती है| कौन नहीं जानता कि किस-किस राजनेता का चरित्र कैसा है, लेकिन महीपाल मदेरणा को ठिकाने लगाना था तो लगा दिया| इसी प्रकार से जाट जाति के बाद राजस्थान में दूसरी ताकतवर समझी जाने वाली मीणा जनजाति के अफसरों को ठिकाने लगाने की राजेश मीणा से शुरूआत करके मीणा जाति के सभी अफसरों और कथित मीणा मुखियाओं को सन्देश दिया गया है कि यदि किसी ने अपनी आँख दिखाने का साहस किया तो उसका हाल राजेश मीणा जैसा होगा|

जहॉं तक इस प्रकार के मामले को मीडिया द्वारा उछाले जाने की बात है तो कोई भी नागरिक सूचना के अधिकार के तहत सरकार से पूछ सकता है कि उसकी ओर से किस-किस समाचार-पत्र को कितने-कितने करोड़ के विज्ञापन दिये गये हैं| जिन अखबारों को हर माह करोड़ों रुपये के विज्ञापन सरकार की ओर से भेंटस्वरूप दिये जाते हैं, उन समाचार-पत्रों की ओर से सरकार का हुकम बजाना तो उनका जरूरी धर्म है|

आजकल मीडिया व्यवसाय हो गया है| जिस पर भारत में केवल और केवल मनुवादियों का कब्जा है| मनुवादी किसी भी सूरत में आदिवासियों को ताकतवर होते हुए नहीं देख सकते हैं| उनके लिये यह असहनीय हो रहा है कि राजस्थान का पुलिस महानिदेशक एक आदिवासी अर्थात् मीणा है| जिसे बदनाम करने के लिये पुलिस को भ्रष्ट दिखाना और वो भी उसी की जाति के राजेश मीणा को भ्रष्टाचार और घूसखोर सिद्ध करना, क्या किसी की समझ में नहीं आ रहा है? केवल इतना ही नहीं राजस्थान की राज्यपाल पुलिस महानिदेशक को बुलाकर कहती हैं कि राज्य में स्त्रियों पर अत्याचार और पुलिस में भ्रष्टाचार बढ रहा है| ये बात गृह मंत्री की ओर से भी कही जा सकती थी, लेकिन जानबूझकर पुलिस महानिदेशक को दबाव में लाने और इस खबर को मीडिया के जरिये जनता के समक्ष लाने की सरकार की नीति को मीणा जनजाति के लोगों को समझना होगा और साथ ही इस बात को भी समझना होगा कि केवल बड़े बाबू बनने या एक पार्टी छोड़कर सत्ताधारी पार्टी का दामन थामकर लाल बत्ती प्राप्त कर लेने मात्र से आदिवासियों का उत्थान नहीं हो सकता! आदिवासी समाज की सेवा करनी है तो लालबत्ती नहीं, आदिवासियों की हरियाली की वफादारी की भावना को जिन्दा रखना होगा| एसपी राजेश मीणा तो एक बहाना है! असली मकसद तो मीणा आदिवासियों को मिटाना है|

Friday, January 4, 2013

विडंबनाओं के देश में स्त्री-सुरक्षा..!

दुनिया के किसी भी देश में रहने वाले इतनी विडंबनाओं के साथ नहीं जीते, जितनी विडंबनाओं के साथ हमें भारत में जीना पड़ता है। धर्म, सम्प्रदाय और राजनीति से परे हम भारतीयों में यदि कोई एकरूपता है, तो वह है, भारतीयों की सोच और कथनी, कथनी और करनी में मौजूद पाखंड। भारतीय समाज का वयस्क हिस्सा, चाहे वह पुरुष हो या महिला, अपने दैनंदिनी जीवन के प्रत्येक पल को इसी दिखावे, बनावटीपन और ओढ़े हुए झूठ के साथ जीते हैं। वह चाहे गरीबों के नाम पर आंसू बहाना हो, भ्रष्टाचार के नाम पर रोष जाहिर करना हो या फिर स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित होना हो, हम अपने पाखंड को सरलता के साथ ओढ़े रहते हैं| हमारी सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि चरित्र और नैतिकता के स्तर पर मूल्यों में दोहरापन हमें कभी कचौटता भी नहीं है।

किसी मनुष्य को जीवन में जिन तीन चीजों की कामना सबसे अधिक होती है, वे तीनों ही भारतीय सन्दर्भों में स्त्री रूप हैं| लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा| धन, बुद्धि और शक्ति। सामान्य तौर पर किसी घर में घर में कन्या का जन्म होने पर कहा जाता है कि लक्ष्मी घर में आई है| पर, उसी लक्ष्मी को कोख में ही मार देने की घटनाएं सर्वाधिक भारत में होती हैं। वही लक्ष्मी दैहिक व्यापार में धकेली जाती है और धन कमाने का साधन मानी जाती है। विडम्बना यह है कि लक्ष्मी को दैहिक व्यापार में ढकेलने के काम में भी सहायक लक्ष्मी ही बनती है।

सरस्वती ज्ञान की देवी है। उन्हीं सरस्वतियों को पढ़ लिखकर क्या करेंगी, कहकर, ज्ञान प्राप्ति से वंचित रखा जाता है। दुर्गा की उपासना करके शक्ति प्राप्त की जाती है| दुर्गा के उन्हीं अवतारों को घरों में समाज में लतियाया जाता है। यह सब करते हुए सोच के स्तर पर समाज में श्रेणी या स्तर का कोई भेदभाव नहीं है। उच्च वर्ग हो, मध्य वर्ग हो या निचला तबका, आर्थिक आधार पर हो या जाती, धर्म और सम्प्रदाय, सोच के स्तर पर सभी समान हैं| स्त्रियाँ पैर की जूती से भी कम हैं। यह सोच के स्तर पर है। स्त्रियाँ पूजनीय हैं, उनका सम्मान होना चाहिये। यह कथनी के स्तर पर है। उन्हें दबाकर रखना चाहिये और अवसर मिलते ही उनका उपभोग किया जा सकता है, यह करनी के स्तर पर है।

दिल्ली सहित पूरे देश में पिछले एक पखवाड़े से चल रहे प्रदर्शनों में यह विडम्बना आंदोलन, राजनीति और प्रशासन तीनों स्तर पर खुलकर सामने आई है। यह क्या कम विडंबनापूर्ण है कि जब इंडिया गेट पर युवाओं का रोषपूर्ण प्रदर्शन अपने चरम पर था, इलेक्ट्रानिक मीडिया के तथाकथित बुद्धिमान और विवेकपूर्ण रिपोर्टर और एंकर गला फाड़ फाड़ कर दिल्ली पोलिस ही नहीं, पूरे देश की पोलिस व्यवस्था को कोस रहे थे, देश की सरकार ही नहीं, सारे दलों के सारे राजनीतिज्ञ घडियाली आंसू बहाकर संवेदनशील दिखने की कोशिश कर रहे थे, दुनिया की सबसे बदनाम पत्रिका और बदनाम क्लबों का समूह प्लेब्वॉय भारत में उसके खुलने वाले क्लबों में शराब परोसने के लिए रखी जाने वाली “बनीज” याने लड़कियों के लिए पहनने वाली पोशाक का प्रदर्शन कर रहा था, पर, न तो इंडिया गेट पर "व्ही डिमांड जस्टिस" के नारे लगाने वालों ने, न ही चैनलों पर बलात्कार के खिलाफ प्रवचन झाड़ने वाले महिलाओं के महिला और पुरुष पक्षधरों ने, न ही गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया के रिपोर्टरों और एंकरों ने, न ही प्रिंट मीडिया के अखबारों ने और न ही घडियाली आंसू बहाने वाले राजनीतिज्ञों ने किंचित मात्र भी चिंता जताई कि कामुकता परोसने वाले इन क्लबों के खुलने का भारतीय समाज पर क्या असर पड़ेगा?

पिछले तीन दशकों ने भारत में कामुकता एक उद्योग के रूप में स्थापित हो चुकी है और महिलाएं इसमें माल के रूप में व्यापार के लिए इस्तेमाल हो रही हैं। कामुकता जब उद्योग की शक्ल ग्रहण कर लेती है, तब इसका उपभोक्ता केवल समाज का अभिजात्य अग्रणी नहीं होता, उपभोक्ताओं का विस्तार मध्यवर्ग और निचले वर्ग तक हो जाता है। ठीक उसी तरह, जैसे देश में पहले जब गुटखे का उत्पादन शुरू हुआ तो वो बड़े पेक (डिब्बे) में मिलता था और उसके ग्राहक समाज के संपन्न तबके से थे। एक दशक के बाद ही वह छोटे पेक याने पाउच में भी मिलाने लगा और उपभोक्ता समाज का प्रत्येक तबका है| यही बात कामुकता के उद्योग पर भी लागू होती है| गुटखा उद्योग समाज को गुटखे का आदी बनाता है। कामुकता का उद्योग समाज को कामुक बनाता है। आज यही होते हम देख रहे हैं। इस उद्योग में माल स्त्री है और वो इसी का दुष्परिणाम भुगत रही है।

इस कामुक समाज का प्रत्येक अंग, व्यक्ति से लेकर संस्था तक, राजनीति से लेकर धर्म तक, स्त्री से लेकर पुरुष तक, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार तक की घटनाओं पर, दहेज से लेकर डायन/टोनही कहकर महिलाओं को मार देने तक की घटनाओं पर, प्रेम निवेदन अस्वीकार कर देने से सम्मान के लिए स्त्रियों को मार देने तक की घटनाओं पर, उसी कामुक नजरिये से सोचता है। यही सोच पोलिस को लापरवाह बनाती है। यही सोच 100 में से 70 बलात्कार के अपराधियों को न्यायालय से छुड़ाती है। यही सोच बलात्कारियों को लोकसभा और विधान सभाओं में पहुंचाती है।

इस विडम्बना के बावजूद कि यही समाज तब उद्वेलित नहीं हुआ था, जब मणिपुर की मनोरमा, छत्तीसगढ़ की सोनी शोरेन, आसिया, नीलोफर या भंवरी देवी के ऊपर अत्याचार हुए थे, इस बात का स्वागत किया जाना चाहिये कि कुछ हलचल तो समाज में हुई है। पर, दुखद तो यह है कि इतना बड़ा अवसर मिलने के बावजूद भी, समाज की चिंताएं, फांसी की सजा, नपुंसक बनाने और पोलिस तथा न्यायायिक सुधार पर ही टिकी हैं। उन प्रदर्शनों में न तो व्यवस्था जन्य दोषों पर कोई बल है, न ही समाज को सेक्स के चक्कर में डालकर मूल सामाजिक समस्याओं की तरफ से भटकाने के प्रति कोई चिंता है| प्रधानमंत्री का कहना है कि उस 23 वर्षीय लड़की की कुरबानी बेकार नहीं जायेगी। उस लड़की के माता-पिता का कहना है कि उनकी बेटी की मौत से दिल्ली और देश की महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ेगी। देश की बेटियों को हक और सम्मान मिलेगा। पर, मिलेगा क्या?

देश का एक युवा क्रिकेटर लड़कियों को पटाने के दो तरीके बता रहा है। एक परफ्यूम के विज्ञापन में लड़के की फियान्सी कामुकता से प्रोत होकर लड़के के पिता के कपड़े उतार रही है। योनी को गोरा बनाने से लेकर, योनी को कसा बनाने की क्रीम तक के विज्ञापन बाजार में छाये हैं। नहीं किसी के मुँह में जहर डाल के आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वो व्यक्ति उस जहर को अमृत में बदल लेगा। इसी तरह समाज के दिमाग में कामुकता भरकर आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह उसे सदवृति में बदल लेगा।

बुनियादी बात यह है कि समाज की संस्कृति, नैतिकता का वाहक समाज का अग्रणी हिस्सा होता है। आज वही भ्रष्ट है। वही कामुकता में खो गया है। आप अपने मालिक को प्लेब्वॉय क्लब तक ले जाने वाले ड्राईवर से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह उसकी पहुँच में आ जाने वाली महिला को माल नहीं समझेगा।

विडम्बना यह है कि उस सोच के बारे में कहीं नहीं सोचा गया जो कामुकता को समाज में रोप रही है, बलात्कार, स्त्रियों को माल समझना, जिसके सहउत्पाद (BY PRODUCT) हैं। न इंडिया गेट पर, न लोकसभा में और न हमारे दिमागों में। बिना उस पर विचार किये, विडंबनाओं से भरे इस समाज में स्त्री सुरक्षा पर रोना कितना फलीभूत होगा, यह तो भविष्य ही बताएगा।

Friday, November 23, 2012

दवा कंपनियां, डॉक्‍टर और दुकानदार: आखिर इस मर्ज की दवा क्‍या है

दवा, डॉक्टर एवं दुकानदार के प्रति भोली-भाली जनता इतना विश्वास रखती है कि डॉक्टर साहब जितनी फीस मांगते हैं, दुकानदार जितने का बिल बनाता है, को वह बिना किसी लाग-लपेट के अपना घर गिरवी रखकर भी चुकाती है. क्या आप बता सकते हैं कि कोई घर ऐसा है, जहां कोई बीमार नहीं पड़ता, जहां

Monday, August 13, 2012

भ्रष्टाचार की शुरुआत कहाँ से...?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

आजादी के बाद से अनेक मोर्चों पर मनमानी और भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ छोटे-बड़े अनेक आन्दोलन देश में होते रहे हैं। जिनमें से अधिकतर का इतिहास है कि वे भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाने के बाद समाप्त होते रहे हैं। पिछले एक वर्ष के दौरान समाज के एक वर्ग और कार्पोरेट घरानों के इशारों पर कदमताल करते मीडिया ने इस बात का पूरी तरह से प्रमाणित करने का भरसक प्रयास किया कि अन्ना हजारे के नेतृत्व में देश का सबसे बड़ा जनान्दोलन उठ खड़ा हुआ है, जो भ्रष्टाचारियों तथा भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ फेंक-कर ही दम लेगा। लेकिन जो कुछ हुआ है, वोे देश की सारी जनता के सामने आ गया। देशवासियों को ज्ञात हो गया है कि अन्ना टीम के मुख्य कर्ताधर्ता एवं भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये बनाये जाने वाले जन लोकपाल के रचनाकारों में से प्रमुख स्वयं भूषण पिता-पुत्र मायावती की भ्रष्ट गंगा में डुबकियॉं लगाते रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज रहे हेगड़े संविधान को धता बताकर के देश के दमित वर्गों के हितों के विरुद्ध निर्णय सुनाकर एक हृदयहीन और शोषक वर्गों के हितसाधक व्यक्ति के रूप में पहले से ही पहचाने जाते रहे हैं।

किरण बेदी चाहे स्वयं को कितनी ही पाकसाफ बतलाने की कोशिश करती रही हों। लेकिन काजल की कोठरी में कोई भी बेदाग नहीं निकल सकता? पुलिस की नौकरी में उन्होंने बड़े-बड़े काम करके दिखाने के बहुप्रचारिक काम या कारनामे किये, जिसके लिये उनको अनेक बार और अनेक स्तरों पर सम्मानित भी किया गया, लेकिन उनका असली चेहरा आज देश के समक्ष प्रकट हो चुका है। 

विदेशी संस्थाओं से अनुदान के नाम पर मोटी रकम लेने वाली संस्थाओं के कार्यक्रमों में जाने के लिये बेदी की ओर से लिये जाने वाले हवाई जहाज के टिकिट के किराये और असल में भुगतान किये जाने वाले किराये में भारी अन्तर देखा गया, जिसे स्वयं किरण बेदी ने अपनी गलती के रूप में स्वीकार कर लिया है। ऐसी संस्थाओं के कार्यक्रमों में जाने की बेदी को क्या जरूरत थी जो भ्रष्टाचार को बढावा देने में पूरी तरह से डूबी हुई हैं?

अरविन्द केजरीवाल को तो उनके अपने साथी ही तानाशाह की उपाधि दे चुके हैं। उन पर भी अनेक प्रकार के आरोप हैं। यही नहीं उन पर तो स्वयं अन्ना हजारे को दिग्भ्रमित करने तक के आरोप हैं। उनके साथियों का मानना है कि केजरीवाल देश के अगले प्रधान मंत्री बनने का ख्वाब पाले बैठे हैं।

इस प्रकार के हालातों के बीच अन्ना हजारे के नेतृत्व में संचालित भ्रष्टाचार विरोधी अन्दोलन जनता के लिये अनपेक्षित दुर्गति को प्राप्त होता दिख रहा है। जबकि हमने शुरू में ही इसे एक प्रायोजित नाटक करार दिया था। जिसके उपरोक्त के अलावा भी अनेक और भी कारण हैं, जिन पर देश के प्रबुद्ध लोग चिन्तन कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। फिलहाल हमें ये देखना है कि भ्रष्टाचार को समाप्त करने वाले ही भ्रष्ट व्यवस्था में स्वयं को समाहित क्यों कर लेते हैं? 

भारत के सन्दर्भ में देखा जाये तो एक समय था, जब केवल शीर्ष स्तर पर ही गलत काम हुआ करते थे। शीर्ष नेतृत्व द्वारा ऐसे लोगों को अभयदान प्राप्त था। जिसके लिये वाकायदा धर्म ग्रंथों में अभयदान देने की व्यवस्था की गयी थी। धर्मग्रंथकारों ने अपने वर्ग को संरक्षित करने के साथ-साथ सबसे पहले ऐसी व्यवस्था की, जिसमें शासक वर्ग को इस आपराधिक गठजोड़ में कहीं भय दिखाकर तो कहीं सजा से छूट प्रदान करके शामिल किया जाये और सत्ता को पोषित करने वाले व्यापारी वर्ग को भी मिला लिया।

जिसके परिणामस्वरूप मुठ्ठीभर इन तीनों वर्गों की तिकड़ी ने देश के तमाम लोगों और सम्पूर्ण व्यवस्था को अपने कैंजे में ले लिया। जिसके बारे में कुछ ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किया जाना भी जरूरी है, जिनसे ये बात प्रमाणित होती है कि मनमानी या भ्रष्टाचार की शुरुआत करने वाले कौन थे।

‘‘राजा यदि परम संकट की परिस्थिति में तो भी उसे ब्राह्मणों को कुपित नहीं करना चाहिये, (आज के सन्दर्भ में इसे आईएएस, आईपीएस और उनके मातहतों को समझा जा सकता है) क्योंकि कुपित ब्राह्मण सेना तथा वाहन सहित राजा (प्रधानमंत्री- मुख्यमंत्री व उनके मंत्री) का विनाश कर सकता है।’’-मनुस्मृति 9/312,

इसमें साफ संकेत दिया गया है कि मनमानी करने वाले ब्राह्मण के विरुद्ध किसी भी प्रकार की दण्डात्मक कार्यवाही के लिये राजा द्वारा सोचा भी नहीं जाना चाहिये।

आगे-मनुस्मृति 9/316, में ये भी साफ कर दिया कि ब्राह्मण चाहे विद्वान हो या मूर्ख वह नि:सन्देह पूज्यनीय ही होता है।

मनुस्मृति 9/319, में कहा गया है कि ब्राह्मण (आईएएस लॉबी) जिनका (प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री व उनके मंत्री) पथ प्रदर्शन करते हैं, वही क्षत्रिय (प्रधानमंत्री/ मुख्यमंत्री व उनके मंत्री) प्रगति कर सकते हैं। मतलब शासक वर्ग को प्रगति करनी है तो ब्राह्मण का पथप्रदर्शन चाहिये ही होगा और वो तब ही मिलेगा, जबकि उसे हर हाल में खुश रखा जाये। उसके कार्मों को अनदेखा किया जाये।

इस प्रकार से ब्राह्मण वर्ग ने स्वयं को सबसे पहले सबसे बड़ा वीआईपी का दर्जा दिलवाया और बाद में क्षत्रिय एवं वैश्य को छोटा वीआईपी बनाकर उन्हें मनमानी करने की व्यवस्था का पोषण किया। निम्न वर्गों (जनता) को इन वर्गों के कर्मों के बारे में सवाल उठाने पर पाबन्दी लगा दी और इस प्रकार से उच्च वर्ग की मनमानी और भ्रष्ट व्यवस्था का जन्म हुआ। यही व्यवस्था आज सरकार और प्रशासन में हर जगह पर देखी जा सकती है, जिसमें मंत्रियों, सचिवों, अफसरों और इंस्पेक्टरों को मनचाही करने और उसके पक्ष में सुरक्षा-संरक्षण के अनेक प्रकार के कानूनी सुरक्षाकवच प्राप्त हैं। जबकि आम जनता अभी भी सूद्र की भांति कुकर्मी या सुकर्मी सभी शासकों का सम्मान करने को विवश है!

इस व्यवस्था को बदलने के लिये देश में नवब्राह्मण बनाने की व्यवस्था को समाप्त करना होगा, जिसके लिये देश के हर व्यक्ति के अवचेतन में व्याप्त पुरानी ब्राह्मणवादी व्यवस्था को समाप्त समूल नष्ट करने के लिये, आगे बढकर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के जनक और पोषक लोगों को काम करना होगा। जब तक कोई भी बीमारी जड़ से समाप्त नहीं होगी, ऊपरी दिखावटी उपचारों से उसका शमन सम्मव नहीं है।

Wednesday, March 14, 2012

विधानसभा चुनाव परिणामों के संकेत-अन्ना और बाबा ने भ्रष्टाचार की लड़ाई को कई वर्ष पीछे धकेल दिया है।

पॉंच राज्यों के चुनाव परिणामों से जो सन्देश निकलकर सामने आया है, उसके ये संकेत तो स्पष्ट रूप से प्रकट हो ही चुके हैं कि मतदाता ने केवल कॉंग्रेस, भाजपा और बसपा को ही धूल नहीं चटायी है, बल्कि इसके साथ-साथ अन्ना हजारे और रामदेव को भी मटियामेट कर दिया है। जो इस देश के भ्रष्टाचार से त्रस्त आम लोगों के लिये दु:खद बात है। क्योंकि पूरे देश में सेवारत हजारों सच्चे सामाजिक कार्यकर्ताओं के दशकों के सतत और कड़े प्रयासों से भ्रष्टाचार जो वास्तव में देशभर में मुद्दा बन चुका था, उस मुद्दे का अन्ना और बाबा ने सत्यानाश कर दिया है। इन्होंने भ्रष्टाचार की लड़ाई को कई वर्ष पीछे धकेल दिया है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

मणीपुर, गोआ, पंजाब, उत्तराण्ड और उत्तर प्रदेश सहित 5 राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव परिणामों ने इलेक्ट्रॉलिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, स्वतंत्र पत्रकार और राजनेताओं सहित सभी को चौंका दिया है। सभी के अंदाज और कयासों को फैल कर दिया है। जीतने वाले और हारने वाले दलों को प्राप्त परिणामों ने सकते में डाल दिया है। जोड़तोड़ के दौर में जहॉं मणीपुर में लगातार तीसरी बार कॉंग्रेस का सत्ता में आना अनहोनी घटना लगती है, वहीं चालीस वर्ष बाद किसी भी दल का लगातार दुबारा सत्ता में आना पंजाब के मतदाता का ही कमाल है। उत्तराखण्ड में भाजपा को दण्डित करते समय मतदाता ने कॉंग्रेस को भी साफ संकेत दिया है कि कॉंग्रेस किसी मुगालते में नहीं रहे! मतदाता की नजर में भाजपा और कॉंग्रेस दोनों ही सत्ता के योग्य नहीं हैं। ये अलग बात है कि गणितीय समीकरणों, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता में राजनैतिक आस्था के कारण उत्तराखण्ड की सत्ता कॉंग्रेस के हिस्से में आ गयी है। आज के युग में इसी को लोकतन्त्र का गठजोड़ीय चमत्कार कहा जाता है। गोआ में भाजपा की ताजपोशी स्वयं भाजपा के नेताओं के लिये भी अप्रत्याशित बतायी जा रही है।

उपरोक्त चार राज्यों के मतदाता ने एक बार फिर से सत्ता की धुरी को हिलाकर और घुमाकर सत्ताधीशों को बतला दिया है कि वे किसी भी मुगालते में नहीं रहें! जनता जो चाहेगी वही होने वाला है। जिसका परिणाम सबके सामने है, लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा के परिणामों ने सभी राजनीतिक पण्डितों के छक्के छुड़ा दिये हैं। सारे एग्जिट पोल और प्रिइलेक्शन पोलों के परिणामों की पोल खोल कर रख दी। उत्तर प्रदेश के वोटर ने तो राष्ट्रीय दलों को तो अपनी औकात बतला ही दी है, साथ ही डॉ. अम्बेड़कर तथा कांशीराम के आदर्शों को तिलांजलि देकर भी स्वयं को दलितों की मसीहा कहाने वाली मायावती के जातीय गणित तथा निजी अहंकार को भी बेरहमी से चकनाचूर कर दिया है।

उत्तर प्रदेश में कहने को तो समाजवादी पार्टी की जीत हुई है। मुलायम सिंह, आजम खान और अखिलेश यादव की जीत हुई है, लेकिन गहराई में जाकर देखा जाये तो उत्तर प्रदेश में सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा की जमीनी जरूरत को मतदाता ने पुष्ट किया है। ऐसा लगता है, मानों मण्डल आयोग के बाद की राजनैतिक धारा को उत्तर प्रदेश की जनता ने फिर से सही दिशा में मोड़ दिया है। इसकी दुसरे दौर की शुरूआत बिहार से हो चुकी थी, लेकिन साम्प्रदायिक कही जाने वाली और संघ के इशारों पर शासन चलाने के आरोप झेलने वाली भाजपा के साथ गठजोड़ करके सरकार चलाने के कारण नीतीश कुमार की जीत को शुरू में सीधे तौर पर सामाजिक न्याय एवं धर्म निरपेक्षता की विजय नहीं माना गया था। यद्यपि नीतीश कुमार की बिहार में दुबारा ताजपोशी करके बिहार के मतदाता ने नीतीश कुमार को साफ तौर पर यह संकेत दे दिया है कि उन्हें बिहार की सत्ता भाजपा के सहयोग के कारण नहीं, बल्कि जनतादल द्वारा मण्डल कमीशन को लागू किये जाने के बाद देश के जिस बड़े वर्ग को आत्मसम्मान की अनुभूति हुई है, उस वर्ग के सम्मान की रक्षा के लिये सत्ता प्राप्त हुई है। जिसे नीतीश को संभालना होगा। उत्तर प्रदेश में भी साफ तौर पर यही संकेत दिख रहा है।

मुलायम सिंह की विजय धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और मण्डल कमीशन के बाद की राजनीतिक जमीन में जनतादल द्वारा बोयी गयी फसल का सुफल है। जिसे मुलायम, आजम और अखिलेश ने बेहतर तरीके से काटा है। समाजवादी पार्टी को आने वाले पॉंच वर्षों में इस नयी, जमीनी हकीकत और बहुसंख्यक दबे-कुचले भारतीय मतदाता की राजनीतिक समझ को केवल समझना ही नहीं होगा, अपितु इसे अपनी संवैधानिक शक्ति और राजनैतिक कौशल से सींचना भी होगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा के ताजा परिणाम इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि अब मतदाता को समझ में आ गया है, कि हजारों वर्षों से देश और देश के बहुसंख्यकों का क्रूरतापूर्वक शोषण करने वाला दो फीसदी वर्ग, देश का और देश के बहुसंख्यकों का शुभचिंतक नहीं है। अत: इस वर्ग को सत्ता से उठाकर फेंक दिया जाये और जिन लोगों का ये देश है, उन्हीं लोगों को उनके सम्पूर्ण हक, पूर्ण सम्मान और आदर के साथ मिलें।

यहॉं पर हमें ये नहीं भूलना चाहिये कि दो फीसदी वर्ग द्वारा पोषित भ्रष्ट और अकर्मण्य नौकरशाही इस प्रकार के देश-हितकारी प्रयासों को कभी भी आसानी से सफल नहीं होने देगी। जिसके लिये नीतीश कुमार और मुलायम सिंह को नौकरशाही पर कूटनीतिक तरीके से न मात्र लगाम लगानी होगी, बल्कि नौकरशाही को इस बात का अहसास भी करवाना होगा कि नौकरों का काम जनता की सेवा करना है, न कि जनता का शोषण करना!

यद्यपि अभी से कुछ कहना बहुत जल्दबाजी होगी, लेकिन फिर भी विधानसभा चुनाव परिणामों के सन्दर्भ में यदि 2014 के लोकसभा चुनावों की तैयारी की बात करें तो परिणाम मिलेजुले दिख रहे हैं। इससे पूर्व राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव होने हैं। जहॉं पर स्थिति अत्यन्त चिन्ताजनक हैं। जहॉं एक ओर गहलोत सरकार में भ्रष्ट नौकरशाही को विश्‍वस्त मानकर, नौकरशाही के भरोसे ही सत्ता का संचालन किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर लगता है मनो मध्य प्रदेश में नौकरशाही को लूट में सीधे-सीधे राझीदार बना लिया गया है। ऐसे हालात में बिना कुछ किये कॉंग्रेस और भाजपा आलाकमान द्वारा मतदाता को बेवकूफ समझने वाले प्रान्तीय राजनेताओं को आगामी विधानसभा चुनावों में अपनी जमीनी हकीकत से दो-चार होने से बचा पाना बहुत मुश्किल होगा। 

अन्त में एक और महत्वूपर्ण बात पॉंच राज्यों के चुनाव परिणामों से जो सन्देश निकलकर सामने आया है, उसके ये संकेत तो स्पष्ट रूप से प्रकट हो ही चुके हैं कि मतदाता ने केवल कॉंग्रेस, भाजपा और बसपा को ही धूल नहीं चटायी है, बल्कि इसके साथ-साथ अन्ना हजारे और रामदेव को भी मटियामेट कर दिया है। जो इस देश के भ्रष्टाचार से त्रस्त आम लोगों के लिये दु:खद बात है। क्योंकि पूरे देश में सेवारत हजारों सच्चे सामाजिक कार्यकर्ताओं के दशकों के सतत और कड़े प्रयासों से भ्रष्टाचार जो वास्तव में देशभर में मुद्दा बन चुका था, उस मुद्दे का अन्ना और बाबा ने सत्यानाश कर दिया है। इन्होंने भ्रष्टाचार की लड़ाई को कई वर्ष पीछे धकेल दिया है।

Tuesday, February 21, 2012

आवंटन अधिसूचना जारी होने से २ वर्ष पूर्व ही कर दिया गया था|

सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय उपभोक्ता कांग्रेस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (मनु/सुको /०३४५/२०११) के निर्णय में कहा है कि राज्य या इसकी एजेंसियां राजनैतिक संस्थानों/या राज्याधिकारियों की इच्छानुसार किसी भी व्यक्ति को खैरात या लाभ नहीं दे सकती| ऐसा लाभ सशक्त, पारदर्शी , दृष्टव्य और निश्चित नीतिगत सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए |वर्तमान प्रकरण में भूमि के आरक्षण हेतु एक्स द्वारा मेमोरिअल ट्रस्ट के संयोजक

Tuesday, January 10, 2012

भ्रष्टाचार, स्त्री और असंवेदनशीलता

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

गत 23 दिसम्बर को एक समाचार पढने में आया कि जिला शिक्षा अधिकारी इन्दौर के कार्यालय में कार्यरत एक महिला लिपिक ने रिश्‍वत ली और वह रंगे हाथ रिश्‍वत लेते हुए पकड़ी भी गयी| इस प्रकार की खबरें आये दिन हर समाचार-पत्र में पढने को मिलती रहती हैं| इसलिये यह कोई नयी या बड़ी खबर भी नहीं है, लेकिन मेरा ध्यान इस खबर की ओर इस कारण से गया, क्योंकि इस खबर से कुछ ऐसे मुद्दे सामने आये जो हर एक संवेदनशील व्यक्ति को सोचने का विवश करते हैं| पहली बात तो यह कि एक महिला द्वारा एक दृष्टिबाधित शिक्षक से उसके भविष्य निधि खाते से राशि निकालने के एवज में रिश्‍वत की मांग की गयी| शिक्षक ने भविष्य निधि से निकासी का स्पष्ट कारण लिखा था कि वह उसके चार वर्षीय पुत्र का इलाज करवाना चाहता है, जो कि लम्बे समय से किडनी की तकलीफ झेल रहा है|

इतना सब पढने और जानने के बाद भी महिला लिपिक श्रीमती पुष्पा ठाकुर का हृदय नहीं पसीजा| श्रीमती ठाकुर ने भविष्य निधि में जमा राशि को निकालने के लिये प्रस्तुत आवेदन को आपनी टेबल पर दो माह तक लम्बित पटके रखा और आखिर में दो हजार रुपये रिश्‍वत की मांग कर डाली, जो एक बीमार पुत्र के पिता के लिये बहुत ही तकलीफदायक बात थी| जिससे आक्रोशित या व्यथित होकर दृष्टिबाधित पिता ने रिश्‍वत देने के बजाय सीधे लोकयुक्त पुलिस से सम्पर्क किया और श्रीमती पुष्पा ठाकुर को रंगे हाथ गिरफ्तार करवा दिया|

इस मामले में सबसे जरूरी सवाल तो यह है कि भविष्य निधि से निकासी के लिये पेश किये जाने वाले आवेदन दो माह तक लम्बित पटके रहने का अधिकार एक लिपिक को कैसे प्राप्त है? यदि आवेदन प्राप्ति के साथ ही आवेदन को जॉंच कर प्राप्त करने, पावती देने और हर हाल में एक सप्ताह में मंजूर करने की कानूनी व्यवस्था हो तो श्रीमती ठाकुर जैसी निष्ठुर महिलाओं को परेशान शिक्षकों या अन्य कर्मियों को तंग करने का कोई अवसर ही प्राप्त नहीं होगा| क्या मध्य प्रदेश की सरकार को इतनी सी बात समझ में नहीं आती है?

दूसरी बात ये भी विचारणीय है कि स्त्री को अधिक संवेदनशील और सुहृदयी मानने की भारत में जो महत्वूपर्ण विचारधारा रही है, उसको श्रीमती ठाकुर जैसी महिलाएँ केवल ध्वस्त ही नहीं कर रही हैं, बल्कि स्त्री की बदलती छवि को भी प्रमाणित कर रही हैं| इससे पूर्व विदेश विभाग की माधुरी गुप्ता जासूसी करके भी स्त्री की बदलती छवि को प्रमाणित कर चुकी है| यदि ऐसे ही हालात बनते गये तो स्त्री के प्रति पुरुष प्रधान समाज में जो सोफ्ट कॉर्नर है, वह अधिक समय तक टिक नहीं पायेगा|

इन हालातों में पुष्पा ठाकुर और माधुरी गुप्ता जैसी महिलाओं द्वारा स्त्री छवि को तहस-नहस किये जाने से सारी की सारी स्त्री जाति को ही आगे से पुरुष की भांति माने जाने का अन्देशा है| यदि ऐसा हुआ तो भारतीय कानूनों में स्त्री को जो संरक्षण मिला हुआ है, उसका क्या होगा?

Friday, December 30, 2011

लोकपाल-हमाम में सभी नंगे!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’


लोकपाल विधेयक के बहाने कॉंग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबन्धन यूपीए और भाजपा के नेतृत्व वाले मुख्य विपक्षी गठबन्धन एनडीए सहित सभी छोटे-बड़े विपक्षी दलों एवं ईमानदारी का ठेका लिये हुंकार भरने वाले स्वयं अन्ना और उनकी टीम के मुखौटे उतर गये! जनता के समक्ष कड़वा सत्य प्रकट हो गया!

जो लोग भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाते रहे हैं, वे संसद में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये आँसू बहाते नजर आये! सशक्त और स्वतन्त्र लोकपाल पारित करवाने का दावा करने वाले यूपीए एवं एनडीए की ईमानदारी तथा सत्यनिष्ठा की पोले खुल गयी! सामाजिक न्याय को ध्वस्त करने वाली भाजपा की आन्तरिक रुग्ण मानसिकता को सारा संसार जान गया! भाजपा देश के अल्प संख्यकों के नाम पर वोट बैंक बढाने की घिनौनी राजनीति करने से यहॉं भी नहीं चूकी|

भाजपा और उसके सहयोगी संगठन एक ओर तो अन्ना को उकसाते और सहयोग देते नजर आये, वहीं दूसरी ओर मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी द्वारा इस देश पर जबरन थोपे गये आरक्षण को येन-केन समाप्त करने के कुचक्र भी चलते नजर आये!

स्वयं अन्ना एवं उनके मुठ्ठीभर साथियों की पूँजीपतियों के साथ साठगॉंठ को देश ने देखा| भ्रष्टाचार के पर्याय बन चुके एनजीओज् के साथ अन्ना टीम की मिलीभगत को भी सारा देश समझ चुका है| सारा देश यह भी जान चुका है कि गॉंधीवादी होने का मुखौटा लगाकर और धोती-कुर्ता-टोपी में आधुनिक गॉंधी कहलवाने वाले अन्ना, मनुवादी नीतियों को नहीं मानने वाले अपने गॉंव वालों को खम्बों से बॉंधकर मारते और पीटते हैं!

भ्रष्टाचार मिटाने के लिये अन्ना भ्रष्टाचार फैलाने वाले कॉर्पोरेट घरानों और विदेशों से समाज सेवा के नाम पर अरबों रुपये लेकर डकार जाने वाले एनजीओज् को लोकपाल के दायरे में क्यों नहीं लाना चाहते, इस बात को देश को समझाने के बजाय बगलें झांकते नजर आये! जन्तर-मन्तर पर लोकपाल पर बहस करवाने वाली अन्ना टीम ने दिखावे को तो सभी को आमन्त्रित करने की बात कही, लेकिन दलित संगठनों को बुलाना तो दूर, उनसे मनुवादी सोच को जिन्दा रखते हुए लम्बी दूरी बनाये रखी है!

संसद में सभी दल अपने-अपने राग अलापते रहे, लेकिन किसी ने भी सच्चे मन से इस कानून को पारित कराने का प्रयास नहीं किया| विशेषकर यदि कॉंग्रेस और भाजपा दोनों अन्दरूनी तौर पर यह तय कर लिया था कि लोकपाल को किसी भी कीमत पर पारित नहीं होने देना है और देश के लोगों के समक्ष यह सिद्धि करना है कि दोनों ही दल एक सशक्त और स्वतन्त्र लोकपाल कानून बनाना चाहते हैं| वहीं दूसरी और सपा, बसपा एवं जडीयू जैसे दलों ने भी लोकपाल कानून को पारित नहीं होने देने के लिये संसद में बेतुकी और अव्यावहारिक बातों पर जमकर हंगामा किया| केवल वामपंथियों को छोड़कर कोई भी इस कानून को पारित करवाने के लिये गम्भीर नहीं दिखा| यद्यपि बंगाल को लूटने वाले वामपंथियों की अन्दरूनी सच्चाई भी जनता से छुपी नहीं है|

Friday, December 16, 2011

लोकपाल क्या कर लेगा ...?

लोकपाल के मुद्दे पर देश में अंधी बहस छिड़ चुकी है और मैं समझता हूँ कि इस समस्या की जड का शायद या तो इन लोगों को सम्यक ज्ञान नहीं है अथवा वे इसे स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करने में घबराते हैं | देश में अन्य अपराधियों  के समान भ्रष्टाचारियों  को भी दण्डित करने के लिए अनुसंधान एजेंसी एवं न्यायालय स्थापित हैं | अलबता भ्रष्टाचार के मामलों के लिए अलग से विशेष जांच एजेंसी केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो , भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ,इंटेलीजेंस विभाग , सतर्कता आयोग आदि देश में कार्यरत हैं और इन मामलों के परीक्षण के लिए विशेष न्यायलय भी कार्यरत हैं | भ्रष्टाचार रोक थाम अधिनियम की धारा19 में यह प्रावधान है कि भ्रष्टाचार संबंधिंत किसी भी मामले में सुनवाई में न्यायालय द्वारा  रोक नहीं लगायी जावेगी और हमारा उच्चतम न्यायालय सत्यनारायण शर्मा के मामले में इस प्रावधान को पुष्ट  भी कर चुका है | किन्तु न्यायालयों द्वारा इसकी अनुपालना की वास्तविकता पर मैं कोई टिपण्णी करने की आवश्यकता नहीं समझता हूँ |

यह निर्विवादित तथ्य है कि भ्रष्टाचारियों के मामलों में न तो अनुसन्धान उचित रूप से होता है और न ही न्यायालयों द्वारा उनका परीक्षण कानून सम्मत ढंग से होता है| हमारी सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था भ्रष्टाचार से संक्रमित है| हमारे संविधान निर्माताओं की सबसे बड़ी भूल यह रही है कि उन्होंने न्यायपालिका को देवीय स्थान देकर उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह नहीं बनाया | भ्रष्टाचार के मामले बढ़ने का सीधासा अर्थ यह है कि इन मामलों का अच्छे न्यायधीशों द्वारा अच्छे कानून लागू कर निर्णय नहीं दिया जा रहा है| यदि इन मामलों का अच्छे न्यायधीशों द्वारा निस्तारण किया जाये तो स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सकता है |लोकपाल की आवश्यकता इसलिए अनुभव की जा रही है कि न्यायालयों द्वारा भ्रष्टाचारियों को दण्डित नहीं किया जा रहा है |
एशियाई मानवाधिकार आयोग के शब्दों में भारत में अधिकांश लोक अभियोजक कार्यालय ऐसी दलाली के कार्यालयों की तरह कार्य करते हैं जहाँ पुलिस , बचाव के वकील और लोक अभियोजक के बीच अपवित्र लेनदेन संपन्न होते हैं| जब एक लंबी खरीद फरोख्त के बाद भ्रष्ट राजनेताओं की इच्छा और पसंद के अनुसार राज्य द्वारा अभियोजक नियुक्त किये जाते हों तो इसे बुरा नहीं माना जा  सकता | भारत में न्याय प्रदानगी निकाय की नींव को ही क्षति पहुँच चुकी है |यह निकाय भ्रष्टाचार और अक्षमता की बदबूदार नाली में रेंगता है . जो अधिकारी जन सामान्य के हितों की रक्षा करने के बहाने से कार्य ग्रहण करते हैं वे भी इस गंदी नाली में जहरीले साँपों की तरह जहर छोड़ते हुए  और अपनी शैतानी पूंछ हिलाते हुए  रेंगते हैं व आम नागरिक ,जो मात्र उनकी दया पर आश्रित होते हैं, का उपहास करते हैं |

हमारे यहाँ कानून निर्माण में अंग्रेजी पद्धति का  अनुसरण किया जाता है और हमारी व्यवस्था की भिन्नताओं को ध्यान नहीं रखा जाता है |इस सन्दर्भ में भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि और हमारे सामाजिक–सांस्कृतिक ढांचे पर भी विचार करना समीचीन रहेगा| पाश्चत्य देशों में विवाह व परिवार कोई बंधन या दायित्व नहीं हैं| वहाँ एक औसत व्यक्ति अपने जीवन में ५-६ विवाह करता है और विवाह वहाँ एक आपसी किराये के अनुबंध के समान हैं | सेवानिवृति के बाद पेंशन का प्रावधान इसलिए रखा गया था कि एक लोक सेवक को सेवानिवृति के बाद जीवनयापन की चिंता  नहीं रहे और वह सेवाकाल के दौरान सेवानिवृति के बाद जीवनयापन के लिए भ्रष्ट साधनों से सम्पति संचित करने का प्रयास नहीं करे| हमारी संस्कृति में विवाह और परिवार एक बंधन हैं और एक शक्तिसंपन्न लोकसेवक अपनी आने वाली पीढ़ियों  के लिए सम्पति संचित करना चाहते हैं |


अब यदि लोकपाल बन गया और उनमें उचित अनुसन्धान हो भी गया तो मामलों का परीक्षण तो अंग्रेजी कानून पर आधारित इन न्यायालयों ने ही करना है जो कानूनन किसी के भी प्रति जवाबदेह नहीं हैं| अतः यदि स्वयं न्यायपलिका को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाये तो लोकपाल बनाने का उद्देश्य ही समाप्त जो जायेगा क्योंकि भ्रष्ट न्यायधीशों को अभयदान मिल जायेगा और वे भ्रष्टाचारियों को निस्संकोच दोषमुक्त कर देंगे |

Tuesday, December 13, 2011

कैसा हो लोकपाल कानून?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि इस देश की रग-रग में भ्रष्टाचार समाया हुआ है और भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिये अन्य अनेक बातों के साथ-साथ सख्त कानून की दरकार है, जिसके लिये प्रस्तावित लोकपाल कानून को जरूरी बताया जा रहा है| अब तक की सभी केन्द्र सरकारों द्वारा किसी न किसी बहाने लोकपाल कानून को लटकाकर रखा है, जिसमें कॉंग्रेस भी शामिल है| चूँकि कॉंग्रेस ने सर्वाधिक समय तक देश पर शासन किया है, इस कारण कॉंग्रेस भ्रष्टाचार को पनपाने, रोकथाम नहीं कर पाने और भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों का क्रियान्वयन नहीं करवा पाने और, या लोकपाल कानून को नहीं बनवा पाने के लिये सर्वाधिक जिम्मेदार है| जिससे वह बच नहीं सकती है| यह अलग बात है कि केन्द्र की वर्तमान यूपीए सरकार लोकपाल कानून के बारे में बुरी तरह से फंस चुकी है| जानकारों का मानना है कि केन्द्र सरकार इस बारे में अन्ना हजारे और अन्ना हजारे के पीछे खड़े राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) को इस बात का श्रेय नहीं लेने देना चाहती कि उनके दबाव में लोकपाल कानून बनाया गया है| क्योंकि राजनीति में इस प्रकार के निर्णयों का चुनावों में असर होता है| लेकिन आम जनता को इस बात से क्या लेना देना है? कॉंग्रेस या यूपीए ने ऐसी स्थिति क्यों निर्मित होने दी कि अन्ना, आरएसएस या भाजपा या एनडीए या अन्य विपक्षी दलों को लोकपाल कानून बनवाने का श्रेय मिलने की स्थिति बनी! निश्‍चय ही यह वर्तमान यूपीए और कॉंग्रेस नेतृत्व की राजनैतिक असफलता है| जिसका फायदा दूसरे राजनैतिक उठाना चाहते हैं, तो उनका राजनैतिक अधिकार है| इसमें गलत भी क्या है? अब भी यदि कॉंग्रेस दुविधा से बाहर नहीं निकल पायी तो फिर उसे और यूपीए को होने वाले नुकसान की लम्बे समय तक भरपाई कर पाना सम्भव नहीं होगा| अत: बेहतर यही होगा कि केन्द्र सरकार न मात्र लोकपाल कानून को लाये ही, बल्कि सच्चे अर्थों में लोकपाल कानून बनाकर संसद में पेश करे| जिससे देश और देश की जनता को भ्रष्टाचार, अनाचार और गैर-कानूनी कुकृत्यों से मुक्ति मिल सके|

वर्तमान में इस बात की बहस भी चल रही है कि लोकपाल के दायरे में कौन हो और कौन नहीं हो| निश्‍चय ही यह महत्वपूर्ण और विचारणीय मुद्दा है| जिस पर राष्ट्रीय सोच और राष्ट्रहित के साथ-साथ देश के सभी वर्गों का विशेषकर कमजोर वर्गों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है| अत: प्रस्तावित लोकपाल कानून बनाते समय ध्यान रखा जावे कि-

1. बिना किसी किन्तु-परन्तु के देश का प्रत्येक लोक सेवक लोकपाल के दायरे में आना चाहिये| लोक सेवक के दायरे में छोटे से छोटे जनप्रतिनिधि से लेकर प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति तक हर एक उस व्यक्ति को आना चाहिये जो जनता से संग्रहित धन से वेतन लेता हो या जनता से संग्रहित धन को खर्चे करने के बारे में निर्णय लेने का कानूनी या संवैधानिक अधिकार रखता हो| जिसमें न्यायपालिका और सेना भी शामिल हों|

2. सभी औद्योगिक घराने, गैर-सरकारी संगठन (चाहे सरकारी अनुदान लेते हों या नहीं), सभी गैर-सरकारी शिक्षण या अन्य संस्थान, खेल संघ और ऐसा प्रत्येक सरकारी या गैर सरकारी या निजी निकाय या उपक्रम जिसके पास जनता से किसी भी कारण से किसी भी रूप में धन संग्रहित करने और उसे खर्च करने का हक हो उसे बिना किसी भी किन्तु-परन्तु के प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में होना ही चाहिये|

3. सभी प्रकार की ऐसी जॉंच ऐजेंसियॉं, जिन्हें किसी भी प्रकार के मामले की जॉंच करने का हक हो उन्हें भी प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में होना चाहिये| जिनमें नीचे से ऊपर तक सभी लोक सेवकों की नियुक्ति, पदोन्नति और बर्खास्तगी का अधिकार केवल लोकपाल के पास ही होना चाहिये|

4. प्रस्तावित लोकपाल कानून में भ्रष्टाचार की परिभाषा को विस्तिृत और सुस्पष्ट करने की जरूरत है| जिसमें प्रत्येक ऐसे गैर-कानूनी कृत्य को जिसमें धन, बजट, अनुदान, शुल्क बजट,विज्ञापन, कर आदि को किसी भी प्रकार से धन समावेश हो वह मामला भ्रष्टाचार से सम्बन्धित होने के कारण प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में आना चाहिये| इसके अन्तर्गत समस्त प्रकार का मीडिया, बजट का मनमाना और गैर-कानूनी उपयोग करने वाले लोक सेवकों को शामिल किया जाना बेहद जरूरी है| इससे मीडिया की मनमानी और ब्यूराक्रेसी की भेदभावपूर्ण कुनीतियों पर भी अंकुश लग सकेगा|

5. प्रस्तावित लोकपाल कानून में यह स्पष्ट रूप से व्यवस्था होनी चाहिये कि इसमें देश के सभी सम्प्रदायों और वर्गों को बारी-बारी से अवसर मिलेंगे| इसमें कम से कम 50 फीसदी स्त्रियों सहित, अल्पसंख्यकों, पिछड़ा वर्ग और दलित-आदिवासी वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सशक्त हिस्सेदारी देने की सुनिश्‍चित व्यवस्था भी होनी चाहिये|

6. लोकपाल की औपचारिक नियुक्ति बेशक राष्ट्रपति द्वारा की जावे, लेकिन लोकपाल के चयन का अधिकार किसी भी राजनेता और पूर्व ब्यूरोक्रेट के पास नहीं होना चाहिये| बल्कि लोकपाल का चयन करने के लिये देश के निष्पक्ष कानूनविदों, न्यायविदों और सामाज के निष्पक्ष लोगों के संवैधानिक चयन मण्डल द्वारा होना चाहिये| बाद के चयनों में सेवा निवृत लोकपालों को भी शामिल किया जा सकता है|

7. लोकपाल को हटाने के लिये एक संवैधानिक निकाय होना चाहिये, जिसमें एक भी ऐसा व्यक्ति शामिल नहीं हो, जो लोकपाल के चयन मण्डल में भागीदार रहा हो| लोकपाल के अधीन सभी लोक सेवकों के विरुद्ध देश के हर एक व्यक्ति को कानूनी कार्यवाही प्रारम्भ कराने के लिये न्यायपालिका के समक्ष अर्जी देने का पूर्ण हक दिया जावे|

Saturday, December 3, 2011

लोकपाल क्या कर लेगा ...?

लोकपाल के मुद्दे पर देश में अंधी बहस छिड़ चुकी है और मैं समझता हूँ कि इस समस्या की जड का शायद या तो इन लोगों को सम्यक ज्ञान नहीं है अथवा वे इसे स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करने में घबराते हैं | देश में अन्य अपराधियों  के समान भ्रष्टाचारियों  को भी दण्डित करने के लिए अनुसंधान एजेंसी एवं न्यायालय स्थापित हैं | अलबता भ्रष्टाचार के मामलों के लिए अलग से विशेष जांच एजेंसी केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो , भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ,इंटेलीजेंस विभाग , सतर्कता आयोग आदि देश में कार्यरत हैं और इन मामलों के परीक्षण के लिए विशेष न्यायलय भी कार्यरत हैं | भ्रष्टाचार रोक थाम अधिनियम की धारा19 में यह प्रावधान है कि भ्रष्टाचार संबंधिंत किसी भी मामले में सुनवाई में न्यायालय द्वारा  रोक नहीं लगायी जावेगी और हमारा उच्चतम न्यायालय सत्यनारायण शर्मा के मामले में इस प्रावधान को पुष्ट  भी कर चुका है | किन्तु न्यायालयों द्वारा इसकी अनुपालना की वास्तविकता पर मैं कोई टिपण्णी करने की आवश्यकता नहीं समझता हूँ |

यह निर्विवादित तथ्य है कि भ्रष्टाचारियों के मामलों में न तो अनुसन्धान उचित रूप से होता है और न ही न्यायालयों द्वारा उनका परीक्षण कानून सम्मत ढंग से होता है| हमारी सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था भ्रष्टाचार से संक्रमित है| हमारे संविधान निर्माताओं की सबसे बड़ी भूल यह रही है कि उन्होंने न्यायपालिका को देवीय स्थान देकर उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह नहीं बनाया | भ्रष्टाचार के मामले बढ़ने का सीधासा अर्थ यह है कि इन मामलों का अच्छे न्यायधीशों द्वारा अच्छे कानून लागू कर निर्णय नहीं दिया जा रहा है| यदि इन मामलों का अच्छे न्यायधीशों द्वारा निस्तारण किया जाये तो स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सकता है |लोकपाल की आवश्यकता इसलिए अनुभव की जा रही है कि न्यायालयों द्वारा भ्रष्टाचारियों को दण्डित नहीं किया जा रहा है |
एशियाई मानवाधिकार आयोग के शब्दों में भारत में अधिकांश लोक अभियोजक कार्यालय ऐसी दलाली के कार्यालयों की तरह कार्य करते हैं जहाँ पुलिस , बचाव के वकील और लोक अभियोजक के बीच अपवित्र लेनदेन संपन्न होते हैं| जब एक लंबी खरीद फरोख्त के बाद भ्रष्ट राजनेताओं की इच्छा और पसंद के अनुसार राज्य द्वारा अभियोजक नियुक्त किये जाते हों तो इसे बुरा नहीं माना जा  सकता | भारत में न्याय प्रदानगी निकाय की नींव को ही क्षति पहुँच चुकी है |यह निकाय भ्रष्टाचार और अक्षमता की बदबूदार नाली में रेंगता है . जो अधिकारी जन सामान्य के हितों की रक्षा करने के बहाने से कार्य ग्रहण करते हैं वे भी इस गंदी नाली में जहरीले साँपों की तरह जहर छोड़ते हुए  और अपनी शैतानी पूंछ हिलाते हुए  रेंगते हैं व आम नागरिक ,जो मात्र उनकी दया पर आश्रित होते हैं, का उपहास करते हैं |

हमारे यहाँ कानून निर्माण में अंग्रेजी पद्धति का  अनुसरण किया जाता है और हमारी व्यवस्था की भिन्नताओं को ध्यान नहीं रखा जाता है |इस सन्दर्भ में भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि और हमारे सामाजिक–सांस्कृतिक ढांचे पर भी विचार करना समीचीन रहेगा| पाश्चत्य देशों में विवाह व परिवार कोई बंधन या दायित्व नहीं हैं| वहाँ एक औसत व्यक्ति अपने जीवन में ५-६ विवाह करता है और विवाह वहाँ एक आपसी किराये के अनुबंध के समान हैं | सेवानिवृति के बाद पेंशन का प्रावधान इसलिए रखा गया था कि एक लोक सेवक को सेवानिवृति के बाद जीवनयापन की चिंता  नहीं रहे और वह सेवाकाल के दौरान सेवानिवृति के बाद जीवनयापन के लिए भ्रष्ट साधनों से सम्पति संचित करने का प्रयास नहीं करे| हमारी संस्कृति में विवाह और परिवार एक बंधन हैं और एक शक्तिसंपन्न लोकसेवक अपनी आने वाली पीढ़ियों  के लिए सम्पति संचित करना चाहते हैं |


अब यदि लोकपाल बन गया और उनमें उचित अनुसन्धान हो भी गया तो मामलों का परीक्षण तो अंग्रेजी कानून पर आधारित इन न्यायालयों ने ही करना है जो कानूनन किसी के भी प्रति जवाबदेह नहीं हैं| अतः यदि स्वयं न्यायपलिका को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाये तो लोकपाल बनाने का उद्देश्य ही समाप्त जो जायेगा क्योंकि भ्रष्ट न्यायधीशों को अभयदान मिल जायेगा और वे भ्रष्टाचारियों को निस्संकोच दोषमुक्त कर देंगे |

Monday, November 14, 2011

अन्ना का कंधा, टीम का धंधा!

कनक तिवारी

यह देश के लिए दुखद होगा कि जनलोकपाल आंदोलन को जन-पथ पर चलाते रहने के बदले उसे अंधी गलियों में भटकाया जा रहा है. मुख्य मुद्दा यही है कि भ्रष्टाचार के मुकाबले के लिए एक सशक्त लोकपाल कानून सर्वानुमति से बनाया जाए. भ्रष्टाचार मुट्ठी भर लोगों का यदि षड़यंत्र है तो देश के करोड़ों लोग उसके शिकार.

अन्ना हज़ारे का एक लंबा सार्वजनिक जीवन रहा है. वे महाराष्ट्र की सरहद में रहकर भ्रष्टाचार से बेलाग होकर लड़ते रहे हैं. उस वजह से कांग्रेस, भाजपा और शिवसेना वगैरह के नेताओं की अन्ना से अदावत रही है. यू.पी.ए. की सरकार के बड़े घोटालों के कारण देश भौचक हो गया है. इसके बाद अन्ना और उनकी टीम ने राष्ट्रीय आयाम और महत्व का बेहतर और सकारात्मक आंदोलन किया. अनिच्छुक केन्द्र सरकार को अन्ना के सामने झुकता दिखाया गया. लेकिन हकीकत यह है कि खुद अन्ना की टीम ने उनके अनशन के दौरान अपनी मांगों को इतना लचीला और छोटा बना दिया था कि उससे सहमत होने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं हुई. 

लातीनी अमरीकी देशों के बड़े क्रांतिकारी रेगी देब्रे ने कहा है कि क्रांति की गति वर्तुल या चक्रीय होती है. देब्रे का शायद यह आशय रहा होगा कि क्रांति अपने उफान के बाद अवसान की तरफ जाती भले दिखाई दे, वह दुबारा अपनी रीढ़ की हड्डी पर फिर खड़ी की जा सकती है. 

इसी परिकल्पना को यदि क्षैतिज धरातल पर समझा जाए तो उसी तरह होगा जैसे शांत जल में एक पत्थर फेंक देने से गोल-गोल लहरें उठती हैं लेकिन वे धीरे-धीरे बड़ी होती जाती हैं. यह इतिहास का विपर्यय होगा, यदि भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन की दुर्गति हो जाए, क्योंकि इस आंदोलन को उसकी चक्रीय गति से वंचित होना पड़े. 

आंदोलन के दो विरोधी साफ साफ नज़र आते हैं. एक तो केन्द्र सरकार के मंत्री और कांग्रेस के कुछ बड़बोले प्रवक्ता. लेकिन इसके साथ साथ अन्ना की टीम के चुनिंदा तीन चार बड़े सदस्य एक चंडाल चौकड़ी के रूप में भी उनके आलोचकों द्वारा सफलतापूर्वक प्रचारित किए जा रहे हैं. 

मीडिया ने अन्ना के आंदोलन को बुलंदियों पर पहुंचाया था. अब मीडिया ही यह बता रहा है कि अरविन्द केजरीवाल एक खलनायक हैं. किरण बेदी झूठे यात्रा बिल बनाने का राष्ट्रीय कीर्तिमान बन गई हैं. जयप्रकाश और लोहिया भारत-पाक एकीकरण के स्वप्नशील प्रवक्ता थे. ठीक उसके विपरीत अन्ना टीम के वकील प्रशांत भूषण बकवास करते नज़र आए कि कश्मीर के लोगों को जनमत संग्रह का अधिकार होना चाहिए. 

अन्ना इन सब मुद्दों को लेकर कोप भवन में कैकेयी की तरह मौन व्रत पर चले गए. अन्ना टीम के इन चतुर और वाचाल सिपाहियों ने उन्हें न केवल किसी तरह मना लिया बल्कि अपना दबाव कायम रखा है. एकता परिषद के राजगोपाल, मशहूर पानी विशेषज्ञ राजेन्द्र सिंह, जनलोकपाल प्रारूप समिति के सदस्य न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े, प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, अन्ना टीम के सदस्य कुमार विश्वास और पहले टीम में रहे स्वामी अग्निवेश के बाद अन्ना के ब्लॉगर रहे पुरुलेकर ने भी किनाराकशी कर ली है. अग्निवेश को छोड़कर बाकी के असंतोष की मुनासिब वजहें हैं. 

यह साफ है कि अन्ना गांधीवादी नहीं हैं. उनकी वेशभूषा ग्रामीण बनावट, सहज लहज़ा और सपाटबयानी उनमें गांधी के युग की याद दिलाते हैं. गांधी लेकिन बीच-बीच में वीर शिवाजी की ज़रूरत आज़ादी के आंदोलन में महसूस नहीं करते थे जो अन्ना करते हैं. 

इतिहास ने अन्ना को एक लोकप्रिय आंदोलन का विनम्रतापूर्वक नेतृत्व करने का अवसर दिया है. अन्ना टीम के सदस्य उसे एक युग प्रर्वतक का अवतार समझते हैं जो निहायत गलत है. गांधी को अपने राजनीतिक शत्रुओं अर्थात अंगरेजों तक से नफरत नहीं थी. वे अंगरेज़ियत के खिलाफ थे और अंगरेज़ों द्वारा हिन्दुस्तान पर थोपी गई सड़ी गली राजनीतिक, प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था के. अन्ना के समर्थकों को गांधी की सैद्धान्तिक समझ कहां है. वे संविधान की मौजूदा व्यवस्थाओं के अंदर कुछ पैबंद लगाने को गांधी विचार के वस्त्र बनाना समझते हैं. यह देश और अन्ना का दुर्भाग्य है कि अन्ना विचारक और बुद्धिजीवी नहीं हैं. जो लोग आज़ादी की लड़ाई में जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजा़द और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद वगैरह की बुद्धि के कायल थे, वे अब आश्वस्त हैं कि महात्मा गांधी केवल योद्धा नहीं थे. वे ही सबसे बड़े असाधारण बौद्धिक के रूप मंं रहकर इतिहास के स्थायी भाव हैं. 

अन्ना आंदोलन अब किरण बेदी, प्रशांत भूषण और अरविन्द केजरीवाल के चेहरों को चमकाने की वर्जिश बनकर रह गया है. ये तीनों खुद को अपनी महत्वकांक्षाओं के नागपाश में बंधा पाते होंगे. इन तीनों का सार्वजनिक जीवन सेवा और त्याग का नहीं रहा है. सूचना के अधिकार अधिनियम को लेकर केजरीवाल ने संघर्ष किया है लेकिन अरुणा रॉय ने तो उनसे कहीं ज़्यादा. उनकी पटरी आपस में क्यों नहीं बैठती है. 

प्रशांत भूषण जनहित याचिकाओं के जाने पहचाने वकील हैं लेकिन उनके वकील परिवार की आय के स्त्रोत बार-बार संदेह के घेरे में क्यों आते हैं. नोएडा में भूखंड लेने का मामला तो साफ पाक नहीं ही है. वैसे भी इस परिवार की इंदिरा गांधी के परिवार से राजनीतिक खुन्नस बहुप्रचारित है. 

किरण बेदी पुलिसिया जबान का इस्तेमाल करती एक मर्दाना अफसर ज़्यादा रही हैं. सभी सुविधाओं का लाभ उठाते हुए प्रशासन में नए प्रयोग करना एक अच्छी बात है लेकिन उससे प्रशासक का चेहरा जनसेवक का नहीं बनता. वरिष्ठता में नज़र अंदाज़ होने के कारण उन्होंने पूरी व्यवस्था को चुनौती देने के लिए अन्ना का सहारा लेकर खुद को एक लोकसेवक के रूप में तराशना शुरू किया. 

सिविल सोसायटी के जो सदस्य स्वयंसेवी संगठन चलाकर देश विदेश से करोड़ों रुपयों का चंदा ले सकते हैं, उन्हें जनआंदोलनों का भागीदार समझने में इतिहास को परहेज़ करना चाहिए. 

अन्ना आंदोलन देश की जनता के सपनों को एक तरफ करता हुआ राजनीतिक भड़ास निकालने का शोशा बनता जा रहा है. हिसार की लोकसभा सीट पर कांग्रेस तो वैसे ही फिसड्डी रही है. वहां अन्ना टीम में भाजपा की सांठगांठ से भजनलाल के बेटे को सहयोग किया तब भी वह चैटाला के बेटे से बड़ी मुश्किल से जीता. 

अन्ना एक दिन कहते हैं कि वे किसी पार्टी के खिलाफ प्रचार नहीं करेंगे. दूसरे दिन उनसे कहलाया जाता है कि यदि कांग्रेस ने लोकपाल बिल पास नहीं किया तो कांग्रेस की खुली खिलाफत की जाएगी. बीच-बीच में अन्ना यह भी कहते रहे कि यदि राहुल गांधी ने उनकी बातें मान लीं तो वे राहुल के साथ जनयात्राएं भी करेंगे. 

कोई अन्ना तिकड़ी से पूछे कि क्या चुनावों में वोट एक मुद्दे पर दिए जाते हैं और वह भी बिना किसी भूमिका, इतिहास या जड़ से पैदा हुए अन्ना-वृक्ष पर चढ़ी अमरबेलों के कारण? क्या लोकतंत्र में ऐसे सामयिक मुद्दों को उभारने वाले वाचाल प्रवक्ताओं को समाज विज्ञान का विशेषज्ञ समझा जा सकता है. 

दिग्विजय सिंह की केवल निंदा नहीं की जानी चाहिए. वे अन्ना आंदोलन के रथ का पहिया उठाए अभिमन्यु शैली में नहीं लड़ रहे हैं. दिग्विजय लगातार सैद्धान्तिक हमले कर रहे हैं. इसमें क्या छिपा हुआ है कि अन्ना का सक्रिय समर्थन संघ परिवार कर रहा है. लेकिन संघ परिवार कोई विदेशी शक्ति तो है नहीं. इसलिए उसका समर्थन यदि लिया जाता है तो वह देशद्रोह तो नहीं है. यही वजह है कि देश की तमाम वामपंथी ताकतें अन्ना आंदोलन के साथ नहीं हैं. 

इस देश के मतदाताओं का बहुमत समाजवाद और पंथ निरपेक्षता सहित वामपंथ की ओर झुका हुआ है. डॉ. मनमोहन सिंह की कृपा से देश में गरीब परिवार इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं कि वामपंथ का भविष्य तो उज्जवल है. अन्ना को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि यदि केन्द्र में कोई लूली लंगड़ी गैर कांग्रेसी सरकार कई राजनीतिक पार्टियों की बैसाखी पर चढ़कर आ भी गई तो वह भी अन्ना टीम के जनलोकपाल ड्राफ्ट को पूरी तौर पर स्वीकार नहीं करेगी. अन्ना टीम के वरिष्ठ संविधान सलाहकार शांति भूषण क्या यह गारंटी ले सकते हैं कि यदि उनके पूरे ड्राफ्ट को यदि सरकार मान ले तो उस पर सुप्रीम कोर्ट स्थगन नहीं दे देगा. 

देश में सेवानिवृत्त नौकरशाहों, सेनाध्यक्षों, न्यायाधीशों और अन्य संविधानविदों की कमी नहीं है. उनकी एक विशेषज्ञ समिति बनाकर अन्ना टीम के नामचीन मझोले कद के नेताओं ने सलाह की ज़रूरत क्यों नहीं समझी. मंत्री, नौकरशाह और छोटे कर्मचारी घूस तो खाते हैं और उन्हें सज़ा भी मिलनी चाहिए लेकिन नीरा राडिया, रतन टाटा, अनिल अंबानी, बरखा दत्त, वीर सांघवी, चिदंबरम आदि नामों का क्या किया जाना चाहिए. देश की अमरीका से परमाणु संधि, वहशी निजीकरण और युवकों के भविष्य के लुटेरों के आर्थिक शोषकों को लेकर अन्ना टीम विचारशील क्यों नहीं है. वह केवल निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को खारिज करने और वापिस बुलाने के तिलिस्म से क्यों जूझ रही है? 

फ्रांस की क्रांति के अमर विचारकों वॉल्तेयर और रूसो ने जनता के जनतंत्र और प्रतिनिधिक जनतंत्र में फर्क किया था. अन्ना टीम की निगाह में संसद सार्वभौम नहीं है क्योंकि वह तो निश्चित ही हम भारत के लोग हैं. ऐसी स्थिति में अन्ना के सिपेहसालार भी सिविल सोसायटी नहीं हैं और जनता भी नहीं है. वह भी तो हम भारत के लोग हैं. 

अन्ना टीम का जनलोकपाल विधेयक निश्चित ही एक अच्छा दस्तावेज है, यदि उसमें से कुछ प्रावधान निकाल दिए जाएं. लेकिन क्या अन्ना टीम देश के सामने भ्रष्टाचार की परिभाषा के दायरे को विस्तृत करते हुए देश के अचानक पैदा हुए नव उद्योगपतियों, वैश्वीकरण, तथाकथित आर्थिक उदारवाद और इन सबसे पैदा हो रही विकृतियों का भंडाफोड़ करने का विचार साहस, जोखिम और प्रयोग करना चाहेगी? या वह देश के लाखों सरकारी कर्मचारियों को पकड़ लेने को अपने जीवन का उत्कर्ष मानेगी. स्त्रोत : http://raviwar.com/news/632_anna-hazare-and-team-anna-kanak-tiwari.shtml?utm_source=newsletter&utm_medium=email&utm_campaign=13112011

Thursday, October 20, 2011

केवल एक व्यक्ति को जागरूक करके आप बहुत बड़ी देशसेवा कर सकते हैं!

आज हममें से प्रत्येक व्यक्ति मँहगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त है। हम सभी इन दोनों महादानव के शिकंजे में दिन-ब-दिन फँसते चले जा रहे हैं और हमारा जीवन दिनोंदिन दुःखमय होता चला जा रहा है। अंग्रेजों की गुलामी के समय हम दुःखी तो थे ही पर गुलामी से मुक्ति मिल जाने के बाद भी हम दुःखी ही हैं। गुलामी के समय में हमें गोरे अंग्रेज लूटते थे और अब काले अंग्रेज लूट रहे हैं। हम दुःखमय जीवन सिर्फ इसलिए जी रहे हैं

Wednesday, October 19, 2011

अन्ना हज़ारे और केजरीवाल तानाशाह: राजेंद्र सिंह

टीम अन्ना कोर कमेटी के सदस्य रहे मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह ने बीबीसी से बातचीत में अन्ना हज़ारे और अरविंद केजरीवाल को ‘तानाशाह’ बताया है और कहा है कि आंदोलन दलगत राजनीति की ग़लत दिशा में जा रहा है.