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Wednesday, July 9, 2014

धारा 498-ए : सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बेअसर!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ’निरंकुश’

हमारी बहन-बेटियों को दहेज उत्पीड़न के सामाजिक अभिशाप से कानूनी तरीके से बचाने और दहेज उत्पीड़कों को कठोर सजा दिलाने के मकसद से संसद द्वारा सम्बंधित कानूनी प्रावधानों में संशोधनों के साथ भारतीय दण्ड संहिता में धारा 498-ए जोड़ी गयी थी। मगर किसी भी इकतरफा कठोर कानून की भांति इस कानून का भी प्रारम्भ से ही दुरुपयोग शुरू हो गया। जिसको लेकर कानूनविदों में लगातार विवाद रहा है और इस धारा को समाप्त या संशोधित करने की लगातार मांग की जाती रही है। इस धारा के दुरुपयोग के सम्बन्ध में समय-समय पर अनेक प्रकार की गम्भीर टिप्पणियॉं और विचार सामने आते रहे हैं। जिनमें से कुछ यहॉं प्रस्तुत हैं :-
1. 19 जुलाई, 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए को कानूनी आतंकवाद की संज्ञा दी।
2. 11 जून, 2010 सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के सम्बन्ध में कहा कि पतियों को अपनी स्वतंत्रता को भूल जाना चाहिये।
3. 14 अगस्त, 2010 सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार से भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए में संशोधन करने के लिए कहा।
4. 04 फरवरी, 2010 पंजाब के अम्बाला कोर्ट ने स्वीकारा कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के प्रावधानों का दुरूपयोग हो रहा है।
5. 16 अप्रेल, 2010 बॉम्बे हाई कोर्ट ने और 22 अगस्त, 2010 को बैंगलौर हाई कोर्ट ने भी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के दुरूपयोग की बात को स्वीकारा।
6. केवल यही नहीं, बल्कि 22 अगस्त, 2010 को भारत सरकार ने सभी प्रदेशों की पुलिस को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के प्रावधानों के दुरुपयोग के बारे में चेतावनी दी।
7. विधि आयोग ने अपनी 154 वीं रिपोर्ट में इस बात को साफ शब्दों में स्वीकारा कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के प्रावधानों का दुरूपयोग हो रहा है।
8. नवम्बर, 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 498-ए के आरोप में केवल एफआईआर में नाम लिखवा देने मात्र के आधार पर ही पति-पक्ष के लोगों के विरुद्ध धारा-498-ए के तहत मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिये।
उपरोक्त गंभीर विचारों के होते हुए भी धारा 498-ए भारतीय दंड संहिता में ज्यों की त्यों कायम है इसका दुरुपयोग भी लगातार जारी रहा है। जिसको लेकर देश की सर्वोच्च अदालत अर्थात् सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 02 जुलाई, 2014 को एक बार फिर से अनेक गम्भीर मानी जा रही टिप्पणियों के साथ अपना निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति चंद्रमौलि कुमार प्रसाद की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने अपने निर्णय में मूल रूप से निम्न बातें कही हैं:-
1. दहेज उत्पीड़न विरोधी धारा 498-ए का पत्नियों द्वारा जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है।
2. धारा 498-क में वर्णित अपराध के संज्ञेय और गैर जमानती होने के कारण असंतुष्ट पत्नियां इसे अपने कवच की बजाय अपने पतियों के विरुद्ध हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं।
3. धारा 498-क के तहत गिरफ्तारी व्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने के साथ-साथ, गिरफ्तार व्यक्ति को अपमानित भी करती है और हमेशा के लिए उस पर धब्बा लगाती है।
4. धारा 498-ए वर पक्ष के लोगों को परेशान करने का सबसे आसान तरीका है। पति और उसके रिश्तेदारों को इस प्रावधान के तहत गिरफ्तार कराना बहुत आसान है। अनेक मामलों में पति के अशक्त दादा-दादी, विदेश में दशकों से रहने वाली उनकी बहनों तक को भी गिरफ्तार किया गया है।
5. धारा 498-ए के इस प्रावधान के तहत गिरफ्तार व्यक्तियों में से करीब एक चौथाई पतियों की मां और बहन जैसी महिलायें होती हैं, जिन्हें गिरफ्तारी के जाल में लिया जाता है।
6. धारा 498-ए के मामलों में आरोप पत्र दाखिल करने की दर 93.6 फीसदी तक है, जबकि सजा दिलाने की दर सिर्फ 15 फीसदी है।
7. वैवाहिक विवादों में इजाफा हुआ है। जिससे शादी जैसी संस्था प्रभावित हो रही है।
उपरोक्त कारणों से सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि धारा 498-ए के दुरूपयोग को रोकने के लिये हम सभी राज्य सरकारों को निम्न निर्देश देते हैं :-(सुप्रीम कोर्ट के प्रत्येक निर्देश के सम्बन्ध में इस आलेख के लेखक द्वारा टिप्पणियॉं भी दी गयी हैं।)
1. देश में पुलिस अभी तक ब्रितानी सोच से बाहर नहीं निकली है और गिरफ्तार करने का अधिकार बेहद आकर्षक है। पहले गिरफ्तारी और फिर बाकी कार्यवाही करने का रवैया निन्दनीय है, जिस पर अंकुश लगाना चाहिए। पुलिस अधिकारी के पास तुरंत गिरफ्तारी की शक्ति को भ्रष्टाचार का बड़ा स्रोत है।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् सुप्रीम कोर्ट मानता है कि हमारी पुलिस न तो न्यायप्रिय है और न हीं निष्पक्ष है, बल्कि इसके साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि में पुलिस भ्रष्ट भी है। इसके उपरान्त भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा केवल पुलिस के इस चरित्र की निन्दा करके ही इस गभीर मामले को समाप्त कर दिया गया। पुलिस के चरित्र में सुधार के लिये किसी प्रकार की पुख्ता निगरानी व्यवस्था कायम करने या अन्य किसी भी प्रकार के सुधारात्मक आदेश नहीं दिये गये। जबकि न मात्र धारा 498-ए के सन्दर्भ में बल्कि हर एक मामले पुलिस का न्यायप्रिय तथा निष्पक्ष नहीं होना और साथ ही भ्रष्ट होना आम व्यक्ति के लिए न्याय प्राप्ति में सबसे बड़ी और खतरनाक बाधा है। मगर सुप्रीम कोर्ट कम से कम इस मामले में आश्चर्यजनक रूप से मौन रहा है।
2. सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में आगे निर्देश देते हुए कहा है कि सभी राज्य सरकारें अपने-अपने पुलिस अधिकारियों को हिदायत दें कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत मामला दर्ज होने पर स्वत: ही गिरफ्तारी नहीं करें, बल्कि पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 में प्रदत्त मापदंडों के तहत गिरफ्तारी की आवश्यकता के बारे में खुद को संतुष्ट करें।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् जिस पुलिस को खुद सुप्रीम कोर्ट एक ओर भ्रष्ट मानता है, उसी पुलिस को खुद को ही इस बात की निगरानी रखनी है कि पुलिस के द्वारा कानूनी प्रावधानों का सही से प्रयोग किया जा रहा है या नहीं! क्या यह संभव है?
3. किसी व्यक्ति के खिलाफ पत्नियों द्वारा अपराध करने का आरोप लगाने के आधार पर ही फौरी तौर पर कोई गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। दूरदर्शी और बुद्धिमान पुलिस अधिकारी के लिए उचित होगा कि आरोपों की सच्चाई की थोड़ी बहुत जांच के बाद उचित तरीके से संतुष्ट हुए बगैर कोई गिरफ्तारी नहीं की जाये।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् यहॉं पर भी सुप्रीम कोर्ट की नजर में दूरदर्शी और बुद्धिमान पुलिस को ही स्वयं ही, स्वयं पर निगरानी रखनी है। पुलिस को भ्रष्ट करार देने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट को किसी बाहरी ऐजेंसी से पुलिस की निगरानी करवाने की जरूरत प्रतीत नहीं हुई।
4. पुलिस स्वत: ही आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकती और उसे गिरफ्तार करने की वजह बतानी होगी और ऐसी वजहों की न्यायिक समीक्षा की जायेगी। पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार करने की जरूरत के बारे में मजिस्ट्रेट के समक्ष गिरफ्तारी के कारण और उनके समर्थन में सामग्री पेश करनी होगी। क्योंकि पतियों को गिरफ्तार करने का कानूनी अधिकार एक बात है और इसके इस्तेमाल को पुलिस द्वारा न्यायोचित ठहराना दूसरी बात है। गिरफ्तार करने के अधिकार के साथ ही पुलिस अधिकारी ऐसा करने को कारणों के साथ न्यायोचित ठहराने योग्य होना चाहिए।
लेखक की टिप्पणी : यहॉं पर सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश के बारे में दो बातें गौर करने वाली हैं। प्रथम तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश में ये बात साफ नहीं है कि धारा 498-ए के तहत मुकदमा दर्ज होने के बाद आरोपियों को गिरफ्तार करने से पूर्व मजिस्ट्रेट के समक्ष गिरफ्तारी के आधारों को पुलिस की ओर से सिद्ध करना होगा या गिरफ्तारी के बाद में मजिस्ट्रेट के पूछने पर सिद्ध करना होगा। दूसरे जिन मजिस्ट्रटों की अदालत से राष्ट्रपति तक के खिलाफ आसानी से गिरफ्तारी वारण्ट जारी करवाये जा सकते हैं और जो अदालतें मुकदमों के भार से इस कदर दबी बड़ी हैं कि उनके पास वर्षों तक तारीख बदलने के अलावा लोगों की सुनवाई करने तक का समय नहीं है, उन अदालतों से ये अपेक्षा किया जाना कि पुलिस द्वारा अरोपियों को गिरफ्तारी करने से पूर्व अपनी अन्वेषण डायरी में जो कारण लिखें हैं, वे कितने न्यायोचित या सही या उचित हैं, कहॉं तक व्यावहारिक होगा?
5. जिन किन्हीं मामलों में 7 साल तक की सजा हो सकती है, उनमें गिरफ्तारी सिर्फ इस कयास के आधार पर नहीं की जा सकती कि आरोपी ने वह अपराध किया होगा। गिरफ्तारी तभी की जाए, जब इस बात के पर्याप्त सबूत हों कि आरोपी के आजाद रहने से मामले की जांच प्रभावित हो सकती है और वह कोई और क्राइम कर सकता है या फरार हो सकता है।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी उक्त आदेश को पूर्व में भी अनेकों बार दोहराया जाता रहा है, लेकिन पुलिस द्वारा लगातार और बिना किसी प्रकार की परवाह किये इस प्रावधान का और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हर दिन उल्लंघन किया जाता रहा है। जिसका मूल कारण है, इस कानून का उल्लंघन करने वाले एक भी पुलिस लोक सेवक को आज तक किसी प्रकार की सजा नहीं दिया जाना। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक बार फिर से दोहराये गये इस आदेश का क्या हाल होगा, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है!

ये तो हुई बात सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय की उक्त टिप्पणियों तथा निर्देशों की, लेकिन जमीनी हकीकत इतनी भयावह है कि धारा 498-ए के कहर से निर्दोष पीड़ितों को मुक्ति दिलाने के लिये इससे भी कहीं आगे बढकर किसी भी संवैधानिक संस्था को विचार कर निर्णय करना होगा, क्योंकि फौरी उपचारों से इस क्रूर व्यवस्था से निर्दोष पतियों को न्याय नहीं मिल सकता है। अत: मेरी नजर में इसके बारे में कुछ व्यवहारिक और कानूनी मुद्दे विचारार्थ प्रस्तुत हैं :-
1. पति-पत्नी के बीच किसी सामान्य या असामान्य विवाद के कारण यदि पत्नी की ओर से भावावेश में या अपने पीहर के लोगों के दबाव या बहकावे में आकर धारा 498-ए के तहत एक बार पति के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा देने के बाद इसमें समझौता करने का कानूनी प्रावधान नहीं हैं!
ऐसे हालातों में इस कानूनी व्यवस्था के तहत एक बार मुकदमा अर्थात् एफआईआर दर्ज करवाने के बाद वर पक्ष को मुकदमें का सामना करने के अलावा, विवाद के समाधान का अन्य कोई रास्ता ही नहीं बचता है। इसलिये यदि हम वास्तव में ही विवाह और परिवार नाम की सामाजिक संस्थाओं को बचाने के प्रति गम्भीर हैं तो हमें इस मामले में मुकदमे को वापस लेने या किसी भी स्तर पर समझौता करने का कानूनी प्रावधान करना होगा। अन्यथा वर्तमान हालातों में मुकदमा सिद्ध नहीं होने पर, मुकदमा दायर करने वाली पत्नी के विरुद्ध झूठा मुकदमा दायर करने के अपराध में स्वत: आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की कानूनी व्यवस्था किया जाना प्राकृतिक न्याय की मांग है, क्योंकि स्वयं सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि 85 फीसदी मामलों में धारा 498-ए के आरोप सिद्ध ही नहीं हो पाते हैं। इस स्थिति से कैसे निपटा जाये और झूठे आरोप लगाने वाली पत्नियों के साथ क्या सलूक किया जाना चाहिए, इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पूरी तरह से मौन है। जो दु:खद है!
2. वरपक्ष के जिस किसी भी सदस्य का, वधुपक्ष की ओर से धारा 498-ए के तहत एफआईआर में नाम लिखवा दिया जाता है, उन सभी सदस्यों को बिना ये जाने कि उन्होंने कोई अपराध किया भी है या नहीं उनकी गिरफ्तारी करना पुलिस अपना परमकर्त्तव्य समझती रही है! 
मेरी राय में उक्त हालातों के लिये मूल में दो बड़े कारण हैं-

पहला तो यह कि धारा 498-ए के मामले में साक्ष्य अधिनियम के प्रावधान न्यायशास्त्र के उस मौलिक सिद्धान्त का सरेआम उल्लंघन करते हैं, जिसके अनुसार आरोप लगाने के बाद आरोपों को सही सिद्ध करने का दायित्व अभियोजन या वादी पक्ष पर नहीं डालकर आरोपी पर डालता है और कहता कि आरोपी अपने आपको निर्दोष सिद्ध करे। जिसके चलते पुलिस को इस बात से कोई लेना-देना नहीं रहता कि कोर्ट से यदि कोई आरोपी छूट भी जाता है तो इसके बारे में उससे कोई सवाल-जवाब किये जाने की समस्या होगी।

दूसरा बड़ा कारण यह है कि ऐसे मामलों में पुलिस को अपना रौद्र रूप दिखाने का पूरा अवसर मिलता है और सारी दुनिया जानती है कि रौद्र रूप दिखाते ही सामने वाला निरीह प्राणी थर-थर कांपने लगता है! पुलिस व्यवस्था तो वैसे ही अंग्रेजी राज्य के जमाने की अमानवीय परम्पराओं और कानूनों पर आधारित है! जहॉं पर पुलिस को लोगों की रक्षक बनाने के बजाय, लोगों को डंडा मारने वाली ताकत के रूप में जाना और पहचाना जाता है! ऐसे में यदि कानून ये कहता हो कि 498-ए में किसी को भी बन्द कर दो, यह चिन्ता कतई मत करो कि वह निर्दोष है या नहीं! क्योंकि पकड़े गये व्यक्ति को खुद को ही सिद्ध करना होगा कि वह दोषी नहीं, निर्दोष है। अर्थात् अरोपी को अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने के लिये स्वयं ही साक्ष्य जुटाने होंगे। ऐसे में पुलिस को पति-पक्ष के लोगों का तेल निकालने का पूरा-पूरा मौका मिल जाता है।

इसलिये जरूरी है कि संसारभर में मान्यता प्राप्त न्यायशास्त्र के इस सिद्धान्ता को धारा 498-ए के मामले में भी लागू किया जाना चाहिये कि आरोप लगाने वाली पत्नियॉं इस बात के लिये जिम्मेदार हों कि उनकी ओर से लगाये गये आरोप पुख्ता तथा सही हैं और मंगठन्थ नहीं हैं। जिन्हें न्यायालय के समक्ष कानूनी प्रक्रिया के तहत सिद्ध करना उनका कानूनी दायित्व है। जब तक इस प्रावधान को नहीं बदला जाता है, तब तक गिरफ्तारी को पारदर्शी बनाने की औपचारिकता मात्र से कुछ भी नहीं होने वाला है।
3. अनेक बार तो खुद पुलिस एफआईआर को फड़वाकर, अपनी सलाह पर पत्नीपक्ष के लोगों से ऐसी एफआईआर लिखवाती है, जिसमें पति-पक्ष के सभी छोटे बड़े लोगों के नाम लिखे जाते हैं। जिनमें-पति, सास, सास की सास, ननद-ननदोई, श्‍वसुर, श्‍वसुर के पिता, जेठ-जेठानियॉं, देवर-देवरानिया, जेठ-जेठानियों और देवर-देवरानिया के पुत्र-पुत्रियों तक के नाम लिखवाये जाते हैं। अनेक मामलों में तो भानजे-भानजियों तक के नाम घसीटे जाते हैं।
पुलिस ऐसा इसलिये करती है, क्योंकि जब इतने सारे लोगों के नाम आरोपी के रूप में एफआईआर में लिखवाये जाते हैं तो उनको गिरफ्तार करके या गिरफ्तारी का भय दिखाकर आरोपियों से अच्छी-खायी रिश्‍वत वसूलना आसान हो जाता है (जिसे स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकारा है) और अपनी तथाकथित जॉंच के दौरान ऐसे आलतू-फालतू-झूठे नामों को रिश्‍वत लेकर मुकदमे से हटा दिया जाता है। जिससे अदालत को भी अहसास कराने का नाटक किया जाता है कि पुलिस कितनी सही जॉंच करती है कि पहली ही नजर में निर्दोष दिखने वालों के नाम हटा दिये गये हैं। ऐसे में इस बात का भी कानूनी प्रावधान किया जाना जरूरी है कि यदि इस बात की पुष्टि किसी भी स्तर पर हो जाती है कि धारा 498-ए के मामले में किसी व्यक्ति का असत्य नाम लिखवाया गया है तो उसी स्तर पर एफआईआर लिखवाने वाली के विरुद्ध मुकदमा दायर किया जाकर कार्यवाही की जावे।

इस प्रकार हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि न मात्र धारा 498-ए के मामलों में बल्कि जिन किन्हीं भी मामलों या प्रावधानों में कानून का दुरुपयोग हो रहा है, वहॉं पर किसी प्राभावी संवैधानिक संस्था को लगातार सतर्क और विवेकपूर्ण निगरानी रखनी चाहिये, जिससे कि ऐसे मामलों में धारा 498-ए की जैसी स्थिति निर्मित ही नहीं होने पाये। क्योंकि आज धारा 498-ए के मामले में सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों के बाद भी इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं दिख रहा है, बल्कि कुछ लोगों का तो यहॉं तक कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के कारण दहेज उत्पीड़कों के हौंसले बढेंगे, जिससे पत्नियों पर अत्याचार बढ सकते हैं। फिर भी मेरा साफ तौर पर मानना है कि जब तक इस कानून में से आरोपी के ऊपर स्वयं अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने का भार है, तब तक पति-पक्ष के निर्दोष लोगों के ऊपर होने वाले अन्याय को रोक पाना या उन्हें न्याय प्रदान करना वर्तमान व्यवस्था में असम्भव है, क्योंकि धारा 498-ए के मामले में साक्ष्य अधिनियम के प्रावधान न्याय का गला घोंटने वाले, अप्राकृतिक और अन्यायपूर्ण हैं! अत: धारा 498-ए के कहर से निर्दोष पतियों को बचाने में सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान निर्णय भी बेअसर ही सिद्ध होना है!
मोबाइल नं. : 098750-66111

Wednesday, December 18, 2013

पूर्व जस्टिस गांगुली मामले में कानून का मजाक उड़ाया जा रहा है!

पूर्व जस्टिस गांगुली मामले में कानून का मजाक उड़ाया जा रहा है!

इस अत्यन्त अम्भीर और संवेदनशील मामले को सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ सभी दलों के राजनेताओं, महिला संगठनों और मीडिया द्वारा जितने हल्के से लिया जा रहा है, वह अपने आप में घोर आश्‍चर्य का विषय है! सच तो ये है कि हर ओर सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक अवमानना का भय व्याप्त है, इस कारण कोई भी खुलकर बोलने या सच को कहने, लिखने या दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। इसलिये इस बारे में कुछ कानूनी और व्यवस्थागत पहलुओं पर को जानने और समझने के बाद विचार करने की जरूरत है।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस ए. के. गांगुली ने अपने अधीन इंटर्नशिप कर रही कानून की एक छात्रा का यौन शोषण किया। ये आरोप छात्रा ने सोशल मीडिया के माध्यम से लगाया, क्योंकि इस हादसे से उबरने में उसे एक वर्ष से अधिक समय लग गया। इस मामले की जॉंच करके सुप्रीम कोर्ट के जजों की कमैटी ने पहली नजर में छात्रा के आरोपों को सही माना और पूर्व जस्टिस एवं पश्‍चिम बंगाल के राज्य मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष ए. के. गांगुली को यौन शोषण के लिये आरोपी माना है, लेकिन साथ ही साथ सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में किसी भी प्रकार की कार्यवाही करने से ये कहकर असमर्थता प्रकट की है कि वर्तमान में पूर्व जस्टिस गांगुली सेवानिवृत्त हो चुके हैं और कानून की छात्रा भी वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के अधीन इंटर्नशिप नहीं कर रही है। इसलिये सुप्रीम कोर्ट की ओर से किसी प्रकार की कार्यवाही करने का सवाल नहीं है। दूसरी ओर इस मामले में कुछ राजनेताओं की ओर से पूर्व जस्टिस गांगुली से पश्‍चिम बंगाल के राज्य मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से तुरन्त त्यागपत्र मांगा जा रहा है।

इस अत्यन्त अम्भीर और संवेदनशील मामले को सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ सभी दलों के राजनेताओं, महिला संगठनों और मीडिया द्वारा जितने हल्के से लिया जा रहा है, वह अपने आप में घोर आश्‍चर्य का विषय है! सच तो ये है कि हर ओर सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक अवमानना का भय व्याप्त है, इस कारण कोई भी खुलकर बोलने या सच को कहने, लिखने या दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। इसलिये इस बारे में कुछ कानूनी और व्यवस्थागत पहलुओं पर को जानने और समझने के बाद विचार करने की जरूरत है।

सबसे पहले तो हर आम-ओ-खास को इस बात को समझना जरूरी है कि लोक सेवकों के विरुद्ध कार्यवाही कैसे की जाती है? सरकार के किसी भी विभाग या कार्यालय में कार्यरत किसी भी लोक सेवक के भ्रष्ट या अनैतिक आचरण या अनुशासनहीनता के मामले में दो प्रकार की कार्यवाही की जा सकती हैं-प्रथम विभागीय और दूसरी अदालती। इसी प्रकार से सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी अपने अधीन कार्य करने वाले लोक सेवकों, जिनमें जज भी शामिल हैं के विरुद्ध भी उक्त दो प्रकार की कार्यवाही की जा सकती हैं।

इसे एक उदाहरण के जरिये अच्छे से समझा जा सकता है। माना कि एक लोक सेवक अपने साथ कार्य करने वाले किसी लोक सेवक की पिटाई कर देता है तो इस आरोप के लिये उसके विभाग की ओर से उसके खिलाफ विभागीय अनुशासनिक कार्यवाही तो की ही जाती है। साथ ही साथ यदि विभाग प्रमुख चाहे तो मारपीट की सूचना पुलिस को देकर पुलिस थाने में एफआईआर भी दर्ज करवा सकता है या खुद पीड़ित लोक सेवक पुलिस थाने में उपस्थित होकर रिपोर्ट दर्ज करवा सकता है।

आमतौर पर लोक सेवको के मामले में दूसरे प्रकार की कार्यवाही नहीं होती है। मामले को विभागीय स्तर पर ही निपटा दिया जाता है या ये कहना अधिक उपयुक्त होगा कि विभागीय स्तर पर ही रफादफा कर दिया जाता है। इसी कारण से लोक सेवकों के होंसले बुलन्द हैं और वे कुछ भी कुकर्म करने से नहीं चूकते हैं। इस प्रकार के बहुत से लोक सेवक आरोपी एवं अपराधी होते हुए भी स-सम्मान नौकरी करते हुए जनता के धन को बर्बाद करने और लूटते को स्वतन्त्र हैं।

यहॉं यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि लोक सेवकों के विरुद्ध ऐसे किसी अनैतिक आचरण या अनुशासनहीनता के मामले में सेवानिवृति के बाद भी विभागीय कार्यवाही संस्थित की जा सकती है, जो ऐसे लोक सेवक द्वारा सेवानिवृति से पूर्व किया गया था। जैसा कि पूर्व जस्टिस गांगुली के मामले में हुआ है। यदि मामला सामने आने में अधिक समय गुजर गया हो तो विभागीय कार्यवाही शुरू करने से पूर्व राष्ट्रपति की मंजूरी की जरूरत होती है।

इस बात को पूर्व जस्टिस गांगुली के मामले में समझने की जरूरत है। चूंकि पूर्व जस्टिस गांगुली सेवानिवृत हो चुके हैं और उनके विरुद्ध लगाया गया आरोप उस समय का है, जब वे लोक सेवक के रूप में सुप्रीम कोर्ट में जज के रूप में सेवारत थे। साथ ही यह भी प्रमाणित है कि उस समय उनके अधीन पीड़ित कानून की छात्रा इंटर्नशिप कर रही थी।

इसलिये पूर्व जस्टिस गांगुली के मामले में पहले दिन से ही उक्त दोनों प्रकार की कार्यवाही संस्थित करना सम्भव रहा है। इसी श्रृंखला में और इसी मकसद से सुप्रीम कोर्ट द्वारा विभागीय कार्यवाही के करने से पूर्व की जाने वाली प्राथमिक जॉंच के रूप में एक विभागीय जॉंच कमैटी बनाकर मामले की प्रारम्भिक जॉंच करवायी गयी और उस जॉंच में पाया गया कि पूर्व जस्टिस गांगुली पृथमदृष्टया यौन शोषण के आरोपी हैं। यहॉं पर ये बात भी समझने की है कि उक्त कमैटी की जॉंच का निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट का विभागीय कार्य है न कि न्यायिक कार्य। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के विभागीय कार्य और न्यायिक कार्यों को मसझने में आमतौर पर भारी भूल हो जाती है।

अब दूसरा सवाल ये उठता है कि सुप्रीम कोर्ट का विभागीय स्तर पर प्राथमिक जॉंच करवाने के बाद ये कहना है कि चूंकि अब पूर्व जस्टिस गांगुली उनके अधीन सेवारत नहीं हैं और कानून की पीड़ित छात्रा भी इंटर्नशिप करके जा चुकी है। अत: सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व जस्टिस गांगुली के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्यवाही नहीं की जा सकती है। इसका आशय है कि पूर्व जस्टिस गांगुली के विरुद्ध सुप्रीम कार्ट द्वारा किसी भी प्रकार की विभागीय जॉंच या अनुशासनिक कार्यवाही नहीं की जा सकती है।

जबकि जैसा कि पूर्व में लिखा गया है सेवानिवृति के बाद भी विभागीय जॉंच और अनुशासनिक कार्यवाही की जा सकती है। जिसके लिये अनेक मामलों में स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने अपनी न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए अनेक पूर्व लोक सेवको के विरुद्ध विभागीय जॉंच करने के आदेश दिये हैं। ऐसे मामलों में सेवानिवृत लोक सेवकों की पेंशन तक रोकी जा सकती है। मगर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी विभागीय शक्तियों का उपयोग करते हुए पूर्व जस्टिस गांगुली के खिलाफ कोई कार्यवाही करने से ये कह कर इनकार कर दिया कि वर्तमान में पूर्व जस्टिस ए. के. गांगुली सुप्रीम कोर्ट का हिस्सा नहीं हैं अर्थात् उनके अधीन सेवारत नहीं हैं।

ऐसे में इसी से जुड़ा दूसरा सवाल यह भी उठना स्वाभाविक है कि यदि पूर्व जस्टिस गांगुली के सेवानिवृत हो जाने के कारण उनके विरुद्ध विभागीय जॉंच या अनुशासनिक कार्यवाही करना सुप्रीम कार्ट के विभागीय अनुशासनिक जॉंच के अधिकार के दायरे में नहीं है तो फिर सुप्रीम कार्ट ने पूर्व जस्टिस गांगुली के विरुद्ध पीड़ित की ओर से लगाये गये आरोपों की जॉंच के लिये जजों की विभागीय जॉंच कमैटी किस अधिकार से और किस मकसद को पूरा करने के लिये बनाई थी?

इसके अलावा ये न्यायिक सवाल भी उठता है कि सुप्रीम कार्ट के पास असीमित न्यायिक शक्तियॉं हैं, जिनका उपयोग करके सुप्रीम कोर्ट संविधान की रक्षा करने के साथ-साथ हर एक क्षेत्र में न्याय की स्थापना करने के लिये कार्य करने को सशक्त है। ऐसे में इस मामले में पीड़ित लड़की को न्याय दिलाने की खातिर सुप्रीम कोर्ट द्वारा कमैटी की रिपोर्ट मिलते ही पूर्व जस्टिस गांगुली के खिलाफ दिल्ली पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश क्यों नहीं दिये गये?

मामला केवल यहीं खतम नहीं हो जाता है, बल्कि इसके और भी अनेक पहलु हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट के जजों की जॉंच कमैटी ने पूर्व जस्टिस गांगुली को अपनी जॉंच में निर्दोष पाया होता तो क्या होता? जबकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार पूर्व जस्टिस गांगुली के खिलाफ उसे कोई कार्यवाही करने का अधिकार नहीं है, फिर उसकी कमैटी द्वारा पूर्व जस्टिस गांगुली को निर्दोष ठहराये जाने के बाद कानूनी स्थिति क्या होती?

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के रवैये से यदि पीड़िता की ओर से पुलिस में रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई गयी होती या पुलिस जॉंच में हिस्सा नहीं लिया होता तो क्या इस मामले को इसी स्तर पर समाप्त मान लिया जाना चाहिये था? जबकि तहलका के पूर्व प्रमुख सम्पादक तरुण तेजपाल के मामले में गोवा पुलिस द्वारा स्वयं संज्ञान लेकर मामला दर्ज किया गया और अब तरुण तेजपाल कानून के शिकंजे में है। ऐसे में दिल्ली पुलिस तत्काल पूर्व जस्टिस गांगुली के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता के तहत रिपोर्ट दर्ज कर कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं करनी चाहिये थी?

इस मामले से जुड़े हुए और भी अनेक मुद्दे हैं, जैसे यदि पूर्व जस्टिस गांगुली को सुप्रीम कोर्ट की जॉंच कमैटी में निर्दोष पाया जाता और पीड़िता पुलिस में रिपोर्ट करवाती तो सबसे पहले तो इसी जॉंच के आधार पर पुलिस रिपोर्ट ही दर्ज नहीं करती और यदि अदालती कार्यवाही के जरिये रिपोर्ट दर्ज हो भी जाती तो पुलिस सुप्रीम कोर्ट की कमैटी के निर्णय के विरुद्ध जाकर पूर्व जस्टिस गांगुली को आरोपी बनाकर गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। बाद में मामला यदि कोर्ट में जाता तो विचारण करने वाला जज भी सुप्रीम कोर्ट की कमैटी की जॉंच के प्रभाव से मुक्त हुए बिना निष्पक्ष विचारण कर पाता, इस बात की आशा नहीं की जा सकती? इसलिये यहॉं ये तथ्य भी विचार योग्य है कि सर्वोच्च न्यायिक कोर्ट के किसी लोक सेवक के विरुद्ध प्राथमिक जॉंच सुप्रीम कोर्ट की कमैटी द्वारा किया जाना न्याय की राह में रोड़ा तो नहीं!

इसलिये सुप्रीम कोर्ट की ओर से खुद से इस बात को भी साफ किया जाना जरूरी है कि उसकी ओर से करवायी गयी जॉंच न्यायिक कार्यवाही का नहीं, बल्कि विभागीय कार्यवाही का हिस्सा है। जिससे पुलिस, मीडिया में और नागरिकों में किसी प्रकार का भ्रम पैदा नहीं होने पाये।

अब चूंकि पूर्व जस्टिस गांगुली सुप्रीम कोर्ट की विभागीय जॉंच कमैटी की जॉंच में पहली नजर में कानून की छात्रा का यौन शोषण करने के आरोपी हैं। यही नहीं पीड़िता ने भी अपने बयानों में उसके साथ पूर्व जज द्वारा किये गये यौन शोषण की पुष्टि कर दी है, लेकिन इस सबके उपरान्त भी एक ओर तो विभागीय कार्यवाही करने से सुप्रीम कोर्ट ने असमर्थता प्रकट कर दी है। दूसरी ओर कोई भी राजनैतिक दल खुलकर पूर्व जज को गिरफ्तार करने की बात नहीं कह रहा है। महिला नेत्री और भाजपा की कद्दावर लीडर सुसमा स्वराज भी केवल इतनी सी मांग कर रही हैं कि गांगुली को पश्‍चिम बंगाल के राज्य मानव अधिकार के पद से तत्काल त्यागपत्र दे देना चाहिये। जबकि अन्य दल इस पर भी खुलकर कुछ नहीं कह रहे हैं।

अत: पूर्व जस्टिस गांगुली के खिलाफ दिल्ली पुलिस को तत्काल रिपोर्ट दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार किये जाने की जरूरत है। यही नहीं पीड़ित छात्रा को भी थोड़ा और साहस दिखाकर पुलिस जॉंच में पूरा-पूरा सहयोग करना चाहिये, जिससे कि समाज के सामने एक बड़ा उदाहरण कायम हो सके और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस गांगुली यदि आरोपी पाये जाते हैं तो उनको कानून के समक्ष दोषी ठहराकर जेल की हवा खाने को विवश किया जा सके।

इस मामले को मीडिया द्वारा अधिक साहसपूर्वक कदम उठाने की जरूरत है और पूर्व जस्टिस गांगुली को कम से कम अपने वर्तमान पद से तो बिना मांगे ही बहुत पहले ही त्यागपत्र दे देना चाहिये था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया है, इसलिये सरकार को उन्हें हटाने के लिये तत्काल कानूनी कार्यवाही करनी चाहिये।-18.12.13

-लेखक, जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार पत्र ‘प्रेसपालिका’ के प्रकाशक एवं सम्पादक हैं। दाम्पत्य सलाहकार और होम्योपैथ चिकित्सक हैं। लेखक को पत्रकारिता व लेखन क्षेत्र में योगदान के लिये अनेक राष्ट्रीय सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है। इसके अलावा लेखक 21 राज्यों में सेवारत प्रतिष्ठित संगठन ‘‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)’’ के मुख्य संस्थापक तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और ‘‘जर्नलिस्ट्स, मीडिया एवं राइटर्स वैलफेयर एशोसिएशन’’ के भी नेशनल चेयरमैन हैं।-09828502666

Saturday, October 26, 2013

दूसरी बीवी को गुजारा भत्ता, सुप्रीम कोर्ट का बहुपत्नीवादी निर्णय

अधिकतर स्त्रियों को वास्तव में इस बात का ज्ञान होता है कि वे जिस पुरुष से विवाह रचाने जा रही हैं, वह पहले से ही विवाहित है और उसकी पत्नी जिन्दा है। फिर भी वे एक निर्दोष स्त्री के वैवाहिक अधिकारों का बलात्कार करते हुए एक विवाहित पुरुष को अपना पति मान लेती हैं या उसके साथ कुछ किन्तु-परन्तुओं के साथ विवाह रचा लेती हैं। जब आपस में बिगाड़ हो जाता है तो अदालत में आरोप लगाया जाता है कि उसके पति ने खुद को अविवाहित बताकर उसके साथ विवाह किया था। अब ऐसी औरतों को सुप्रीम कोर्ट के उक्त निणर्य के अनुसार गुजारा भत्ता देय होगा।
इस प्रकार के न्यायिक निर्णय वास्तव में स्त्रियों के हित में नहीं हैं, बल्कि ये निर्णय स्त्रियों के दूरगामी भविष्य के लिये चिन्ताजनक हैं। जिन पर समय रहते गम्भीरता से चिन्तन करने की जरूरत है। क्योंकि इन सभी निर्णयों में पुरुषवादी सोच परिलक्षित होती है, जो स्त्री को बेचारी दर्शाते हुए परोक्ष रूप से पुरुष की आदिकाल से बहुपत्नीवादी मानसिकता को मान्यता प्रदान करने की ओर अग्रसर हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’  

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 की नयी और लीक से हकटकर व्याख्या करते हुए, 21 अक्टूबर, 2013 को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि बेशक किसी पुरुष ने पहली पत्नी के जीवित रहते हुए, दूसरा विवाह किया हो, परन्तु यदि ऐसा विवाह दूसरी पत्नी को धोखे में रखकर किया गया है तो पहली पत्नी के जीवित होते हुए, दूसरी पत्नी को अपने धोखबाज पति से गुजारा भत्ता पाने का कानूनी हक है।

मोटे तौर पर देखें तो यह निर्णय महिलाओं के हित में है और साथ ही साथ उन पुरुषों के लिये चेतावनी और सबक है, जो अपनी पहली पत्नी के जीवित होते हुए और, या उससे बिना तलाक लिये अन्य स्त्री से दगाबाजी करके दूसरा विवाह रचा लेते हैं। ऐसे पुरुषों को अब अपनी पहली पत्नी और परिवार का पालन पोषण करते हुए दूसरी पत्नी को गुजारा भत्ता भी अदा करना होगा। इस मामले की मीडिया में कहीं कोई विशेष चर्चा नहीं हुई है, जबकि मेरा मत है कि यह निर्णय कई मायनों में चर्चा योग्य है।

सबसे पहली बात तो यह है कि इस प्रकार के मामलों में अभी तक धोखे से दूसरा विवाह रचाने के मामलों में दूसरी पत्नी को कानूनी तौर पर पत्नी का दर्जा नहीं मिलता था। उसे वैध पत्नी नहीं माना जाता था, बेशक उसकी सन्तानों को अवश्य वैध सन्तान माना जाता था। इस कारण से दूसरा विवाह रचाने वाली पत्नी को जीवन भर विवाह के रिश्ते को एक बोझ की तरह से ढोना पड़ता था और ऐसी स्त्रियॉं आम तौर पर अपने परिजनों या दूसरे पति की मेहरबानी पर ही जीवकापार्जन करने को मजबूर होती रही हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद हालतों में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। विशेषकर उन पत्नियों के मामलों में जिन्हें धोखे में रखकर दूसरा विवाह रचाया गया था।

दूसरी बात विचार योग्य यह है कि इस निर्णय के बाद क्या अदालतों में ऐसे मुकदमों की बाढ नहीं आ जायेगी, जिनमें विवाहित पुरुष से दूसरा विवाह रचाने वाले स्त्रियों से उनके पति का यदि किसी कारण से अलगाव हो जाता है, तो उनकी दूसरी पत्नी की ओर से अदालत में येनकेन प्रकारेण यह प्रमाणित किया जायेगा कि दूसरा विवाह धोखे में रखकर ही किया गया था। इस कारण ऐसी पीड़ित पत्नी को गुजारा भत्ता प्रदान किया जाये।

तीसरी विचार योग्य बात यह है कि विवाहित पुरुषों से दूसरा विवाह रचाने वाली अधिकतर स्त्रियों को वास्तव में इस बात का ज्ञान होता है कि वे जिस पुरुष से विवाह रचाने जा रही हैं, वह पहले से ही विवाहित है और उसकी पत्नी जिन्दा है। फिर भी वे एक निर्दोष स्त्री के वैवाहिक अधिकारों का बलात्कार करते हुए एक विवाहित पुरुष को अपना पति मान लेती हैं या उसके साथ कुछ किन्तु-परन्तुओं के साथ विवाह रचा लेती हैं। जब आपस में बिगाड़ हो जाता है तो अदालत में आरोप लगाया जाता है कि उसके पति ने खुद को अविवाहित बताकर उसके साथ विवाह किया था। अब ऐसी औरतों को सुप्रीम कोर्ट के उक्त निणर्य के अनुसार गुजारा भत्ता देय होगा।

चौथी बात इस मामले में मेरी नजर में सबसे महत्वपूर्ण है और वह यह है कि धोखे से दूसरा विवाह रचाने वाले पुरुष से दूसरी पत्नी को गुजारा भत्ता दिलाकर अदालत ने दूसरा विवाह रचाने वाली स्त्री के साथ तो न्याय करने का नया रास्ता निकाला है, लेकिन इस निर्णय के कारण जब गुजारा भत्ता नियमित रूप से दिया जायेगा, तो इसके परिणामस्वरूप विवाहिता पत्नी और उसके वैध बच्चों के समानजनक जीवकोपार्जन पर जो नकारात्मक आर्थिक असर होगा। उनकी शिक्षा-दीक्षा पर जो कुप्रभाव पड़ेगा, क्या वह न्यायोचित और विधि सम्मत है? इस सवाल के समाधन के बारे में इस निर्णय में जिक्र नहीं किया गया है, लेकिन न्यायपालिका को इसका जवाब तलाशना होगा। क्योंकि दूसरा विवाह रचाने वाले पुरुष की गलती की सजा, उसके परिवार के लोगों को क्यों भुगतनी पड़े? इस बात पर कोर्ट के साथ-साथ हम समाज के लोगों को भी विचार करना होगा। अन्यथा तो विवाहिता पत्नी और उसके बच्चों के लिये ऐसे मामलों में जीवनभर के लिये बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी होने वाली है।

केवल यही नहीं सुप्रीम कोर्ट के इस प्रकार के निर्णय परोक्ष रूप से बहुपत्नी प्रथा को भी स्वीकृति प्रदान करते नजर आ रहे हैं। इससे पूर्व भी एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट दो पत्नियों को एक पति की सरकारी सेवा में मृत्यु के बाद मिलने वाले लाभों और अनुकम्पा नियुक्ति में आपसी सहमति से कानूनी हक प्रदान करने का निर्णय सुना चुका है। जिसके बारे में मैंने एक आलेख लिखा था-‘‘दोनों बीवी राजी तो क्या करेगा काजी?’’ जिसे अन्तरजाल पर अनेक न्यूज पोर्टलों पर पढा जा सकता है।

मेरा ऐसा मानना है कि इस प्रकार के न्यायिक निर्णय वास्तव में स्त्रियों के हित में नहीं हैं, बल्कि ये निर्णय स्त्रियों के दूरगामी भविष्य के लिये चिन्ताजनक हैं। जिन पर समय रहते गम्भीरता से चिन्तन करने की जरूरत है। क्योंकि इन सभी निर्णयों में पुरुषवादी सोच परिलक्षित होती है, जो स्त्री को बेचारी दर्शाते हुए परोक्ष रूप से पुरुष की आदिकाल से बहुपत्नीवादी मानसिकता को मान्यता प्रदान करने की ओर अग्रसर हैं।

अन्त में यह ओर कि ऐसे मामलों में जहां किसी पुरुष द्वारा पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह रचाया गया है, वहां दूसरी पत्नी को जीवन भर गुजारा भत्ता प्रदान करके वैधानिक परिवार को आर्थिक मुसीबतों में डालने के बजाय दोषी पुरुष के विरुद्ध कड़ी दण्डात्मक कार्यवाही की जानी चाहिये और धोखे की शिकार ऐसी स्त्रियों के गुजारे के लिये अन्य वैकल्पिक रास्ते खोजने की जरूरत है। जिनमें सरकार की ओर से पेंशन आदि विकल्प विचारणीय हो सकते हैं।-09828502666

Monday, August 12, 2013

दुर्गा शक्ति के बहाने ताकतवर होती आईएएस लॉबी

"हमें हजारों सालों से एक ही बात सिखायी गयी है कि उच्च वर्ग और शासक वर्ग कभी गलत नहीं होता, उसे कभी बड़ी सजा नहीं दी जा सकती और छोटे लोग या निम्न वर्ग सेवा करने, सजा पाने और देश के कानून को तथा सत्ताधारियों व सत्ता के दलालों के हर आदेश को मानने के लिये पैदा हुए हैं।" "ये मनोभाव आज भी इस देश के लोगों के अवचेतन में विद्यमान है और यही रुग्ण मानसिकता, अनेक प्रकार के शोषण एवं विभेद के लिये जिम्मेदार है। जब तक इस मानसिकता को पैदा करने वाले कारकों को शक्ति से नहीं बदला जायेगा दुर्गा शक्ति नागपाल जैसियों के बहाने आईएएस अधिक ताकतवर होते रहेंगे और कमजोर वर्ग शोषण का शिकार होता रहेगा।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा युवा आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित कर दिये जाने के मुद्दे को कॉर्पोरेट तथा धनाढ्य वर्ग के चंगुल में कैद मीडिया द्वारा जमकर उछाला गया है। इस मुद्दे के बहाने मीडिया व हितबद्ध लोगों द्वारा तरह-तरह की चर्चाएँ और परिचर्चाएँ आयोजित और सम्पन्न करवायी गयी। प्रिंट और सोसल मीडिया पर कई सौ आलेख इस विषय पर लिखे जा चुके हैं। इस मुद्दे को प्रचारित करने का आधार ये बताया जा रहा है कि दुर्गा शक्ति नागपाल नाम की ये निलम्बित आईएएस ईमानदार बतायी जाती हैं और इन्होंने कथित रूप से माफिया से टक्कर लेने की कौशिश की। जबकि उत्तर प्रदेश की सरकार का पक्ष है कि रमजान के पवित्र महिने में इस्लाम के अनुयाईयों की ओर से किये जा रहे मस्जिद की निर्माण में व्यवधान डालने का प्रयास करके दुर्गा शक्ति नागपाल ने कथित रूप से सामाजिक सौहार्द और शान्ति को भंग करने का प्रयास किया।

इस मुद्दे को जहॉं एक ओर तो देश की आईएएस लॉबी ने अपनी आन-बान और शान से जोड़ दिया है, वहीं दूसरी और इस देश की संस्कृति, ईमानदारी, चाल, चरित्र और सभी सामाजिक मूल्यों की ठेकेदारी करने वाली सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक ताकतों ने इसे इस प्रकार से उछालने का प्रयास किया है, मानो दुर्गा शक्ति नागपाल के निलम्बन से आसमान टूट पड़ा हो और मानो इससे देश का सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और ईमानदारी का ढांचा ही बिखर जायेगा। इन ताकतों का मानना है कि इस देश के प्रबुद्ध वर्ग का नेतृत्व आईएएस करता है और वही देश को सही दिशा दे सकता है। इसलिये हर हाल में आईएएस का सम्मान होना चाहिये और आईएएस चाहे कुछ भी करे, उसे स्थानान्तरित किये जाने से बड़ी कोई सजा दी ही नहीं जानी चाहिये।

अन्यथा क्या कारण है कि गुजरात के आईपीएस संजीव भट्ट के साथ कोई क्यों खड़ा नहीं हुआ और प्रतिदिन कई सौ छोटे कर्मचारी कठोर श्रम करने के बाद भी अपनी ईमानदारी और संविधान के प्रति निष्ठा के चलते हुए भी आईएएस और पीएसएसी अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किये जा रहे हैं, लेकिन उनके साथ कोई खड़ा नहीं होता है। उनके साथ होने वाला अन्याय कोई अन्याय नहीं और दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित किया जाना देशभर में इस प्रकार से चर्चा का विषय बना दिया गया है, मानो दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ कोई भयंकर अमानवीय दुर्व्यवहार या दुर्घटना हो गयी है।

स्वयं सुप्रीम कोर्ट अनेक बार कहा चुका है कि "निलम्बन कोई सजा नहीं है। अत: निलम्बन को चुनौती नहीं दी जा सकती।" हॉं ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट के ऐसे निर्णय उन छोटे कर्मचारियों को राहत नहीं देते हुए सुनाये जाते रहे हैं, जिनमें राज्य लोक सेवा आयोग और संघ लोक सेवा आयोग के उत्पाद महामानव, महान विभूतियों द्वारा मनमाने तरीके से छोटे कर्मचारियों का निलम्बन किया जाता रहा है, ऐसे में दुर्गा शक्ति नागपाल के मामले में आने वाले समय में स्वयं सुप्रीम कोर्ट भी मीडिया की भॉंति अपना नया "विपरीत रुख" अपना ले तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट हड़ताल करने को असंवैधानिक घोषित करने के बाद भी ओबीसी वर्ग को संविधान में वर्णित सामाजिक न्याय की अवधारणा के अनुसार उच्च शिक्षण संस्थानों में, ओबीसी की जनसंख्या से बहुत कम फीसदी आरक्षण दिये जाने के सरकारी आदेश के विरुद्ध, उच्च वर्ग के डॉक्टरों द्वारा विरोध स्वरूप, गैर कानूनी तरीके से की गयी हड़ताल को, सुप्रीम कोर्ट अपने पिछले आदेश की अनदेखी करते हुए न मात्र संवैधानिक ठहरा चुका है, बल्कि केन्द्र सरकार को निर्देश भी दे चुका है कि हड़ताली डॉक्टरों को हड़ताल की अवधि का वेतन दिया जावे।

ऐसे में "आईएएस अधिकारी का निलम्बन भी सुप्रीम कोर्ट को सजा नजर आ जाये तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये!" जिसका सबसे बड़ा कारण यही है कि "हमें हजारों सालों से एक ही बात सिखायी गयी है कि उच्च वर्ग और शासक वर्ग कभी गलत नहीं होता, उसे कभी बड़ी सजा नहीं दी जा सकती और छोटे लोग या निम्न वर्ग सेवा करने, सजा पाने और देश के कानून को तथा सत्ताधारियों व सत्ता के दलालों के हर आदेश को मानने के लिये पैदा हुए हैं।" "ये मनोभाव आज भी इस देश के लोगों के अवचेतन में विद्यमान है और यही रुग्ण मानसिकता, अनेक प्रकार के शोषण एवं विभेद के लिये जिम्मेदार है। जब तक इस मानसिकता को पैदा करने वाले कारकों को शक्ति से नहीं बदला जायेगा दुर्गा शक्ति नागपाल जैसियों के बहाने आईएएस अधिक ताकतवर होते रहेंगे और कमजोर वर्ग शोषण का शिकार होता रहेगा।

Monday, February 25, 2013

मेहतर जाति की मुक्ति कैसे सम्भव है?


एक अलिखित कानून बन गया कि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने के लिये भंगी जाति के लोगों ने ही जन्म लिया है। अन्य किसी भी सरकारी नौकरी में आरक्षित वर्ग के लोगों की किसी त्रुटिवश एक फीसदी भी या एक भी अभ्यर्थी के अधिक नियुक्ति हो जाने पर मनुवादियों द्वारा तत्काल हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया जाता है और झट से मनुवादी संरक्षक न्यायाधीशों द्वारा ऐसे मामलों में संज्ञान ले लिया जाता है। कुछ मामले तो ऐसे भी हैं, जहॉं पर मनुवादी न्यायाधीशों द्वारा स्वयं ही संज्ञान लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक ऐसे निर्णय दिये हैं, जो संविधान की मूल भावना और आरक्षित वर्ग के लिये जरूर सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत हैं। जिन्हें अनेक बार संसद ने निरस्त किया है। इसके उपरान्त भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है और आज तक न तो रुका है और न हीं रुकने वाला है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

हजारों सालों से सबकी गंदगी की सफाई करने वाली जाति को मनुवादियों ने अनेकानेक घृणित नाम दिये हैं। जैसे-मेहतर, भंगी, शूद्र और आजकल स्वीपर कहा जाता। जिसे ढोंगी महात्मा मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी ने हरिजन कहा, जबकि गॉंधी इस बात से वाकिफ था कि गुजरात में जिसके मॉं-बाप का पता नहीं होता है, ऐसी नाजायज औलादों को हरिजन कहा जाता है। 

इस जाति के लोगों की दशा समाज में निम्नतम दर्जे की है। सबसे घृणित कार्य यही भंगी कहलाने वाली जाति के लोगों द्वारा किये जाते हैं। आजादी के बाद भी इन्हें अछूत से छूत बनाने के लिये किसी भी सरकार की ओर से कोई रचनात्मक कदम नहीं उठाया गया। अलबत्ता शुरुआत में नगर निगमों, नगरपालिकाओं और सभी स्थानीय निकायों में घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई के लिये इन्हीं लोगों को सरकार द्वारा नियोजित किया जाने लगा। ये कहा जाये तो अनुचित नहीं होगा कि इन सभी घृणित समझे जाने वाले सफाई कार्यों में शतप्रतिशत इसी जाति के लोगों को नियुक्तियॉं दी जाने लगी।

इसके चलते एक अलिखित कानून बन गया कि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने के लिये भंगी जाति के लोगों ने ही जन्म लिया है। अन्य किसी भी सरकारी नौकरी में आरक्षित वर्ग के लोगों की किसी त्रुटिवश एक फीसदी भी या एक भी अभ्यर्थी के अधिक नियुक्ति हो जाने पर मनुवादियों द्वारा तत्काल हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया जाता है और झट से मनुवादी संरक्षक न्यायाधीशों द्वारा ऐसे मामलों में संज्ञान ले लिया जाता है। कुछ मामले तो ऐसे भी हैं, जहॉं पर मनुवादी न्यायाधीशों द्वारा स्वयं ही संज्ञान लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक ऐसे निर्णय दिये हैं, जो संविधान की मूल भावना और आरक्षित वर्ग के लिये जरूर सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत हैं। जिन्हें अनेक बार संसद ने निरस्त किया है। इसके उपरान्त भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है और आज तक न तो रुका है और न हीं रुकने वाला है।

जबकि इसके विपरीत घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने वाले कर्मचारियों में शतप्रतिशत केवल और भंगी जाति के लोगों की ही नियुक्ति की जाती है, लेकिन इसे आज तक न तो किसी मनुवादी ने अदालत में चुनौती दी और न ही इस देश की कथित न्यायप्रिय न्यायपालिका ने स्वयं संज्ञान लेकर भारत सरकार से नोटिस जारी करके सवाल पूछा कि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने वाले कर्मचारियों में एक ही भंगी जाति के ही लोगों को क्यों नियुक्त किया जाता रहा है? अन्य और उच्च जाति के लोगों को इस कार्य में क्यों नियुक्तियॉं नहीं दी जाती हैं?

केवल यही नहीं पिछले दो दशक से तो इस असंवैधानिक व्यवस्था से पीछा छुड़ाने के लिये सरकारी, अर्द्ध-सरकारी और निजी क्षेत्र में एक नायाब तरीका निकाल लिया है-सफाई कार्य ठेके पर दिये जा रहे हैं। ठेके उच्च जाति के लोगों द्वारा लिये जाते हैं, जबकि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने वालों में शतप्रतिशत केवल और केवल उसी भंगी/मेहतर जाति के लोगों को मनमानी शर्तों पर नियुक्त किया जाता है। इस चालाकीपूर्ण व्यवस्था में मोटी कमाई ठेकेदारों की होती है, जो सफाईकर्मियों से 10 से 12 घण्टे काम लेते हैं और मजदूरी के नाम पर तीन से चार हजार रुपये महावार वेतन देते हैं। उनका खुला शोषण होता है, कोई साप्ताहिक विश्राम तक नहीं दिया जाता है।

जबकि होना तो ये चाहिये कि सरकार या जिन किन्हीं निकायों या उपक्रमों या संस्थानों द्वारा ठेकेदारी पर कोई भी कार्य करवाया जाता है तो ठेके की शर्तों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिये कि जिस कार्य के लिये सरकार द्वारा अपने कर्मियों को जो वेतन दिया जाता है, उससे कम वेतन ठेकेदार द्वारा नहीं दिया जायेगा। यदि इतनी सी बात का ठेके की शर्तों में उल्लेख कर दिया जाये तो सभी क्षेत्र के कर्मियों का शोषण स्वत: रुक सकेगा और देश में मजदूरों को हड़ताल करने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा। इसी कारण पिछले दिनों मजदूरों ने देशव्यापी हड़ताल की थी, लेकिन ये जानकर मुझे आश्‍चर्य हुआ कि किसी भी मजदूर संगठन द्वारा ये मांग नहीं उठायी गयी कि जिस काम के लिये सरकार 20 हजार महावार वेतन देती है, उसी कार्य के लिये ठेकेदार 4 हजार में करवाता है, इस बात को रोकने के लिये सरकार ठेके की शर्तों में संशोधन क्यों नहीं करती है?

हमारे देश की व्यवस्था में सुधार के अनेक प्रयास हो रहे हैं, लेकिन मेहतर जाति के उत्थान के लिये कोई पुख्ता या कारगर कदम नहीं उठाये जा रहे हैं। जिसके चलते आज भी आऊट सोर्सिंग के जरिये घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई इसी जाति के लोगों से नाम-मात्र की मजदूरी पर करवाये जा रहे हैं।

यहॉं पर मैं इस बात का उल्लेख करना भी जरूरी समझता हूँ कि मेहतर/भंगी जाति के लोगों में आपसी सामाजिक एकता का अभाव होने के कारण भी उनका सारे देश में सरकार और ठेकेदारों द्वारा सरेआम इस प्रकार से शोषण किया जा रहा है। अन्यथा जिस दिन इस जाति के लोगों द्वारा सामाजिक रूप से एक होकर ये कड़ा निर्णय ले लिया जायेगा कि वे घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई का कार्य अपनी शर्तों पर ही करेंगे, उसी दिन, बल्कि उसी क्षण इन्हें पचास हजार रुपये मासिक मजदूरी देने को भी सरकार और सफाई ऐजेंसियों को मजबूर होना पड़ेगा। बस एक दृढ और कड़ा निर्णय लेने की जरूरत है।

Friday, August 24, 2012

पी. चिदम्बरम को बदनाम करने का मुआवजा क्या?


  1. अब इस न्यायिक परिदृश्य में सबसे बड़ा और न्यायसंगत सवाल ये है कि पी. चिदम्बरम जो देश के एक सम्मानित मंत्री हैं और देश के वरिष्ठ राजनेता भी हैं, उनके ऊपर लगातार व्यक्तिगत आक्षेप करने वाले राजनैतिक दलों, व्यक्तियों और संगठनों की ओर से लम्बे समय तक जो सुनियोजित अभियान चलाया गया और उनकी छवि को नुकसान पहुँचाया, संसद का समय और धन बर्बाद किया गया, उसकी भरपाई किस प्रकार से होगी?
  2. अनेक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस प्रकार की याचिकाओं को निरस्त करते समय याची पर जुर्माना लगाते रहे हैं। जिसका मकसद निराधार और प्रचार के मकसद से दायर याचिकाओं को हतोत्साहित करना बताया जाता रहा है। इस मामले में स्वामी और एक संगठन की ओर से दायर याचिका को निरस्त करते समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ताओं के विरद्ध कठोर रुख नहीं अपनाया जाना, फिर से ऐसे ही लोगों को अन्य किसी व्यक्ति को बदनाम करने के लिये उकसाने के समान ही है।
  3. राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे को कठघरे में खड़ा करने के लिये राजस्थान के सरकार ने एक आयोग का गठन किया गया। जिसका मकसद कथित रूप से पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान किये गये भ्रष्टाचार और घोटालों की जॉंच करना था। आयोग पर जनता का करोड़ों रुपया खर्च किया गया। आयोग द्वारा अनेक विभागों की फाइलों को जब्त किया गया। जिससे आम लोगों को भी भारी परेशानी का समाना करना पड़ा। अन्त में कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को इस प्रकार का आयोग गठित करने का कानूनी अधिकार ही नहीं था और आयोग के गठन को अवैधानिक करार दे दिया गया।


डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
विवादास्पद 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन प्रकरण में वित्त मंत्री पी चिदंबरम की भूमिका की जॉंच को लेकर दायर याचिका को यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया कि पी. चिदम्बरम के खिलाफ कोई आपराधिका मामला नहीं बनता है। इसीलिये इस बारे में किसी भी प्रकार की जॉंच की कोई जरूरत नहीं है।

पी. चिदम्बर की वित्तमंत्री की हैसियत से संदिग्ध भूमिका की जॉंच के लिये जनता पार्टी के स्वयंभू अध्यक्ष सुब्रहमण्यम स्वामी और एक गैर सरकारी संगठन सेन्टर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटीगेशंस की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गयी थी। यह मामला पूर्व में निचली अदालत द्वारा भी निरस्त किया जा चुका था। जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा गया था कि चिदम्बरम की भूमिका की निष्पक्ष जॉंच होनी चाहिये। इसके अतिरिक्त संसद में प्रतिपक्ष की ओर से भी इस मामले को लम्बे समय से लगातार उठाया जाता रहा है। चिदम्बरम को फिर से वित्तमंत्री बनाये जाने को भी इसी कारण से सवालों के कटघरे में रखा गया।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जी. एस. सिंघवी और न्यायमूर्ति के एस. राधाद्भष्णन की खंडपीठ ने जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रहमण्यम स्वामी और गैर सरकारी संगठन सेन्टर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटीगेशंस की याचिकाओं की स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए साफ शब्दों में निर्णीत किया है कि पी. चिदम्बरम की वित्तमंत्री के रूप में भूमिका को लेकर किसी प्रकार की जॉंच की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि उनके ऊपर किसी प्रकार का कोई मामला बन ही नहीं रहा है। इसके विपरीत सुब्रहमण्यम स्वामी ने इस याचिका में पी. चिदम्बरम के मामले में निचली अदालत के निर्णय को चुनौती दी थी। जिसमें निचली अदालत ने 2जी स्पेक्ट्रम प्रकरण में चिदम्बरम को अभियुक्त बनाने से इंकार करते हुए कहा था कि चिदम्बरम किसी प्रकार की आपराधिक साजिश में शामिल नहीं थे।

अब इस न्यायिक परिदृश्य में सबसे बड़ा और न्यायसंगत सवाल ये है कि पी. चिदम्बरम जो देश के एक सम्मानित मंत्री हैं और देश के वरिष्ठ राजनेता भी हैं, उनके ऊपर लगातार व्यक्तिगत आक्षेप करने वाले राजनैतिक दलों, व्यक्तियों और संगठनों की ओर से लम्बे समय तक जो सुनियोजित अभियान चलाया गया और उनकी छवि को नुकसान पहुँचाया, संसद का समय और धन बर्बाद किया गया, उसकी भरपाई किस प्रकार से होगी?

अनेक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस प्रकार की याचिकाओं को निरस्त करते समय याची पर जुर्माना लगाते रहे हैं। जिसका मकसद निराधार और प्रचार के मकसद से दायर याचिकाओं को हतोत्साहित करना बताया जाता रहा है। इस मामले में स्वामी और एक संगठन की ओर से दायर याचिका को निरस्त करते समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ताओं के विरद्ध कठोर रुख नहीं अपनाया जाना, फिर से ऐसे ही लोगों को अन्य किसी व्यक्ति को बदनाम करने के लिये उकसाने के समान ही है। किसी भी व्यक्ति को राजनैतिक कारणों से कानून के शिकंजे में फंसाना या उसे बदनाम करने का प्रयास करना, एक प्रकार से न्यायपालिका और कानून का दुरुपयोग ही है, जिसकी सजा होनी ही चाहिये। इसके साथ-साथ आहत व्यक्ति तथा देश के खजाने को हुए नुकसान की भरपायी के लिये इसके बदले में मुआवजा भी दिया जाना निहायत जरूरी है। जो उन लोगों, संगठनों और राजनैतिक दलों से वसूला जाना चाहिये, जिनकी ओर से आमतौर पर ऐसा देखने में आता है कि इस प्रकार के निराधार अभियान सुनियोजित षड़यन्त्र और दुराशय के तहत ही चलाये जाते हैं।

पाठकों को याद होगा कि राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे को कठघरे में खड़ा करने के लिये राजस्थान के सरकार ने एक आयोग का गठन किया गया। जिसका मकसद कथित रूप से पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान किये गये भ्रष्टाचार और घोटालों की जॉंच करना था। आयोग पर जनता का करोड़ों रुपया खर्च किया गया। आयोग द्वारा अनेक विभागों की फाइलों को जब्त किया गया। जिससे आम लोगों को भी भारी परेशानी का समाना करना पड़ा। अन्त में कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को इस प्रकार का आयोग गठित करने का कानूनी अधिकार ही नहीं था और आयोग के गठन को अवैधानिक करार दे दिया गया। इस अवैधानिक आयोग के गैर-कानूनी रूप से अस्तित्व में रहने तक वसुन्धरा राजे और पिछली भाजपा सरकार के ऊपर जमकर कीचड़ उछाला गया और आयोग के समाप्त होने के बाद सारे आरोप और कथित भ्रष्टाचार के आरोप तथा आरोप लगाने वाले आश्‍चर्यजनक रूप से चुप्पी साध गये। 

ऐसे मामलों में आहम व्यक्ति तथा देश को मुआवजा नहीं दिये जाने तक इस प्रकार के दुराशयपूर्ण षड़यन्त्र चलते ही रहेंगे। ऐसे मामलों में परम्परागत मीडिया तो बिक जाता है। ऐसे में सोशियल मीडिया को इस प्रकार के मामलों में पुरजोर आवाज उठानी चाहिये। जिससे जतना को मूर्ख बनाने वालों, अपने राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने वालों और देश के लोगों से एकत्रित राजस्व को नुकसान पहुँचाने वालों को सबक सिखाया जा सके। 

Sunday, November 20, 2011

विदेशों से केवल तकनीक ही नहीं, इंसाफ करना भी सीखें!

प्रेसपालिका न्यूज ब्यूरो

भारत में विदेशी वस्तुओं और तकनीक को अपनाने वालों की अच्छी खासी तादाद है| विदेशी सामग्री को अपनाने के प्रति हर आम-ओ-खास में शर्म नहीं, बल्कि गर्व का भाव है| इस प्रकार से आजादी के समय में विदेशी कपड़ों की होली जलाने का भाव अब भारत में ध्वस्त हो चुका है| अब तो स्वदेशी की बात करने वाले और संत महात्मा भी आधुनिक सुविधा सम्पन्न जीवन शैली एवं वातानुकूलित संयन्त्रों में जीवन जीने के आदी हो चुके हैं| ऐसे में यह बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि आज वैश्‍विक अर्थव्यवस्था तथा अन्तरजाल (इंटरनैट) के युग में केवल भारत की विरासत और सोच को ही सर्वश्रेष्ठ कहने वालों को अब अपनी परम्परागत सोच पर पुनिर्विचार करके खुले दिमाग और उदारता से सोचने की जरूरत है, जिससे कि हम संसार के किसी भी कोने में अपनायी जाने वाली अच्छी बातों और नियमों को देश में खुशी-खुशी अपना सकें|

आज की कड़वी सच्चाई यह है कि केवल हम ही नहीं, बल्कि सारा संसार विकसित देशों का पिछलग्गू बना हुआ है| जिसका कारण विकसित देशों की जीवन शैली है, लेकिन हमारा मानना है कि किसी भी बात को आँख बन्द करके अपनाने की जरूरत नहीं है, बल्कि जो बात, जो सोच और जो विचार हमारे देश के लोगों के जीवन को बदलने वाले हों, उन्हें मानने, स्वीकरने और अपनाने में कोई आपत्ति या झिझक नहीं होनी चाहिये| जैसे कि हम कम्प्यूटर तकनीक को हर क्षेत्र में अपना रहे हैं, जिससे जीवन में क्रान्तिकारी बदलाव आये हैं| जो काम व्यक्तियों का बहुत बड़ा समूह सालों में भी नहीं कर पाता, उसी कार्य को कम्प्यूटर तकनीक के जरिये कुछ पलों में पूर्ण शुद्धता (एक्यूरेसी) से आसानी किया जा सकता है| ऐसे में हमारे जीवन और व्यवस्था से जुड़ी अन्य बातों को भी हमें सहजता और उदारता से अपनाने की जरूरत है|

इसी प्रसंग में संयुक्त राज्य अमेरिका की न्यायिक व्यवस्था के एक उदाहरण के जरिये भारत की न्यायिक व्यवस्था में बदलाव के लिये यहॉं एक विचार प्रस्तुत किया जा रहा है| जिस पर भारत के न्यायविदों, नीति नियन्ताओं और विधि-निर्माताओं को विचार करने की जरूरत है| इसके साथ-साथ आम लोगों को भी इस प्रकार के मामलों पर अपनी राय को अपने जनप्रतिनिधियों के जरिये संसद तथा विधानसभाओं तक पहुँचाने की भी सख्त जरूरत है|

यहॉं सबसे पहले यह बतलाना जरूरी है कि अमेरिका में हर एक राज्य का संविधान और सुप्रीम कोर्ट अलग होते हैं| जो प्रत्येक राज्य की विशाल और स्थानीय सभी जरूरतों तथा आशाओं को सही अर्थों में पूर्ण करते हैं| प्रस्तुत मामले में अमेरिका के मिस्सिस्सिपी राज्य के सुप्रीम कोर्ट ने मिस्सिस्सिपी राज्य के न्यायिक निष्पादन आयोग बनाम जस्टिस टेरेसा ब्राउन डीयरमैन मामले में सुनाये गये निर्णय दिनांक 13.04.2011 के कुछ तथ्य पाठकों के चिन्तन और विचारार्थ प्रस्तुत हैं|

मिस्सिस्सिपी राज्य के न्यायिक निष्पादन आयोग ने वहॉं के सुप्रीम कोर्ट की जज डीयरमैन के विरुद्ध दिनांक 19.01.2011 को औपचारिक शिकायत दर्ज करवाई| डीयरमैन पर आरोप लगाया कि उन्होंने जजों के लिये लागू आचार संहिता के निम्न सिद्धांतों का उल्लंघन किया :-

(1) न्यायिक निष्ठा को संरक्षित करने के आचरण के उच्च मानकों को स्थापित करने, बनाये रखने और लागू करना|

(2) जज द्वारा हमेशा इस प्रकार कार्य करना कि उससे न्यायपालिका की निष्ठा व निष्पक्षता में जन विश्वास बढे|

(3) जज द्वारा अपने पद की साख को अन्य व्यक्ति के हित साधन के लिए उपयोग में नहीं लाना|

(4) जज द्वारा कानून का विश्‍वासपूर्वक पालना करना और व्यक्तिगत हितों के लिए कार्य करने से दूर रहना|

उपरोक्त सिद्धान्तों का उल्लंघन करके वहॉं के एक कोर्ट की जज डीयरमैन ने प्रथम न्यायिक फ्लोरिडा जिला सर्किट न्यायालय के जज लिंडा एल नोबल्स को दिनांक 05.11.2010 को एक टेलीफोन किया और अपने एक पुराने मित्र के पक्ष में सिफारिश करके उसे जमानत पर छोड़ने के लिये संदेश छोड़ा| यद्यपि उक्त फोन संदेश से पूर्व ही मामले की सुनवाई हो चुकी थी, जिससे जिला कोर्ट के निर्णय पर संदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन जस्टिस डीयरमैन के विरुद्ध आरोप लगाये गये, जिन्हें स्वयं डीयरमैन ने भी स्वीकार कर लिया| डीयरमैन का आचरण मिस्सिस्सिपी राज्य के संविधान की धारा 177 ए के अंतर्गत भी दंडनीय होने के कारण और आचरण संहिता के उल्लंघन का आरोप लगने के बाद जस्टिस डीयरमैन स्वयं को सार्वजनिक रूप से प्रता़ड़ित किये जाने और 100 डॉलर (5000 रुपये) तक के खर्चे के दंडादेश को भुगतने के लिए भी स्वेच्छा से सहमत हो गयी| इसके बाद वहॉं के राज्य के सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस डीयरमैन को दोषी मानते हुए तीस दिन के लिए अवैतनिक निलंबन, सार्वजनिक प्रताड़ना और 100 डॉलर खर्चे का दण्डादेश जारी किया गया|

इसके विपरीत भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा उत्तर प्रदेश न्यायिक अधिकारी संघ (1994 एससीसी 686) के मामले में सुनाये गये निर्णय में किसी भी जज के विरुद्ध मुख्य न्यायाधीश की अनुमति के बिना मामला दर्ज करने तक पर कानूनी प्रतिबन्ध लगा रखा है और भारत में तकरीबन सभी न्यायालयों द्वारा अमेरिका के उक्त मामले जैसे मामलों को तुच्छ मानते हुए कोई संज्ञान तक नहीं लिया जाता है| यह भारतीय न्याय व्यवस्था के लिये घोर चिंता और आम लोगों तथा संसद के लिये विचार का विषय है|

तथ्य संग्रह : मनीराम शर्मा, एडवोकट, लेखन एवं सम्पादन : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

Tuesday, September 27, 2011

आरोप, अभियोग और महाअभियोग

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

अनुशासनहीनता करने या कानून का उल्लंघन करने पर लोक सेवकों के विरुद्ध आरोप लगाये जाते हैं, अभियोग चलाये जाते हैं और दोष सिद्ध होने पर उन्हें दण्डित भी किया जाता है, लेकिन लोक सेवक की परिभाषा में शामिल होने के उपरान्त भी हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ आमतौर पर न तो

Thursday, September 8, 2011

सुप्रीम कोर्ट में दो करोड़ 39 लाख मेडीकल खर्च का रिकॉर्ड ही नहीं?

सूचना अधिकार कानून के तहत हुआ खुलासा
सुप्रीम कोर्ट में दो करोड़ 39 लाख मेडीकल खर्च का रिकॉर्ड ही नहीं?
सुप्रीम कोर्ट के मामले में सीआईसी की बोलती बन्द क्यों हो जाती है?

Friday, September 2, 2011

दोनों बीवी राजी, क्या करेगा काजी?

दोनों बीवी राजी, क्या करेगा काजी?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' 

अभी तक हम सबने कहावत पढी और सुनी है कि "मियां बीवी राजी, क्या करेगा काजी?" लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ समय पूर्व सुनाये गये एक निर्णय की गहराई में जाने पर जो बात निकलकर सामने आयी है, उसके आधार पर मैं एक नयी कहावत का सृजन करने का दुस्साहस कर रहा हूँ-"दोनों बीवी राजी, क्या करेगा काजी (कानून)?"