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Sunday, April 19, 2015

मनुवाद से मुक्ति, शुरूआत कैसे?

मनुवाद से मुक्ति,  शुरूआत कैसे?
मनुवादी-धार्मिक-अंधविश्वासों के चलते हर दिन सैकड़ों लोग बेमौत मारे जा रहे हैं!
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सोशल मीडिया के मार्फ़त देशभर में मनुवाद के खिलाफ एक बौद्धिक मुहिम शुरू हो चुकी है। जिसका कुछ-कुछ असर जमीनी स्तर पर भी नजर आने लगा है! लेकिन हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विचारणीय सवाल यह है कि यदि हमें मनुवाद के खिलाफ इस मुहिम को स्थायी रूप से सफल बनाना है तो हमें वास्तव में इस देश के बहुसंख्यक लोगों को और विशेषकर आम लोगों को साथ लेना होगा, जिनको बामसेफ और बसपा वाले बहुजन कहते और लिखते हैं, लेकिन हकीकत में मनुवाद बामसेफ और बसपा के नेतृत्व द्वारा परिभाषित देश के बहुसंख्यक अर्थात बहुजनों के कंधे पर पर ही ज़िंदा है। इसलिए हमें ऐसा सरल और व्यावहारिक रास्ता निकालना होगा, जिससे कि दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक अर्थात सभी अनार्य भारतीय केवल कागजों पर ही नहीं, बल्कि दैनिक व्यवहार में भी मनुवाद के विरुद्ध स्वेच्छा से एकजुट हो सकें, जिसके लिए मनुवाद के विरुद्ध केवल अतिवादी सोच या अतिवादी लेखनी मात्र से कुछ नहीं होगा। बल्कि ऎसी अतिवादी सोच या लेखनी हमें हमारे आम लोगों से दूर भी ले जा सकती है। यह मुहिम दोधारी तलवार जैसी है। मेरा मानना है कि हमें हमारे अनार्य लोगों के साथ सीधा संवाद कायम करना होगा। वातानुकूलित कक्षों से बाहर निकलकर हमें लोगों के बीच जाना होगा, क्योंकि चालाक आर्यों ने मनुवाद को हजारों सालों से धर्म की चासनी में लपेट रखा है। समस्त अनार्य, आर्यों के मनुवादी षड्यंत्र के शिकार होते आये हैं। आज भी मानसिक रूप से हमारे लोग मनुवादियों के गुलाम हैं और सबसे दुखद तो यह है कि उनको इस गुलामी का अहसास ही नहीं है, बल्कि इस मानसिक गुलामी को अनार्य लोग धार्मिक स्वाभिमान और आस्था का प्रतीक मान चुके हैं। उनके अवचेतन मन पर मनुवाद ही धर्म के रूप में स्थापित हो चुका है। हमारे ही लोगों को मनुवाद का विरोध, पहली नजर में धर्म का विरोध नजर आता है, ऐसे में हमें यह विचार करना होगा कि हम किस प्रकार से अपने लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत किये बिना, उनको किस प्रकार से मनुवाद से मुक्ति दिला सकते हैं? क्योंकि यदि हम बिना विचारे मनुवाद और मनुवादी धार्मिक प्रतीकों का सीधा विरोध करते रहे तो ऐसे में सबसे बड़ा खतरा यह है कि आर्य-मनुवादियों तथा अनार्य मनुवादी अंधभक्तों द्वारा हमारी मुहिम को कमजोर करने के लिए हमारे मनुवाद विरोधी सही, सच्चे और तार्किक विचारों को भी हिन्दू धर्म विरोधी करार दिए जाने के लिए पूरे प्रयास किये जायेंगे। बल्कि किये भी जा रहे हैं। जातीय खाप पंचायतों को हमारे खिलाफ खडा किया जा सकता है। जिनमें न तर्क सुने जाते हैं और न ही वहां पर, उनसे न्याय की अपेक्षा की जा सकती है! यही नहीं धर्म के नाम पर हमारे ही लोग हमारे खिलाफ खड़े हो सकते हैं! जिससे हमारी मुहिम पहले दिन से कमजोर हो जाती है। अत: हमको आत्मचिन्तन करना होगा कि मनुवाद के दुश्चक्र को कैसे परास्त किया जाए? इसके लिए हर उस व्यक्ति को जो मनुवाद से आहत है, उसको गहन चिन्तन और मनन करना होगा! यद्यपि मेरा निजी अनुभव है कि मनुवाद से सर्वाधिक आहत मेहतर जाति के लोग तक मनुवाद का खुलकर विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं! लेकिन यह भी सच है कि मनुवाद से मुक्ति के बिना भारत के अनार्यों, मूल निवासियों और वंचित वर्गों के लिए संविधान के अनुसार सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना असम्भव है! इसलिए हमें हर हाल में, लेकिन बौद्धिक तरीके से मनुवाद मुक्त समाज की स्थापना के लिए अनेक स्तरों पर लगातार प्रयास करने होंगे! सबसे पहले हम धर्म के नाम पर संचालित अवैज्ञानिक-अंधविश्वासों और स्वास्थ्य के साथ किये जाने वाले खिलवाड़ के प्रति आम लोगों में जागरण लाना होगा! जैसे उदाहरण के लिए हमें हमारे लोगों को समझाना होगा कि-रात दिन मंदिर, मस्जिद या चर्च में रहने वाला पुजारी, मौलवी या पादरी जब बीमार होता है तो वह अपना उपचार करवाने के लिए सीधा डॉक्टर के पास जाता है, जबकि अनार्य अनपढ़ और भोले लोग बीमार होने पर पुजारी, मौलवी या पादरी के पास जाते हैं! जहां इनको-झाड, फूंक, व्रत, भजन, कीर्तन, पाठ, सवामणी, कथा, गंदा, ताबीज आदि उपचार बतलाये जाते हैं और इस प्रकार मनुवादी धार्मिक अन्धविश्वास के चक्कर में हमारे लोग अपनी बीमारी को असाध्य बना लेते हैं! दुष्परिणामस्वरूप बीमारी इतनी असाध्य हो जाती है, जिसका डॉक्टर भी उपचार करने से इनकार कर देते हैं! बीमार की अकाल मौत हो जाती है! लेकिन मनुवादी इसे भी ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करने और बीमार की अकाल मृत्यु पर भी पुण्य-दान करने की सलाह देते हैं! एक कडवी सच्चाई यह भी है कि ऐसे मनुवादी-धार्मिक-अंधविश्वासों के चलते हर दिन सैकड़ों लोग बेमौत मारे जा रहे हैं! ऎसी मौतों के बाद भी मनुवादियों द्वारा हमें बतलाया जाता है कि दान-पुण्य करने से मृतक को मोक्ष मिलेगा और मृत-आत्मा को पाप नीच योनी से मुक्ति मिलेगी! यदि और कुछ नहीं कर सकते तो हम ऎसी पोंगापंथी धूर्त मनुवादी कहानियों से तो हम अपने अनार्य बन्धुओं को बचा ही सकते हैं! शुरूआत में ऐसे प्रयोग मनुवादी शिकंजे से मुक्ति के पुख्ता आधार बन सकते हैं!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 19.04.2015

Thursday, September 19, 2013

ये हिन्दू एकता किस चिड़िया का नाम है?

ये हिन्दू एकता किस चिड़िया का नाम है :

1996 में भी इंटेलिज़ेंस विभाग के पूर्व निदेशक एवम् उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री टी.वी. राजेश्वर ने लिखा था कि पूर्वी भारत में एक नये इस्लामिक राज्य का नक्शा उभर रहा है। इतना ही नहीं सम्पूर्ण भारत में जहाँ मुस्लिम आबादी बढने लगती है, प्रशासन उसे संवेदनशील मानने लगती है। इस कारण से वैदिक धर्म के आयोजन करनें में बहुत सी कठिनाईयों का सामना कुछ मुस्लिम अवसरवादी नेताओं के कारण करना पडता है। लगातार ऐसे आयोजनों की शिकायत पुलिस प्रशासन को की जाती है। जिससे पुलिस प्रशासन ऐसे आयोजनों को अत्यधिक कठिनाई से और बहुत शर्तों को मनवाने बाद ही अनुमति देती हैं। पुलिस संवेदनशील क्षेत्र कहकर ऐसे आयोजनों से बजने की जुगत में रहती है।


साथ ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने नान डाँमिनेन्ट ग्रप को ही अल्पसंख्य माना है और 3 मई 2007 को अल्पसँख्यक मुद्दे पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री एन. एस. श्रीवास्तव नें मुस्लिमों को अल्पसँख्यक की श्रेणी से बाहर रखने की सलाह दी थी, क्योंकि यह नाँन डामिनेन्ट ग्रुप नहीं है। इनका राजनीति में भी दखल है, अकेले उत्तर प्रदेश में दोनों सदनों में 50 से अधिक विधायक है और 18 संसद सदस्य हैं। आगे प्रस्तुत है-जनसंख्या से सम्बंधित आँकडे 1951 में हुई जनगणना में देश में हिन्दु जनसँख्या थी 85 प्रतिशत और 2001 की जनसँख्या के अनुसार हिन्दु जनसँख्या 5 प्रतिशत कम होकर 80 प्रतिशत रह गयी और 1951 में ही मुस्लिम अल्पसँख्यक नहीं थे 1951 में मुस्लिम जनसँख्या थी 10 प्रतिशत और 2001 में मुस्लिम जनसँख्यख्या 3 प्रतिशत बढकर 13 प्रतिशत हो गयी। आगे की गणना और भी हतप्रभ करने वाली है।

क्या आप इस बात पर विश्वास कर सकते हैं कि 9 साल में मुस्लिम जनसँख्या 1.6 प्रतिशत बढी, देश के लगभग 40 जिलों में मुस्लिम जनसँख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। जम्मू कश्मीर, केरल, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार और उत्तर प्रदेश अत्यधिक मुस्लिम जनसँख्या वाले हो गये हैं। बाँग्लादेश से सटे लगभग सभी 10 जिले और 22 लोकसभा क्षेत्र मुस्लिम बहुल्य हो चुके हैं। असम के 6 जिले तथा 126 में से 40 विधानसभा क्षेत्र मुस्लिम प्रभुत्व वाले हो गये हैं। पश्चिम बंगाल में 28000 गाँवों में से 8000 गाँवों मे हिन्दु अत्यन्त अल्प हो गये हैं तथा 10 जिलों में 24 प्रतिशत से अधिक जनसँख्या मुस्लिम है। उत्तर प्रदेश के 70 में से 19 जिले 20 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम जनसँख्या के हैं। सबसे हैरान करने वाले आँकडे हरियाणा के हैं। हरियाणा में मुस्लिम जनसँख्या तीन गुना बढी है। जम्मू कश्मीर के सात जिलों में 90 प्रतिशत मुस्लिम जनसँख्या है। सम्पूर्ण केरल में मुस्लिम जनसँख्या 19.2 प्रतिशत है और देश की राजधानी देहली में 1951 में मुस्लिम 5.71 प्रतिशत था और 2010 में यह जनसँख्या तीन गुणा हो गयी है। 

परिवार नियोजन पर अल्पसंख्यकों का प्रचलित उत्तर यही रहता है कि कुरान हमें परिवार नियोजन अपनाने की इजाजत नहीं देता है अथवा बच्चे अल्लाह की दैन हैं। इसे रोकना नहीं चाहिये तो उनसे मेरे कुछ प्रश्न हैं ओमान में 4.5% , सीरिया और लीबिया में 3.7% बँग्लादेश में 3.3% जार्डन में 3.1% केन्या में 2.7% कुवैत में 2.6% और पाकिस्तान में 2.2% जनसँख्या में कमी परिवार नियोजन को अपनाने के कारण आयी है और वहाँ की इस्लामी सरकारे परिवार नियोजन पर बहुत अधिक रकम खर्च कर रही हैं। यदि इस्लामी कानून इसकी इजाज़त नहीं देता तो इन इस्लामिक देशों में परिवार नियोजन योजनाएं सरकारी खर्चों पर क्यूँ चल रही हैं?

साथ ही एक और प्रश्न भी है यदि बच्चे अल्लाह की देन है तो बीमारियाँ को भी तो अल्लाह की दी सज़ा के रूप में माने उनका ईलाज करवाने क्यूँ डाँक्टर के पास जाते हैं ये सब कुतर्क हैं जो जनता में फैलाये जाते हैं। पाखण्डी धर्माधिकारियों द्वारा जिससे देश में अल्पसँख्यक एक दिन बहुसँख्यक होकर भी अल्पसँख्यकों को मिलने वाले लाभ उठाते रहें। अल्पसँख्यकों को पहले ही पर्याप्त अधिकार दिये जा चुके हैं। शुक्रवार को नमाज़ का छूट, पूरे विश्व में कहीं भी हजयात्रा में कोई छूट नहीं होती, लेकिन भारत में हजयात्रा पर छूट मिलती है, आपको यह जानकार आश्चर्यहोगा की हमारी सरकार ने हज यात्राओ पर अब तक लगभग 10 हजार करोड़ रुपये फूँक दिये है।
स्त्रोत : युवा पंचायत

Thursday, February 9, 2012

एम के गॉंधी के-निष्ठुर, हृदयहीन तथा धोखेभरे निर्णयों को सहना ही होगा!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पॉंच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में किसका ऊंट किस करवट बैठेगा, इस बात का सही-सही पता तो चुनाव परिणामों के बाद ही चलेगा, लेकिन हर ओर उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणामों के बारे में सर्वाधिक चर्चा हो रही है| हो भी क्यों नहीं, जब दिल्ली की सत्ता का किला उत्तर प्रदेश के रास्ते ही फतह किया जा सकने की सारी सम्भावनाएँ हैं|

यूपीए की केन्द्रीय सरकार को उत्तर प्रदेश चुनावों से ठीक पहले आबीसी के अन्दर अल्पसंख्यकों को अलग से आरक्षण प्रदान करने की बात याद आ रही है| यही नहीं भाजपा को भी उत्तर प्रदेश की सत्ता के लिये राम का नाम और राम मन्दिर याद आने लगा है| यही नहीं भाजपा और भाजपा से सम्बद्ध संगठनों को पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण की चिन्ता भी सताने लगी है| जबकि सामान्यत: ये सारे कथित राष्ट्रवादी, हिन्दूवादी और भारतीय संस्कृति के महारक्षक हर राजनैतिक और गैर-राजनैतिक मंच से सामाजिक न्याय की संवैधानिक अवधारणा के विरोध में बयान जारी करते रहते हैं|

इसी सोच के चलते इन लोगों ने जाति आधारित जनगणना का कड़ा विरोध करने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी| जिसकी भी असली वजह है, कि ये महामहिम राष्ट्रवादी लोग चाहते ही नहीं कि इस देश के सभी वर्गों और सभी जातियों के लोगों को उनकी जनसंख्या के अनुसार सत्ता, प्रशासन और संसाधनों में संवैधान की मूल भावना के अनुसार समान हिस्सेदारी मिले| ये लोग चाहते हैं कि अन्य पिछड़ा वर्ग सहित, सभी आरक्षित वर्गों की सही-सही जनसंख्या का देश की सरकार को पता ही नहीं चलना चाहिये| अन्यथा इनके पास कोर्ट को भ्रमित करने के सारे रास्ते बन्द हो जायेंगे|

यही नहीं इन सबकी नजर में सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ों को भी यदि बहुत जरूरी हो तो आरक्षण देने का प्रावधान केवल और केवल आर्थिक आधार पर ही नजर आता है और दूसरी ओर आर्थिक रूप से पिछड़े अन्य पिछड़ा वर्ग को उच्च शिक्षा में आरक्षण प्रदान करने पर ये ही लोग गला फाड़-फाड़ कर उसका विरोध करने के लिये सड़कों पर उतर आते हैं| आज इन लोगों को भी ओबीसी के आरक्षण में से साढे चार फीसदी हिस्सा अल्पसंख्यकों को दे देने पर, महान भारत राष्ट्र के खण्डित होने के खतरे सहित, ओबीसी के साथ कथित रूप से हो रहे घोर अन्याय के कारण हार्ट अटैक आने जैसी वेदना हो रही है|

जबकि कड़वी सच्चाई यही है कि अल्पसंख्यकों की केवल और केवल उन्हीं पिछड़ी जातियों को ही साढे चार फीसदी आरक्षण प्रदान किया गया है, जो ओबीसी वर्ग में पूर्व से ही शामिल हैं और जिनका समानुपातिक दृष्टि से साढे चार फीसदी हक ओबीसी के सत्ताईस फीसदी आरक्षण में बनता है|

यही नहीं ऐसा निर्णय करने से पूर्व भारत सरकार ने हर प्रकार से अध्ययन और जानकारी एकत्रित करके इस बात को जॉंचा-परखा है कि अल्पसंख्यकों की जातियों को ओबीसी वर्ग में कितनी हिस्सेदारी मिल रही है| जिसके बाद ही अलग से आरक्षण प्रदान करने का निर्णय लिया गया है| यह अलग बात है कि यह निर्णय राजनैतिक लाभ पाने के लिये पॉंच राज्यों के विधानसभा चुनावों से ठीक पूर्व लिया गया है| जिसे संवैधानिक भावना के अनुकूल नहीं माना जा सकता| इस सबके उपरान्त भी लगातार आरक्षण और आरक्षित वर्गों के हितों का विरोध करने को ही राष्ट्रहित बतलाने वाली भाजपा और भाजपा के अनुसांगिक संगठनों को भारत सरकार के इस निर्णय का विरोध करने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता है|

जहॉं तक धर्म के आधार पर अल्पसंख्यकों को आरक्षण प्रदान करने की बात है तो ये बात तो प्रारम्भ से ही लागू की जाती रही है| ओबीसी की सूची में इस्लाम से सम्बन्धित जातियों को शामिल किया गया है| यही नहीं अजा एवं अजजा वर्गों की सूचियों में भी किस-किस धर्म की कौन-कौन सी धर्म-परिवर्तित जातियों को आरक्षण प्राप्त होगा और किस-किस धर्म की धर्म-परिवर्तित जातियों को आरक्षण प्राप्त नहीं होगा| इस बारे में स्पष्ट नीति बनाकर लागू की हुई है| जिसका आज तक इसी आधार पर विरोध क्यों नहीं किया गया? इस बात पर भी चर्चा होनी चाहिये| भाजपा और भाजपा के अनुसांगिक संगठनों को क्या यह नहीं पता कि आदिवासियों के सत्तर फीसदी हक को केवल कुछ मुठ्ठीभर ईसाई आदिवासी छीन रहे हैं| इस बारे में एक भी आवाज सामने नहीं आती है| क्योंकि निरीह आदिवासियों के बारे में भाजपा और उससे सम्बद्ध लोग क्योंकर अपनी ऊर्जा खपाने लगे?

इसी सन्दर्भ में यह बात भी स्पष्ट कर देना जरूरी है कि वेब मीडिया सहित अनेक मंचों पर यह सवाल उठाया जाता रहा है कि आने वाले दिनों में यदि अजा एवं अजजा वर्गों में शामिल अल्पसंख्यक जातियों को भी अलग से आरक्षण प्रदान किया जायेगा, तब अजा एवं अजजा के प्रतिनिधियों, कार्यकर्ताओं, विचारकों और बुद्धिजीवियों का क्या विचार (तर्क) होगा| मैं इस बारे में यहॉं पर यह कहना बेहद जरूरी समझता हूँ कि जिन मानदण्डों और जिन पैमानों के आधार पर ओबीसी वर्ग की सूची में शामिल अल्पसंख्यक वर्ग की जातियों को अलग से साढे चार फीसदी आरक्षण दिया गया है| यदि उन्हीं सब मानदण्डों और पैमानों पर अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि अजा एवं अजजा वर्गों में शामिल अल्पसंख्यक धर्मावलम्बियों की जातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है तो अवश्य ही उन्हें उनकी जनसंख्या के अनुपात में अलग से ‘आरक्षण के अन्दर आरक्षण’ दिया ही जाना चाहिये| केवल यही नहीं-अजा एवं अजजा वर्ग में शामिल हिन्दू या अहिंदू या अन्य धर्मावलम्बी जातियों में भी विभाजन होना चाहिये| जिससे सभी जातियों और समूहों को संविधान की सामाजिक न्याय की मंसा के अनुरूप सत्ता और प्रशासन में अपने-अपने प्रतिनिधि भेजने का अवसर मिल सकें| आखिर हमें, हमारे संविधान की भावना का आदर तो करना ही होगा| 

बेशक यह सब हमें सेपरेट इलेक्ट्रोल के हक को मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी द्वारा धोखे से छीने जाने के कारण सहना और करना पड़ रहा है| अन्यथा यदि डॉ. भीमराव अम्बेड़कर की सैपरेट इलेक्ट्रोल की न्यायसंगत मांग को मानकर के भी गॉंधी द्वारा छलपूर्वक देश पर पूना पैक्ट नहीं थोपा गया होता तो सरकारी सेवाओं में और सरकारी शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण नाम की कोई अवधारणा भारत में होती ही नहीं! गॉंधी की विरासत को संभालते हुए हमें एम के गॉंधी के निष्ठुर और हृदयहीनता के पिरचायक धोखेभरे निर्णयों को भी तो सहना ही होगा|