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Saturday, February 13, 2016

यूरेशियन आर्य-क्षत्रियों के वंशज शूद्रों की दारुण व्यथा और बामसेफी बामण मेश्राम का 'मूलनिवासी' मिशन

यूरेशियन आर्य-क्षत्रियों के वंशज शूद्रों की दारुण व्यथा
और बामसेफी बामण मेश्राम का 'मूलनिवासी' मिशन
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
जिन यूरेशियन आर्य-ब्राह्मणों ने अपने ही आर्य-वंशी-यूरेशियन-क्षत्रियों का उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार बंद करके चौथे वर्ण में डालकर उनको 'शूद्र' बना दिया। उन शूद्रों के पूर्वज अनेक तेजस्वी राजा हुए थे। बाबा साहब ने ऐसे वीर पूर्वजों के वंशज शूद्रों के बारे में गहन अध्ययन, शोध और विश्लेषण करके ''शूद्र कौन थे'' नामक ग्रंथ की रचना की। जिसको भारत सरकार द्वारा 1998 से 2013 तक सात बार प्रकाशित किया जा चुका है। जबकि वर्तमान भारत सरकार इसके प्रकाशन में कोई रुचि नहीं दिखा रही है। जिसके कारण अम्बेड़करवादियों में नाराजगदी दिखाई दे रही है। इस ग्रंथ में बाबा साहब ने शूद्रों के बारे में क्या अधिकृत जानकारी प्रस्तुत की है? इसे निम्न उद्धरणों से आसानी से समझा जा सकता है:-
1-''मैं निश्चय के साथ कहा सकता हूं कि मैंने अपनी इस खोज में स्वयं को पूर्वाग्रह से मुक्त रखा है। शूद्रों के विषय में लिखते समय मैंने शूद्र इतिहास के अतिरिक्त अन्य शेष बातों पर ध्यान नहीं दियाा है।......यह पुस्तक सरल और अबोध शूद्रों के लिये लिखी गयी है कि उनकी यह दशा कैसे हुई और वे हैं कौन? उन्हें पता नहीं कितने करीने से यह ग्रंथ लिखा गया है।''-कृपया देखें भारत सरकार द्वारा प्रकाशित एवं बाबा साहब लिखित ग्रंथ ''शूद्र कौन थे' के सातवें संस्करण-2013 के प्राक्कथन का पृष्ठ : 9

2-''निसंदेह मैं जो इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं, वह मेरी जिज्ञासाओं और खोज का प्रतिफल है। इस पुस्तक में दो प्रश्नों का उत्तर पाने का प्रयास किया गया है। (1) शूद्र कौन थे? और (2) उन्हें भारतीय आर्य समुदाय का चतुर्थ वर्ण कैसे बनाया गया? संक्षेप में मेरा उत्तर इस प्रकार है:-
(1) शूद्र आर्यों के सूर्यवंशी समुदाय में से ही थे।
(2) एक समय था जब आर्य समुदाय में केवल तीन वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को ही मान्यथा थी।
(3) शूद्रों का अलग से कोई वर्ण नहीं था वे भारतीय आर्य समुदाय के क्षत्रिय वर्ण में आते थे।
(4) शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच अनवरत संघर्ष होते रहते थे और ब्राह्मणों को शूद्रों के हाथों अनेक कष्ट और अपमान सहने पड़े।
(5) शूद्रों द्वारा किये गये उत्पीड़न और पीड़ाओं से त्रस्त होकर ब्राह्मणों ने फलस्वरूप शूद्रों का उपनयन संस्कार सम्पन्न करवाना बंद कर दिया।
(6) उपनयन संस्कार से वंचित होने पर शूद्र जो क्षत्रिय थे उनका सामाजिक ह्रास हो गया। उनका दर्जा वैश्यों के नीचे हे गया और वे चौथे वर्ण में गिने गये।--कृपया देखें उक्त का पृष्ठ : 3 एवं 4

3-भारत सरकार द्वारा प्रकाशित एवं बाबा साहब लिखित ग्रंथ ''शूद्र कौन थे' के सातवें संस्करण-2013 का पृष्ठ : 1-''यह बात प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि शूद्र भारतीय आर्यों के समाज का चौथा वर्ण हैं..''
4-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 10 पर बाबा साहब ने ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के हवाले से लिखा है कि- ''भारतीय आर्य जाति पांच कबीलों के समन्वय से बनी है जो भारतीय आर्य जन में एकीकृत होकर एक समान जाति बन गयी।''
5-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 15 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''सवर्ण शब्द आमतौर पर अवर्ण का विलोम है। सवर्ण का अर्थ है जो चारों वर्णों में से कोई एक है। सवर्ण वह है जिसका चारों वर्णों से कोई सम्बन्ध नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सवर्ण हैं।''
6-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 54 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-"आर्यों और दासों तथा दस्युओं के बीच अंतर न तो प्रजातीय था और न ही शारीरिक बनावट का। इसीलिये दास और दस्यु आर्य कहे जा सकते हैं।''
7-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 55 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''पश्चिमी लेखकों ने यह कहानी रची कि आर्यों ने आक्रमण करके दासों तथा दस्युओं को पराजित किया।''
8-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 56 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''यह दावा कि आर्य बाहर से आये और भारत पर आक्रमण किया और यह कल्पना कि दास या दस्यु भारत के मूलनिवासी थे, एकदम गलत है।''
9-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 75 एवं 76 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''प्राय: यह संभावना व्यक्त की जाती है कि दास और दस्यु भारत के मूलनिवासी थे और आर्यों से भिन्न जाति थे। आर्यों ने उन्हें पराजित किया, यह तो एक काल्पनिक उड़ान मात्र है।''
10-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 79 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''जहां तक दस्युओं का प्रश्न है ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता कि इन्हें अनार्य जाति के रूप में माना जा सकता है।''
11-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 80 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''दस्यु भारतीय मूल वंश के नहीं हो सकते।''
12-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 81 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''दास भारत के मूल निवासी आदिवासी सिद्ध नहीं होते।''
13-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 82 एवं 83 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''शूद्र आर्यों (ब्राह्मणों) के विरोधी थे, (इससे) यह तात्पर्य नहीं निकलता कि शूद्र आर्य नहीं थे। वास्तव में वे भिन्न (आर्य) वर्ग या समूह के आर्य थे।''
14-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 85 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''व्याख्या कोई भी हो किन्तु तथ्य फिर भी स्पष्ट है कि सातवीं पीढी में शूद्र परिस्थिति विशेष में ब्राह्मण हो सकता था। शूूद्र यदि आर्य नहीं होते तो इस प्रकार की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।''....''अर्थशास्त्रियों के अनुसार शूद्र अनार्य नहीं थे।''
15-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 86 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''कौटिल्य (चाणक्य) ने अपने अर्थशास्त्र में शूद्रों को स्पष्ट रूप से आर्य घोषित किया है।''
16-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 86 एवं 87 पर बाबा साहब ने शूद्रों के क्षत्रिय-आर्य होने के प्रमाण जुटाते हुए लिखा है कि-
(1) ''शूद्र क्षत्रिय राजाओं के राज्याभिषेक में सम्मिलित होते थे।''
(2) ''युधिष्ठर के राजतिलक समाराह में ब्राह्मणों के साथ शूद्र भी आमंत्रित किये गये थे।''
(3) ''शूद्र प्रतिनिधियों का ब्राह्मण भी विशेष रूप से सम्मान करते थे।''
(4) ''शूद्र मंत्री होते थे और उनको ब्राह्मणों के बराबर ही प्रतिनिधित्व प्राप्त होता था।''
17-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 89 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''शूद्र यदि मूलत: अनार्य नहीं थे तो कौन थे? मेरे मतानुसार इसके तीन उत्तर निम्न प्रकार हैं:—
(1) —''शूद्र आर्य थे।''
(2) —शूद्र क्षत्रिय थे।
(3) —शूद्र क्षत्रियों में इतने उत्तम और महत्वपूर्ण वर्ण थे कि प्राचीन आर्यों के समुदाय में अनेक शूद्र तेजस्वी और बलशाली राजा थे।
18-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 106 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''शूद्र आर्य ही थे।...यह तो असंदिग्ध है कि वे आर्य और क्षत्रिय थे।''
19-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 124 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''शूद्र क्षत्रियों की ही एक शाखा थे।''
20-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 130 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''ब्राह्मण परशुराम ने क्षत्रियों का संहार कर दिया था तथा जो बच गये थे उनका मूलोच्छेदन मगध के शूद्र राजा महापदम नंद ने कर दिया था। अत: क्षत्रियों का सम्पूर्ण विनाश हो गया। केवल ब्राह्मण और शूद्र बचे थे।''
21-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 138 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''शूद्रों से बदला लेने के लिये ब्राह्मणों ने शूद्रों के विरुद्ध उपनयन (यज्ञोपवीत) विरोध को एक भीषण अणुबम के रूप में प्रयोग कर उन्हें गर्त में ढकेल दिया और उन्हें शमशान तुल्य बना दिया।''
22-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 164 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''शूद्र यह समझ नहीं पाये कि उपनयन बंद हो जाने के क्या फलितार्थ होंगे।''
23-उक्त ग्रंथ के अन्तिम अध्याय पृष्ठ : 165 पर बाबा साहब ने निष्कर्ष रूप में लिखा है कि-
(1) शूद्र सूर्यवंशी आर्यजतियों के एक कुल या वंश थे।
(2) भारतीय आर्य समुदाय में शूद्र का स्तर क्षत्रिय वर्ण का था।
(3) एक समय आर्यों में केवल तीन वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही थे। शूद्र अलग वर्ण नहीं था, बल्कि क्षत्रिय वर्ण का ही एक भाग था।
(4) शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों में निरन्तर संघर्ष चलता रहा, जिससे ब्राह्मणों को (शूद्रों का) अत्याचार, उत्पीड़न और अपमान सहना पड़ा।
(5) शूद्रों के अत्याचार व उत्पीड़न से त्रस्त ब्राह्मणों ने प्रतिशोध के कारण उनका उपनयन बन्द कर दिया।
(6) उपनयन (यज्ञोपवीत) पर प्रतिबन्ध से शूद्रों का सामाजिक पतन हुआ और (शूद्र) वैश्यों से निचली सीढी पर आ गये। उनका स्तर वैश्यों से भी निम्न हो गया। परिणामस्वरूप वे समाज का चौथा वर्ण बन गये।
24-उक्त ग्रंथ के अन्तिम पृष्ठ : 168 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-''मुझे यह कहने का पूरा अधिकार है कि शूद्रों की उत्पत्ति और पतन के संबंध में मेरा मत शुद्ध और त्रुटिहीन तथा युक्तिसंगत है। मेरा कथन है केि इस विषय पर कोई और रचना इससे बेहतर नहीं हो सकती।

लेखकीय टिप्पणी : बाबा साहब के ग्रंथ के उक्त उद्धरणों से शूद्रों को मूलनिवासी जैसे असंगत शब्द के बहाने बहकाकर भारत के मूलवासी सिद्ध करने वाले बामण मेश्राम की हकीकत भी आसानी से समझी जा सकती है। इसके अलावा उक्त विवेचन से यह भी स्वत: प्रमाणित है कि शूद्र वर्ण में केवल आर्य—क्षत्रियों के वंशज—शूद्रों में ओबीसी और आदिवासी शामिल नहीं हैं।

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जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी सब एक समान!!

@—लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोशिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक), पूर्व रा महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ, दाम्पत्य विवाद सलाहकार तथा लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में एकाधिक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित। वाट्स एप एवं मो. नं. : 9875066111/दि.13.02.2016/06.33 PM
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—निवेदक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Monday, February 25, 2013

मेहतर जाति की मुक्ति कैसे सम्भव है?


एक अलिखित कानून बन गया कि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने के लिये भंगी जाति के लोगों ने ही जन्म लिया है। अन्य किसी भी सरकारी नौकरी में आरक्षित वर्ग के लोगों की किसी त्रुटिवश एक फीसदी भी या एक भी अभ्यर्थी के अधिक नियुक्ति हो जाने पर मनुवादियों द्वारा तत्काल हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया जाता है और झट से मनुवादी संरक्षक न्यायाधीशों द्वारा ऐसे मामलों में संज्ञान ले लिया जाता है। कुछ मामले तो ऐसे भी हैं, जहॉं पर मनुवादी न्यायाधीशों द्वारा स्वयं ही संज्ञान लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक ऐसे निर्णय दिये हैं, जो संविधान की मूल भावना और आरक्षित वर्ग के लिये जरूर सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत हैं। जिन्हें अनेक बार संसद ने निरस्त किया है। इसके उपरान्त भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है और आज तक न तो रुका है और न हीं रुकने वाला है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

हजारों सालों से सबकी गंदगी की सफाई करने वाली जाति को मनुवादियों ने अनेकानेक घृणित नाम दिये हैं। जैसे-मेहतर, भंगी, शूद्र और आजकल स्वीपर कहा जाता। जिसे ढोंगी महात्मा मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी ने हरिजन कहा, जबकि गॉंधी इस बात से वाकिफ था कि गुजरात में जिसके मॉं-बाप का पता नहीं होता है, ऐसी नाजायज औलादों को हरिजन कहा जाता है। 

इस जाति के लोगों की दशा समाज में निम्नतम दर्जे की है। सबसे घृणित कार्य यही भंगी कहलाने वाली जाति के लोगों द्वारा किये जाते हैं। आजादी के बाद भी इन्हें अछूत से छूत बनाने के लिये किसी भी सरकार की ओर से कोई रचनात्मक कदम नहीं उठाया गया। अलबत्ता शुरुआत में नगर निगमों, नगरपालिकाओं और सभी स्थानीय निकायों में घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई के लिये इन्हीं लोगों को सरकार द्वारा नियोजित किया जाने लगा। ये कहा जाये तो अनुचित नहीं होगा कि इन सभी घृणित समझे जाने वाले सफाई कार्यों में शतप्रतिशत इसी जाति के लोगों को नियुक्तियॉं दी जाने लगी।

इसके चलते एक अलिखित कानून बन गया कि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने के लिये भंगी जाति के लोगों ने ही जन्म लिया है। अन्य किसी भी सरकारी नौकरी में आरक्षित वर्ग के लोगों की किसी त्रुटिवश एक फीसदी भी या एक भी अभ्यर्थी के अधिक नियुक्ति हो जाने पर मनुवादियों द्वारा तत्काल हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया जाता है और झट से मनुवादी संरक्षक न्यायाधीशों द्वारा ऐसे मामलों में संज्ञान ले लिया जाता है। कुछ मामले तो ऐसे भी हैं, जहॉं पर मनुवादी न्यायाधीशों द्वारा स्वयं ही संज्ञान लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक ऐसे निर्णय दिये हैं, जो संविधान की मूल भावना और आरक्षित वर्ग के लिये जरूर सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत हैं। जिन्हें अनेक बार संसद ने निरस्त किया है। इसके उपरान्त भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है और आज तक न तो रुका है और न हीं रुकने वाला है।

जबकि इसके विपरीत घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने वाले कर्मचारियों में शतप्रतिशत केवल और भंगी जाति के लोगों की ही नियुक्ति की जाती है, लेकिन इसे आज तक न तो किसी मनुवादी ने अदालत में चुनौती दी और न ही इस देश की कथित न्यायप्रिय न्यायपालिका ने स्वयं संज्ञान लेकर भारत सरकार से नोटिस जारी करके सवाल पूछा कि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने वाले कर्मचारियों में एक ही भंगी जाति के ही लोगों को क्यों नियुक्त किया जाता रहा है? अन्य और उच्च जाति के लोगों को इस कार्य में क्यों नियुक्तियॉं नहीं दी जाती हैं?

केवल यही नहीं पिछले दो दशक से तो इस असंवैधानिक व्यवस्था से पीछा छुड़ाने के लिये सरकारी, अर्द्ध-सरकारी और निजी क्षेत्र में एक नायाब तरीका निकाल लिया है-सफाई कार्य ठेके पर दिये जा रहे हैं। ठेके उच्च जाति के लोगों द्वारा लिये जाते हैं, जबकि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने वालों में शतप्रतिशत केवल और केवल उसी भंगी/मेहतर जाति के लोगों को मनमानी शर्तों पर नियुक्त किया जाता है। इस चालाकीपूर्ण व्यवस्था में मोटी कमाई ठेकेदारों की होती है, जो सफाईकर्मियों से 10 से 12 घण्टे काम लेते हैं और मजदूरी के नाम पर तीन से चार हजार रुपये महावार वेतन देते हैं। उनका खुला शोषण होता है, कोई साप्ताहिक विश्राम तक नहीं दिया जाता है।

जबकि होना तो ये चाहिये कि सरकार या जिन किन्हीं निकायों या उपक्रमों या संस्थानों द्वारा ठेकेदारी पर कोई भी कार्य करवाया जाता है तो ठेके की शर्तों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिये कि जिस कार्य के लिये सरकार द्वारा अपने कर्मियों को जो वेतन दिया जाता है, उससे कम वेतन ठेकेदार द्वारा नहीं दिया जायेगा। यदि इतनी सी बात का ठेके की शर्तों में उल्लेख कर दिया जाये तो सभी क्षेत्र के कर्मियों का शोषण स्वत: रुक सकेगा और देश में मजदूरों को हड़ताल करने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा। इसी कारण पिछले दिनों मजदूरों ने देशव्यापी हड़ताल की थी, लेकिन ये जानकर मुझे आश्‍चर्य हुआ कि किसी भी मजदूर संगठन द्वारा ये मांग नहीं उठायी गयी कि जिस काम के लिये सरकार 20 हजार महावार वेतन देती है, उसी कार्य के लिये ठेकेदार 4 हजार में करवाता है, इस बात को रोकने के लिये सरकार ठेके की शर्तों में संशोधन क्यों नहीं करती है?

हमारे देश की व्यवस्था में सुधार के अनेक प्रयास हो रहे हैं, लेकिन मेहतर जाति के उत्थान के लिये कोई पुख्ता या कारगर कदम नहीं उठाये जा रहे हैं। जिसके चलते आज भी आऊट सोर्सिंग के जरिये घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई इसी जाति के लोगों से नाम-मात्र की मजदूरी पर करवाये जा रहे हैं।

यहॉं पर मैं इस बात का उल्लेख करना भी जरूरी समझता हूँ कि मेहतर/भंगी जाति के लोगों में आपसी सामाजिक एकता का अभाव होने के कारण भी उनका सारे देश में सरकार और ठेकेदारों द्वारा सरेआम इस प्रकार से शोषण किया जा रहा है। अन्यथा जिस दिन इस जाति के लोगों द्वारा सामाजिक रूप से एक होकर ये कड़ा निर्णय ले लिया जायेगा कि वे घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई का कार्य अपनी शर्तों पर ही करेंगे, उसी दिन, बल्कि उसी क्षण इन्हें पचास हजार रुपये मासिक मजदूरी देने को भी सरकार और सफाई ऐजेंसियों को मजबूर होना पड़ेगा। बस एक दृढ और कड़ा निर्णय लेने की जरूरत है।

Friday, February 1, 2013

देश का माहौल बिगाड़ने वाले तथाकथित बड़े लोग


"मनुवादी आशीष नन्दी कहते हैं कि भ्रष्टाचार के जनक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोक सेवक हैं। आशीष नन्दी को ये सब कहने का साहस इस कारण से हुआ कि कुछ ही दिन पूर्व प्रवीण तोगड़िया ने कहा कि यदि वह भारत का प्रधानमंत्री बन जाये तो मुसलमानों से सभी प्रकार के संवैधानिक हकों को एक झटके में छीन लेंगे। इस बयान पर देश के शूद्र, तथाकथित बुद्धिजीवी, संविधान के रक्षक चुप्पी साधे रहे। सभी जानते हैं कि देश के 90 फीसदी से अधिक मुसलमानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों के पूर्वजों के वंशज हिन्दुओं से धर्मपरिवर्तित होकर मुसलमान बने हैं, जो मनुवादियों के लिये आज भी शूद्र ही हैं।"

डॉ पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

यदि हम इतिहास उठाकर देखें तो पायेंगे कि हर क्षेत्र में हर बार भारत का सौहार्द बिगाड़ने का काम भारत के तथाकथित बड़े कहलाने वाले लोगों ने ही किया है। इसकी शुरूआत कभी भी भारत के आम आदमी ने नहीं की है। चाहे बात अखण्ड भारत के स्वतन्त्रता सेनानी और पाकिस्तान के जनक मुहम्मत अली जिन्ना से शुरू की जाये या भारत के बहुसंख्यक शूद्रों (दलित, आदिवासियों और पिछड़ों) के सेपरेट इलेक्ट्रोल के अधिकार को छीनने के लिये अनशन को हथियार बनाने वाले मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी की करें या अहिंसा के नाटककार पुजारी मो. क. गॉंधी के हत्यारे और कट्टरपंथी हिन्दू नाथूराम गोडसे की बात की जाये।

आगे चलकर अयोध्या-बाबरी विवाद को जानबूझकर भड़काने वाले लालकृष्ण आडवाणी की बात करें या कट्टर हिन्दुत्व को भड़काकर अपनी रोटी सेकने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उत्पाद प्रवीण तोगड़िया, उमा भारती, विनय कटारिया, नरेन्द्र मोदी जैसे मुसलमान विरोधी लोगों की बात करें या शिव सेना के बाला साहेब ठाकरे, उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे और उनके गुण्डों के कुकर्मों को देखें या फिर कथित बुद्धिजीवी कहलाने वाले समाज विज्ञानी और प्रोफेसर आशीष नन्दी की बात करें। स्त्री एवं शूद्र विरोधी ढोंगी संत आसाराम या हिंदुत्व के ठेकेदार संघ के मुखिया मोहन भागवत की बात करें। ये सब के सब इस देश के बहुसंख्यक लोगों (अर्थात शूद्रों), स्त्रियों और मुसलमानों को दूसरे, तीसरे और चौथे दर्जे का नागरिक मानते हैं। शूद्र, स्त्री एवं मुसलमानों को देश की कुल आबादी में से घटाने के बाद बचे शेष कुलीन मुनवादी लोग इस देश पर विगत हजारों सालों की भांति आगे भी हजारों सालों तक अपना अमानवीय राज कायम रखने के लिये तरह-तरह के पेंतरे चलते रहते हैं। जिसके लिये इन लोगों ने शूद्रों, स्त्रियों और मुसलमानों में से भी कुछ समाज-द्रोहियों को ललचाकर अपने मिला लिया है। जिन्हें दिखावटी तौर पर आगे रखकर ये सभी वर्गों के हितचिन्तक होने का ढोंग करते रहते हैं!

हिन्दुत्व के ये कथित संरक्षण अपनी संविधानेत्तर और कथित धार्मिक सत्ता और मनुवादी विचारधारा को हर कीमत पर कायम रखने के लिये अपनी खुद की गुण्डा-पुलिस रखते हैं। जो 14 फरवरी को वेलैटाइंस डे पर, मुम्बई से उत्तर भारतीयों को खदेड़ते समय, दलितों को मन्दिरों से लतियाते समय और स्त्रियों को धार्मिक आयोजनों पर बहिष्कृत करते हुए और छेड़ते समय अपना कमाल दिखाती रहती है। ये पुलिस देश में धर्म के नाम पर तरह-तरह के कुकर्म करती रहती है। जिसके सुफल गुजरात के डाण्डिया रास के बाद गर्भपात क्लीनिकों के आंकड़ों से प्रमाणित होते हैं। जिसे रोकने के लिये अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने तो बाकायदा डाण्डिया रास स्थलों के आसपास सरकारी खर्चे पर लाखों गर्भनिरोधक पिल्स और कण्डोम वितरित करवाकर इस बात को प्रमाणित किया था कि धार्मिक आयोजन कुलीन हिन्दुओं के लिये आज भी ऐश-ओ-आराम के सुअवसर होते हैं। आजाद भारत में जबकि देवदासी बनाने की अमानवीय हिन्दू प्रथा संवैधानिक तौर पर समाप्त हो चुकी है तो ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों का भव्यता से आयोजन किया जाने लगा है, जिनमें युवा लड़कियां धर्म के नाम पर घर से बाहर निकलती हैं और उनके साथ मनुवादियों की स्व-घोषित पुलिस के कमाण्डर और पैदल सेना के लोग यौनसुख भोगने को उसी प्रकार से आजाद होते हैं, जैसे कि देवदासियों के साथ उनके पूर्वज हुआ करते थे। इसी का परिणाम है कि आज डाण्डिया रास गुजरात से निकलकर अनेक प्रान्तों में अपने पैर पसार चुका है!

इसके उपरान्त भी मनुवादी आशीष नन्दी कहते हैं कि भ्रष्टाचार के जनक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोक सेवक हैं। आशीष नन्दी को ये सब कहने का साहस इस कारण से हुआ कि कुछ ही दिन पूर्व प्रवीण तोगड़िया ने कहा कि यदि वह भारत का प्रधानमंत्री बन जाये तो मुसलमानों से सभी प्रकार के संवैधानिक हकों को एक झटके में छीन लेंगे। इस बयान पर देश के शूद्र, तथाकथित बुद्धिजीवी, संविधान के रक्षक चुप्पी साधे रहे। सभी जानते हैं कि देश के 90 फीसदी से अधिक मुसलमानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों के पूर्वजों के वंशज हिन्दुओं से धर्मपरिवर्तित होकर मुसलमान बने हैं, जो मनुवादियों के लिये आज भी शूद्र ही हैं।

शूद्रों को अजा, अजजा, ओबीसी और मुसलमानों के नाम पर मनुवादी लगातार गालियॉं देते रहते हैं और शूद्र चुपचाप सब कुछ सहते और सुनते रहते हैं। यही कारण है कि शूद्र विरोधी भारतीय न्यायपालिका के कुछ जजों ने ऐसे निर्णय दिये हैं, जिनके कारण इस देश के सामाजिक माहौल को बिगाड़ने का काम किया है। इन निर्णयों से इस देश का माहौल मनुवाद को मजबूत करने में सहायक का काम कर रहा है। सभी जानते हैं कि शूद्रों को हजारों सालों तक भारत में मानव नहीं समझा गया। इसी वजह से उन्हें सरकारी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिये आरक्षण प्रदान किया गया। जिसे अमलीजामा पहनाने के लिये संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में साफ़ तौर पर प्रारम्भ से ही ये सुस्पष्ट व्यवस्था की गयी थी कि आरक्षण "नियुक्ति के समय" अर्थात् "नौकरी प्राप्त करते समय" और "पदों पर" अर्थात् "पदोन्नति के समय" दिया जायेगा। जिसकी मनुवादी विचारधारा के पोषक जजों ने बार-बार, मनुवादियों और आरक्षणविरोधियों के पक्ष में और संसद की भावना के विपरीत व्याख्या की गयी, जिसे संसद ने अनेक बार ख़ारिज किया और शूद्रों को आरक्षण के हक से वंचित करने के लिये अनेकों बार न्यायिक शक्ति की आड़ में सताया गया! ये सिलसिला अनवरत आज भी जारी है। इस प्रकार इस देश के सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और न्यायिक माहोल को बिगाड़ने में सबसे अधिक यदि किसी का योगदान है तो वे हैं शूद्र-विरोधी-मनुवादी तथाकथित बड़े-बुद्धिजीवी, राजनेता, धर्मनेता और जज|