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Sunday, April 3, 2016

निजी क्षेत्र में व्याप्त खुले शोषण को रोकने हेतु सख्त कानूनी सुधार जरूरी

निजी क्षेत्र में व्याप्त खुले शोषण को
रोकने हेतु सख्त कानूनी सुधार जरूरी
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

वर्ष 1991 में जैसे नरसिम्हा राव की सरकार ने सत्ता संभाली या यह कहना अधिक उचित होगा कि वीपी सिंह एवं चन्द शेखर की सरकार द्वारा बरबार अर्थव्यवस्था के सुधार के लिये जैसे ही रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया के पूर्व गर्वनर डॉ. मनमोहन सिंह ने भारत के वित्तमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली भारत को फिर से कॉर्पोरेट के गुलाम बनाने की शुरूआत हो गयी। खुले बाजार और विश्व अर्थव्यवस्था के साथ प्रतियोगिता के नाम पर डॉ. मनमोहन सिंह की नीति को पीवी नरसिम्हाराव के बाद अटलबिहारी वाजपेयी और अन्तत: स्वयं डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने उत्तरोत्तर प्र​गति के साथ जारी रखा। जिसके चलते भारत का पहले से कमजोर तबका लगातार वंचित और बेहाल हो गया तथा किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो गये। स्त्रियों की स्थिति बद से बदतर हो गयी। निम्न श्रेणी की सरकारी नौकरियां समाप्त करने की प्रकिया शुरू हो गयी।

वर्तमान नरेन्द्र मोदी सरकार भारत की अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र को सौ फीसदी हिस्सेदारी प्रदान करके सम्पूर्ण रूप से कॉर्पोरेट घरानों पर मेहरबान है। जिसके चलते जहां एक ओर भ्रष्टाचार चरम पर है, वहीं दूसरी ओर आम व्यक्ति, किसान, स्त्री और वंचित तबका बेहाल है। अपरिहार्य तकनीकी पदों को छोड़कर ग्रुप डी की सरकारी नौकरियां समाप्त हो चुकी हैं। जिसके चलते वंचित तबकों को प्रशासन में प्राप्त संवैधानिक प्रतिनिधित्व/आरक्षण का मूल अधिकार हमेशा के लिये नेस्तनाबूद किया जा चुका है।

यहां जो सबसे महत्वूपर्ण और विचारणीय तथ्य है, वह यह कि—सरकारी क्षेत्रों में जिन कार्यों के लिये, जितनी पगार मिला करती थी या वर्तमान में मिल रही, उसी कार्य के लिये ठेकदार द्वारा एक चौथाई पगार पर वंचित तबके के लोगों को कार्य पर रखा जा रहा है। जिसके चलते वंचित वर्ग का खुला शोषण हो रहा है। लेकिन इसकी ओर 1991 से आज तक किसी भी सरकार या जनप्रतिनिधि ने जरा सा भी ध्यान नहीं दिया। दुष्परिणामस्परूप वर्तमान में जो कार्य ग्रुप डी सरकारी कर्मचारी 25 से 40 हजार रुपये महावार वेतन में करता है, वही कार्य ठेकदार के अधीन कार्यरत मजदूर 9 से 12 हजार प्रतिमाह में करने को विवश है। जिसे अन्य किसी प्रकार की कोई सुविधा या कानूनी संरक्षण भी प्राप्त नहीं हैं।

इस शोषक व्यवस्था के कारण कारोबारी, ठेकेदार, कॉर्पोरेट घराने और ठेका प्रदान करने वाले सरकारी अफसर लगातार मालामाल होते जा रहे हैं। हों भी क्यों नहीं, जब कार्य की लागत का अनुमान/ऐस्टीमेट सरकारी दर पर बनाया जाता है और ठेकेदार द्वारा मजदूरों से सरकारी दर की तुलना में मात्र एक चौथाई दर पर कार्य करवाया जाता है। इसमें जो मुनाफा होता है, उसकी आपस में बन्दरबांट होती है, जिसका निर्धारित हिस्सा सरकार में उच्चतम स्तर तक​ पहुंचता है। इसी काले धन के कारण भ्रष्ट धनकुबेरों और भ्रष्ट अफसरों की संख्या में बेतहासा बढोतरी हो रही है। इसी के चलते चुनावों में बेतहासा धन खर्च/विनियोग किया जाता है। जीतने के बाद खर्चे गये/विनियोग किये गये खर्चे का सैकड़ों गुणा वसूला जाता है। जिसका सरलतम रास्ता है—ठेकादारी/अनुबन्ध प्रथा।

डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा बिना पर्याप्त कानून बनाये और वंचित तबके के संवैधानिक अधिकारों को संरक्षण प्रदान किये शुरू की गयी खुली अर्थव्यवस्था के कारण वर्तमान में हर एक जिले में हजारों भ्रष्ट लोग तो मालामाल हो गये, लेकिन लाखों—करोंड़ों लोगों को हमेशा—हमेशा के लिये दलित, वंचित और शोषित बना दिया गया है। जिसकी ओर कोई भी ध्यान देने की जरूरत नहीं समझता है। वर्तमान में निर्वाचित होकर विधायिका में पहुंचने वाले जनप्रतिनिधियों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बहुत बड़ी संख्या शोषक ठेकेदारों की भी है। इस कारण इस बारे में कभी भी विधायिका में कोई सुधारात्मक चर्चा नहीं होती है। ऐसे में वंचित तबका लगातार शोषण के दुष्चक्र और गरीबी के अंधकूप में समाता जा रहा है। जिसके चलते दैहिक शोषण सहित अनेकों प्रकार के अपराधों में वृद्धि हो रही है। किसान आत्महत्या करने को विवश हैं और देश का मोस्ट वर्ग प्रशासन में प्रस्तावित संवैधानिक हिस्सेदारी के मूल अधिकार से असंवैधानिक तरीके से वंचित किया जा रहा है।

इस प्रायोजित समस्या का समाधान उन्हीें सत्ताधारी लोगों अर्थात् डॉ. मनमोहन सिंह के मानसपुत्रों के अधिकार क्षेत्र में है, जिन्होंने इसे अर्थव्यवस्था में सुधार के नाम पर जन्म देकर पोषित किेया है। अर्थात् कार्यपालिका और विधायिका द्वारा न्यायसंगत कानून बनकार ठेकेदारों के अधीन कार्यरत मजदूरों एवं कर्मकारों को न्यायसंगत वेतन, भत्ते, भविष्य निधि, चिकित्सा सुविधा, आपात निधि आदि की व्यवस्था करके इस समस्या का स्थायी निराकरण सम्भव है, लेकिन ऐसे जरूरी और न्यायसंगत कानून बनाते ही ऊपर तक पहुंचने वाला कमीशन मिलना बन्द हो जायेगा। इस कारण स्थित विकट हो चुकी है।

अत: शोषण और अन्याय के खिलाफ सच्चे इरादों से प्रयासरत हम लेखकों, चिन्तकों और मीडिया से जुड़े लोगों का दायित्व है कि हम जनागरण के जरिये इस अत्यधिक समस्या को समाज और सरकार के सामने लायें। जिससे शोषण और अन्याय के खिलाफ जनमत खड़ा हो सके और वर्तमान शोषक व्यवस्था से मुक्ति के लिये सख्त कानून बनाने को सरकार को विवश किया जा सके। याद रहे एकजुट जनमत के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी है। आइये—एकजुट होना शुरूआत है।
- : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' 9875066111/03-04-2016/08.25 AM
@—लेखक का संक्षिप्त परिचय : मूलवासी-आदिवासी अर्थात रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया। होम्योपैथ चिकित्सक और दाम्पत्य विवाद सलाहकार। राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोसिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक) और पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ।

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Saturday, February 27, 2016

केवल आदिवासी ही भारत के मूलवासी हैं।

केवल आदिवासी ही भारत के मूलवासी हैं।
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
हमारे कुछ मित्र दिन-रात "जय मूलनिवासी" और "मूलनिवासी जिंदाबाद" की रट लगाते नहीं थकते। बिना यह जाने और समझे कि मूलनिवासी का मतलब क्या होता है? साथ ही भारत के 85 फीसदी लोगों को भारत के मूलनिवासी घोषित करके, शेष आबादी ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय को विदेशी बतलाते हैं। आश्चर्य कि इनमें से बहुत से खुद को तर्क के समर्थक महामानव बुद्ध के अनुयायी भी बतलाते हैं, लेकिन इनको व्यवहार में बुद्ध के तर्क के सिद्धांत से परहेज है। तर्क करने वाला इनको मूर्ख, गद्दार और मनुवादियों का एजेंट नजर आता है। मूलनिवासी का नारा देने वाले शीर्ष लोग एक विशेष तबके या विशेष मानसिकता के लोग हैं, जो खुद को बुद्धिजीवियों का शिरोमणि मानते हैं। सबसे बड़ा दुःख तो यह है कि इनका बाबा आंबेडकर या कांशीराम या अन्य किसी के मिशन या सामाजिक न्याय या संविधान के प्रावधानों से कोई सरोकार नहीं है। इनको वंचित वर्ग शूद्रों की समस्याओं से भी कोई मतलब नहीं है। इनका लक्ष्य येनकेन प्रकारेण सत्ता पर कब्जा करना है, जिसके लिये इनको नरेंद्र मोदी का प्रचार करने वाली और बामणों को आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करने वाली मायावती साक्षात देवी नजर आती हैं। आएं भी क्यों नहीं, आखिर मायावती के सहारे पहले की भाँति सत्ता की मलाई मिलने की उम्मीद जो जगी रहती है। इनको बाबा साहब और कांशीराम की संदिग्ध मौत की जांच की मांग करना तो दूर इस बारे में बात करना तक गवारा नहीं है। ऐसे लोग भारत की सत्ता पर कब्जा करने के सपने देखते हैं, जिनको बोलने, लिखने और संवाद करने की तहजीब तक नहीं? हकीकत में ऐसे लोग अभिव्यक्ति की आजादी को कुचल देना चाहते हैं। मूलाधिकारों में इनकी कोई आस्था नहीं। वंचित वर्गों की संख्यात्मक दृष्टि से छोटी-छोटी जातियों के प्रति इनके मन में कोई मान-सम्मान या जगह नहीं। सच में इनका व्यवहार ब्राह्मणों से कई गुना अधिक दुराग्रही और तानाशाही है। इनके लिए वंचित वर्गों के महान लोग, जैसे ज्योतिराव फ़ूले, बिरसा मुंडा, पेरियार, बाबा साहब, कांशीराम आदि के विचार, काम और नाम केवल सत्ता पाने की सीढ़ी मात्र हैं। इनको इतनी सी बात समझ में नहीं आती कि आज भारत का प्रत्येक वह व्यक्ति भारत का मूलनिवासी है, जिसके पास मूलनिवास प्रमाण-पत्र है! ये लोग प्रायोजित और तथाकथित डीएनए को आधार बनाकर तर्क करते हैं, लेकिन हजारों सालों से बामणों और आर्य शासकों के यौनाचार के साथ-साथ विवाहेत्तर यौन सम्बंधों के कार्ब उटप्पन्न वर्णशंकर संतति के कड़वे सच पर विचार, चर्चा और तर्क नहीं करना चाहते। इनका मकसद केवल सत्ता है, सत्ता भी वंचित वर्ग के उद्धार के लिए नहीं, बामणों के साथ समझौता करके माल कमाने और नरेंद्र मोदी का प्रचार करने के लिए चाहिए। सत्ता चाहिये जिससे बामणों के हित में अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम को निलम्बित किया जा सके। संघ के लिए राम मन्दिर और धारा 370 का जो महत्व है, वही इनके लिए मूलनिवासी का अर्थ है। अर्थात लोगों को गुमराह करके वोट बैंक तैयार करना। इसलिए ये लोग सत्ता की खातिर वंचित वर्गों को मूलनिवासी के बहाने लगातार गुमराह कर रहे हैं। मूलनिवासी शब्द के बहाने ये लोग केवल खुद को अर्थात एक विशेष तबके को भारत के मूलवासी घोषित करना चाहते हैं। इनसे मेरा सीधा सवाल है कि यदि वास्तव में इनके पूर्वज भारत के मूलवासी थे तो मूलनिवासी जैसे हल्के शब्द को गढ़ने की क्या जरूरत है? अपने आप को भारत के मूलवासी अर्थात आदिवासी क्यों नहीं मानते? सारा संसार जानता है कि भारत के मूलवासी तो आदिवासी हैं। मूलनिवासी तो प्रत्येक देश के सभी नागरिक होते हैं। ईसाई, पारसी, यहूदी, आर्य-क्षत्रिय-शूद्र, अछूत, दलित, ओबीसी, घुमन्तु, विमुक्त, आदिवासी, हूँण, कुषाण, शक, मंगोल, मुगल, आर्य-ब्राह्मण और वैश्यों सहित सभी के वंशज जो भारत के नागरिक हैं, आज कानूनी तौर पर भारत के मूलनिवासी हैं, लेकिन भारत के मूलवासी नहीं हैं। भारत के मूलवासी केवल भारत के आदिवासी हैं। हाँ यदि इतिहास या अन्य किन्हीं साक्ष्य के मार्फत किन्हीं अन्य जाति, समुदायों के भारत के मूलवासी और आदिवासी होने के प्रमाण प्रकट होते हैं, तो सभी को अपने आप को भारत का आदिवासी मानना चाहिये और आदिवासी एकता को मजबूत करना चाहिए। अन्यथा लोगों को गुमराह करने और बुद्ध के नाम की माला जपने और तर्क से भागने का नाटक बन्द करना चाहिए।

जय आदिवासी। जय मूलवासी।
जय भीम। नमो बुद्धाय।
जय भारत। जय संविधान।
नर-नारी सब एक सामान।।
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', 9875066111/27.02.2016.

Thursday, February 25, 2016

आखिर देश बड़ा या आरक्षण? देशद्रोह और राष्ट्रहित क्या है?

आखिर देश बड़ा या आरक्षण?
देशद्रोह और राष्ट्रहित क्या है?
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग में शामिल किसी भी जाति या किसी भी वर्ग या किसी हिस्से की ओर से जब—जब भी सामाजिक न्याय के संवैधानिक हक अर्थात् बराबरी की मांग या गुहार की जाती है, बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्गी मानसिकता के लोगों द्वारा हर बार, विभिन्न माध्यमों से यही सवाल उठाया जाता है कि देश बड़ा या आरक्षण? पहले गूजर आरक्षण आन्दोलन के दौरान और इन दिनों जाट आरक्षण आन्दोलन को लेकर फिर से यही उठाया जा रहा है। जब कभी मुसलमानों की ओर से ऐसा कोई या किसी प्रकार का कोई आन्दोलन किया जाता है तो उन्हें तो इन बकवासवर्गी मानसिकता के लोगों द्वारा सीधे—सीधे देशद्रोही और पाकिस्तान परस्त करार दे दिया जाता है।
ऐसे में सवाल यह है कि आखिर देश है क्या?

अल्पसंख्यक, ओबीसी, दलित, आदिवासी, घुमुंतू, विमुक्त आदि कोई भी वंचित वर्ग अपने हकों की मांग करता है तो उनको बकवासवर्गी लोगों द्वारा हक और हिस्सेदारी दी नहीं जाती। जब संवैधानिक हक एवं समान हिस्सेदारी के लिये सड़कों पर उतरकर आन्दोलन किये जाते हैं तो ऐसे आन्दोलन देशहित के खिलाफ करार दे दिये जाते हैं! बल्कि ऐसे लोगों को देशद्रोही करार दे दिया जाता है। अत: 'आखिर देश है क्या?' इस सवाल का उत्तर तलाशने से पहले हमें 'देशहित और देशद्रोह की परिभाषा क्या है?' इस दूसरे सवाल का उत्तर भी तलाशना होगा।

भारत में बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग के संवैधानिक हक और समान हिस्सेदारी की बात या मांग करना, बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्गी लोगों की नजर में देशद्रोह है। राष्ट्रहित के विरुद्ध है। क्योंकि राष्ट्रहित और देशद्रोह की परिभाषा गढने का हक भी सत्ता पर हजारों सालों से काबिज इसी बकवासवर्गी मानसिकता के लोगों द्वारा अपने पास कैद किया हुआ है। जिसे बकवासवर्गी मीडिया लगातार बकवास वर्ग के पक्ष में हवा देता रहता है। बकवासवर्गी मीडिया, बकवासवर्गी विचारों के पक्ष में और वंचित मोस्ट वर्ग के विरुद्ध लोगों को गुमराह तैयार करता रहता है। जिसे बकवासवर्गी लोग जनमत कहते हैं। जब भी बकवास वर्ग के असंवैधानिक और जबरन काबिज हितों में कमी होने की आशंका नजर आती है, ऐसे प्रयाय देश के विरुद्ध करार दे दिये जाते हैं। मांग करने वालों को देशद्रोही करार दे दिया जाता है।

अत: भारत में बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग को गम्भीरतापूर्वक इस कड़वी सच्चई को जितना जल्दी सम्भव हो समझने की जरूरत है कि आखिर बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्गी लोगों के शोषण या मनमानी या तानाशाही या मनुवादी आतंक के विरुद्ध या बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग के संवैधानिक हक और समान हिस्सेदारी के समर्थन में कोई भी मांग या आन्दोलन देशद्रोह क्यों है? राष्ट्रहित के विरुद्ध क्यों है? इस सवाल का उत्तर जान लेने के बात स्वत: ही इस सवाल का जवाब मिल जायेगा कि 'आखिर देश है क्या?'

वास्तव में देखा जाये तो इन दिनों—'बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्ग' की सत्ता, मनमानी, बकवास वर्ग का मनुवादी आतंक, शोषण, बलात्कार, गुण्डाराज और तानाशाही ही देश का पर्याय बन चुके हैं। इन सब अपराधों के विरुद्ध कोई भी मांग, गुहार या आन्दोलन बकवास वर्गी लोगों द्वारा देशद्रोह और राष्ट्रहितों के विरुद्ध करार दे दिये जाते हैं! आरक्षण भी बकवासवर्गी लोगों के प्रशासनिक अधिपत्य को तोड़ता है, अत: इनकी दृष्टि में राष्ट्रहित के विरुद्ध है।

यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि बकवासवर्गी मीडिया के मार्फत जाट आन्दोलन के दौरान हिंसा तथा अपराध की जो खबरें प्रकाशित, प्रचारित एवं प्रसारित की जा रही हैं, यदि वे सच हैं तो निन्दनीय हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जाटों को इस आन्दोलन के लिये विवश किसने और क्यों किया?

जब त​क भारत के बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग को उसके सभी संवैधानिक हक और समान हिस्सेदारी नहीं मिलेगी, वंचित मोस्ट वर्ग का आक्रोश ऐसे आन्दोलनों में प्रकट होता रहेगा। दु:ख इस बात का है कि ऐसे आन्दोलनों से पीड़ित होने वाले में अधिकतर मोस्ट वर्ग के लोग ही होते हैं। बकवास वर्ग ऐसे आन्दोलनों से अप्रभावित ही रहता है। अत: भारत के बहुसंख्यक वंचित MOST=(Minority+OBC+SC+Tribals) वर्ग को संवैधानिक हकों और समान हिस्सेदारी के लिये ऐसी योजना और रणनीति बनाने की जरूरत है कि 'बकवास (BKVaS=B-ब्राह्मण+K-क्षत्रिय+Vaवैश्य+Sसंघी) वर्ग' तुरन्त घुटने टेकने को मजबूर हो जाये। देश के मोस्ट वर्ग के चिन्तनशील लोगों को इस बारे में तत्काल गम्भीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।

जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी सब एक समान!!
@—लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोशिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक), पूर्व रा महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ, दाम्पत्य विवाद सलाहकार तथा लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में एकाधिक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित। वाट्स एप एवं मो. नं. : 9875066111 / दि.25.02.16/ 08.54AM
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—निवेदक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Sunday, April 28, 2013

भारत का बलात्कार करने वाले लड़ रहे हैं बलात्कार की लड़ाई!

सच तो ये है कि भारत का मतलब है भारत के असली मालिक, जो आज हर क्षेत्र में सबसे निचले पायदान पर वंचित वर्गों में शामिल हैं और इन्हीं वंचित वर्गों के हकों और स्वाभिमान का, हर क्षेत्र में दिनरात बेरोकटोक बलात्कार होता रहता है, जो वास्तव में भारत के साथ बलात्कार है। लेकिन भारत के साथ हजारों सालों से बलात्कार करने वाले इन 15 फीसदी वर्ग के लोगों में शामिल कुछ चालाक और षड़यंत्रकारी आज खुद आम आदमी की टोपी पहनकर और भगवा वस्त्र धारण करके बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करने का नाटक खेल रहे हैं। इस  षड़यंत्र में कॉंग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी बुरी तरह से फंस चुकी है, क्योंकि कॉंग्रेस पार्टी में भी, कॉंग्रेसी चोला धारण किये हुए, इन फासिस्ट और देशद्रोहियों के ऐजेंट नीति-नियन्ता पदों पर पदस्थ हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान मेरे हाथ में है, जो मुझे आम आदमी पार्टी की अजमेर (राजस्थान) की महिला कार्यकर्ता (या पदाधिकारी) मैडम कीर्ति पाठक जी ने मेल के जरिये ये दिखाने के लिये भेजा है, कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ सच में ‘‘आम आदमी’’ की पार्टी है। मैडम कीर्ति जी ने मेरे किसी लेख को पढकर पहले तो बड़े ही संयमित तथा शिष्ट तरीके से मुझसे मोबाइल पर बात की और फिर कहा कि अन्याय के खिलाफ संघर्षरत हम सभी लोगों को एक-दूसरे की कमियों को दिखाने के बजाय ‘‘आम आदमी’’ की परेशानियों के लिये मिलकर आम आदमी की लड़ाई में शामिल होना चाहिये। मैडम कीर्ति जी का कहना था कि इसके लिये ‘‘आम आदमी पार्टी’’ अरविन्द केजरीवाल जी के नेतृत्व में देशभर में अन्याय के खिलाफ संघर्षरत लोगों को एकजुट करके और साथ लेकर आम आदमी की समस्याओं के लिये संघर्ष कर रही है।

मुझे मैडम कीर्ति जी से मोबाइल पर बात करके अच्छा लगा और जब उनकी ओर से मेल के जरिये ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान और ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संकल्प पत्र (विजन डॉक्यूमेंट) मिला तो इस बात की प्रसन्नता हुई कि मैडम कीर्ति जी ने जो वायदा किया उसे पूरा किया। स्वाभावत: मैंने दोनों ही दस्तावेजों को अद्योपान्त बढा। जिस पर विस्तृत प्रतिक्रिया तो फिर कभी, लेकिन फिलवक्त तो देश की राजधानी नयी दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ लोगों के गुस्से के संदर्भ में लिखना असल मकसद है।

नयी दिल्ली में बलात्कार की घटनाओं के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों के दौरान भीड़ में अधिकतर लोगों में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की टोपी पहनने वाले और भाजपा या भाजपा से सम्बद्ध संगठनों का झंडा हाथ में लिये लोगों का टीवी पर दिखना आम बात है। जिससे लगता है कि बलात्कार की सर्वाधिक चिन्ता इन्हीं दो राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं को है। इसके अलावा टेलीवीजन पर खबरों को बेचने वालों को तो बलात्कार की सर्वाधिक चिन्ता सता ही रही है।

आम आदमी पार्टी की टोपी पहने लोग, जिस पर लिखा होता है-‘‘मैं हूँ आम आदमी’’ नयी दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करते नजर आते हैं। जो अपने इस संघर्ष को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिये देशभर के लोगों का गुस्सा दिखलाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते हैं। जिससे टीवी देखने वाला आम आदमी इस भ्रम में पड़ जाता है कि भारत की राजधानी महिलाओं के लिये सुरक्षित नहीं है और महिलाओं की सुरक्षा की सर्वाधिक चिन्ता यदि किसी को है तो ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को है। पहले इस मामले में भाजपा प्रथम स्थान पर हुआ करती थी। अब ‘‘आम आदमी पार्टी’’ ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। यही नहीं ‘‘आम आदमी पार्टी’’ हर उस मामले में आम आदमी के साथ दिखना चाहती है, जिससे वो ये दिखा सके कि वास्तव में आम आदमी की चिन्ता केवल और केवल ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को ही है।

संयोग से ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के सभी बड़े कर्ताधर्ता नयी दिल्ली में या आसपास में रहते हैं और छनछन कर प्राप्त होने वाली खबरों के मुताबिक इस समय देश को अस्थिर करने वाली ताकतें भारत के मीडिया को खरीद चुकी हैं। इसलिये मीडिया फासिस्टवादी और कमजोर लोगों के खिलाफ षड़यन्त्र करने वाली ताकतों का जमकर गुणगान कर रहा है। इन्हीं ताकतों में, ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को शामिल करना मेरी बाध्यता है, क्योंकि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के मुखिया दिल्लीवासियों से बिजली का बिल जमा नहीं करने का आह्वान करते हैं और स्वयं अपने बिजली के बिल सही समय पर जमा करवाते हैं। इस प्रकार आम लोगों को सरकार से लड़ाने का काम करते हैं। यह आम आदमी के साथ ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का खुला षड़यंत्र है।

द्वितीय ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान में इस बात को स्वीकार किया गया है कि-‘‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ वर्गों में शामिल लोग सामाजिक रूप से वंचित समूह हैं। इन वर्गों की आबादी देश की कुल आबादी का पिच्यासी फीसदी बतायी जाती है। अर्थात् इन वंचित समूहों के लोग ही इस देश में असली वंचित और आम आदमी हैं।

अत: देश की पहली प्राथमिकता इन वंचित वर्गों का उत्थान करना होनी चाहिये। ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नजर में भी स्वाभाविक रूप से इन्हीं वंचित समूहों के लोगों को इस देश का ‘‘आम आदमी’’ होना चाहिये और ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के ‘‘नीति-नियन्ता अर्थात् असली कर्ताधर्ता’’ पदों पर भी इन्हीं वंचित समूहों और वर्गों के लोगों का संवैधानिक अधिकार होना चाहिये। अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान में ऐसी सुस्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिये, जिससे कि देश की पिच्यासी फीसदी आबादी के वंचित समूहों, जो हकीकत में देश के ‘‘आम आदमी’’ हैं के हाथों में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की कमान होनी हो। 

लेकिन इस देश के आम आदमी का दुर्भाग्य यहॉं भी उसका साथ नहीं छोड़ता है और आम आदमी के नाम पर बनायी गयी ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान कहता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कुल तीस सदस्य होंगे और इन तीस पदों पर पदस्थ राष्ट्रीय कार्यकारिणी द्वारा ही देशभर में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नीतियों का निर्धारण, नीतियों का संचालन एवं क्रियान्वयन किया जायेगा, लेकिन ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान दूसरी बात यह कहता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नीतियों का निर्धारण करने में इस देश के वंचित समूहों में शामिल ‘‘आम आदमी’’ की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होगी। अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान के अनुसार देश के पिच्यासी फीसदी वंचित समूहों अर्थात् ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ के अधिकतम केवल पांच लोग ही ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा हो सकेंगे।

अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कुल तीस पदों में से पच्चीस पद उन ताकतवर वर्गों के लोगों के पास होंगे, जिनके अन्याय के और शोषण के कारण ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ वर्गों के लोग सामाजिक रूप से वंचित बनाये जा चुके हैं। अर्थात् जो 15 फीसदी शोषक वर्ग पिच्यासी फीसदी लोगों के पिछड़ेपन का कारण हैं, उसी वर्ग के शोषक और अन्यायी लोग आम आदमी के नाम पर ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संचालन करेंगे। केवल यही नहीं, बल्कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान वंचित वर्गों के विरुद्ध यहॉं तक नकारात्मक प्रावधान भी करता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सामाजिक रूप से वंचित उक्त समूहों अर्थात् के देश के 85 फीसदी लोगों का अधिकतम प्रतिनिधित्व 16 फीसदी से अधिक नहीं हो सकेगा और देश की 85 फीसदी आबादी को सामाजिक रूप से वंचित बनाये रखने, उनका शोषण एवं अन्याय करने वाले 15 फीसदी लोगों को ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 84 फीसदी से भी अधिक पदों पर पदस्थ होने का संवैधानिक अधिकार होगा।

इन तथ्यों से इस बात को प्रमाणित करने की जरूरत नहीं रह जाती है कि इस देश की 85 फीसदी आबादी को असमानता, भेदभाव, शोषण और अन्याय का शिकार बनाने के लिये, शेष 15 फीसदी लोग ही जिम्मेदार हैं। जिसमें स्वयं अपने वर्गों की महिलाओं के साथ किये जाने वाले बलात्कारी भी शामिल हैं। 

इससे भी बड़ी सच्चाई तो यह भी है कि देश की 84 फीसदी आबादी के मान-सम्मान, संवैधानिक, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और जीने के अधिकार का हजारों सालों से बलात्कार करने वाले 15 फीसदी लोगों की जैसी मानसिकता वाले लोगों द्वारा इस देश में आम आदमी के नाम पर ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का गठन किया गया है, जो महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कारों के विरुद्ध दिल्ली में घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। जिन्हें न तो आम आदमी के दु:ख दर्दों से कोई सारोकार है और न हीं आम आदमी के दु:ख दर्दों की कोई पीड़ा है।

सच तो ये है कि भारत का मतलब है भारत के असली मालिक, जो आज हर क्षेत्र में सबसे निचले पायदान पर वंचित वर्गों में शामिल हैं और इन्हीं वंचित वर्गों के हकों और स्वाभिमान का, हर क्षेत्र में दिनरात बेरोकटोक बलात्कार होता रहता है, जो वास्तव में भारत के साथ बलात्कार है। लेकिन भारत के साथ हजारों सालों से बलात्कार करने वाले इन 15 फीसदी वर्ग के लोगों में शामिल कुछ चालाक और षड़यंत्रकारी आज खुद आम आदमी की टोपी पहनकर और भगवा वस्त्र धारण करके बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करने का नाटक खेल रहे हैं। इस  षड़यंत्र में कॉंग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी बुरी तरह से फंस चुकी है, क्योंकि कॉंग्रेस पार्टी में भी, कॉंग्रेसी चोला धारण किये हुए, इन फासिस्ट और देशद्रोहियों के ऐजेंट नीति-नियन्ता पदों पर पदस्थ हैं।

-लेखक : होम्योपैथ चिकित्सक, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिसट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन और राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास), मोबाइल : 085619-55619, 098285-02666