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Friday, January 1, 2016

उमराव सालोदिया का उमराव खान हो जाना


उमराव सालोदिया का उमराव खान हो जाना
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राजस्थान के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी उमराव सालोदिया ने मुख्य सचिव नहीं बनाये जाने से नाराज हो कर स्वेच्छिक सेवा निवृति लेने तथा हिन्दुधर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने की घोषणा कर सनसनी पैदा कर दी है ।
राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार से अब न उगलते बन रहा है और न ही निगलते। यह सही बात है कि वरीयता क्रम में वे मुख्य सचिव बनने के लिए बिलकुल पात्र थे और यह भी सम्भव था कि वे राज्य के पहले दलित मुख्य सचिव बन जाते मगर भाजपा सरकार ने वर्तमान मुख्य सचिव सी एस राजन को तीन माह का सेवा विस्तार दे कर सालोदिया को वंचित कर दिया ।
सेवा एवम् धर्म छोड़ने की घोषणा करते हुए सालोदिया ने यह भी कहा कि उन्हें सेवाकाल के दौरान सामान्य वर्ग के एक व्यक्ति ने बहुत परेशान किया ,जिसकी प्राथमिकी दर्ज कराये जाने के बावजूद उस व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी।सालोदिया ने यह भी कहा कि वे समानता की चाह में इस्लाम कबूल कर रहे है । हालाँकि उन्होंने यह भी बताया कि उनकी इस्लाम में रूचि लंबे समय से है और उन्होंने इस्लाम को भली भांति पढ़ समझ कर ही धर्मान्तरण का फैसला किया है।
उमराव सालोदिया अब उमराव खान बन चुके है। उनके धर्म परिवर्तन करने पर मिश्रीत प्रतिक्रियाएं आई है ।राज्य के गृह मंत्री गुलाब चन्द कटारिया ने इसे व्यक्तिगत निर्णय बताते हुए कहा कि अगर उनके साथ अन्याय हुआ है और उन्हें लगता है कि उन्हें वंचित किया गया है तो उसका विरोध उचित फोरम पर किया जा सकता था। चिकित्सा एवम् स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ ने इसे सेवा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन करार देते हुए कहा कि वे पद पर रहते हुए इस तरह प्रेस वार्ता कैसे कर सकते है । उन्हें दूसरे मान्य तरीके अपनाने चाहिए ।
यह तो निर्विवाद तथ्य है कि उन्हें मुख्य सचिव बनाया जाना चाहिये। यह उनका हक़ है जिसे सरकार ने जानबूझ कर छीना है मगर उनके इस तरीके और इस्लाम कबूल करने को लेकर दलित बहुजन आंदोलन ने भी कई सवाल खड़े करके उन्हें इस लड़ाई में अकेला छोड़ दिया है।
दरअसल विगत कुछ दिनों से दलित समुदाय के युवा सोशल मीडिया के ज़रिये उमराव सालोदिया को मुख्य सचिव बनाने की पुरजोर मांग कर रहे थे।इन उत्साही अम्बेडकर अनुयायियों को उमराव सालोदिया के इस आकस्मिक और एकाकी निर्णय ने निराश कर दिया है।अब तक उनके पक्ष में खड़े लोग ही अब पूंछ रहे है कि उमराव सालोदिया उमराव गौतम क्यों नहीं हुए ? जिस अम्बेडकर की वजह से वे इतने बड़े पद तक पंहुचे उनका मार्ग क्यों नहीं लिया खान साहब ने ?
दलित बहुजन आंदोलन को इस्लाम से ना तो परहेज़ है और ना ही कोई दिक्कत ,परेशानी उमराव सालोदिया के तरीके और निर्णय से है। बिना संघर्ष किये ही उनके नौकरी छोड़ने के निर्णय को पलायन माना जा रहा है तथा बुद्ध धर्म नहीं अपनाने की कड़ी आलोचना हो रही है।
दलित युवा सोशल मीडिया पर बहस छेड़े हुए है कि अब वे दलितों की समानता के मिशन के लिए काम करेंगे अथवा दीन की तब्लीग के लिए जमाती बन जाएंगे। यह भी प्रश्न उठाया जा रहा है कि अगर उनके साथ नौकरशाही में रहते हुए लंबे अरसे से अन्याय व भेदभाव हो रहा था तो वे इतने समय तक खामोश क्या सिर्फ मुख्य सचिव बनने की झूठी आशा में थे ? यहाँ तक पूंछा जा रहा है कि क्या अगर उन्हें चीफ सेकेट्री बना दिया जाता तो उनकी नज़र में हिन्दू धर्म समानता का धर्म हो जाता ? अब लोग यह भी जानना चाह रहे है कि क्या उन्होंने बौद्ध धर्म को पढ़ा है ?
जो उमराव सालोदिया को जानते है उनके मुताबिक वे कभी भी आंबेडकर की मुहिम में शामिल नहीं रहे है और ना ही उन्हें मुक्तिकामी कबीर, फुले, अम्बेडकर की विचारशरणी से कोई मतलब रहा है।यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें समाज हित में एक सामूहिक फैसला ले कर नज़ीर स्थापित करनी चाहिए थी ।उन्हें अपने साथ हुए भेदभाव और वंचना के प्रश्न को समाज जागृति का हथियार बनाना चाहिए था मगर वे इससे चूक गए और इसे केवल निजी हित का सवाल बना डाला है।संभवतः उमराव सालोदिया से यह चूक इसलिए हुयी है क्योंकि उनका जुड़ाव समुदाय से लगभग नहीं के बराबर रहा है । वे पूरे सेवाकाल में इन्हीं लोगों के होने में लगे रहे जैसे अधिकांश बड़े दलित अधिकारी करते है।
यह बात कुछ हद तक सही भी है कि जो अधिकारी और राजनेता समाज से कट कर जीते है फिर उन्हें अपनी लड़ाई अक्सर अकेले ही लड़नी होती है और फिर वे ऐसे ही अदूरदर्शी निर्णय ले कर अपनी तथा अपने वर्ग की किरकिरी करा बैठते है।
बेहतर होता कि उमराव सालोदिया इस लड़ाई को थोडा पहले शुरू करते और अंत तक लड़ते ,मगर उन्होंने योद्धा बनने के बजाय भगौड़ा बनना स्वीकार किया है ,जिसका दलित बहुजन आंदोलन ने स्वागत करने से साफ इंकार कर दिया है।अब दलित किसी धर्म में मुक्ति नहीं देखते,क्योंकि उन्हें मुक्ति संघर्ष में दिखाई देती है पलायन में नहीं ।
- भंवर मेघवंशी
( लेखक स्वतन्त्र पत्रकार है ,उनसे Bhanwar meghwanshi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है )





Sunday, April 19, 2015

मनुवाद से मुक्ति, शुरूआत कैसे?

मनुवाद से मुक्ति,  शुरूआत कैसे?
मनुवादी-धार्मिक-अंधविश्वासों के चलते हर दिन सैकड़ों लोग बेमौत मारे जा रहे हैं!
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सोशल मीडिया के मार्फ़त देशभर में मनुवाद के खिलाफ एक बौद्धिक मुहिम शुरू हो चुकी है। जिसका कुछ-कुछ असर जमीनी स्तर पर भी नजर आने लगा है! लेकिन हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विचारणीय सवाल यह है कि यदि हमें मनुवाद के खिलाफ इस मुहिम को स्थायी रूप से सफल बनाना है तो हमें वास्तव में इस देश के बहुसंख्यक लोगों को और विशेषकर आम लोगों को साथ लेना होगा, जिनको बामसेफ और बसपा वाले बहुजन कहते और लिखते हैं, लेकिन हकीकत में मनुवाद बामसेफ और बसपा के नेतृत्व द्वारा परिभाषित देश के बहुसंख्यक अर्थात बहुजनों के कंधे पर पर ही ज़िंदा है। इसलिए हमें ऐसा सरल और व्यावहारिक रास्ता निकालना होगा, जिससे कि दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक अर्थात सभी अनार्य भारतीय केवल कागजों पर ही नहीं, बल्कि दैनिक व्यवहार में भी मनुवाद के विरुद्ध स्वेच्छा से एकजुट हो सकें, जिसके लिए मनुवाद के विरुद्ध केवल अतिवादी सोच या अतिवादी लेखनी मात्र से कुछ नहीं होगा। बल्कि ऎसी अतिवादी सोच या लेखनी हमें हमारे आम लोगों से दूर भी ले जा सकती है। यह मुहिम दोधारी तलवार जैसी है। मेरा मानना है कि हमें हमारे अनार्य लोगों के साथ सीधा संवाद कायम करना होगा। वातानुकूलित कक्षों से बाहर निकलकर हमें लोगों के बीच जाना होगा, क्योंकि चालाक आर्यों ने मनुवाद को हजारों सालों से धर्म की चासनी में लपेट रखा है। समस्त अनार्य, आर्यों के मनुवादी षड्यंत्र के शिकार होते आये हैं। आज भी मानसिक रूप से हमारे लोग मनुवादियों के गुलाम हैं और सबसे दुखद तो यह है कि उनको इस गुलामी का अहसास ही नहीं है, बल्कि इस मानसिक गुलामी को अनार्य लोग धार्मिक स्वाभिमान और आस्था का प्रतीक मान चुके हैं। उनके अवचेतन मन पर मनुवाद ही धर्म के रूप में स्थापित हो चुका है। हमारे ही लोगों को मनुवाद का विरोध, पहली नजर में धर्म का विरोध नजर आता है, ऐसे में हमें यह विचार करना होगा कि हम किस प्रकार से अपने लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत किये बिना, उनको किस प्रकार से मनुवाद से मुक्ति दिला सकते हैं? क्योंकि यदि हम बिना विचारे मनुवाद और मनुवादी धार्मिक प्रतीकों का सीधा विरोध करते रहे तो ऐसे में सबसे बड़ा खतरा यह है कि आर्य-मनुवादियों तथा अनार्य मनुवादी अंधभक्तों द्वारा हमारी मुहिम को कमजोर करने के लिए हमारे मनुवाद विरोधी सही, सच्चे और तार्किक विचारों को भी हिन्दू धर्म विरोधी करार दिए जाने के लिए पूरे प्रयास किये जायेंगे। बल्कि किये भी जा रहे हैं। जातीय खाप पंचायतों को हमारे खिलाफ खडा किया जा सकता है। जिनमें न तर्क सुने जाते हैं और न ही वहां पर, उनसे न्याय की अपेक्षा की जा सकती है! यही नहीं धर्म के नाम पर हमारे ही लोग हमारे खिलाफ खड़े हो सकते हैं! जिससे हमारी मुहिम पहले दिन से कमजोर हो जाती है। अत: हमको आत्मचिन्तन करना होगा कि मनुवाद के दुश्चक्र को कैसे परास्त किया जाए? इसके लिए हर उस व्यक्ति को जो मनुवाद से आहत है, उसको गहन चिन्तन और मनन करना होगा! यद्यपि मेरा निजी अनुभव है कि मनुवाद से सर्वाधिक आहत मेहतर जाति के लोग तक मनुवाद का खुलकर विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं! लेकिन यह भी सच है कि मनुवाद से मुक्ति के बिना भारत के अनार्यों, मूल निवासियों और वंचित वर्गों के लिए संविधान के अनुसार सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना असम्भव है! इसलिए हमें हर हाल में, लेकिन बौद्धिक तरीके से मनुवाद मुक्त समाज की स्थापना के लिए अनेक स्तरों पर लगातार प्रयास करने होंगे! सबसे पहले हम धर्म के नाम पर संचालित अवैज्ञानिक-अंधविश्वासों और स्वास्थ्य के साथ किये जाने वाले खिलवाड़ के प्रति आम लोगों में जागरण लाना होगा! जैसे उदाहरण के लिए हमें हमारे लोगों को समझाना होगा कि-रात दिन मंदिर, मस्जिद या चर्च में रहने वाला पुजारी, मौलवी या पादरी जब बीमार होता है तो वह अपना उपचार करवाने के लिए सीधा डॉक्टर के पास जाता है, जबकि अनार्य अनपढ़ और भोले लोग बीमार होने पर पुजारी, मौलवी या पादरी के पास जाते हैं! जहां इनको-झाड, फूंक, व्रत, भजन, कीर्तन, पाठ, सवामणी, कथा, गंदा, ताबीज आदि उपचार बतलाये जाते हैं और इस प्रकार मनुवादी धार्मिक अन्धविश्वास के चक्कर में हमारे लोग अपनी बीमारी को असाध्य बना लेते हैं! दुष्परिणामस्वरूप बीमारी इतनी असाध्य हो जाती है, जिसका डॉक्टर भी उपचार करने से इनकार कर देते हैं! बीमार की अकाल मौत हो जाती है! लेकिन मनुवादी इसे भी ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करने और बीमार की अकाल मृत्यु पर भी पुण्य-दान करने की सलाह देते हैं! एक कडवी सच्चाई यह भी है कि ऐसे मनुवादी-धार्मिक-अंधविश्वासों के चलते हर दिन सैकड़ों लोग बेमौत मारे जा रहे हैं! ऎसी मौतों के बाद भी मनुवादियों द्वारा हमें बतलाया जाता है कि दान-पुण्य करने से मृतक को मोक्ष मिलेगा और मृत-आत्मा को पाप नीच योनी से मुक्ति मिलेगी! यदि और कुछ नहीं कर सकते तो हम ऎसी पोंगापंथी धूर्त मनुवादी कहानियों से तो हम अपने अनार्य बन्धुओं को बचा ही सकते हैं! शुरूआत में ऐसे प्रयोग मनुवादी शिकंजे से मुक्ति के पुख्ता आधार बन सकते हैं!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 19.04.2015

Monday, February 9, 2015

यदि भाजपा मांझी को समर्थन देती है तो मांझी का अत्यंत बुरा अंत तय है।

यदि भाजपा #मांझी को समर्थन देती है तो मांझी का अत्यंत बुरा अंत तय है।

बिहार के सबसे विवादास्पद मुख्यमंत्री बना दिए गए #जीतनराम मांझी जनता दल में शामिल होने से पहले कांग्रेसी हुआ करते थे। वह डॉ. जगन्नाथ मिश्र की राज्य सरकार में राज्यमंत्री भी रहे। जनतादल में बिखराव के बाद में जीतनराम मांझी लालू प्रसाद के साथ गए और राष्ट्रीय जनता दल की सरकार मे मंत्री रहे। फिर वह लालू को छोड़ कर नीतीश के साथ हो गये और उनकी सरकार में मंत्री बने। मुख्य मंत्री बनने से पूर्व तक मध्य बिहार में जीतनराम मांझी की छवि एक सीधे-सादे गैर-विवादास्पद राजनेता की रही है। 

जीतनराम मांझी के बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में लगभग आठ महिने के कार्यकाल को देखें तो अपने दामाद को मुख्यमंत्री कार्यालय में पदस्थापित कराने के अलावा उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसे गरिमाहीन या अनैतिक कहा जा सके। दामाद के मामले में भी उन्होंने फ़ौरन कार्रवाई की और उन्हें पदमुक्त कर दिया। 

मनुवादी मीडिया ने मांझी के हर एक सच्चे बयान को विवादित बतलाने और बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। #जनता दल (यू) के नेताओं-विधायकों की मांझी के बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया को भी मीडिया द्वारा ऐसे पेश किया गया, जैसे कि मांझी नीतीश के खिलाफ या सवर्णों और आर्यों के बारे में सच्ची बात बोलकर अपराध कर रहा हैं। 

इस प्रष्ठभूमि में देखा जाए तो बिहार के मुख्‍यमंत्री जीतनराम मांझी का कद केवल बिहार के #महादलितों में ही नहीं, बल्कि बहुत कम समय में देशभर के #दलितों, #पिछड़ों और #आदिवासियों में भी तेजी बढ़ा। जिसे नीतीश और जनता दल (यू) ने बगावत करार दिया। 

जीतनराम मांझी के बगावती तेवर और नीतीश के मुख्‍यमंत्री बनने की जल्‍दबाजी ने 'जनता परिवार' के एकीकरण का सारा खेल बिगाड़ दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आपात स्थिति में नीतीश कुमार ने जिस मांझी को सरकार रूपी नैया की पतवार सौंपी थी, वही आज बगावती सुर अलापकर नैया मझधार में डुबोने पर क्‍यों अमादा हैं?

सारा देश जनता है कि लोकसभा चुनाव में जनता दल (यू) के अत्यधिक घटिया प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 19 मई, 2014 को अपनी कार से जीतन राम मांझी के साथ राजभवन पहुंचे थे। सरकार की कमान संभालने के लायक उन्होंने जीतन राम मांझी को ही समझा था। वही मांझी आज उनके लिए खतरा दिखाई दे रहा है। लेकिन इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करना भी जरूरी है। 

मांझी ने 20 मई, 2014 को 17 अन्य मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। नीतीश ने कहा था कि मांझी सरकार चलाएंगे और वह (नीतीश) संगठन का काम देखेंगे। सवाल यह है कि इन आठ महीनों में ऐसा क्या हो गया? क्‍यों बागी हुए जीतनराम मांझी, जानिये ये रहे असली कारण :-

-नीतीश मांझी को रिमोट से चलाना चाहते थे जो मांझी को कतई भी मंजूर नहीं था। 

-बिहार के भाजपा के कद्दावर नेता सुशील कुमार मोदी सारे विकल्प खुले रहने के बयान देकर भाजपा के समर्थन के स्पष्ट संकेत दिए। दूसरी और उमा भारती ने अपने पटना दौरे के दौरान मांझी से मुलाकात की थी और उन्हें सार्वजनिक रूप से 'गरीबों का मसीहा' बताया था। जिससे मांझी भाजपा के संपर्क में माने जाने लगे।

-राजनीति के जानकार कहते हैं कि इतने दिनों में मांझी की तेजी से महत्वकांक्षा बढ़ती  गई है। प्रारंभ से ही मांझी महादलित नेता के तौर पर खुद को स्थापित करने में लगे थे। मांझी बहुत कम दिनों में अपने समाज के नेता बन गए। कई लोग मांझी के पीछे खड़े नजर आते हैं। इसमें कई मंत्री और विधायक भी शामिल हैं। ऐसे में मांझी का हौसला बुलंद हुआ।

-मांझी के सही और कडवे बयानों से जद (यू) नेतृत्व परेशान हो चुका था। ऐसे में पार्टी नेतृत्व ने मांझी से जब इस्तीफा मांगा तो मांझी बागी से दिखने लगे।

-मांझी की नाराजगी लगातार उनके कामों में हस्तक्षेप को लेकर भी है। पिछले दिनों उनके काम को लेकर पार्टी के प्रवक्ताओं द्वारा की गई बयानबाजी से मांझी खासा नाराज हुए थे। इसके बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के स्थानांतरण को भी दो मंत्रियों ने नियम विरुद्ध बताते हुए मुख्य सचिव से शिकायत की थी।

-कुछ सूत्रों का यह दावा है कि कुछ दिनों पूर्व राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने भी मांझी को खरी-खोटी सुनाई थी। इस कारण मांझी को लेकर जनता दल (यू) में नाराजगी काफी दिनों से थी, परंतु पार्टी अध्यक्ष शरद यादव द्वारा उनसे बिना पूछे पार्टी विधानमंडल दल की बैठक बुलाना आग में घी का काम कर गया और जदयू की नाव हिचकोले खाने लगी। 

अब देखना यह है कि मांझी और जनता दल (यू) की यह नाव किस किनारे लगती है। यदि भाजपा मांझी को समर्थन देती है तो वो मांझी का अत्यंत बुरा अंत तय है। क्योंकि भाजपा रामबिलास पासवान जैसो की भांति मांझी को भी अपनी छत्र छाया में लाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ने वाली। आखिर भाजपा का मकसद दलित और आदिवासियों को नेतृत्व विहीन करना जो है!-डॉ. #पुरुषोत्तम मीणा '#निरंकुश', 

Friday, May 10, 2013

दलित-आदिवासी और स्त्रियों का धर्म आधारित उत्पीड़न हमारी चिन्ता क्यों नहीं?

तत्काल समाधान हेतु इस देश में यदि आज सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वो है, देश के पच्चीस फीसदी दलितों और आदिवासियों और अड़तालीस फीसदी महिला आबादी को वास्तव में सम्मान, संवैधानिक समानता, सुरक्षा और हर क्षेत्र में पारदर्शी न्याय प्रदान करना और यदि सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वो है-दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को धर्म के नाम पर हर दिन अपमानित, शोषित और उत्पीड़ित किया जाना। यही नहीं इस देश में आज की तारीख में यदि सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न कर रहे हैं और जिन्हें धर्म और संस्द्भति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सहयोग प्रदान करते रहते हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पिछले कुछ समय से मीडिया की मेहरबानी से कुछ चतुर, चालाक, भ्रष्ट और कट्टरपंथी ताकतों ने देश की राजधानी नयी दिल्ली को अपनी प्रायोजित ताकत दिखाने और संवैधानिक सरकारों को बदनाम करने का नया तरीका ईजाद कर लिया है। जिसकी बड़ी और सार्वजनिक शुरुआत अन्ना हजारे आन्दोलन के समय हुई। इस आन्दोलन को कथित रूप से विदेशी ताकतों और देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों का खुला समर्थन था। कुछ ही समय में इस कथित जन आन्दोलन की और इसके कर्ताधर्ताओं की चारित्रिक सच्चाई देश के सामने आ गयी।

इसी प्रायोजित नाटक का सहारा प्रारम्भ से ही तथाकथित योग गुरू बाबा रामदेव भी लेते रहे हैं, लेकिन उसका शोषक व्यापारी का घिनौना चेहरा भी देश के समक्ष आ चुका है। यही नहीं देश यह भी जान चुका है कि इन तथाकथित योग गुरू का असली मकसद देश में साम्प्रदायिक और फासीवादी ताकतों को मजबूत करना तथा देश के धर्म-निरपेक्ष ढांचे का ध्वस्त करना है। यही नहीं वह जनता से प्राप्त अनुदान और योग-शुल्क के मार्फत एकत्रित राशि में से चुनावों के समय भारतीय जनता पार्टी को आर्थिक सहयोग करते रहे हैं।

इसी क्रम में अन्ना हजारे से अलग होकर अरविन्द केजरीवाल ने अपनी नयी दुकान ‘‘आम आदमी’’ के नाम पर खोल ली है और वो न मात्र भारत के लोगों को देश की संवैधानिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ सरेआम भड़का और उकसा रहे हैं, बल्कि इसके साथ-साथ ‘‘आम आदमी पार्टी’’ बनाकर, आम आदमी के नाम का भी दुरूपयोग कर रहे हैं। जबकि इस पार्टी के नीति नियंताओं में कोई भी आम आदमी नहीं है!

ये और कि इन जैसे सभी लोगों के कथित जनान्दोलनों का भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अर्थात् आरएसएस और आरएसएस के अनुसांगिक सभी संगठन, जिनमें बजरंग दल, विश्‍व हिन्दू परिषद, दुर्गा वाहिनी आदि प्रमुख हैं, खुलकर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सक्रिय सहयोग करते रहे हैं और ये सब मिलकर हर छोटे बड़े मुद्दे को सुनियोजित तरीके से मीडिया के मार्फत राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का हरसंभव अनैतिक प्रयास करते रहे हैं।

लेकिन आश्‍चर्यजनक तथ्य ये है कि भारतीय जनता पार्टी, आरएसएस और आरएसएस के अनुसांगिक संगठनों सहित ऐसी ताकतें, जो अपने आप को राष्ट्रवादी, देशभक्त और हिन्दुत्ववादी संस्कृति की संरक्षक बतलाती हैं, आश्‍चर्यजनक रूप से उस समय लम्बा मौन साध लेती हैं, जबकि दलितों, आदिवासियों और गरीब एवं पिछड़े वर्गों की स्त्रियों का सरेआम शोषण और उत्पीड़न होता है। बल्कि कड़वी सच्चाई तो ये है कि इन्हीं तथाकथित राष्ट्रवादी, देशभक्त और हिन्दुत्ववादी ताकतों के इशारों या इनके सक्रिय सहयोग और इन्हीं के उकसावे पर हर दिन देशभर में दलितों, आदिवासियों और गरीब एवं पिछड़े वर्गों की स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता रहता है। देश में हर दिन कहीं न कहीं दलितों और आदिवासियों की लड़कियों के साथ गैंग-रेप किये जा रहे हैं। दलितों और आदिवासियों का सार्वजनिक रूप से उत्पीड़न किया जाता है। उनको अमानवीय त्रासदियॉं दी जाती हैं।

कभी मंदिरों से धक्के देकर बाहर भगा दिया जाता है तो कभी बलात्कार करने में असफल होने पर दलितों और आदिवासियों की पीड़ित औरतों को विरोध करने के कारण जिन्दा जला दिया जाता है। कभी होटलों में खाना खाने की हिमाकत करने पर दलितों और आदिवासियों को अपमानित करके सरेआम सड़कों पर घसीटा जाता है। नाईयों को बाल नहीं काटने दिये जाते हैं। सार्वजनिक नल-कूपों से पानी नहीं भरने दिया जाता है। इन सब असंवैधानिक और मनमानियों को क्रियान्वित करने की आज्ञा जिन झूठे और ढोंगी ग्रंथों में दी गयी है, उन कथित धर्म ग्रंथों का सरकार और प्रशासन की नाक के नीचे, बल्कि सरकार और प्रशासन के सहयोग से हर दिन कहीं न कहीं और टीवी पर पूरे उत्साह के साथ और सार्वजनिक रूप से पठन-पाठन किया जाता है। इसी प्रकार से दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और स्त्रियों के साथ इतिहास में किये गये अन्याय के मुख्य खलनायकों का भी सार्वजनिक रूप से महिमामंडन किया जाता है।

इस प्रकार तत्काल समाधान हेतु इस देश में यदि आज सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वो है, देश के पच्चीस फीसदी दलितों और आदिवासियों और अड़तालीस फीसदी महिला आबादी को वास्तव में सम्मान, संवैधानिक समानता, सुरक्षा और हर क्षेत्र में पारदर्शी न्याय प्रदान करना और यदि सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वो है-दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को हर दिन धर्म के नाम पर अपमानित, शोषित और उत्पीड़ित किया जाना। यही नहीं इस देश में आज की तारीख में यदि सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न कर रहे हैं और जिन्हें धर्म और संस्कृति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सहयोग प्रदान करते रहते हैं।

अत: हमारे देश में भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर उपरोक्त प्रकार के अन्यायों से देश के शोषित लोगों का ध्यान भटकाया जाता है। असल में आज सबसे बड़ी जरूरत है कि हम इस बात को समझें कि इस देश की तकरीबन नब्बे फीसदी से अधिक आबादी लगातार अभावों में जीने को विवश है। अत: हमें देश के कर्णधारों से इस बात के लिये सवाल करना होगा कि उन्हें देश की बहुसंख्यक आबादी की चिन्ता क्यों नहीं है। यदि जन-आन्दोलनों या बाबा रामदेव जैसों द्वारा योग के नाम पर भटकाया जावे तो इस देश के दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को सबसे पहले उनसे भी उपरोक्त सवाल पूछने चाहिये।

-लेखक : होम्योपैथ चिकित्सक, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिसट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) और संगठित षड़यंत्र के चलते जिला जज ने उम्र कैद की सजा सुनाई, चार वर्ष से अधिक समय चार-जेलों में व्यतीत किया। हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने दोषमुक्त/निर्दोष ठहराया। मोबाइल : 085619-55619, 098285-02666

Tuesday, February 26, 2013

हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र

मनीषा पांडेय
इंडिया टुडे की फीचर एडिटर
मनीषा पांडेय






एक काम क्‍यों नहीं करते, इस मुल्‍क को आप हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र घोषित कर दीजिए!

मनीषा पांडेय

"मैं पिछले दस सालों से घर से दूर अकेले रह रही हूं। लेकिन मेरी मां को आज भी लगता है कि मैं घर वापस आ जाऊं। लड़की के अकेले रहने, अकेले घर से बाहर निकलने के ख्‍याल से उन्‍हें बार-बार इलाहाबाद की उस महिला डॉक्‍टर का ख्‍याल आता है, जिसे कुछ लोगों ने रेप करके मार डाला था। दिल्‍ली गैंग रेप के बाद उनका डर और गहरा हो गया है। वो जानती हैं, रहना तो पड़ेगा लेकिन उनके दिल को सुकून नहीं है। उन्‍हें कतई भरोसा नहीं है कि कभी कुछ बुरा नहीं हो सकता। इस मुल्‍क में उन्‍हें अपनी बच्‍ची की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं लगती। वो डर में जीती हैं।"
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"मेरा एक मुसलमान दोस्‍त मुंबई में रहता है। शहर में जब-जब बम फटता है, उससे बहुत दूर बिजनौर में बैठी उसकी मां डर जाती है। वो नास्तिक है। खुदा से उसका कभी याराना नहीं रहा। वो न नमाज पढ़ता है, न रोजे रखता है। लेकिन उसे याद है कि हर नौकरी में लोगों ने उसके नाम के कारण उसे तिरछी निगाहों से देखा है। जब-जब बम फटे, उससे उसकी देशभक्ति का सबूत मांगा है। वो जिस मुल्‍क में पैदा हुआ, उसके दादा, परदादा, दादा के दादा, जिस मुल्‍क में जन्‍मे और जिसकी मिट्टी में दफन हो गए, वो मुल्‍क उससे रोज उसकी देशभक्ति का सबूत मांगता है। दूर देश बैठी उसकी मां रोज डर में जीती है। मां को भरोसा नहीं इस मुल्‍क पर कि वो उसके बच्‍चे की हिफाजत करेगा। इस मुल्‍क ने मां को वो भरोसा कभी नहीं ही दिया।
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मेरा एक और दोस्‍त है। बहुत गरीब दलित परिवार से आता है। उसकी विधवा मां ने लोगों के घरों में झाडू-बर्तन करके उसे पढ़ाया। आज वो पीसीएस ऑफीसर है। लेकिन अब भी वो कभी-कभी उदास होता है क्‍योंकि उसकी सारी पढ़ाई, मेहनत, पोजीशन और पावर के बावजूद लोग उसे आज भी पीठ पीछे चमार का लड़का कहकर बुलाते हैं। उसकी सारी उपलब्धियों का ठीकरा रिजर्वेशन के सिर फोड़ देते हैं। मां अपनी धुंधलाई आंखों से बेटे को देखती है और सोचती है कि इतना पढ़-लिखकर भी आखिर बदला क्‍या। उसकी मां को भी इस मुल्‍क पर भरोसा नहीं। क्‍या चाहिए था जिंदगी में। इज्‍जत और स्‍वाभिमान की दो रोटी। रोटी तो मिली लेकिन इज्‍जत और स्‍वाभिमान नहीं।
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ये सारी माएं तुम्‍हारे महान लोकतांत्रिक मुल्‍क में आज भी डर में जीती हैं। वो मुल्‍क पर भरोसा कर न सकीं, मुल्‍क उन्‍हें भरोसा करा न सका। क्‍योंकि ये मुल्‍क औरतों के, दलितों के, मुसलमानों के स्‍वाभिमान का घर है ही नहीं। एक काम क्‍यों नहीं करते। अपने मुल्‍क को आप हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र घोषित कर दीजिए।
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मेरे मुसलमान दोस्‍त से ये मुल्‍क बार-बार देशभक्ति का सबूत मांगता है। एक औरत से उसका पति उसके शरीर की पवित्रता का सबूत मांगता है। बलात्‍कार की शिकार महिला से पुलिस, कानून, न्‍यायालय तक अच्‍छे चरित्र का सबूत मांगते हैं। एक दलित से उसकी खून की श्रेष्‍ठता का सबूत मांगते हैं। नौकरी और प्रमोशन में योग्‍यता का सबूत मांगते हैं। तुम्‍हारे मुल्‍क में हम सब हर क्षण संदेह के घेरे में हैं। तुम्‍हारे हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र में हमारे लिए न इज्‍जत है, न स्‍वाभिमान।

स्त्रोत/साभार : भड़ास४मीडिया (इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय Manisha Pandey के फेसबुक वॉल से.)

Friday, January 11, 2013

एसपी राजेश मीणा तो एक बहाना है! असली मकसद तो मीणा आदिवासियों को मिटाना है!!

मनुवादी किसी भी सूरत में आदिवासियों को ताकतवर होते हुए नहीं देख सकते हैं| उनके लिये यह असहनीय हो रहा है कि राजस्थान का पुलिस महा निदेशक एक आदिवासी अर्थात् मीणा है| जिसे बदनाम करने के लिये पुलिस को भ्रष्ट दिखाना और वो भी उसी की जाति के राजेश मीणा को भ्रष्टाचार और घूसखोर सिद्ध करना, क्या किसी की समझ में नहीं आ रहा है? केवल इतना ही नहीं राजस्थान की राज्यपाल पुलिस महानिदेशक को बुलाकर कहती हैं कि राज्य में स्त्रियों पर अत्याचार और पुलिस में भ्रष्टाचार बढ रहा है| ये बात गृह मंत्री की ओर से भी कही जा सकती थी, लेकिन जानबूझकर पुलिस महानिदेशक को दबाव में लाने और इस खबर को मीडिया के जरिये जनता के समक्ष लाने की सरकार की नीति को मीणा जनजाति के लोगों को समझना होगा और साथ ही इस बात को भी समझना होगा कि केवल बड़े बाबू बनने या एक पार्टी छोड़कर सत्ताधारी पार्टी का दामन थामकर लाल बत्ती प्राप्त कर लेने मात्र से आदिवासियों का उत्थान नहीं हो सकता! आदिवासी समाज की सेवा करनी है तो लालबत्ती नहीं, आदिवासियों की हरियाली की वफादारी की भावना को जिन्दा रखना होगा|

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पिछले दिनों राजस्थान के अजमेर जिले के पुलिस अधीक्षक पद पर तैनात राजेश मीणा को कथित रूप से अपने ही थानेदारों से वसूली करते हुए राजस्थान के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने दलाल के साथ रंगे हाथ पकड़ा गया | यह कोई पहली घटना नहीं है, जिसमें किसी लोक सेवक को रिश्‍वत लेते हुए पकड़ा गया हो! हर दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी लोक सेवक को रिश्‍वत लेते पकड़ा ही जाता रहता है| ऐसे में किसी को रिश्‍वत लेते पकड़े जाने पर, किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये| सरकार और प्रशासन अपने-अपने काम करते ही रहते हैं| इसी दिशा में हर एक राज्य का भ्रष्टाचार निरोधक विभाग भी अपना काम करता रहता है| इसी क्रम में राज्य की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो भी अपना काम कर ही रही है|

सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि जिस दिन से राजेश मीणा को कथित रूप से घूस लेते हुए पकड़ा है, उसी दिन से स्थानीय समाचार-पत्रों में इस खबर को इस प्रकार से प्रसारित और प्रचारित किया जा रहा है, मानो केवल मीणा जनजाति के सम्पूर्ण अधिकारी और कर्मचारी ही चोर हैं, बाकी सारे के सारे दूध के धुले हुए हैं| राजस्थान की मीणा जनजाति सहित सारे देश के सम्पूर्ण जनजाति समाज में इस बात को लेकर भयंकर रोष व्याप्त है| रोष व्याप्त होने का प्रमुख कारण ये है कि राजेश मीणा की मीडिया ट्रायल की जा रही है, जबकि दक्षिणी राजस्थान में अपनी मजदूरी मांगने जाने वाले एक आदिवासी मीणा के उच्च जाति के एक ठेकेदार द्वारा सरेआम हाथ काट दिये जाने की सही और क्रूरतम घटना को सही तरह से प्रकाशित और प्रसारित करने में इसी मीडिया को अपना धर्म याद नहीं रहा|

इसके अलावा पिछले दिनों दलित परिवार के दो नवविवाहिता जोड़ों को मन्दिर से धक्के मारकर भगा देने की घटना को इसी मीडिया द्वारा जानबूझकर दबा दिया गया| भ्रूण हत्या के आरोपों में पकड़े जाने वाले उच्च जातीय डॉक्टरों के रंगे हाथ पकड़े जाने के उपरान्त भी खबर को अन्दर के पन्नों पर दबा दिया जाता है| जब पिछड़े वर्ग से आने वाले राजनेता महीपाल मदेरणा का प्रकरण सामने आया तो उसकी भी जमकर मीडिया ट्रायल की गयी| जबकि दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों के विरुद्ध होने वाले अपराधों में पकड़े जाने वाले मनुवादी अपराधियों के क्रूर और घृणित अपराधों को जानबूझकर मीडिया द्वारा और प्रशासन द्वारा दबा दिया जाता है|

इन सब बातों का साफ और सीधा मतलब है कि चाहे कानून और संविधान कुछ भी कहता हो जो भी जाति या व्यक्ति मनुवादी व्यवस्था से टकराने का प्रयास करेगा उसे निपटाने मे मनुवादी मीडिया और प्रशासन एवं सत्ता पर काबिज मनुवादी कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे| महीपाल मदेरणा और राजेश मीणा दोनों ही मामलों में मनुवादियों की ओर से पिछड़ों और आदिवासियों को यही संकेत दिया गया है| 

राजस्थान में मीणा जाति के बच्चे कड़ा परिश्रम करते हैं| उनके माता-पिता कर्ज लेकर, अपने बच्चों को जैसे-तैसे पढा-लिखाकर योग्य बनाते हैं| जब वे अफसर या कर्मचारी नियुक्त होते हैं तो उस वर्ग की आँखों में खटकने लगते हैं, जो सदियों से मलाई खाता आ रहा है और आज भी सत्ता की असली ताकत उसी के पास है| जबकि जानबूझकर के मीणा जनजाति को बदनाम किया जा रहा है और अफवाह फैलायी जाती है कि मीणा सभी विभागों में और सभी क्षेत्रों में भरे पड़े हैं| जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है|

राजस्थान में आजादी से आज तक एक भी दलित या आदिवासी वकील को, वकीलों के लिये निर्धारित 67 फीसदी वकील कोटे से हाई कोर्ट का एक भी जज नियुक्त नहीं किया गया| इसका अर्थ क्या ये लगाया जाये कि दलित-आदिवासी वकील हाई कोर्ट के जज की कुर्सी पर बैठने लायक नहीं हैं या हाई कोर्ट के जज की कुर्सी दलित-आदिवासियों के बैठने से अपवित्र होने का खतरा है या दलित-आदिवासियों को जज नियुक्त करने पर मनुवादियों को खतरा है कि उनकी मनमानी रुक सकती हैं| कारण जो भी हो, लेकिन राजस्थान हाई कोर्ट में अपवादस्वरूप पदोन्नति कोटे से एक मात्र यादराम मीणा के नाम को छोड़ दिया जाये तो आजादी के बाद से एक भी व्यक्ति सरकार को या जज नियुक्त करने वाले लोगों को ऐसा नजर नहीं आया, जिसे जज के पद पर नियुक्त किया जा सकता!

मीणा क्यों बहुतायत में दिखते हैं? इस बात को भी समझ लेना जरूरी है| चूँकि आदिवासी वर्ग के लोग सरल व भोली प्रवृत्ति के होते हैं, इस कारण वे मनुवादियों की जैसी चालाकियों से वाकिफ नहीं होते हैं और इसी का नुकसान राजस्थान की आदिवासी मीणा जनजाति के लोगों को उठाना पड़ रहा है| सबके सब अपने नाम के आगे ‘मीणा’ सरनैम लिखते हैं| जिसके चलते सभी लोगों को हर एक क्षेत्र में मीणा ही मीणा नजर आते हैं| यदि मीणा अपने गोत्र लिखने लगें, जैसे कि-मरमट, सेहरा, मेहर, धणावत, घुणावत, सपावत, सत्तावत, जोरवाल, बारवाड़, बमणावत आदि तो क्या किसी को लगेगा कि मीणा जाति के लोगों की प्रशासन में बहुतायत है, लेकिन अभी भी मीणा जनजाति के लोगों को इतनी सी बात समझ में नहीं आ पायी है|

यह तो एक बड़ा और दूरगामी सवाल है, जिस पर फिर कभी चर्चा की जायेगी| लेकिन फिलहाल राजस्थान की मजबूत और ताकतवर कही जाने वाली मीणा जनजाति की नौकरशाही को इस बात को समझना होगा कि वे इस मुगालते में नहीं रहें कि वे बड़े बाबू बन गये तो उन्होंने कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मार लिया है| क्योंकि सारा देश जानता है कि राजस्थान की ही नहीं, बल्कि सारे देश की पुलिस व्यवस्था अंग्रेजों की बनायी पटरी पर चल रही है| जिसके तहत प्रत्येक पुलिस थाने की बोली लगती है| थानेदार उगाही करके एसपी को देता है और एसपी ऊपर पहुँचाता है, जिसको अंतत: सत्ताधारी पार्टी को पहुँचाया जाता है| हर विभाग में इस तरह की उगाही होती है| पिछले दिनों एक एक्सईएन बतला रहे थे कि राजस्थान का प्रत्येक एक्सईन अपने चीफ इंजीनियर को हर माह पचास हजार रुपये पहुँचाता है, जिसमें से सीएमडी के पास से होते हुए हर माह मोटी राशी सरकार के पास पहुँचायी जाती है|

कहने का तात्पर्य यह है कि सरकारें स्वयं अफसरों से उगाही करवाती हैं और जब कभी कोई अफसर या अफसरों का कोई धड़ा नियम कानून या संविधान के अनुसार काम करने लगता है तो वही सरकार एक पल में ऐसे अफसरों को उनकी औकात दिखा देती है| कौन नहीं जानता कि किस-किस राजनेता का चरित्र कैसा है, लेकिन महीपाल मदेरणा को ठिकाने लगाना था तो लगा दिया| इसी प्रकार से जाट जाति के बाद राजस्थान में दूसरी ताकतवर समझी जाने वाली मीणा जनजाति के अफसरों को ठिकाने लगाने की राजेश मीणा से शुरूआत करके मीणा जाति के सभी अफसरों और कथित मीणा मुखियाओं को सन्देश दिया गया है कि यदि किसी ने अपनी आँख दिखाने का साहस किया तो उसका हाल राजेश मीणा जैसा होगा|

जहॉं तक इस प्रकार के मामले को मीडिया द्वारा उछाले जाने की बात है तो कोई भी नागरिक सूचना के अधिकार के तहत सरकार से पूछ सकता है कि उसकी ओर से किस-किस समाचार-पत्र को कितने-कितने करोड़ के विज्ञापन दिये गये हैं| जिन अखबारों को हर माह करोड़ों रुपये के विज्ञापन सरकार की ओर से भेंटस्वरूप दिये जाते हैं, उन समाचार-पत्रों की ओर से सरकार का हुकम बजाना तो उनका जरूरी धर्म है|

आजकल मीडिया व्यवसाय हो गया है| जिस पर भारत में केवल और केवल मनुवादियों का कब्जा है| मनुवादी किसी भी सूरत में आदिवासियों को ताकतवर होते हुए नहीं देख सकते हैं| उनके लिये यह असहनीय हो रहा है कि राजस्थान का पुलिस महानिदेशक एक आदिवासी अर्थात् मीणा है| जिसे बदनाम करने के लिये पुलिस को भ्रष्ट दिखाना और वो भी उसी की जाति के राजेश मीणा को भ्रष्टाचार और घूसखोर सिद्ध करना, क्या किसी की समझ में नहीं आ रहा है? केवल इतना ही नहीं राजस्थान की राज्यपाल पुलिस महानिदेशक को बुलाकर कहती हैं कि राज्य में स्त्रियों पर अत्याचार और पुलिस में भ्रष्टाचार बढ रहा है| ये बात गृह मंत्री की ओर से भी कही जा सकती थी, लेकिन जानबूझकर पुलिस महानिदेशक को दबाव में लाने और इस खबर को मीडिया के जरिये जनता के समक्ष लाने की सरकार की नीति को मीणा जनजाति के लोगों को समझना होगा और साथ ही इस बात को भी समझना होगा कि केवल बड़े बाबू बनने या एक पार्टी छोड़कर सत्ताधारी पार्टी का दामन थामकर लाल बत्ती प्राप्त कर लेने मात्र से आदिवासियों का उत्थान नहीं हो सकता! आदिवासी समाज की सेवा करनी है तो लालबत्ती नहीं, आदिवासियों की हरियाली की वफादारी की भावना को जिन्दा रखना होगा| एसपी राजेश मीणा तो एक बहाना है! असली मकसद तो मीणा आदिवासियों को मिटाना है|

Friday, December 21, 2012

बलात्कार से निजात कैसे?


एक पुलिस का जवान कानून व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिये पुलिस में भर्ती होता है, लेकिन पुलिस अधीक्षक उसे अपने घर पर अपनी और अपने परिवार की चाकरी में तैनात कर देता है। (जो अपने आप में आपराधिक न्यासभंग  का अपराध है और इसकी सजा उम्र कैद है) जहॉं उसे केवल घरेलु कार्य करने होते हैं-ऐसा नहीं है, बल्कि उसे अफसर की बीवी-बच्चियों के गन्दे कपड़े भी साफ करने होते हैं। क्या यह उस पुलिस कॉंस्टेबल के सम्मान का बलात्कार नहीं है?

Thursday, November 1, 2012

मुनवादी लोगों ने दलित जोड़ों को मन्दिर से अपमानित कर भगाया!

यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि देश में अमन-चैन बना रहे और समाज के सभी दबे-कुचले लोग तरक्की करें और सम्मान के साथ जीवन यापन करें तो हमें मनुवाद को तत्काल प्रतिबन्धित करने और मुनवादी कुकृत्यों को अंजाम देने वालों को देशद्रोही के समान दण्डनीय अपराध घोषित करने की सख्त जरूरत है| जिसके लिये संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 13 (1) एवं 13 (3) में सरकार को सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं| यदि सरकार में राजनैतिक इच्छा-शक्ति हो तो इस प्रावधान के तहत मनुवादी दैत्य को नेस्तनाबूद किया जा सकता है| लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है, जिसके पीछे हर पार्टी में मनुवादियों का वर्चस्व होना बड़ा कारण है|
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

राजस्थान के अजमेर सम्भाग मुख्यालय से प्रकाशित प्रमुख समाचार-पत्र ‘‘दैनिक नवज्योति’’ 29 अक्टूबर, 2012 के अंक के मुखपृष्ठ पर-‘‘दलित जोड़ों को धक्के मारकर मन्दिर से निकाला’’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित हुआ है| जिसमें कहा गया है कि 26 अक्टूबर को अनुसूचित जाति के दो नवविवाहित जोड़े मन्दिर में भगवान के समक्ष नतमस्तक होकर (जिसे स्थानीय आंचलिक बोली में ‘धोक देना’ कहा जाता है) आशीर्वाद लेने गये, लेकिन मन्दिर के पुजारी सहित कुछ मनुवादी लोगों ने और कुछ महिलाओं ने मिलकर न मात्र उन्हें मन्दिर से धक्के देकर बाहर कर दिया, बल्कि उनके साथ जाति सूचक शब्दों का अभद्रतापूर्ण तरीके से उपयोग करते हुए गाली-गलोंच भी की गयी और उन्हें मन्दिर से निकाल दिया गया| इस मामले में खेतड़ीनगर पुलिस ने आठ लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया है| 

Manwadi System
इस मामले में जानकारी करने पर सूत्रों का कहना है कि अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल ‘मेघवाल’ जाति के लोगों को स्थानीय सवर्ण जाति के लोग मन्दिरों में प्रवेश नहीं करने देते हैं और जब भी इन लोगों को में से किसी को मन्दिर में स्थापित भगवान का आशीर्वाद लेना होता है तो मन्दिर के सामने रास्ते या जमीन पर खड़े होकर ही भगवान का आशीर्वाद लिया जा सकता है| इस बार दो नव विवाहित जोड़ों ने मन्दिर के अन्दर जाकर न मात्र भगवान का दर्शन करके आशीर्वाद लेने की हिमाकत की, बल्कि मन्दिर में स्थापित भगवान की पूजा-अर्चना करने का भी अपराध भी कर डाला| जो मन्दिर के पुजारी को नागवार गुजरा| जिस पर मन्दिर के पुजारी घीसाराम स्वामी ने कुछ स्थानीय स्त्री-पुरुषों के साथ मिलकर नवविवाहित जोड़ों को मन्दिर से खदेड़ दिया|

सूत्रों का कहना है कि उक्त पुजारी कट्टर हिन्दू है और मनु द्वारा स्थापित ब्राह्मणवादी व्यवस्था को लागू करना अपना पवित्र धार्मिक कर्त्तव्य मानता है| जिसमें स्थानीय उच्च कुलीन हिन्दू साथ देते हैं| सूत्रों का यह भी कहना है कि पकड़े गये लोगों का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी से निकट सम्बन्ध हैं|

यहॉं विचारणीय गम्भीर प्रश्‍न यह है कि हो सकता है कि कानून के अनुसार आरोपियों के विरुद्ध मुकदमा चले और कुछ वर्षों के विचारण के बाद कुछ लोगों को सजा भी हो जाये, जिसकी कम ही सम्भावना है, लेकिन असल सवाल ये है कि आखिर मनुवाद द्वारा स्थापित यह कुव्यवस्था कब समाप्त होगी और चरित्र निर्माण की बात करने वाला संघ कब तक मनुवादी लोगों का पोषण तथा संरक्षण करता रहेगा?

जब तक मनुवाद और मनुवाद के पोषक संघ तथा संघ की घृणित और समाज तोड़क दोगली सोच को ध्वस्त नहीं कर दिया जाता है, तब तक अकेला कानून कुछ भी नहीं कर सकता है| क्योंकि राजस्थान और अन्य अनेक राज्यों में आये दिन मनुवादियों द्वारा इस प्रकार की अमानवीय और आदिकालीन सोच की परिचायक घटनाओं को लागातार और बेखोफ अंजाम दिया जाता रहा है| जिसे संघ एवं भाजपा से जुड़े लोगों का खुला राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है| जिसका दु:खद परिणाम ये होता है कि आये दिन दलित उत्पीड़न होता रहता है| उत्पीड़न के कुछ मामलों में मुकदमे भी दर्ज होते हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में गवाहों को डराया और धमकाया जाता है| डराने और धमकाने से नहीं मानने पर उनके साथ मारपीट की जाती है, उनकी औरतों और लडकियों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया जाता है और अन्तत: शोषित तथा भयभीत दलित दर जाते हैं! परिणामस्वरूप अधिकतर मुकदमे निरस्त हो जाते हैं, जिन्हें यह कहकर प्रचारित किया जाता है कि दलित लोगों द्वारा बनावटी मुकदमे दर्ज करवाये जाते हैं| 

यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि देश में अमन-चैन बना रहे और समाज के सभी दबे-कुचले लोग तरक्की करें और सम्मान के साथ जीवन यापन करें तो हमें मनुवाद को तत्काल प्रतिबन्धित करने और मुनवादी कुकृत्यों को अंजाम देने वालों को देशद्रोही के समान दण्डनीय अपराध घोषित करने की सख्त जरूरत है| जिसके लिये संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 13 (1) एवं 13 (3) में सरकार को सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं| यदि सरकार में राजनैतिक इच्छा-शक्ति हो तो इस प्रावधान के तहत मनुवादी दैत्य को नेस्तनाबूद किया जा सकता है| लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है, जिसके पीछे हर पार्टी में मनुवादियों का वर्चस्व होना बड़ा कारण है|

Friday, December 30, 2011

लोकपाल-हमाम में सभी नंगे!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’


लोकपाल विधेयक के बहाने कॉंग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबन्धन यूपीए और भाजपा के नेतृत्व वाले मुख्य विपक्षी गठबन्धन एनडीए सहित सभी छोटे-बड़े विपक्षी दलों एवं ईमानदारी का ठेका लिये हुंकार भरने वाले स्वयं अन्ना और उनकी टीम के मुखौटे उतर गये! जनता के समक्ष कड़वा सत्य प्रकट हो गया!

जो लोग भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाते रहे हैं, वे संसद में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये आँसू बहाते नजर आये! सशक्त और स्वतन्त्र लोकपाल पारित करवाने का दावा करने वाले यूपीए एवं एनडीए की ईमानदारी तथा सत्यनिष्ठा की पोले खुल गयी! सामाजिक न्याय को ध्वस्त करने वाली भाजपा की आन्तरिक रुग्ण मानसिकता को सारा संसार जान गया! भाजपा देश के अल्प संख्यकों के नाम पर वोट बैंक बढाने की घिनौनी राजनीति करने से यहॉं भी नहीं चूकी|

भाजपा और उसके सहयोगी संगठन एक ओर तो अन्ना को उकसाते और सहयोग देते नजर आये, वहीं दूसरी ओर मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी द्वारा इस देश पर जबरन थोपे गये आरक्षण को येन-केन समाप्त करने के कुचक्र भी चलते नजर आये!

स्वयं अन्ना एवं उनके मुठ्ठीभर साथियों की पूँजीपतियों के साथ साठगॉंठ को देश ने देखा| भ्रष्टाचार के पर्याय बन चुके एनजीओज् के साथ अन्ना टीम की मिलीभगत को भी सारा देश समझ चुका है| सारा देश यह भी जान चुका है कि गॉंधीवादी होने का मुखौटा लगाकर और धोती-कुर्ता-टोपी में आधुनिक गॉंधी कहलवाने वाले अन्ना, मनुवादी नीतियों को नहीं मानने वाले अपने गॉंव वालों को खम्बों से बॉंधकर मारते और पीटते हैं!

भ्रष्टाचार मिटाने के लिये अन्ना भ्रष्टाचार फैलाने वाले कॉर्पोरेट घरानों और विदेशों से समाज सेवा के नाम पर अरबों रुपये लेकर डकार जाने वाले एनजीओज् को लोकपाल के दायरे में क्यों नहीं लाना चाहते, इस बात को देश को समझाने के बजाय बगलें झांकते नजर आये! जन्तर-मन्तर पर लोकपाल पर बहस करवाने वाली अन्ना टीम ने दिखावे को तो सभी को आमन्त्रित करने की बात कही, लेकिन दलित संगठनों को बुलाना तो दूर, उनसे मनुवादी सोच को जिन्दा रखते हुए लम्बी दूरी बनाये रखी है!

संसद में सभी दल अपने-अपने राग अलापते रहे, लेकिन किसी ने भी सच्चे मन से इस कानून को पारित कराने का प्रयास नहीं किया| विशेषकर यदि कॉंग्रेस और भाजपा दोनों अन्दरूनी तौर पर यह तय कर लिया था कि लोकपाल को किसी भी कीमत पर पारित नहीं होने देना है और देश के लोगों के समक्ष यह सिद्धि करना है कि दोनों ही दल एक सशक्त और स्वतन्त्र लोकपाल कानून बनाना चाहते हैं| वहीं दूसरी और सपा, बसपा एवं जडीयू जैसे दलों ने भी लोकपाल कानून को पारित नहीं होने देने के लिये संसद में बेतुकी और अव्यावहारिक बातों पर जमकर हंगामा किया| केवल वामपंथियों को छोड़कर कोई भी इस कानून को पारित करवाने के लिये गम्भीर नहीं दिखा| यद्यपि बंगाल को लूटने वाले वामपंथियों की अन्दरूनी सच्चाई भी जनता से छुपी नहीं है|

Saturday, August 27, 2011

अन्ना ब्राह्मणवादी!

उन्हें अन्ना हजारे का रवैया बहुत गहरे तक ब्राह्मणवादी लगता है। शराब, तंबाकू यहां तक कि केबल टीवी पर वहां पाबंदी है। दलित परिवारों को भी शाकाहारी भोजन करने पर मजबूर किया जाता है। जो इन नियमों या आदेशों को तोड़ता है, उसे एक खंबे से बांधकर उसकी पिटाई की जाती है।

Friday, August 26, 2011

दलित, साम्प्रदायिकता फासीवाद, बौद्ध, दलित मुस्लिम, अम्बेडकर, पूना पेक्ट आदि के लिंक :

1-सही है जातिगत आधार पर जनगणना-निखिल सबलानिया
2-फासीवाद, साम्प्रदायिकता और दलितजन पेज-1
2(1)-फासीवाद, साम्प्रदायिकता और दलितजन पेज-2
3-'जंग में क़त्ल सिपाही ही होंगे, सुर्ख रु जिल्ले इलाही ही होंगे'-
आज़ाद हिन्दोस्तान से पहले राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान के इतिहास पर गौर करें तो अम्बेडकर-गांधी विवाद हमे प्रस्तुत विषय पर कुछ रौशनी डालता है। गांधी का प्रथक निर्वाचन मंडलों का विरोध करना, अम्बेडकर का प्रथक निर्वाचन मंडलों के सवाल पर अडे रहना किन्तु अंत गाँधी के 'फास्ट अनटो देअथ' के सामने झुक जाना और पूना पेक्ट पर हस्ताक्षर कर गांधी के पक्ष को मान लेने को आप सवर्ण विजय कह सकते हैं चाहें तो सवर्ण चाल या फिर दलित पराभव। औपनिवेशिक शासकों के लिए ये एक फायदा था।
अनुसूचित जाति एवम अनुसूचित जन जातियों पर होने वाले अत्याचारों पर लोकसभा में चर्चा : 19.08.2010 : Discussion regarding situation arising out of increasing atrocities against Scheduled Castes and Scheduled Tribes in the country

Tuesday, August 23, 2011

गांधी और दलित प्रश्न

यहां पाठको का ध्यान आकृष्ठ कराना चाहूगां कि गांधीजी ये मानते थे कि गवांर का बेटा गवांर और कुलीन का बेटा जन्म से ही कुलीन पैदा होता है । वे कहते है कि जैसे ''मनुष्य अपने पूर्वजो की आकृति पैदा होता है वैसे ही वह खास गुण लेकर ही पैदा होता है।``