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Friday, April 29, 2016

भारत की संयुक्त राष्ट्र संघ में घेराबंदी??

भारत की संयुक्त राष्ट्र संघ में घेराबंदी??
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
इस बात में कोई दो राय नहीं कि वर्तमान भाजपा की केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा का 100 फीसदी नेतृत्व करती है। यह भी सर्वविदित है कि संघ मनुवादी आतंक, जनजातीय विभेद, वर्गवाद, वर्णवाद, जातिवाद, अमानवीयता, साम्प्रदायिकता, अंधश्रद्धा, अंधभक्ति, अंधविश्वास, बामणवाद, सामन्तशाही, भ्रष्टचार, अत्याचार, उत्पीड़न, लिंग भेद, स्त्री अत्याचार जैसी हजारों बुराईयों का पोषक है। अत: ऐसी बुराइयां भारत में अचानक पैदा नहीं हुई हैं, बल्कि सदियों से व्याप्त रही हैं। इसके बावजूद अचानक भारत के मन्दिरों और मस्जिदों/दरगाहों में स्त्रियों के प्रवेश का मुद्दा राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गर्माया रहा है। जिसके लिए देशभर में संघ, मनुवाद, भाजपा, बामणवाद, आदि को कोसा जा रहा है। कोसा जाना भी चाहिए, लेकिन इसके पीछे निहित मकसद को भी समझने की जरूरत है। क्योंकि जो कुछ या जिन बुराईयों को प्रचारित किया जा रहा है, वे न तो अचानक पैदा हुई हैं और न ही नयी हैं और न हीं वर्तमान भाजपा की केंद्र सरकार की दैन हैं। अत: इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं:-

1. संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटो पावर प्राप्त करना भारत का दशकों से सपना रहा है। जिसके लिए पिछले 15 वर्षों में बहुत काम किया गया है। ऐसे में भारत को रोकने के लिये विश्व के सामने भारत की छवि की ध्वस्त करना कुछ विश्वव्यापी ताकतों का दुराशय हो सकता है। अत: सम्भव है कि भारत में स्त्रियों के मानवाधिकारों के हनन को मुद्दा बनाकर भारत को घेरने की योजना पर काम हो रहा है। जिसमें प्राथमिक सफलता मिल चुकी है।
2. दूसरा कारण, जिसका भारत को फायदा होगा। वह, यह कि भाजपा को बदनाम करने के लिए प्रोपेगण्डा चलाया जा रहा है।
पहला मुद्दा अत्यंत गम्भीर और विचारणीय है।

जय भारत। जय संविधान।
नर-नारी, सब एक समान।।
: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/28-04-2016/10.26 PM
@—लेखक का संक्षिप्त परिचय : मूलवासी-आदिवासी अर्थात रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया। होम्योपैथ चिकित्सक और दाम्पत्य विवाद सलाहकार। राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोसिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक) और पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ।
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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Sunday, December 30, 2012

बलात्कार : स्थितियां कैसे बदलेंगी?


सच यह है कि हमारे देश में कानून बनाने, कानून को लागू करने और कोर्ट से निर्णय या आदेश या न्याय या सजा मिलने के बाद उनका क्रियान्वयन करवाने की जिम्मेदारी जिन लोक सेवकों या जिन जनप्रतिनिधियों के कंधों पर डाली गयी है, उनमें से किसी से भी भारत का कानून इस बात की अपेक्षा नहीं करता कि उन्हें-संविधान, न्यायशास्त्र, प्राकृतिक न्याय, मानवाधिकार, मानव व्यवहार, दण्ड विधान, साक्ष्य विधि, धर्मविधि, समाज शास्त्र, अपराध शास्त्र, मानव मनोविज्ञान आदि विषयों का ज्ञान होना ही चाहिये। ऐसे में देश के लोगों को न्याय या इंसाफ कैसे हासिल हो सकता है? विशेषकर तब, जबकि शैशव काल से ही हमारा समाजीकरण एक भेदभावमूलक और अमानवीय सिद्धान्तों की पोषक सामाजिक (कु) व्यवस्था में होता रहा है??? अत: यदि हम सच में चाहते हैं कि हम में से किसी की भी बहन-बेटी, माता और हर एक स्त्री की इज्जत सुरक्षित रहे तो हमें जहॉं एक और विरासत में मिली कुसंस्कृति के संस्कारों से हमेशा को मुक्ति पाने के लिये कड़े कदम उठाने होंगे, वहीं दूसरी ओर देश का संचालन योग्य, पात्र और संवेदनशील लोगों के हाथों में देने की कड़ी और जनोन्मुखी संवैधानिक व्यवस्था बनवाने और अपनाने के लिये काम करना होगा। जिसके लिये अनेक मोर्चों पर सतत और लम्बे संघर्ष की जरूरत है। हाँ तब तक के लिए हमेशा की भांति हम कुछ अंतरिम सुधार करके जरूर खुश हो सकते हैं!

Wednesday, January 18, 2012

आदिवासी इलाकों के शहरी




शहरी व्यक्ति के पास कोई आर्थिक संसाधन नहीं हैं. उसे तो आदिवासियों के संसाधनों से जो उद्योग चलेगा या जो व्यापार होगा, उससे ही आमदनी होगी. इसलिए शहरी व्यक्ति आदिवासियों के संसाधनों की लूट को समर्थन देता है... 

हिमांशु कुमार

कुछ दिन पहले दिल्ली में कुछ अफगानी विद्यार्थियों के एक दल से मुलाक़ात हुई. खूबसूरत मुस्कान वाले चौदह से अठारह साल के गोरे और लाल गालों वाले सुन्दर बच्चे. अमन और मुहब्बत की बातें कर रहे थे. मैंने कुछ सवाल किये तो उन्होंने कहा कि अमेरिका जो उनके देश में कर रहा है उसे वहाँ के कबायली अर्थात आदिवासी नापसंद करते हैं, लेकिन शहरी मिडिल क्लास के लोग अमेरिका के हमले को पसंद करते हैं.

मैं उनकी इस बात की समानता दंतेवाडा से करने लगा. दंतेवाडा में जो हथियारबंद फौज़ें वहाँ के खनिजों को लूटने के लिए भेजी गयी हैं, उन्हें भी वहाँ के आदिवासी नापसंद करते हैं, लेकिन शहरों में रहने वाले लोग इस सैन्यीकरण का समर्थन करते हैं, ऐसा क्यों होता है और क्या सब जगह ऐसा ही होता है ?

मैंने देश के जितने भी आदिवासी इलाके देखे हैं उनमें आदिवासियों पर होने वाले दमन के विरुद्ध कभी भी कोई स्थानीय शहरी आवाज़ नहीं उठाता. बल्कि आदिवासियों के लिए आवाज़ उठाने वाले को वहाँ के शहरी पत्रकार, नेता, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी देशद्रोही खलनायक के रूप में चित्रित करते हैं. इसलिए आपको बिनायक या दायमनी के लिए देश में या सारे संसार में समर्थक मिल जायेंगे, लेकिन उनके अपने शहर रायपुर या रांची में नहीं.

इसका पहला कारण तो आर्थिक है. आदिवासियों के पास जंगल में जीवन के अपने संसाधन हैं, इसलिए उन्हें अपने संसाधनों को बचाने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है. इसीलिये वो संसाधन लूटने वाली फौजों और उन फौजों को भेजने वाली सरकार के खिलाफ लड़ता है, लेकिन शहरी व्यक्ति के पास कोई आर्थिक संसाधन नहीं हैं. उसे तो आदिवासियों के संसाधनों से जो उद्योग चलेगा या जो व्यापार होगा, उससे ही आमदनी होगी. इसलिए शहरी व्यक्ति आदिवासियों के संसाधनों की लूट को समर्थन देता है, लुटेरी फौजों को समर्थन देता है, संसाधन लूटने वाली राजनीति का समर्थन करता है.

ऐसे में स्थानीय पत्रकार लुटेरी व्यवस्था के प्रवक्ता बन जाते हैं और फिर इनका सामना होता है किसी ऐसे व्यक्ति से, जो होता तो इनके बीच में है लेकिन इस लूट के खिलाफ आवाज़ बुलंद करता है, वो पूरी लूट की राजनीति को नंगा कर देता है. पूरे शहरी षड्यंत्र का पर्दाफाश करता है. एक अकेला मानवाधिकार कार्यकर्त्ता पूरे सत्ता के किले की नीव को हिलाकर रख देता है.

ऐसे में ये उम्मीद बेमानी होगी कि ये लुटेरी ताकतें उनका पर्दाफाश करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्त्ता को बख्श देंगी. वो ऐसा कर ही नहीं सकतीं, क्योंकि मानवाधिकार कार्यकर्ता लूट होने नहीं देगा और लूट बंद हुई तो शहरी खायेंगे क्या? उनके पास अपना तो कोई उत्पादन है नहीं. सबकुछ तो लूटकर ही लाया गया है, लूट पर तो शहर जिंदा हैं, इसलिए बिनायक को उम्रकैद की सजा देनी जरूरी है, कोपा को जेल में डालना ज़रूरी है. दायमनी बरला को डराना ज़रूरी है.

ग्रामीण आदिवासियों के संसाधनों की इस लूट के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले हज़ारों कार्यकर्ता आज जेलों में बंद हैं. इस लूट के खिलाफ लड़ने वाली ताकतें देश की प्रधानमंत्री द्वारा सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताई जा रही है. देश की ज़्यादातर फौजों को सीमा से हटाकर इन आदिवासी लूट क्षेत्रों में भेजा जा रहा है.

हम सबको जानना चाहिए कि जैसे ही कोई कम्पनी और सरकार खनिजों से भरी ज़मीन का एमओयू पर हस्ताक्षर करते हैं, वैसे ही वह कम्पनी अंतर्राष्ट्रीय शेयर बाज़ार में अपने शेयर बेच देती है. सवाल उठता है कि जिस आदिवासी ज़मीन के लिए दुनिया के ताकतवर लोगों ने अरबों रुपये दाँव पर लगाये हैं वो क्या अपने रुपये डूबने देंगे? ये पैसा लगाने वाले ताकतवर लोग दुनिया के बैंकों के मालिक हैं, ये वालस्ट्रीट के मालिक हैं, अमेरिकी सरकार से लेकर दुनिया की छोटे से छोटे देशों की सरकार को चलाते हैं, देश की हर राजनीतिक पार्टी इनके पैसे से चुनाव लड़ती है, यही आर्थिक दैत्य दुनिया के हर युद्ध की जगह और समय तय करते हैं, हर युद्ध इनके फायदे के लिए लड़ा जाता है और हर देश का बजट इनके कहने से बनाया जाता है.

यही ताकतें टीवी और अखबार की मालिक हैं, आप वही जानते और मानते हैं, जो ये ताकतें चाहती हैं. आपके धर्मगुरु भी इन्हीं आर्थिक आकाओं के गुलाम हैं. जनता इन धनिकों के खिलाफ न हों जाए, इसलिए धर्मगुरु आमजन को आसपास की वास्तविकता से काटकर स्वर्ग-नर्क की कल्पनाओं में उलझा कर रखते हैं. यही आर्थिक ताकतें आपके बच्चों के शिक्षण संस्थान चलाते हैं, इसलिए आपका बच्चा वही पढता है जो इन आर्थिक ताकतों का व्यापार चलाने के लिए आवश्यक है.

ध्यान से देखने पर पता चलता है कि आज ग्रामीण आदिवासी की लूट को समर्थन देने वाली ताकतें धार्मिक हैं, राष्ट्रवादी हैं, सेना और पुलिसभक्त हैं, सरकार को ही लोकतंत्र और राष्ट्र मानने वाली हैं और शहरी हैं. ये लड़ाई अभी और क्रूर और व्यापक होगी और इन शक्तियों का प्रतिरोध भी उतना ही व्यापक और तीव्र होगा.
Souce : Janjwar, TUESDAY, 17 JANUARY 2012 22:45